तब सुनील दुबे ने गुस्से से कहा था- इतनी सी खबर भी क्यों, कूड़ा छपेगा क्या?

-सुधीर मिश्रा-

हिंदुस्तान लखनऊ में सम्पादक रहे श्री सुनील दुबे नहीं रहे। काफी समय से बीमार थे। उनसे पहली मुलाकात 1994 में पटना में हुई थी। ट्रेनी के लिए टेस्ट देने गया तो उन्हें देखा था। फिर 1996 में वो हिंदुस्तान लखनऊ के एडिटर होकर आये। फिर टेस्ट दिया और मेरा नहीं हुआ।

2000 अगस्त में उन्होंने मुझे उस वक्त के मेरे कई सीनियर साथियों के ऊपर वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर हिंदुस्तान में जगह दी। काफी लोग कहते थे कि वह खण्डन और लीगल नोटिस से घबरा जाते हैं। मेरी कई खबरों पर नोटिस आए, विज्ञापन रोक दिए गए। खासतौर पर लखनऊ के बड़े स्कूल समूह की ओर से।

उन्होंने मुझे कभी हतोत्साहित नहीं किया। कोई समझौता नहीं किया। उनके बारे में काफी लोगों ने प्रचारित किया था कि कुछ लोग उनके बहुत खास हैं। ऐसे ही एक खास साथी की खबर मैने काटकर सिंगल कॉलम कर दी। वो गुस्से में दुबे जी से शिकायत करने पहुंचे।

दुबे जी ने मुझे बुलाया और गुस्से से कहा कि तुमने इनकी खबर छोटी सी सिंगल कॉलम क्यों कर दी। मैंने कहा कि उसमें सिर्फ एक नेता का प्रचार था, खबर तो थी ही नहीं। उन्होंने फिर मुझसे उतने ही गुस्से में कहा कि फिर इतनी सी खबर भी क्यों, कूड़ा छपेगा क्या ? मैने हड़बड़ा के कहा, सर हटा देता हूँ उसे भी।

शिकायत करने वाले साथी हक्का बक्का। उन्हें समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या और मैं बाहर आकर दुबे जी की इस स्टाइल के बारे में सोच सोच कर मुस्करा रहा था।

खबरों को लेकर वो हमेशा खरे थे, मेरा तो यही अनुभव रहा उनके साथ।

ईश्वर स्व दुबे जी की आत्मा को शांति दे!



-निशीथ जोशी-

आज जब से बड़े भाई श्री सुनील दुबे के शरीर त्याग करने की खबर पढ़ी है मन बहुत बैचैन सा है। कारण उनसे हमारी पहली मुलाकात 1987में कानपुर जागरण के दफ्तर में हुई थी तब से उनका प्यार और आशीर्वाद बना रहा।

मुलाकात कराने वाले थे भाई तनवीर हैदर उस्मानी। हम लखनऊ में माया पत्रिका में काम करते थे। किसी रिपोर्टिंग के सिलसिले में तनवीर भाई का नाम सुना। उनके बेना झाबर कॉलोनी वाले फ्लैट पर पहुंच गए। उन्होंने और भाभी जान ने महसूस ही नहीं होने दिया कि पहली मुलाकात है। घर पर नाश्ता कराया गरमागर्म परांठे और जानें क्या क्या। फिर शाम को ऑफिस बुला लिया। वहीं श्री सुनील दुबे से मुलाकात हुई।

दुबे जी ने हमको माया पत्रिका में लगातार पढ़ा था जागरण में नौकरी का ऑफर दे दिया। फिर तो हम जब भी कानपुर जाते तनवीर भाई के यहां नाश्ता और शाम को जागरण कार्यालय में श्री सुनील दुबे जी से मुलाकात। जब वहां से फ्री होते तो हम तीनों की पार्टी शुरू होती थी। कई बार तो हमको होटल में रुका दिया गया और कार्यालय से फ्री होते ही दुबे जी और तनवीर भाई वहीं अा जाते। खाने के साथ पीने की व्यवस्था भी साथ होती थी। ऐसा प्यार विरलों को मिलता है।

फिर हम दिल्ली अा गए राष्ट्रीय सहारा में। जब श्री सुनील दुबे जी ने सहारा में संपादक के रूप में ज्वाइन किया तो मिलने पर बोले निशीथ तुम्हारे साथ काम करने की बड़ी इच्छा थी अब पूरी हुई। हमने उनके विशाल व्यक्तित्व और विचारों को देख उनको प्रणाम किया और कहा छोटे भाई को अपना अनुज ही रहने दें। ये थे दुबे जी सहज, सरल और नए आने वाले पत्रकारों को आगे बढ़ाने वाले। उस महान आत्मा को शत शत नमन। तनवीर भाई पहले ही जा चुके हैं अब जिस कड़ी से उन्होंने जोड़ा था वह भी त्याग है।

लगता है जैसे एक युग का अवसान हो गया हो। इन दोनों मित्रों जो बड़े भाई बन कर हमारे ऊपर आशीर्वाद बरसा गए , की आत्मा को ईश्वर और महान गुरुजनों से प्रार्थना है कि अपने हृदय में स्थान दे। आप दोनों हमारे हृदय और स्मृति में सदा जीवित रहेंगे।।

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