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आज के अखबार : सरकार के समर्थन की ‘मजबूरी’ में चुनाव आयोग का भी प्रचार करता दि एशियन एज

संजय कुमार सिंह

राहुल गांधी ने वोट चोरी के जो आरोप लगाये हैं उसके साथ यह भी कहा है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 25 सीटें कम होतीं तो नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं होते। यानी उनकी सरकार चोरी से बनी है। बड़ा आरोप है। आज देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, मोदी सरकार चोरी की सरकार है -खरगे। ऐसे में सरकार और चुनाव आयोग की चिन्ता यह होनी चाहिये कि बैंगलोर सेंट्रल की तरह अगर वाकई अन्य सीटों की जीत संदिग्ध साबित हो गई तो सरकार का क्या होगा? शपथपत्र इसके लिए मांगा जाना चाहिये। लेकिन यह कहने के लिए शपथपत्र मांगा जा रहा है कि बैंगलोर सेंट्रल के एक विधानसभा क्षेत्र महादेवपुरा से संबंधित अपनी जांच और आरोपों के समर्थन में शपथपत्र दें। मुझे नहीं लगता है कि कांग्रेस या राहुल गांधी या कांग्रेस की ओर इस जांच का नेतृत्व करने वाले किसी व्यक्ति को ऐसा शपथपत्र देने में बहुत दिक्कत आयेगी। जो स्थितियां हैं उनमें देर-सबेर कांग्रेस को ऐसा करना ही पड़ेगा। चुनाव आयोग और उसे संरक्षण देने वाले लोग यह नहीं समझ रहे हैं कि शपथपत्र आ ही गया तो क्या होगा। मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची देनी पड़ी और यह साबित हो गया कि प्रधानमंत्री का पद वोट चोरी से प्राप्त किया गया है तो क्या होगा। असल में व्यवस्था के पास संकट बड़ा है और राहत के उपाय बहुत सीमित। भाजपा या मौजूदा गठबंधन ने अभी तक सत्ता में बने रहने के लिए जो सब किया है वह बहुत सोची-समझी योजना नहीं है और जरूरत के अनुसार एक-एक कदम उठाये गये हैं। इसमें तमाम यू टर्न, मनमानी और चूक हैं। इसका जिक्र मेरी किताब, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली – में क्रमबद्ध ढंग से किया गया है। इसे पढ़कर आप मानेंगे कि अगर सब गड़बड़ नहीं है तो सब ठीक भी नहीं है।

ईवीएम की गड़बड़ी और इसके दुरुपयोग का आरोप पुराना है। इससे बचने के लिए जो सब कहा और किया गया है उसमें यह शामिल है 2019 के चुनाव नतीजों पर अनुसंधान करने वालों को परेशान किया जाना। 2019 के नतीजों से संबंधित शिकायतों पर सुनवाई-कार्रवाई नहीं हुई है और अब 2025 के नतीजो को चुनौती है। जांच और अनुसंधान रोकने की कोशिशें हैं और वह क्यों मजबूरी है समझना मुश्किल नहीं है। ऐसे में शपथपत्र मांगना चाहे जितना ठीक हो, दाखिल कर दिये जाने के बाद क्या होगा यह शायद सोचा नहीं गया है। बैंगलोर लोकसभा क्षेत्र के एक विधानसभा सीट के इस परीक्षण से साबित हुआ है कि महादेवपुरा में एक लाख 250 वोट की चोरी की गई। यह चोरी पांच भिन्न तरीकों से की गई। इस कारण लोकसभा चुनाव में यहां भाजपा को बहुत ज्यादा वोट मिले और इससे कांग्रेस बैंगलोर सेंट्रल सीट पर चुनाव हार गई। तथ्य है कि इस सीट पर भाजपा के पीसी मोहन ने कांग्रेस के मंसूर अली खान को 32707 वोट से हराया था। राहुल गांधी ने कहा कि इस 32,707 वोटों के अंतर का ज्यादातर हिस्सा महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र से आया, जहाँ भाजपा की बढ़त लगभग 1.14 लाख वोट थी। राहुल गांधी का दावा है कि महादेवपुरा का वोटिंग डेटा शामिल नहीं किया जाए यानी इस बढ़त को हटा दिया जाए तो कांग्रेस बंगलौर सेंट्रल सीट को 82,000 से अधिक वोट के अंतर से जीत जाती। हटाने की बात इसलिये कि यहां एक लाख 250 वोट संदिग्ध पाये गये हैं। इस तथ्य के बावजूद कि भाजपा घुसपैठियों के वोट रोकना चाहती है। आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, घुसपैठिये वोट नहीं कर सकते हैं (अमित) शाह ने बिहार में एसआईआर का समर्थन किया।

