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काशी से मुंबई… पत्रकारीय जीवन के तीन दशक यूं हुए पूरे… किन-किन का नाम हूं, किस-किस को धन्यवाद कहूं…

आज मुझे तीस साल पूरे हो गए पत्रकारिता करते हुए। आज के दिन ही बनारस से प्रकाशित ‘लोकइच्छा’ अखबार में नगर संवाददाता के रूप में जुड़ा था, वो भी आश्चर्यजनक तरीके से। आश्चर्य इस मामले में कि किसी साथी के साथ ‘जयदेश’ अखबार में एक विज्ञप्ति लेकर गया था। काशी पत्रकार संघ के ठीक सामने मैदागिन में ‘जयदेश’ और ‘सन्मार्ग’ दोनों का ऑफिस था। नीचे ‘सन्मार्ग’, ऊपर ”जयदेश’।

‘सन्मार्ग’ की दीवार पर ही ‘जयदेश’ और ‘लोक इच्छा’ की एक एक कॉपी चिपका दी जाती थी ताकि जो पेपर खरीद न सकें, वो भी पढ़ लें। बनारस में ‘आज’ अखबार और ‘गांडीव’ तथा ‘जनवार्ता’ अखबार ऐसे ही दीवाल पर चिपका दिए जाते थे।

दीवार पर चिपका ‘लोक इच्छा’ पढ़ रहा था। उसमें एक विज्ञापन था कि इस अखबार को विज्ञापन प्रतिनिधि चाहिए। आकर्षक वेतन मिलेगा। विज्ञापन प्रतिनिधि किस चिड़िया का नाम है, नहीं पता था, मगर आकर्षक वेतन शब्द ने जरूर आकर्षित किया। अगले दिन चांप दिया साइकिल और पहुंच गया ‘लोक इच्छा’ अखबार के मछोदरी के दफ्तर।

मेरा वहां संपादक आदर्श जी से मुलाकात हुई। वे पूछे- विज्ञापन के बारे में क्या जानते हो। मैंने साफ कह दिया, कुछ नहीं जानता लेकिन आप बताएंगे तो काम कर लूंगा। आदर्श सर ने मेरा फोटो लिया और मालिक से मुलाकात कराकर कुछ समझाया और एक लेटरहेड पर लिखकर दिया कि तुम नगर संवाददाता और विज्ञापन प्रतिनिधि दोनों का काम करोगे। वो जो शब्द लिखा था, आकर्षक वेतन, उस पर कोई बात नहीं हुई। खैर ट्रेडिल से ये अखबार निकलता था जिसमें लोहे के अक्षर होते थे।

कंपोज होने के बाद एक बड़े लोहे के ट्रे में प्लेट रखकर रिक्शा से मशीन में ये भारी प्लेट लेकर जाने की जिम्मेदारी मुझे दी गयी। उसके पहले शास्त्री नगर स्थित घर से निकलते समय ड्यूटी लगी थी कि लोक इच्छा आते समय पहले घर से कचहरी जाइये जहां से थोड़ी दूर पर पुलिस विभाग का डिस्ट्रिक कंट्रोल रूम यानी डीसीआर है, वहां से जिले का क्राइम का डिटेल लीजिये। फिर चेतगंज जाइये जहाँ पुलिस विभाग का सिटी कंट्रोल रूम यानी सीसीआर है, वहां से सिटी की क्राइम डिटेल लीजिये। वहां से कबीर चौरा अस्पताल आइये। वहां जो मरे या घायल हुए हैं, उनका डिटेल लीजिये। सब लाकर आदर्श शर्मा सर को देता। उन्होंने मुझे खबर लिखने की कला बताना शुरू किया मगर राइटिंग इतनी खराब की कंपोजिंग वाले चिल्लाते थे। सब कुछ पटरी पर आने लगा लेकिन वो आकर्षक वेतन वाली बात अब तक नहीं हो पाई।

खैर 6 से सात महीने काम किया लेकिन वेतन कुछ नहीं मिला। हां, अनुभव जरूर मिला। वेतन न मिलने का मुझे मलाल अब तक नहीं है। उसके बाद लहुराबीर से शायद 1990 में शाम ए संसार अखबार शुरू हुआ। वहां भी नगर संवाददाता के रूप में जुड़ा। यहां आकर्षक वेतन के नाम पर मिला 400 रुपये। यहां पेस्टिंग भी सीखा। इस दौरान आज अखबार और दैनिक जागरण के लिए फीचर लिखना शुरू किया। पहला लेख मेरा जन्मुख अखबार में अनिल सिंह जी ने छापा था। टाइटल था ‘फिल्मी सितारों की होली’। अनिल भइया ने फीचर लेखन के लिए प्रेरित किया।

आज अखबार में फीचर सेक्शन की हेड थीं कुंतल श्रीवास्तव दीदी। बहुत सपोर्ट किया। बहुत लेख लिखवाए, कला संस्कृति पर। रंगमंच तीज त्योहार कला संस्कृति में उस समय पत्रकार लोग कम दिलचस्पी लेते थे। कला संस्कृति पर लेखन में कुमार विजय जी, जिंतेंद्र मुग्ध, आलोक पराड़कर, सलीम राजा और मेरा नाम लोग लेते थे। जितेंन्द्र जी और कुमार विजय जी से काफी कुछ सीखा।

