सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर सवाल न कीजिए, उन्हें रेखांकित कीजिए, कुछ नहीं तो एक साथ छाप दीजिए, पर सरकार के फायदे वाली खबर तो तान दे रहे हैं जो खिलाफ है, नुकसान कर सकती है उसे पी जा रहे हैं।
संजय कुमार सिंह
‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ कहे जाने वाले मीडिया को वाच डॉग से लैप डॉग बना देने की भाजपाई या संघी राजनीति ने तमाम दूसरी संस्थाओं को भी नियंत्रण में लेकर बर्बाद कर दिया है। वे और चाहे जो कर रहे हों, निष्पक्ष और स्वतंत्र तो नहीं ही रह गए हैं। दिलचस्प यह है कि इसका पता इसी पक्षपाती मीडिया से चलता है। भले यह अति होने के कारण हो रहा हो या बहुत व्यवस्थित नहीं होने के कारण। सच्चाई यह है कि चुनाव आयोग के पक्षपाती रुख के बाद सुप्रीम कोर्ट का दोहरा रवैया भी दिखने लगा है। अब जब खबरें नहीं होती हैं, करने नहीं दी जाती हैं और सीएजी विनोद राय जैसे नहीं हैं तो पत्रकार भी अरुण शौरी जैसे नहीं रहे। वरना आज भी खबरें होती हैं। मेरे नौ अखबारों में रोज कुछ ना कुछ मिल ही जाता है। द हिन्दू में कल खबर थी, सुप्रीम कोर्ट ने करुर भगदड़ की सीबीआई जांच के आदेश दिए। यह तमिलनाडु का मामला है, अखबार दक्षिण का है, पाठक भी दक्षिण भारतीय होते हैं तो यह खबर उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है और वोट चोरी से संबंधित मामले में खबर अलग है। कायदे से सुप्रीम कोर्ट की दो (और ज्यादा भी) खबरें एक साथ छापी जा सकती हैं। छपती रही हैं पर अब सेवा भावना और उसपर जीएसटी लगने के कारण मामला गड़बड़ दिखने और लगने लगा है।
मेरे अखबारों में कल ही खबर थी, सुप्रीम कोर्ट ने ‘वोट चोरी’ की जांच के लिए एसआईटी बनाने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी। खबरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। आप समझ सकते हैं कि शिकायत चुनाव आयोग से है और वही इसकी सुनवाई कर सकता है – कहने का क्या मतलब है। इसके मुकाबले करुर हादसे पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं है? हादसा हुआ है, जांच हो रही है, हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच कराने का आदेश नहीं दिया लेकिन भाजपा नेता की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दे दिया। इसपर मैंने अलग से लिखा है। पर आज खबर यह है कि उसी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया है, क्या तमिलनाडु के शराब घोटाले की जांच में ईडी कुछ ज्यादती नहीं कर रहा है। आज यह खबर द हिन्दू में लीड है। इसे भी द हिन्दू ने उन्हीं कारणों से ज्यादा महत्व दिया होगा पर बाकी अखबारों के लिए क्या यह खबर नहीं है। ईडी की मनमानी और उसके सरकारी उपयोग को कौन नहीं जानता है। पर इस खबर को आज वैसी प्रमुखता नहीं मिली है। यहां भी मुद्दा यही है कि ईडी जो कर रहा है क्या उसे करने दिया जाए? जैसे चुनाव आयोग को करने दिया गया। अगर चुनाव आयोग स्वतंत्र है तो ईडी भी स्वतंत्र सरकार के निर्देश पर काम करती है। वैसे ही, जैसे चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर कराया। कानूनी स्थिति क्या है, मैं नहीं जानता। कानून मेरा विषय या मुद्दा भी नहीं है। मैं खबर की बात कर रहा हूं कि खबरें लिखने वालों को ये बातें समझ में नहीं आती हैं या उनके लिए ये सवाल ही नहीं हैं।
