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आज के अखबार : सुप्रीम कोर्ट में नोएडा से जुड़ी खबरें पत्रकारिता और पारदर्शिता के मेधा रूप से प्रभावित

Newspaper front page with the headline 'UP in SC: Magistrate who sent notice to student suspended' and a red subheadline 'Action against SI, not magistrate: CPS'. Includes a block of article text on the left side.

मीडिया को अधिकृत सूचना देना सरकार का काम है। सरकार के पास इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। अभी स्थिति यह है कि संबंधित अधिकारी कह देता है कि मैं मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं हूं, मीडिया सूत्रों के हवाले से खबरें छापता है। उत्तर प्रदेश सरकार की यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया ने सॉलिसिटर जनरल के हवाले से छापी है जो सुप्रीम कोर्ट को दी गई है। दूसरे अधिकारी ने दूसरी जानकारी दी है। अखबार ने दोनों सूचनाएं छाप दी हैं, मेरे लिए सही खबर जानना मुश्किल है। दूसरे अखबार पढ़ने वालों को संभवतः गलत और अधूरी जानकारी ही मिली। 

संजय कुमार सिंह

सुप्रीम कोर्ट में नोएडा का मामला इतना गंभीर है कि कलकत्ता के द टेलीग्राफ से लेकर लंदन संस्करण वाले दि एशियन एज के दिल्ली एडिशन में पहले पन्ने पर है। देशबन्धु में लीड है, अमर उजाला में पहले पन्ने पर है। नवोदय टाइम्स और दैनिक भास्कर के दूसरे पहले पन्ने पर है। मेरे 10 अखबारों में यह खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर नहीं है। हालांकि वहां विज्ञापन तो है ही फोर्ड फाउंडेशन को 60 साल से भी ज्यादा बाद ऑफिस खाली करने के लिए कहे जाने की खबर भी है। यह भी कि इसे ग्लोबल बायोफुएल अलायंस को आवंटित कर दिया गया है।

छात्र आंदोलन और बाद की घटनाओं से संबंधित जो खबरें छपी हैं वह निश्चित रूप से जरूरी है लेकिन औपचारिक भी है। इसे छोड़ भी नहीं सकते थे। हालांकि, ऐसी कोई खबर नहीं है जिसे फॉलो अप या साथ की खबर कहा जा सके। उदाहरण के लिए, नोएडा के मजदूर आंदोलन में छात्रा को फंसाए जाने की खबरों के बाद कल डीएम को बचाने खबर वाली थी। इसमें कहा गया था कि छात्र को नोटिस डीएम ने नहीं, मजिस्ट्रेट ने दिया था। शाम तक पता चला कि छात्र को नोटिस भेजने वाले मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है। 24 घंटे में कार्रवाई का यह उदाहरण भाजपा सरकार में दुर्लभ है। लेकिन यह खबर नहीं है।  

सच्चाई यह है कि नारी वंदन अधिनियम और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के बावजूद मौजूदा व्यवस्था में एक अवयस्क बच्ची को माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया। माफी के बावजूद उसे परेशान किया गया। इतना कि उसने कहा कि अब उसका डर ही खत्म हो गया है, खोने के लिए कुछ नहीं है। ऐसी स्थिति में नोटिस भेजने के लिए 24 घंटे के अंदर अधिकारी को निलंबित किया जाता है लेकिन एक दूसरी लड़की के घर पत्थर फेंकने की शिकायत झूठी मानी जाती है, उसके खिलाफ एफआईआर हो जाती है। वह अपनी बात को सही साबित करने के लिए सबूत सार्वजनिक करती है फिर भी उसे राहत नहीं मिलती है। किसी के खिलाफ कार्रवाई तो भूल जाइए।

