
आज के अखबार अपनी संपादकीय स्वतंत्रता या विज्ञापन व्यवस्था के नशे में पहले पन्ने पर यह बताना भूल गये कि केंद्र सरकार ने किसानों को वार्ता के लिए बुलाया है और डल्लेवाल ने अब जाकर चिकिस्सा सहायता लेने की सहमति दी है। आप जानते हैं कि केजरीवाल ने कहा था कि वे बड़ा बंगला, लाल बत्ती वाली गाड़ी नहीं लेगें तो उनका शीश महल इस्तीफा देने और भाजपा सरकार द्वारा नई मुख्यमंत्री को नहीं देने के बाद भी मुद्दा है लेकिन झोला उठाकर चल दूंगा, 50 दिन में सपनों का भारत बना दूंगा, 100 दिन में काला धन ले आउंगा, चौराहे पर आ जाउंगा – लोग भूल गये हैं। मीडिया क्यों भूल गया है?
संजय कुमार सिंह
आज सैफ अली खान पर हमले में दो लोगों की गिरफ्तारी फिर भी हमले की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं होना, कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर से बलात्कार और हत्या के आरोप में एकमात्र अभियुक्त संजय रॉय को दोषी पाये जाने और आज सजा सुनाए जाने की खबर के अलावा एक तीसरी खबर है, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर हमले की। यह खबर, उससे संबंधित राजनीति और भाजपा के बचाव या आरोप के कारण अखबारों की भूमिका भी बताती है। इसमें भाजपा का प्रचार और बचाव सबसे महत्वपूर्ण है। दिल्ली में चुनाव है, प्रचार चल रहे हैं और केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को लगातार कड़ी टक्कर देने वाली आम आदमी पार्टी उसके मुकाबले डटकर खड़ी है। इस बार आम आदमी पार्टी ने चुनाव जीतने की भाजपाई कोशिशों की पोल खोली है। राहुल गांधी ने संघ परिवार पर आरोप लगाये हैं और हम लोग दस साल से भाजपा शासन का सच देख रहे हैं।
ऐसे में आम लोगों (अखबारों भी पढ़ सकते हैं) द्वारा भाजपा का समर्थन करने का कोई कारण नहीं है और अगर केजरीवाल पर हमला हुआ है तो अखबारों को साफ-साफ बताना चाहिये और अगर वे सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं तो इसका खुलासा करना अखबारों का काम ही है। दोनों स्थितियों में आज यह साफ होना चाहिये था कि हमला हुआ है या नहीं औऱ हुआ है तो हमलावर पकड़े गये या नहीं। पकड़े गये तो कौन हैं और नहीं पकड़े गये तो क्यों। चुनाव के समय यह किसी भी चुनाव क्षेत्र में कानून व्यवस्था की स्थिति सामान्य रखने की जरूरत का मामला है। दिल्ली में कानून व्यवस्था की स्थिति केंद्र सरकार के हाथ में है। इसलिए आरोप के साथ उससे संबंधित रिपोर्टिंग का भी महत्व है। लेकिन अघोषित इमरजेंसी के समय में अखबार जो कर रहे हैं वह शर्मनाक है। इसलिए आज सबसे पहले केजरीवाल पर हमले की खबर।
टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू और द टेलीग्राफ में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। खबर इंडियन एक्सप्रेस में भी पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर सूचना है। इसके अनुसार, आप ने कहा कि केजरीवाल की कार पर हमला हुआ; भाजपा ने कहा कि उसके कार्यकर्ताओं को चोट लगी थी। मुझे लगता है कि भाजपा कार्यकर्ताओं को चोट लगने का मतलब नहीं है कि वे अरविन्द केजरीवाल या किसी और को भी मारे और खुद न्याय करें या बुलडोजर न्याय किया जाये। अगर भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ था तो केजरीवाल की कार पर हमला होना किसी भी तरह से सामान्य नहीं है और यह कानून व्यवस्था का मामला है। वैसे ही जैसे स्कूल में दो बच्चों की मार-पीट में खून-खराबा हो जाये तो वह स्कूल के अधिकार क्षेत्र से बाहर पुलिस का मामला बन जाता है।