यह विचित्र है कि भाजपा (और नरेन्द्र मोदी) ने घुसपैठियों के मुद्दे को इतनी हवा दी है और बिहार में एसआईआर अगर इसी के लिए कराया जा रहा है तो कोई घुसपैठिया मिला नहीं या जो अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पा रहे हैं उन्हें घुसपैठिया नहीं कहा जा रहा है। दूसरी ओर, राहुल गांधी ने महादेवपुरा की मतदाता सूची में जो गड़बड़ियां बताई हैं वही बिहार की मतदाता सूची के प्रारूप में भी मिल रही हैं और एसआईआर को कोई लाभ नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग और उसके समर्थक मानें या न मानें, महादेवपुरा के नतीजे गौरतलब हैं। राहुल गांधी कह रहे हैं कि ऐसा 25 से ज्यादा लोकसभा क्षेत्रों में है। उनके लिए यह वोटों की चोरी (हुई हो या नहीं) साबित करने का अच्छा मौका है। कोई माने या न माने। इसलिए मुझे लगता है कि कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ेगी और जरूरत हुई तो शपथ पत्र भी देगी। सरकार और चुनाव आयोग के लिए वह और बड़ी समस्या होगी और चुनाव आयोग अगर अभी इस मामले से ढंग से निपटता (जो मुश्किल है) तो भविष्य की समस्या से शायद बच पाता। आगे उसका या व्यवस्था का फंसना निश्चित है। कहा जा सकता है कि अशोका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर, सब्यसाची दास के शोधपत्र “डेमोक्रैटिक बैकस्लाइडिंग इन द वर्ल्ड्स लारजेस्ट डेमोक्रेसी” (दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकतांत्रिक पतन) से जो सवाल खड़े हुए थे उनसे निपट लिया गया पर अब वही मामला पर्याप्त गंभीर हो चुका है। आपको याद न हो तो बता दूं कि इस शोध में 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत के कुछ निष्कर्षों पर सवाल उठाए गए थे। इनमें एक था, बेहद नज़दीकी मुकाबलों में जीत का असामान्य वितरण। यह मतदाता से संबंधित संभावित पेंच या ‘इलेक्ट्रोरेल मैनिपुलेशन’ की ओर इशारा करता था।

इस शोध पर हुए विवाद (संभवतः सरकारी दबाव) के कारण इस शोध-पत्र की कोई समीक्षा (किसी समकक्ष द्वारा किये जाने का रिवाज है) किसी अकादमिक जर्नल में प्रकाशित नहीं हुई और इस तरह इसकी गंभीरता को खत्म किया गया। यह शोध सोशल साइंस रिसर्च नेटवर्क (एसएसआरएन) पर ही उपलब्ध था। यह तथ्य या पुरानी खबर है कि जैसे ही यह चर्चा सार्वजनिक हुई, अशोका यूनिवर्सिटी ने इस शोध से दूरी बना लिया। विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि यह शोध उनके आधिकारिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं करता, क्योंकि यह पीयर रीव्यू की प्रक्रिया से नहीं गुज़रा था। विवाद बढ़ने पर, सब्यसाची दास ने अप्रचलित विरोध, राजनीतिक दबाव और अकादमिक स्वतंत्रता में कमी की पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय से इस्तीफ़ा दे दिया था। अब राहुल गांधी इस्तीफा देने से तो रहे। उन्हें पप्पू साबित करने की कोशिश, संसद की सदस्यता खत्म किया जाना, नेशनल हेरल्ड मामले में बदनाम किये जाने को इससे जोड़कर देखिये तो मानना पड़ेगा कि उनकी बातों में दम है और व्यवस्था की परेशानी वास्तविक है। मेरी चिन्ता यह है कि सब कुछ जानते समझते हुए भी मीडिया के लोग इसे गंभीरता से क्यों नहीं देख रहे हैं। देश और व्यवस्था के नुकसान को क्यों नहीं बता रहे हैं। सभी संवैधानिक संस्थाओं के सरकार के नियंत्रण में होने के बाद भी वे देश को छो़ड़कर अपनी चिन्ता में क्यों लगे हुए हैं और देश या लोकतंत्र ही नहीं रहेगा तो पैसों का क्या करेंगे। फिर भी, दि एशियन एज ने आज चुनाव आयोग की इस चनौती को लीड बनाया है, राहुल गांधी ने वोट चोरी के आरोप दोहराये तो चुनाव आयोग ने कहा, शपथ पत्र पर दस्तखत कीजिये या माफी मांगिये। मुझे लगता है कि यह चुनाव आयोग को जरूरत से ज्यादा प्रचार देना है। आज यह खबर मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर खबर है, “क्या चुनाव आयोग भाजपा का एजेंट बन चुका है : राहुल”। असल में आज सर्वसम्मत लीड जैसी कोई खबर भी नहीं है। लेकिन वह अलग मुद्दा है।  फिर भी आइये आज भिन्न अखबारों की लीड देख लें।