अमर उजाला में चार कॉलम में छपी खबर के अनुसार, सीजेपी प्रदर्शन मामले में पीड़िता के परिवार को धमकाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त। नाबालिग लड़की के उत्पीड़न पर सरकारों से रिपोर्ट मांगी गई है। इसी के साथ खबर है कि जुर्माना लगाने वाले मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया में पुलिस के हवाले से खबर है, कार्रवाई एसआई के खिलाफ हुई है मजिस्ट्रेट के खिलाफ नहीं। अमर उजाला में खबर है, इस मामले में दरोगा शिव पांडे को भी निलंबित कर दिया गया है। यहां नाम है लेकिन मजिस्ट्रेट का नाम नहीं है। खबर है, …एसीपी (कार्यपालक मजिस्ट्रेट तृतीय) को निलंबित कर दिया गया है। दोनों खबरों से भ्रम पैदा होता है। मजिस्ट्रेट को निलंबित किए जाने पर शक है और किया भी गया है तो सिर्फ पदनाम है, नाम नहीं।

नोटिस मजिस्ट्रेट ने भेजा था, डीएम ने नहीं, कल छपी (या छपवाई गई) खबर है। मुझे लगता है कि गलत नोटिस भेजने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अगर मजिस्ट्रेट या दरोगा या दोनों को निलंबित कर दिया है तो गलत कार्रवाई के लिए डीएम, मेधा रूपम के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है? नहीं हुई है तो खबर नहीं है? अमर उजाला की कल की खबर के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि आकृति चौधरी पर से रासुका हटाने को चुनौती देगी सरकार। मैं यह जानना चाहता हूं कि राज्य सरकार रासुका हटाने के निर्णय को किस आधार पर चुनौती देगी? इसमें कौन सा जनहित है? क्या इसका मकसद डीएम के खिलाफ आदेश को रद्द करवाना नहीं है?

डीएम के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करवाने की राज्य सरकार की कोशिश का मतलब है, राज्य सरकार रासुका लगाने के पक्ष में है, डीएम के साथ है और डीएम को हाईकोर्ट की कार्रवाई से आजाद करवाना चाहती है। अगर ऐसा है जो मजिस्ट्रेट और/या दरोगा के खिलाफ कार्रवाई क्यों? मुझे लगता है कि यह भी एक खबर है। राज्य सरकार अगर ऐसा सोचती है, करने जा रही है तो स्पष्ट कहना चाहिए और नहीं कह रही है तो खबरों से स्पष्ट होना चाहिए।  दोनों नहीं हो रहा है और संदेश यह जा रहा है कि मेधा रूपम के उच्च संपर्कों के कारण उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है। दूसरी ओर ऐसी ही गलती के लिए मजिस्ट्रेट को निलंबित करने का प्रचार हो रहा है जबकि खबर यह भी है कि दरोगा को निलंबित किया गया है।

जो भी हो, खबरों से स्थिति स्पष्ट नहीं हो रही है। सरकार खबर नहीं देती है, पारदर्शिता नहीं है, प्रेस कांफ्रेंस नहीं करती है, लेकिन पीआईबी फैक्ट चेक करता है। इस मामले में वह भी नहीं दिखा। कुल मिलाकर लग रहा है कि सरकार मनमानी करने के लिए आजाद है, मीडिया खबरें नहीं कर (पा) रहा है। सरकार जो कर रही है वह सबके लिए एक और एक जैसे मामले में समान नहीं है। दैनिक भास्कर में आज इस मामले में पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। दूसरे पहले पन्ने पर छपी खबर का शीर्षक है, मजिस्ट्रेट ससपेंड जबकि दूसरे अखबार में दरोगा को सस्पेंड किए जाने की खबर है या फिर बताया गया कि कार्रवाई दरोगा की शिकायत पर हुई।

जो भी हो, देशबन्धु में यह खबर लीड है। बताया गया है कि छात्र को नोटिस देने वाले मजिस्ट्रेट निलंबित, छात्र को 5 लाख का नोटिस भेजा था। यहां दरोगा को (या भी) निलंबित करने की खबर हाईलाइट की हुई नहीं है। देशबन्धु की खबर में यह जरूर बताया गया है कि नोटिस सब इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर जारी किया गया था। इसके साथ यह भी खबर है कि, 14 साल की बच्ची को धमकाने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त है। दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। 