ठीक है कि प्रधानमंत्री को सवाल पूछना पसंद नहीं है। पूछने पर बुरा मान जाते हैं, भविष्य खराब कर सकते हैं आदि आदि। अगर ऐसा है भी तो क्या जरूरी है कि प्रधानमंत्री से ही सवाल किया जाए या किसी से किया ही नहीं किया जाए। किसी खबर को पढ़कर अगर कोई पुरानी खबर याद आती है, नए सवाल उठते हैं तो उन्हें सामने रखने, सार्वजनिक करने में कैसा डर? या किसी को क्यों नाराज होना चाहिए। कल के अखबारों में छपे दो फैसलों की खबर पढ़कर जो सवाल मेरे दिमाग में आया – उसे मैंने लिखा, सार्वजनिक कर दिया। आज फिर सुप्रीम कोर्ट के सवाल को पढ़कर जो सवाल उठते हैं उनके जवाब तो ढूंढ़ना ही है। कल की खबर पढ़कर मुझे हाथरस हादसे की याद आई। मैंने चेक किया तो पाया कि उस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला अलग था। इस आधार पर मुझे लगता है कि एक जैसे दो मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने दो तरह के फैसले दिए हैं। इसे रेखांकित क्यों नहीं करूं और रेखांकित करने से किसी को क्यों नाराज होना चाहिए। यहीं अगर मुझे लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का रवैया दोहरा है, तो है। इसमें सुप्रीम कोर्ट को क्यों नाराज होना चाहिए या मुझे क्यों डरना चाहिए। यह अपेक्षा मैं संपादकों और पत्रकारों से करता हूं। लेकिन देख रहा हूं कि ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। मैं जिन खबरों के मामले में ऐसे फैसले देख सकता हूं वैसे दूसरे लोग दूसरे फैसलों के बारे में कर सकते हैं और सब लोग करें तो तमाम दबाव के बावजूद जो हो रहा है उसका खुलासा होता रहेगा।
आज की पत्रकारिता से मैं निराश हूं। 1975 से पहले के अखबारों में (जो मैं पढ़ता देखता रहा हूं) द हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस अगर आज भी सरकार के खिलाफ खबर कर पा रहे हैं तो मैं क्यों मानूं की सरकार की ओर से दबाव है और जो दबाव है वह मुझे दिखा तो लिखा ही पर अच्छी बात है कि द हिन्दू वैसे ही है। यही बात इंडियन एक्सप्रेस के लिए भी कही जा सकती है। यही नहीं, इंडियन एक्सप्रेस समूह ने रामनाथ गोयनका के जन्मशताब्दी वर्ष में एक्सीलेंस इन जरनलिज्म अवार्ड शुरू किया था। 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्य अतिथि थे और तब संपादक राजकमल झा ने जो कहा था वह बहुत चर्चित हुआ। कारण जो हो, तथ्य है कि नरेन्द्र मोदी फिर इस समारोह में शामिल नहीं हुए। तब राजकमल झा ने जो कहा था वह मोटा मोटी इस प्रकार था, “सरकार की आलोचना से डरने की ज़रूरत नहीं है। अगर सरकार किसी पत्रकार से नाराज़ है, तो यह पत्रकार के लिए एक तरह के सम्मान का प्रतीक है।” उन्होंने कहा कि अच्छी पत्रकारिता मर नहीं रही, बल्कि “वह शांत है, लेकिन मजबूत है।” यह भी कि, “खराब पत्रकारिता ज़्यादा शोर करती है।” उन्होंने ‘सेल्फी पत्रकारिता’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा था कि, आज पत्रकारिता का एक हिस्सा ऐसा है जो “अपनी तस्वीर, अपनी राय और अपनी उपस्थिति” पर ज़्यादा केंद्रित है, जबकि तथ्य, सच्चाई और जनता की आवाज़ पीछे छूट जाती है। अब यह सब बढ़ा ही है। इंडियन एक्सप्रेस ना घोषित इमरजेंसी में डरा ना अघोषित से फर्क पड़ा। बाद के अखबारों में द टेलीग्राफ और मेरा सबसे नया अखबार देशबन्धु भी इसी श्रेणी में है। पर यह सब अलग मामला है।
दिलचस्प यह है कि कल करुर की खबर दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं थी और आज तमिलनाडु के मामले में ईडी की खबर नहीं है। तथ्य यह है कि भाजपा को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव जीतना है। वैसे ही जैसे पश्चिम बंगाल जीतना होता है। इसलिए मीडिया (वालों का एक वर्ग) भाजपा का सहयोग करने के लिए खबरें छाप रहा है। इसमें करुर हादसे की रिपोर्टिंग और उसका दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर छपना शामिल है। हादसे की सीबीआई जांच के आदेश हो गए, भाजपा का काम बन गया (कैसे? वह अलग मुद्दा है) – इस खबर को अगर उतना ही महत्व दिया जाता तो ज्यादा लोग देख पाते कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक जैसे मामलों में अलग है। चुनाव आयोग, राज्य सरकारों और उनकी आजादी के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला अलग लगता है। जाहिर है, यह कानून के मामला है और संभव है बिल्कुल सही हो लेकिन खबर तो है। सामान्य तौर पर छपती होती तो अब खबर नहीं होती पर वह भी अलग मुद्दा है। अभी तो यह बताना मौजूं है कि सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में जहरीली दवा (कफ सीरप) से बच्चों की मौत के मामले में दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने याचिकाकर्ता विशाल तिवारी से सवाल करने के बाद यह फैसला सुनाया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य सरकारें इस मामले में गंभीरता से कार्रवाई कर रही हैं और उनके पास उचित कानून प्रवर्तन तंत्र मौजूद है।