कुंतल दीदी ने आज अखबार छोड़ा और खुद का अखबार निकाला। नाम रखा वाराणसी टुडे। इस अखबार में मुझे चीफ सिटी रिपोर्टर का पोस्ट मिला। ये अखबार लंबे समय तक नहीं चला। उसके बाद काशी वार्ता अखबार से जुड़ा। काशी वार्ता के प्रकाशन के पहले दिन से मैं था जिसके मालिक थे भूलन सिंह जी। इन्ही का अखबार था जनवार्ता भी जिसमें उस समय दसवीं और बारहवीं का रिजल्ट भी निकलता था।

काशी वार्ता और जनवार्ता दोनों में लंबे समय तक काम किया। सुभाष सिंह जी ने क्राइम रिपोर्टिंग सिखाई। नदेसर पर ही काशीवार्ता व जनवार्ता का ऑफिस था और थोड़ी ही दूर पर सर्किट हाउस था, सो सुभाष भइया के साथ नेताओं की प्रेस कांफ्रेंस में भी जाने लगा। पहली प्रेस कांफ्रेंस थी मेरी अजीत सिंह जी की। उसके बाद तो शरद पवार जी, कल्पनाथ राय सहित कितने लोगों की प्रेस कांफ्रेंस अटेंड किया। इस दौरान काशी में कई बार कर्फ्यू में रिपोर्टिंग के लिए ड्यूटी लगी। नरेश रूपानी जो अब दुनिया में नहीं हैं, उनसे कर्फ्यू की रिपोर्टिंग सीखा। काशीवार्ता में वाजपेयी जी जैसे मित्र भी बने।

इस दौरान पंडित कमलापति त्रिपाठी जी का निधन हो गया जिनकी अन्तिम यात्रा में राजीव गांधी जी आये थे। मेरी ड्यूटी लगी राजीव गांधी जी से बातचीत करने का। समस्या ये थी कि राजीव गांधी तक पहुंचूं कैसे। रजनीश त्रिपाठी भइया ने मेरी मदद की। मैंने राजीव जी से दो शब्द पूछे। वो यादगार पल था मेरे लिए।

उसके बाद तो मैं रजनीश भइया का मुरीद हो गया। आज भी वे नए लोगों की मदद करते हैं। कुछ दिन न्यूज़ फ्लेम अखबार में जुड़कर सरकारी दफ्तरों में पेपर भी बांटा और रिपोर्टिंग भी की। इस दौरान एके लारी जी और रंजीत गुप्ता जी ने भी मेरी काफी मदद की। मेरे निवेदन पर वे मेरे बड़े भाई सुधीर सिंह जी को और मेरे मित्र ज्ञान सिंह रौतेला जी को पत्रकारिता में लाये। सुधीर भइया इस समय लखनऊ अमर उजाला में हैं और उनका बड़ा नाम है। ज्ञान जी भी अपना अलग रुतबा रखते हैं।

इस दौरान संडे मेल, संडे आब्जर्बर, विश्वामित्र और स्वतंत्र भारत में लेखन जारी था। एक चीज जरूर खली कि काशी पत्रकार संघ ने कभी मुझे अपना मेम्बर नहीं बनाया। हर बार मैं फार्म भरता लेकिन लिस्ट में मेरा नाम नहीं रहता जिसका मुझे आज तक मलाल है। इस दौरान 1999 में मुम्बई आ गया। यहां मायापुरी के जेडए जौहर साहब से मालवणी में उनके घर पर मिला। उन्होंने कई पीआरओ के नम्बर दिए और मेरा हौसला बढ़ाया।

इस दौरान सुमंत मिश्र जी से नवभारत टाइम्स में मिला। उनको अपने बारे में बताया। उन्होंने मुझसे कहा हेमामालिनी जी का इंटरव्यू करके लाओ। उन्होंने सिनेविस्टा भेज दिया जहाँ मैंने हेमा जी का इंटरव्यू किया। सुमंत भइया ने मेरे नाम के साथ हेमा जी का इंटरव्यू छापा और उसके बाद तो सुमंत भइया ने मुझे खूब उत्साहित किया।

मुम्बई में मुल्क की आवाज अखबार से जुड़ा फिर मुम्बई कनक संध्या से लंबे समय तक जुड़ा रहा। इसी बीच उत्तर भारतीयों के अखबार यशोभूमि के संपादक आनंद शुक्ला सर से मिला। उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया और यशोभूमि में मेरे फीचर नाम के साथ छपने लगे। एक लेख का 75 रुपये मिलता था। बाद में मुझे हिंदमाता अखबार में उपसम्पादक के रूप में जोड़ा गया। हिंदमाता बंद हुआ तो यशोभूमि में बतौर उप संपादक बना और यहां आज भी कार्यरत हूँ। तीस साल कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। जिन जिन लोगों ने सहयोग किया, मुझे उन सबका धन्यवाद और दिल से आभार।

लेखक शशिकान्त सिंह मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हैं और प्रिंट मीडिया कर्मियों के लिए घोषित मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कराने के वास्ते संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों में अग्रणी हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.


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