अगर भाजपा कार्यकर्ताओं को चोट लगने के जवाब में केजरीवाल पर हमला हुआ है तो खबर वही थी। वह नहीं जो आज छपी है। इंडियन एक्सप्रेस की अंदर वाली खबर देखने से पहले आइये पहले पन्ने की खबरें देख लें। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, आप और भाजपा में चुनाव प्रचार के दौरान आरोप-प्रत्यारोप। खबर भी यही है कि आप ने आरोप लगाया, भाजपा ने कहा कि केजरीवाल की गाड़ी ने जानबूझकर युवा प्रदर्शनकरियों को टक्कर मारी थी। खबर के अनुसार आप ने इसका वीडियो भी जारी किया है। भाजपा के इस आरोप को मान भी लिया जाये कि केजरीवाल की गाड़ी ने प्रदर्शनकारियों को टक्कर मारी थी तो सवाल है कि क्या जवाब में पत्थर फेंकना सही है और नहीं है तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। दो ही कारण हो सकते हैं, 1) आरोप गलत है या 2) पक्षपात हो रही है।
खबरों से लगता है कि टक्कर पहले मारी गई पत्थर बाद में फेंके गये लेकिन शिकायत आप ने पहले की और भाजपा को बचाव में आना पड़ा। अगर ऐसा है तो भाजपा का पूरा सिस्टम आप से मार खा रहा है और आगे है। चुनाव प्रचार और चुनावी स्थिति से संबंधित खबर असल में यह है। आरोप-प्रत्यारोप तो बिल्कुल नहीं। आदर्श आचार संहिता के अनुसार दोनों गलत है, चुनाव आयोग क्या कर रहा है और अखबार की खबर से पता क्यों नहीं चल रहा है कि उसकी राय में क्या हुआ होगा। अगर वाकई स्थिति इतनी बुरी है कि प्रदर्शनकारियों को जान-बूझकर टक्कर मारी जा रही है और जवाब में प्रदर्शनकारी पत्थर चला रहे हैं तो चुनाव निष्पक्ष होगा? मतदाता सूची में हेर-फेर के आरोपों के बावजूद चुनाव आयोग की चुप्पी उसकी निष्पक्षता को संदिग्ध बता रही है और अब हमले की खबर पर आज की यह रिपोर्टिंग बता रही है कि मीडिया (का एक वर्ग) भी निष्पक्ष नहीं है। पूरी बात या सिर्फ सत्य नहीं बताता है। जहां तक भाजपा की बात है वह केंद्र में सत्ता में है और अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल कर रही है और इस कारण कल अंतिम समय में आप की एक डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन रोक दिया गया। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर भी है और मुझे लगता है कि भाजपा की मनमानी के मामले ज्यादा है और खबर अगर होनी थी तो उसी की होनी चाहिये थी। हमले की खबर तब खबर होती जब किसी को चोट लगी होती, एफआईआर होती। अभी तक की खबरों से ऐसा नहीं लग रहा है।
पहले पन्ने पर जो आरोप प्रत्यारोप छपे हैं उसके अनुसार, दिल्ली की मुख्यमंत्री अतिशि ने कहा है, भाजपा क्या चुनावों में जंगलराज लाना चाहती है? चुनाव आयोग को इसकी जानकारी होनी चाहिये और रोकने की व्यवस्था भी उसी को करनी है। अखबारों की खबरों से हम जानते हैं कि भाजपा चुनाव लड़ती है तो हिंसा होती है। राहुल गांधी आरोप लगा चुके हैं और अखबार दिखा चुके हैं कि वे भी प्रभाव में हैं। आज फिर लग रहा है कि न सिर्फ भाजपा, चुनाव आयोग भी दबाव में है। इसका पता भाजपा नेता प्रवेश वर्मा के इस आरोप से लगता है ….पंजाब के पुलिसियों ने तीन बेरोजगार लोगों को पीटा (गाड़ी से जानबूझकर टक्कर मारी से अलग आरोप है)। वर्मा ने यह भी कहा बताते हैं कि केजरीवाल ने ड्राइवर से कहा कि उनके ऊपर गाड़ी चढ़ा दे। कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली चुनाव में पंजाब पुलिस का क्या काम और आरोप का क्या मतलब है।