कानून के पालन की स्थिति यह है कि अमेरिकी सिक्यूरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ने 20 नवंबर 2024 को न्यूयॉर्क की एक अदालत में एक शिकायत दाखिल की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि गौतम अदाणी, उनके भतीजे सागर आदानी और अन्य व्यक्तियों ने $265 मिलियन (लगभग ₹2,200 करोड़) की रिश्वत दे कर बिजली/सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ठेके लिए और बाद में अमेरिकी निवेशकों के समक्ष कंपनी की “रिश्वत विरोधी” नीतियों को लेकर भ्रामक जानकारी दी। यह समन अभी तक अदाणी को सर्व होने की सूचना नहीं है। केंद्र सरकार ने समन सर्व कराने की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि कोर्ट ने वो दस्तावेज़ आदानी को सौंपे या नहीं। दूसरी ओर, सोनम वांगचुक के खिलाफ कार्रवाई कितनी तेजी से हुई और सुप्रीम कोर्ट में जमनात न हो इसके लिए जो दलील दी गई वह इस सरकार और इसके समर्थकों के देश विरोधी होने का उदाहरण है लेकिन यहां विपक्ष ऐसी राजनीति नहीं करता और करने लगे तो भारत भी पाकिस्तान बन जाए। यह भारत के हिन्दूस्थान नहीं होने का फायदा है लेकिन यह भी नहीं बताया जाता। ध्रुव राठी को बताना पड़ता है कि सरकारी प्रचार करने में अग्रणी अखबार ने छह कॉलम का शीर्षक लगाया था, नेपाल में सेना ने संभाला मोर्चा, जेन जी ने मांगा हिन्दू राष्ट्र। तथ्य यह है कि जेन जी आंदोलन ने आधिकारिक रूप से “हिंदू राष्ट्र” की लिखित मांग नहीं की है। अधिकतर रपटों के अनुसार उनका ज़्यादातर फोकस भ्रष्टाचार, राजनीतिक व्यवस्था ठीक-ठाक होने, नौकरियों, न्याय व्यवस्था आदि पर है।
देश में सरकार और प्रशासन की हालत यह है कि हरियाणा में वोट चोरी से डबल इंजन की सरकार तो बन गई लेकिन एक आईपीएस ने आत्म हत्या कर ली। कई दिनों तक शव का पोस्टमार्टम नहीं हो पाया, सरकार पर दबाव बना तो किसी का तबादला हुआ कोई छुट्टी पर भेजा गया। खतरनाक मोड़ तब आया जब एक और आत्महत्या हो गई। यह अमर उजाला और नवोदय टाइम्स की लीड है। देशबन्धु की लीड, भाजपा के 71 उम्मीदवारों की सूची जारी होने की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड एएसआई की आत्महत्या की खबर है। अधपन्ने की लीड है, माओवादियों के राजनीतिक मस्तिष्क ने समर्पण किया। हिन्दुस्तान टाइम्स में हरियाणा में एक और पुलिस वाले की मौत अधपन्ने पर लीड है मुख्य लीड है, बिहार चुनावों के लिए भाजपा के 71 उम्मीदवारों की पहली सूची में दो उप मुख्यमंत्री। इंडियन एक्सप्रेस की लीड, माओवादियों के बौद्धिक प्रमुख के समर्पण से बड़ा झटका। दि एशियन एज की आज की लीड के अनुसार, एनडीए में टकराव के बीच मोदी ने नीतिश को ‘नाराज’ कहा है; भाजपा ने बिहार के लिए 71 उम्मीदवारों की सूची जारी की। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, गूगल भारत का सबसे बड़ा एआई केंद्र बनाएगा। विशाखापत्तनम के इंफ्रा क्षेत्र में 15 बिलियन डॉलर का निवेश। इससे आप अखबारों की पसंद, प्राथमिकता समझ सकते हैं और अगर मानते हैं कि दि एशियन एज की लीड किसी दबाव में होगी तो मैं सहमत नहीं हूं। मुझे लगता है कि ऐसी खबरें सेवा करके तुरंत लाभ पाने के लिए छापी जाती है। 2002 में नौकरी छोड़ने के बाद बहुत कुछ बदल गया है। मैं गलत हो सकता हूं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


