Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

संजीव श्रीवास्तव जी ने तब लखनऊ के सौ-सौ करोड़ के मालिक पत्रकारों के बीच मुझे चुना और फोकस न्यूज़ का यूपी हेड बना दिया!

ज्ञानेंद्र शुक्ला-

एक पाती भावों को अर्पित-यादों को समर्पित: कल राजस्थान से एक खबर दिखी कि देश के नामचीन पत्रकार Sanjeev Srivastava ने जयपुर में रेस्टोरेंट शुरू कर दिया है, कई वरिष्ठ पत्रकार उनकी दुकान पर कचौरी का स्वाद चख चुके हैं। वरिष्ठ पत्रकार Arvind Chotia का उनसे बातचीत करते वीडियो दिखा तो संजीव सर से जुड़े तमाम वाकये चलचित्र के मानिंद आँखों के आगे घूम गए।

बारह वर्ष बीत गए पर लगता है कि कल का ही किस्सा था जब वरिष्ठ पत्रकार शंकर अनिमेष जी का फोन आया…पूछा कि क्या मैं एक नए नवेले संस्थान से जुड़ना चाहूंगा जिसके ग्रुप एडीटर संजीव श्रीवास्तव जी हैं। इतने चर्चित पत्रकार से मिलने का मौका भला कौन चूकता, अगले ही दिन नोएडा पहुंच गया। पहली ही मुलाकात में संजीव सर की सहजता-स्नेहिल स्वभाव मन को भा गया।

सर से मैंने पूछा कि मुझे कैसे चुना तो हंसते हुए बोले के यार लखनऊ में जिन भी लोगों के बारे में पता किया तो बताया गया कि सौ-सौ करोड़ के मालिक हैं, ऐसे में आपके बारे में पता चला कि उस करोड़ी दायरे में नहीं हो, फिर कमाल खान जी और दूसरे वरिष्ठ पत्रकारों से भी बात की तो आपका नाम सामने आया। फिर तो फोकस न्यूज चैनल में बतौर यूपी ब्यूरो चीफ नए सफर का आगाज़ हो गया।

देश की राजनीति में मोदी युग के सूत्रपात वाले दौर में संजीव सर के नेतृत्व में यूपी में अपनी टीम गठित करने और काशी से लेकर तमाम शहरों के चुनावी सफर को कवर करने का मौका मिला। मशहूर एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी को एक रिपोर्टर के तौर पर शामिल करने का आईडिया सर का था, नवाजुद्दीन की यूपी की चुनावी यात्रा की स्क्रिप्ट लिखने का मौका मुझे मिला।

महज एक दिन में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी सहित राजनाथ सिंह जी, लालजी टंडन जी से लेकर कल्बे सादिक सरीखी दिग्गज हस्तियों का इंटरव्यू लाइनअप करने और कुड़ियाघाट पर चुनावी शो को मैनेज करने का चुनौतीपूर्ण दायित्व मिला। वरिष्ठ पत्रकार साथी बृजेश सिंह, कैमरा साथी जीतेश, नीरज, दिवाकर, सुमित के सहयोग से जटिल काम आसानी से संभव हो गया। संजीव सर की अगुवाई में एक से एक बेहतरीन स्टोरीज पर काम करने का सुअवसर मिला।

नेपाल की भूकंप त्रासदी की कवरेज के दौरान संजीव सर से ‘इंटरनेशनल रिपोर्टिंग’ के तमाम पहलुओं को समझा। अमूमन चैनलों के संपादक दूरस्थ ब्यूरो के फील्ड रिपोर्टर्स की तुलना में डेस्क के पुरोधाओं को अधिक तरजीह देते हैं, क्योंकि उनके संग उनका हर रोज का मिलना होता है। पर संजीव सर सबमें गजब का संतुलन बनाने के महारथी दिखे। पत्रकारिता में अव्वल योग्यता रखने वाले खांटी पत्रकार संजीव सर कारपोरेट कुटिलता-तिकड़म के आगे कभी नहीं झुके लिहाजा उनकी चैनल में पारी लंबी नहीं चल सकी। मैं भी दूसरे संस्थानों के सफर पर निकल गया।

संजीव सर से साल 2019 में तब मुलाकात हुई जब वह 92 की घटना को लेकर बने लिब्राहन कमीशन में बतौर गवाह लखनऊ पहुंचे थे, अपने निश्छल अंदाज में हंसते हुए बताया कि एयरपोर्ट से कमीशन के दफ्तर तक लाने ले जाने के लिए लखनऊ पुलिस ने कितनी खटारा गाड़ी भेजी।

चाहें लोकसभा चुनाव हों या फिर यूपी के विधानसभा चुनाव हर बार संजीव सर का फोन आया। चुनाव के दौरान की हवा को परखने-जमीनी हकीकत को समझने की अपनी सहज वृत्ति के लिए सर ऐसा करते रहे होंगे पर मेरे लिए उनसे बात होना ही सुखद अनुभूति थी।

अपनी शर्तों पर जीने वाले संजीव सर ने एक वेबसाइट की शुरूआत की। पर बदलते दौर में मीडिया का कलेवर बदल रहा था ऐसे युग ने दस्तक दे दी थी जहां अंधविरोध या अंधसमर्थन ही न्यू नार्मल होने जा रहा था। पत्रकारिता के इस संक्रमण काल में निष्पक्ष मीडिया और मीडियाकर्मियों का मन उचटने लगा। संजीव सर सरीखे संपादक न उस दौर से सहमत थे जब जादू-सांप-भूत की नौटंकी पत्रकारिता का दौर था न ही इस दौर से जब मौजूदा सत्ता के समर्थन में ‘प्रशस्तिगान’ करना या विरोध में ‘छाती पीट स्यापा’ करना ही पत्रकारिता मानी जाती हो।

सत्ता के ‘चारण भाट’ बनकर या विरोध में ‘न्यूज विदूषक’ बनकर मीडिया के दमकते कई सितारे इस शेर को मौजूं किए हुए हैं कि-

“शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते हैं, इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं ख़्वाईशो के बोझ में ‘बशर’, तू क्या क्या कर रहा है, इतना तो जीना भी नहीं, जितना तु मर रहा है….”।

ऐसे कालखंड में संजीव सर सरीखी चंद पत्रकारीय हस्तियां न सत्ता के ‘चारण भाट’ बनने को तैयार हुए न ही विरोध के ‘न्यूज विदूषक’, वे भारी भरकम पगार लपकने- स्क्रीन पर दिखते रहने के मोहपाश से परे हैं। बीबीसी नेशनल हेड रहे संजीव सर टाइम्स आफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, डीडी न्यूज का भी हिस्सा रहे- पत्रकारीय पेशे के शिखर तक की यात्रा कर चुके संजीव सर संभवता मैस्लो के self actualization यानी आत्मबोध या “स्व-वास्तविककरण” के चरण में है, जहां दुनियावी अंहकार बेमानी हो जाते हैं। वो सब करने की उत्कंठा होती है जिसमें स्व परिभाषित हो सके, मन को सुख पहुंच सके।

इसलिए तमाम भौतिक संपन्नता के बावजूद उन्हें कचौरी बेचना भी सुखकर प्रतीत हो रहा है। सर से बहुत कुछ सीखा-अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। संजीव सर के लिए ये पंक्तियां सटीक हैं, “हर जगह इत्र ही नहीं महका करते, कई शख्सियत ऐसी हैं जिनका किरदार भी खूशबू बिखेरता है।”

ये भी पढ़ें…

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन