तब ऐसा था सुल्तानपुर : कम आबादी के बावजूद जमीन के 76 फीसद हिस्से के मालिक राजपूत थे!

Raj Khanna-

ब्यौरे बहुत पुराने हैं लेकिन उनकी दिलचस्पी हो सकती है , जिन्हें सुल्तानपुर के अतीत को लेकर जिज्ञासा रहती है। 1857 की क्रांति में बढ़चढ़कर हिस्सेदारी की बहुत बड़ी कीमत सुल्तानपुर ने चुकाई थी। गोमतीं के उत्तर बसा शहर अंग्रेजों ने पूरी तौर पर नष्ट कर दिया था। वहां चिराग जलाने तक की इजाजत नहीं थी। शांति स्थापित होने के बाद अंग्रेजों ने 1858 – 59 में गोमतीं के दक्षिणी किनारे पर मौजूदा शहर और जिले का मुख्यालय स्थापित किया । शहर बसने के पहले यह स्थान गिरगिट नामक गांव था। चूंकि पहले इस स्थान पर अंग्रेजी फौज कैम्प करती थी , इसलिए आम लोग इसे कम्पू भी कहते थे। मिस्टर पार्किन्स पहले डिप्टी कमिश्नर थे। शहर का पार्किंसगंज मोहल्ला उन्हीं के नाम पर है। मेजरगंज और गोरा बारिक ( गोरा बैरक) जैसे नाम इस स्थान पर फौज की मौजूदगी की याद दिलाते हैं।

1903 में छपा सुल्तानपुर का गजेटियर इन दिनों पढ़ रहा हूँ। एच. आर.नेविल्स आई.सी.एस. ने इसे तैयार किया था। जिले के इतिहास के अलावा जनजीवन और साथ ही प्रशासनिक और बुनियादी जरूरतों के इंतजाम की कोशिशों के शुरुआती ढांचे से जुड़े तमाम पहलुओं से जुड़ी जानकारियां यह गजेटियर समेटे हुए है। 1863 -70 के मध्य जिले का प्रथम भूमि बंदोबस्त मिस्टर मिलेट ने किया। 1869 में जिले का पुनर्गठन किया गया। उसके पहले जिले में 12 परगने थे। नए सीमांकन में इसौली,बरौंसा और अलदेमऊ को फैजाबाद से हटाकर सुल्तानपुर से जोड़ा गया। उधर सुल्तानपुर से निकाल कर इन्हौना,जायस , सिमरौता और मोहनलाल गंज को रायबरेली में तथा सुबेहा को बाराबंकी में शामिल कर दिया गया।

1869 में जिले में पहली जनगणना हुई। आबादी थी 9,30,023। सीमाओं के परिवर्तन के बाद आबादी बढ़कर 10,40,227 हो गई। प्रति वर्गमील 593 लोग रहते थे। 1881 में आबादी घटकर 9,57,912 रह गई। आबादी घटने का कारण 1873 और 1877 का भयंकर अकाल था जिसमें बड़ी संख्यां में मौतें हुईं और पलायन भी हुआ। 1891 की जनगणना में आबादी 10,75,851 थी। इस जनगणना में पास-पड़ोस के जिलों में भी जनसंख्या में वृद्धि हुई थी।

1901की जनगणना में पिछली की तुलना में जनसंख्या में मामूली वृद्धि हुई। कुल जनसंख्या 10,83,904 थी। प्रतिवर्ग मील 637 लोग निवास करते थे। कुल आबादी में हिंदुओं की संख्या 9,63,879 और मुसलमान 1,19,740 थे। यह जनगणना इस मिथ को तोड़ती है कि सिख विभाजन के बाद ही यहां बसे। उस समय 151 सिख यहाँ आबाद थे। दो जैनी और एक पारसी भी थे। 25 हिंदुओं ने स्वयं को ‘ आर्य ‘ के तौर पर दर्ज कराया था। इस जनगणना में जातिवार ब्यौरे दर्ज हुए। इसमें ब्राह्मण 1,60,000 , राजपूत 86,561, जाटव 1,40,000 , यादव 1,28,000 , वैश्य 22,970 , कायस्थ 12,832, मुराई 4,244 तथा कुर्मी 28,455 थे। अन्य आबादी में कलवार, केवट, कुम्हार, पासी, कोरी, गड़रिया, तेली और कहांर आदि का उल्लेख है लेकिन उनकी अलग-अलग संख्या दर्ज नहीं हैं। मुसलमानों की कुल आबादी में 25,800 ऐसे मुसलमान थे जो राजपूतों के विभिन्न वर्गों से धर्मांतरित हुए थे। आबादी में कम हिस्सेदारी के बाद भी जिले की कृषियोग्य भूमि के 76 फीसद हिस्से के मालिक राजपूत थे। उनके पास 1633 मौजे थे। मुसलमानों के पास 175, ब्राह्मणों के पास 75 और कायस्थों के पास 67 मौजे थे। शेष भूमि अन्य जातियों के पास थी।

लगभग पूरी आबादी खेती पर निर्भर थी। पूरे जिले में इकलौता शहर सुल्तानपुर था। उसकी आबादी दस हजार से भी कम थी। 1890 में उसे म्युनिस्पिलिटी का दर्जा हासिल हो चुका था। इसके तेरह सदस्यों में दस निर्वाचन से चुने जाते थे। दो का नामांकन होता था। डिप्टी कमिश्नर इसके पदेन अध्यक्ष होते थे। 1871 में डिस्ट्रिक्ट कमेटी बनाई गई। इसे 1884 में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड (आज की जिला पंचायत) नाम दिया गया। इसकी सत्रह सदस्यीय कमेटी में 12 का निर्वाचन होता था। चार तहसीलें थीं। प्रत्येक तहसील से तीन प्रतिनिधि चुने जाते थे। चारों तहसीलों के एस. डी. एम. इसके पदेन सदस्य जबकि डिप्टी कमिश्नर अध्यक्ष होते थे।