मुझे लगता है कि हाईकोर्ट द्वारा रासुका रद्द किए जाने के बावजूद जेल से रिहा नहीं हो पाना, और भी कई मामले होना छात्रा को परेशान किए जाने का ही उदाहरण होगा। नहीं है तो खबर यह भी होनी चाहिए थी। हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार के अधिकारियों को बाकी मामलों की जांच और पुष्टि कर लेनी चाहिए थी ताकि इन मामलों में भी ऐसा ही आदेश न हो जाए। यह भी संभव है कि वे अपनी कार्रवाई से निश्चित हों, इन कारणों (दरअसल एफआईआर) के बावजूद हाईकोर्ट का आदेश सही हो या गलत है उसे चुनौती दी जाएगी तो खबर है कि उसका आधार क्या होगा?

क्या डीएम के खिलाफ कार्रवाई ठीक नहीं है। ऐसी खबर होती तो उसमें यह भी बताया जाना चाहिए था कि मजिस्ट्रेट या दरोगा के खिलाफ कार्रवाई कैसे ठीक या गलत या बेमतलब या किसी और उद्देश्य से है। पर वह सब खबर नहीं है। जाहिर है, इसका कारण सरकारी विज्ञापनों का लालच या सरकारी कार्रवाई से डर हो सकता है। सरकारी कार्रवाई का डर अखबारों पर है और लड़कियों को परेशान करने वालों को नहीं है तो यह भी खबर है और इसलिए भी है कि एक अपराधी इतना निश्चिंत था कि वह न सिर्फ अपने अपराध कैमरे पर बता गया बल्कि अपने आकाओं के नाम भी गिना दिए।

ऐसे में सरकार क्या कर रही है, कैसे काम कर रही है, क्या नहीं कर रही है और क्यों नहीं कर रही है वह सब खबरों में नहीं है जो मीडिया के पिछले या पुराने रुख से काफी अलग है। नवोदय टाइम्स के पहले पन्ने पर आज भी ऐसी कोई खबर नहीं है। आधा पन्ना विज्ञापन से भरा है इसलिए मैंने दूसरा पहला पन्ना देखा। यहां एक खबर का शीर्षक है, पीड़िता को डरा नहीं सकता कोई : उच्चतम न्यायालय। मुझे लगता है कि अखबार-पत्रकार और थाना पुलिस अपना काम ठीक से कर रहे होते तो ये सारे मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचते ही नहीं। पर वह अलग मुद्दा है।

इसके बावजूद, मामला इतना गंभीर है कि कोलकाता के द टेलीग्राफ ने इस खबर को पहले पन्ने पर छापा है। खबर के अनुसार, जंतर मंतर प्रदर्शन में भाग लेने के लिए सरकार समर्थकों के निशाने पर आई अवयस्क बालिका ने शिकायत की तो उसके घर पर पत्थर फेंके गए, इसकी शिकायत पर उसके खिलाफ एफआईआर हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसपर चिन्ता जताई। दि एशियन एज में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, अवयस्क की सोशल मीडिया सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा।

हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर सुप्रीम कोर्ट के हवाले से एक खबर है कि सीजेपी के विरोध प्रदर्शन की जांच के लिए बना पैनल एफआईआर दर्ज करने के आदेश नहीं दे सकता है। इसके साथ बताया गया है कि संबंधित खबरें अंदर हैं। इनमें एक मेट्रो स्टेशन बंद करने पर केंद्र से जवाब मांगने और प्रदर्शन से संबंधित धमकियों के बाद एफआईआर करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबरें हैं। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन द हिन्दू में आधे पन्ने का विज्ञापन होने के बावजूद सिंगल कॉलम में है।   

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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