ऐसे में चुनाव आयोग क्यों शांत है। वह पंजाब पुलिस के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है – दो कारण हो सकते हैं 1) आरोप निराधार हैं और 2) अगर पहले की शिकायतों पर कार्रवाई हुई होती तो अभी भी होती। उल्लेखनीय है कि भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री के बेटे पर किसानों के ऊपर गाड़ी चढ़ा देने का आरोप है। मंत्री जी ने इस्तीफा नहीं दिया। बेटे को जमानत मिल गई है। आगे की कार्रवाई, सजा, मुकदमे की खबर नहीं है। जबकि आज कोलकाता के आरजी कर अस्पताल मामले के आरोपी को दोषी ठहराये जाने की खबर है। किसानों की हत्या पहले हुई थी। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि भाजपा की राजनीति और कार्यशैली कैसी है। फिर भी अखबार अगर उसी के साथ हैं तो मामला गड़बड़ है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार फिल्म की स्क्रीनिंग जिला चुनाव अधिकारी ने रोकी है क्योंकि उनसे अनुमति नहीं ली गई थी। मुझे नहीं लगता कि आम आदमी पार्टी इतनी कच्ची खिलाड़ी है और इतना हल्का आरोप लगाकर भाजपा को मौका देगी कि उसे फंसा सके और भाजपा मौका चूक जायेगी। भाजपा और उसकी राजनीति अपनी जगह, खबर का विवरण तो चाहिये था। इस खबर का विस्तार अंदर के पन्ने पर है। वहां बताया गया है कि फिल्म की स्क्रीनिंग घोषित थी, पुलिस ने रोका क्योंकि चुनाव अधिकारी से अनुमति नहीं ली गई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली पुलिस भाजपा के सीधे नियंत्रण में है। चुनाव आयोग अमूमन भाजपा के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता है।
दि एशियन एज में खबर लगभग वैसे ही और उसी क्रम में है जैसे हिन्दुस्तान टाइम्स में और यहां भी मैं यही कहूंगा कि आप प्रमुख की कार ने भाजपा कार्यकर्ताओं को घायल भी कर दिया हो तो भाजपा कार्यकर्ता स्वयं बुलडोजर न्याय नहीं कर सकते थे और किया है तो उसका समर्थन अखबारों को नहीं करना चाहिये उलटे जनता को बताना चाहिये कि भाजपा की नीति और राजनीति क्या है ताकि लोग सही जगह वोट दें। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में यह खबर लगभग एक ही तरह से छपी है जो हिन्दी अखबारों में आम है, आरोप-प्रत्यारोप। मेरा मानना है कि अखबारों का पहला पन्ना आरोप-प्रत्यारोप के लिए नहीं होने चाहिये और इसपर गंभीर खबरें छपनी चाहिये। अगर यह नहीं छाप सकते कि दिल्ली पुलिस ने आप को एक फिल्म की स्क्रीनिंग से रोक दिया तो आम आदमी पार्टी पर भाजपा के इस आरोप का कोई मतलब नहीं है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने युवाओं पर गाड़ी चढ़वाई। वह भी तब जब ऐसा ही आरोप भाजपा के एक केंद्रीय मंत्री के बेटे पर है और इस मामले में क्या कार्रवाई हुई उसकी खबर नहीं है।
उसके बाद के आरजी कर मेडिकल कालेज मामले में अभियुक्त को दोषी ठहराया जा चुका है, आज उसे सजा सुना दी जायेगी। अमर उजाला की खबर की खास बात यह है कि घायल युवकों को लेडी हार्डिंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है और केजरीवाल की पार्टी ने वीडियो जारी किया है इसलिए मामला हवा-हवाई नहीं है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की खबर है कि दोनों पक्षों ने पुलिस को शिकायत नहीं दी है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर में घायलों के अस्पताल में होने और प्रवेश वर्मा का उन्हें देखने जाना सब बताया गया है फिर भी पुलिस को सूचना नहीं है तो आप समझ सकते हैं कि प्रशासन और मीडिया के लोग अपना काम कैसे कर रहे हैं। आमतौर पर मीडिया ऐसे लोगों के मुंह में माइक ठूंस देता है। पर घायल अस्पताल में हैं, पुलिस कह रही है उसे खबर नहीं है और मीडिया के पास पूरी सूचना नहीं है। किसे सच माना जाये। जहां तक हमले के कारण की बात है, अगर सैफ अली खान पर हमले का कारण चिन्ता का विषय नहीं है तो क्या केजरीवाल पर हमले का कारण होना चाहिये और नहीं होना चाहिये तो भाजपा को बचाव की जरूरत क्यों पड़ी।
