आलोक श्रीवास्तव-
वह गद्दारी असाधारण थी, उपमहाद्वीप की नियति पर उसका निर्णायक असर पड़ा… उपनिवेश के दौर में अलग अलग कालखंडों में अलग अलग कारणों से अनेक राजघरानों, क्षत्रपों, सिपहसालारों आदि ने अंग्रेजों का साथ दिया. दरअसल अंग्रेजों की मूल शक्ति ही यह थी कि उन्हें जब भी जरूरत पड़ी, गद्दारोंे की सेवाएं हासिल रहीं.
परंतु 1857 में सिंधिया की गद्दारी उतनी भर नहीं थी, जितनी सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता या 1857 पर लिखी सावरकर की इतिहास-पुस्तक बताती है.
यह गद्दारी अत्यंत गंभीर प्रकृति की थी और इसका निर्णायक प्रभाव 1857 के युद्ध पर और प्रकारांतर से उसके बाद के भारतीय उपमहाद्वीप के सारे इतिहास पर पड़ा. इस गद्दारी के स्वरूप को जानने के लिए सैन्य-इतिहासकारों, रणनीतिकारों, दस्तावेजों, उस युद्व के प्रतिदिन के घटनाक्रम को जानना जरूरी है. सुखद बात यह है कि अब यह सब अत्यंत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भी है, पर अधिकांशतः अंग्रेजी में. 1857 पर पहली पुस्तक होने के बावजूद सावरकर की पुस्तक की बहुत सीमाएं हैं. उसमें न तो घटनाक्रम का विस्तृत वर्णन है, न पर्याप्त शोध. उस समय उनके लिए संभव भी नहीं था.
क्रिस्टोफर हिबर्ट, साॅल डेविड, रोजी लेवलीन सहित दर्जनों विदेशी इतिहासकारों ने मूल दस्तावेजों को खंगाल कर 1857 पर कई दर्जन वृहद ग्रंथों की रचना पिछले तीन-चार दशकों में की है. इन सभी पुस्तकों की सूचनाएं नेट पर उपस्थित हैं, और खरीदने के लिए पुस्तकों के लिंक मौजूद हैं.
वस्तुतः सिंधिया ने जो सबसे भयानक काम किया वह यह था कि वह उन राजघरानों की तरह, जो अंग्रेजों के साथ मिल गए थे या विद्रोहियों के साथ, वह किसी एक पक्ष के साथ मिला नहीं. वह दोनों पक्षों को अपने साथ होने के संदेश देता रहा. यही कारण था कि रानी लक्ष्मी बाई झांसी में घिरने के बाद सिंधिया के साथ देने के भ्रम में झांसी से सौ किलोमीटर दूर दुष्कर मार्ग तय कर घोड़े से अपनी टुकड़ी के साथ ग्वालियर पहुंचीं और ऐन मौके पर सिंधिया की गद्दारी के कारण ऐन ग्वालियर के किले के बाहर मारी गईं. सिंधिया की इसी चालबाजी के कारण तात्या टोपे और अनेक विद्रोही अपनी सेनाएं लेकर ग्वालियर में जुट रहे थे. योजना यह थी कि ग्वालियर को केंद्र बनाकर संग्राम का संचालन किया जाएगा.
ग्वालियर को केंद्र क्यों बनाया जा रहा था?
यह ग्वालियर के किले के सामने खड़े होकर ही जाना जा सकता है.
35 साल पहले जब मैं किशोरावस्था में उस किले की फसीलों पर खड़ा था तो 1857 की पढ़ी कहानियों का मर्म स्पष्ट हो रहा था. वह किला उस काल के सैन्य संसाधनों और युद्धों के लिए अभेद्य था. अंग्रेज अपनी पूरी फौज देश भर से इकट्ठी कर भी उसे जीत न पाते. विद्रोहियों ने शानदार रणनीति बनाई थी. अंतिम निर्णायक लड़ाई के लिए तात्या टोपे, नाना साहेब पेशवा, लक्ष्मीबाई ने दिल्ली और आगरा को नहीं ग्वालियर को चुना था.
पर इस रणनीति को पलीता लगाया सिंधिया के चरित्र ने. उसने पहले तो विद्रोहियों को भरोसा दिलाया, फिर अंग्रेजों की सेना के साथ लौटा उन्हें जिबह करने.
ग्वालियर के प्रकरण को हम सिर्फ लक्ष्मी बाई की शहादत के भावुक प्रसंग के रूप में याद रखते हैं. नहीं, यह 1857 की पराजय की निर्णायक समरभूमि थी, और इसका एकमात्र कारण सिंधिया की गद्दारी थी. यह पूरे भारतीय इतिहास की असाधारण गद्दारियों में से थी. इसके लिए सिंधिया घराने को राष्ट्र के समक्ष क्षमायाचना करनी चाहिए थी. उस इतिहास से अपने को काट कर विलग करना था. पर ऐसा कभी नहीं किया गया.
हिंदुस्तानी सिपाहियों ने 1857 का संग्राम हारा नहीं था. दिल्ली, कानपुर, आगरा, लखनऊ उन्होंने जीत लिया था. हां, इस जीत को वे कायम नहीं रख पाए – सिर्फ और सिर्फ सिंधिया की गद्दारी के कारण. उस दिन ग्वालियर के किले की खाइयों के पार हिंदुस्तान के इतिहास का निर्णय हुआ था. वह निर्णय यह था कि भारत को 90 साल तक और लूटा जाएगा. यहां की खेती और कुटीर उद्योग पूरी तरह तबाह किए जाएंगे. पूंजी का अवशोषण इतना अधिक होगा, कि पूरा देश मृत शरीर का ढांचा भर रह जाए. अंग्रेज उन सारे अंतर्विरोधों को और गहरा कर सकें, जिनसे निपटने में इस उपमहाद्वीप की पीढि़यां खप जाएं और सदियां गुजर जाएं.
इस गद्दारी का मापन 90 साल में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा ढाए अकालों, विदेशी मोर्चे पर मरने भेजे गए भारतीय सैनिकों की जानों, 1857 की पराजय के बाद मारे गए लाखों लोगों, 1947 तक मारे गए लाखों लोगों के शवों की गिनती कर के किया जा सकता है और उस पूंजी के महायोग से भी जो इन 90 सालों में अवशोषित हुई.
वह गद्दारी साधारण नहीं थी.