1. हिन्दुस्तान टाइम्स

अमेरिकी धमकियों के बीच, मोदी, पुतिन ने ‘विशेष संबंधों’ पर जोर दिया।

(अधपन्ने पर) घुसपैठिये वोट नहीं कर सकते हैं (अमित) शाह ने बिहार में एसआईआर का समर्थन किया

2. इंडियन एक्सप्रेस

रूसी तेल पर ट्रम्प टैरिफ को लेकर विवाद के बीच मोदी और पुतिन ने गहराते संबंधों पर चर्चा की  

3. टाइम्स ऑफ इंडिया

प्रधानमंत्री ने पुतिन से बात की जबकि चीन ने एससीओ सम्मेलन में उनका स्वागत किया।

4. द हिन्दू

टैरिफ विवाद के बीच मोदी और पुतिन ने यूक्रेन की चर्चा की

5. दि एशियन एज

राहुल गांधी ने वोट चोरी के आरोप दोहराये तो चुनाव आयोग ने कहा, शपथ पत्र पर दस्तखत कीजिये या माफी मांगिये

6. द टेलीग्राफ

कोलकाता की स्थानीय खबर, ऑटिस्टिक विद्वान ने हार मानी (लगता है आत्म हत्या कर ली)। पहले पन्ने पर एक ऐसी खबर है जो दूसरे अखबारों में नहीं दिखा, भारत ने अमेरिकी हथियार और विमान खरीदने की अपनी योजना को टाल दिया है और रक्षा अधिकारियों ने इससे इनकार किया है।

7. अमर उजाला

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार के खिलाफ फैसला वापस, शीर्ष कोर्ट ने कहा – न्यायपालिका के सम्मान की चिन्ता।

8. देशबन्धु

मोदी सरकार चोरी की सरकार है -खरगे

9. नवोदय टाइम्स

मोदी-पुतिन ने साझेदारी मजबूत करने पर बात की।

यहां यह बताना सही रहेगा कि चुनाव आयोग ने ईवीएम हैक करके दिखाने वाले हैदराबाद स्थित इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) से जुड़े एक ईवीएम तकनीकी विशेषज्ञ, हरि कृष्णा प्रसाद वामुरु पर ईवीएम चोरी का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था। ईवीएम की सुरक्षा को अभेद्य न होना दिखाने के लिए किसी को चोर बना दिया जाये तो निश्चित रूप से उसे यह अपमानजनक लगेगा और इस तरह ईवीएम की लाज बचाई गई। चुनाव आयोग ने किसी को जांचने के लिए ईवीएम दिया ही नहीं और कहता रहा कि जो हैक किया गया है वह उसका नहीं है और एक चुनौती आयोजित की। पर तब शर्तें ऐसी थीं कि किसी ने स्वीकार नहीं किया। तब जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी वह बाद में इंटरनेट पर नहीं मिली। मेरी किताब में उसका भी जिक्र है। चुनाव आयोग ने इस तरह ईवीएम की लाज बचाई तो अब मतदाता सूची के मामले में फंसा हुआ है। कुछ लोगों को लगता है कि ईवीएम का मामला साबित नहीं हुआ जबकि यह गलत है औऱ साबित हो चुका है। अब इस मामले में भी चोरों को बचाने की कोशिश है या चोर बचने की कोशिश में हैं। मीडिया निष्पक्ष रिपोर्टिंग करके लोगों को सच्चाई बताने की जगह आरोपियों का साथ दे रहा है।  पाठकों को सच्चाई क्यों नहीं बता रहे हैं। वैसे भी फैसला तो मीडिया को नहीं करना है। फैसला तो जनता ही करेगी और अगर सरकार गलत तरीके से चुनाव जीत रही है तो जनता को यह जानने का हक है कि वह जिसका समर्थन कर रही है वह इस काबिल नहीं है।

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