नवोदय टाइम्स में यह खबर टॉप पर है। यहां केजरीवाल की कार पर पत्थर फेंकने का आरोप ही शीर्षक है। प्रवेश वर्मा का बचाव या पक्ष उपशीर्षक है। जैसा मैंने पहले कहा है, केजरीवाल की गाड़ी ने टक्कर मारी भी थी तो पत्थर फेंकना गलत है और यह बचाव नहीं हो सकता है तथा इसी को जंगल राज कहा जाता है। जहां तक सवाल पूछने वालों के साथ तानाशाही की बात है, भाजपा और उसने नेता यह सब पहले से बेहतर करते आये हैं। मेरा मानना है कि यह सब रिपोर्टर को मालूम होना चाहिये और खबर लिखते समय सच-झूठ का अंदाजा लगाने में यह सब काम आता है या इसका उपयोग किया जाना चाहिये। आप सब कुछ भूल जायें, पाठक नहीं भूलता है और इसी से तय करता है कि किस अखभार या रिपोर्टर की खबर अच्छी होती है।
इंडियन एक्सप्रेस ने इसे दिल्ली चुनाव की खबरों के पन्ने पर छापा है। यहां भी आप का आरोप ही पहले है और भाजपा का जवाब बाद में है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का उपशीर्षक है, पुलिस ने कहा किसी भी पक्ष से कोई शिकायत नहीं मिली है। लेकिन घायलों के अस्पताल में दाखिल होने के बावजूद पुलिस को खबर नहीं है तो जाहिर है, पूरा मामला अखबारों के लिए ही हो सकता है। अगर यह आम आदमी पार्टी की ओर से है तो उसकी मजबूरी हो सकती है और मुझे टाइमिंग नहीं पता लेकिन फिल्म की स्क्रीनिंग रोकने का आरोप पहले पन्ने पर नहीं छपने से साफ हो गया है कि आप मीडिया और सरकारी पक्षपात से परेशान हो सकती है या भाजपा को इस मामले में भी जीतने नहीं दे रही है। खबरों में अखबारों और सरकार का पक्षपात दिख रहा है।
सैफ अली खान का फॉलो अप आज मेरे आठ में से तीन ही अखबारों में पहले पन्ने पर है। अगर यह हमाला चोरी या लूट के लिए नहीं किया गया है तो क्या हो सकता है समझना मुश्किल नहीं है। लेकिन ताजुजब की बात है कि अखबारों में इसपर अटकल नहीं है वैसी खबरें नहीं हैं जैसी आम आदमी पार्टी के खिलाफ हैं। इंडियन एक्सप्रेस, द टेलीग्राफ के अलावा दि हिन्दू में आज यह खबर सिंगल कॉलम में है जबकि बाकी दोनों में चार कॉलम की। संदिग्ध की गिरफ्तारी के बाद भी अखबारों ने नहीं लिखा है कि हमले का कारण कुमार विश्वास का भड़काऊ बयान हो सकता है। या पुलिस इस पहलू की भी जांच कर रही है या क्यों नहीं कर रही है। भाजपा या किसी और दल के नेता ने भी अभी तक कहा हो तो खबर में दिखा कि सार्वजनिक जीवन जीने वाली हस्तियों के खिलाफ ऐसे भड़काऊ बयान नहीं दिये जाने चाहिये। यह देश का सामाजिक ताना-बाना बनाये रखने के लिए जरूरी है। द टेलीग्राफ की आज की खबर में लिखा है, करीना कपूर ने पुलिस से कहा है कि हमलावर ने घर में रखे जेवरों को नहीं छुआ। वह बेहद आक्रामक था। मैंने देखा कि वह सैफ पर बार-बार वार कर रहा था…. हमारी प्राथमिकता उन्हें अस्पताल ले जाने की थी। आज के अखबार अपनी संपादकीय स्वतंत्रता के नशे में ऐसे मस्त हैं कि पहले पन्ने पर यह बताना भूल गये कि केंद्र सरकार ने किसानों को वार्ता के लिए बुलाया है और डल्लेवाल ने चिकिस्सा सहायता लेने की सहमति दे दी है। किसान नेताओं के साथ केंद्र सरकार की बैठक दिल्ली चुनाव के नतीजों के बाद 14 फरवरी को होगी। इंडियन एक्सप्रेस में यह तीन कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सिंगल कॉलम में है।