अपने बुजुर्गों से उनके दौर के किस्से सुनते हुए या उन्होंने जो अपने बड़ों से सुन रखा था , उसे जब वे दोहराते थे तो हमारी पीढ़ी हंसती थी। खासतौर पर जब गुजरे जमाने की कीमतों का जिक्र होता था। दिलचस्प है कि गजेटियर में भी इनमें बहुत कुछ पढ़ा जा सकता है। उन दिनों तौल के लिए ‘ सेर ‘ का इस्तेमाल होता था। प्रति सेर लगभग आठ सौ ग्राम का होता था। ब्यौरों के मुताबिक 1861 में गेहूं एक रुपये का 28 सेर मिलता था। अगले तीन सालों में सूखे के कारण दाम बढ़े। इन वर्षों में एक रुपये का दस सेर गेहूं बिका। 1869 में पौने तेरह सेर जबकि 1867 से 1872 का औसत दाम 19 सेर था।

1877 के अकाल में गेहूं की भारी किल्लत हुई। लेकिन 1880 से 1886 के सात वर्षों में एक रुपये में गेहूं का औसत दाम 21.4 सेर था। 1887 से 1896 के सात वर्षों में गेहूं एक रुपये में 15.2 सेर की दर से बिका। बाद के सात वर्षों यानी 1902 तक गेहूं का औसत दाम 16.5 सेर था। कोदों, ज्वार, चना की कमजोर वर्गों में सबसे ज्यादा खपत थी। उनमें चना सबसे ज्यादा पसंद किया जाता था। 1861 में एक रुपये में ज्वार-चना 32 सेर उपलब्ध था। अगले चालीस वर्षों में इन जिसों का औसत मूल्य प्रति रुपया 22.5 सेर था।

20 वीं सदी की शुरुआत तक सुल्तानपुर में नकद मजदूरी का चलन नहीं था। आमतौर पर एवज में अनाज ही दिया जाता था , यद्यपि मजदूरी का निर्धारण पैसे में होता और फिर उस मूल्य का अनाज दिया जाता था। कम परिश्रम के काम जो महिलाओं और बच्चों के जिम्मे होते , उसकी मजदूरी इकन्नी थी। ज्यादा परिश्रम के कामों की मजदूरी छह पाई थी। बढई की मजदूरी उसके हुनर के मुताबिक तीन से पांच आने के बीच थी। हल को साल भर दुरुस्त रखने के लिए लोहार को आठ सेर अनाज दिया जाता था। सबसे कीमती माने जाने जाने वाले ‘ सोने ‘ के दाम तो गजेटियर में नहीं दिए गए हैं लेकिन सुनार की मजदूरी का जिक्र जरूर है। इसके मुताबिक सुनार सोने के मूल्य के प्रति रुपये में एक आना मजदूरी लेते थे। जिले के लगभग सभी मकान कच्चे थे। पक्की ईंटें बनती थीं लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ ताल्लुकेदारों-जमींदारों और सम्पन्न और सबल लोगों के मकानों में ही होता था। उस समय तक मकानों में पत्थर का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं हुआ था। अमीर जानकर लुटने के डर से भी लोग पक्के मकान बनवाने से बचते थे।

ईंटों का दाम चार से नौ रुपये प्रति हजार था। कच्चे मकानों में इस्तेमाल होने वाला खपड़ा का दाम एक रुपया प्रति हजार था। दस क्यूबिक फीट कच्ची दीवार की लागत बारह आना थी। कीमती लकड़ी यहां उपलब्ध नहीं थी। आम-,महुआ-नीम बहुतायत में था। आम की लकड़ी का प्रति क्यूबिक फीट दाम पांच आना था। बांस एक रुपये के अट्ठारह थे। तब यहां बैंक नही थे। गांव के साहूकार प्रति रुपया पर इकन्नी ब्याज लेते थे। ब्याज की दरें आमतौर पर एक से दो फीसद महीना थीं। हालांकि शर्तें कर्जदार की जरूरतों पर बदलती रहती थीं। हसनपुर और निहालगढ़ के सेठ सबसे ज्यादा सम्पन्न थे।

4 अप्रैल 1893 को सुल्तानपुर से होकर गुजरी लखनऊ-फैजाबाद-बनारस रेल लाइन पर पहली गाड़ी चली लेकिन सुल्तानपुर में कोई स्टेशन नहीं बना। जौनपुर के अरगुपुर गांव में बने स्टेशन का नाम बिलवाई रखा गया। बिलवाई सुल्तानपुर जिले का राजस्व गांव है। दो साल बाद लखनऊ-प्रतापगढ़ रेल लाइन शुरू होने के बाद अमेठी, गौरीगंज और मिश्रौली में स्टेशन बन गए। जिला मुख्यालय को रेल सुविधा की शुरुआत के लिए 1901 तक इंतजार करना पड़ा। इस साल इलाहाबाद-सुल्तानपुर -फैजाबाद रेल लाइन चालू हुई थी।

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं, क्लिक करें-

https://chat.whatsapp.com/CMIPU0AMloEDMzg3kaUkhs

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *