आज कर्तव्य भवन के उद्घाटन का प्रचार भी खबर है। मुझे लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को भी अपना कर्तव्य निभाना चाहिये। बतायें कि प्रधानमंत्री ने अपने चुनावी शपथपत्र में डिग्री संबंधी जो दावा किया है वह सही है या नहीं। हमें डिग्री से मतलब नहीं है लेकिन उनके दावे से है। आज मिलावटी पेट्रोल उसी भाव बेचने की सरकारी साजिश का केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बचाव किया है। यह खबर द हिन्दू में है। गडकरी ने पेट्रोल लॉबी पर शंका जताई है लेकिन कीमतों के मामले में कह दिया, ‘हमसे संबंधित नहीं है’। यह सब उस दिन जब प्रधानमंत्री के पारदर्शी शासन मॉडल देने का दावा छपा है।

संजय कुमार सिंह
आज ट्रम्प टैरिफ 50 प्रतिशत कर दिये जाने की खबर सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। ज्यादातर में यह लीड है। फिर भी, सरकार की ओर से यह नहीं बताया गया है कि इसका कारण वह क्या मानती है। इससे निपटने के बारे में क्या सोच रही है या क्या सब करने की योजना है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दावा किया है कि भारत ने 11 वर्षों में पारदर्शी शासन मॉडल देखा है। सरकार यह दावा तब कर रही है जब पिछली सरकार के दिये आरटीआई कानून से उसे हमेशा दिक्कत हुई है। कोविड के समय बनाये गये पीएम केयर्स को आरटीआई से मुक्त बताया गया है जबकि यह प्रधानमंत्री के स्तर पर वसूली और संग्रह का गंभीर मामला लगता है। यही नहीं, प्रधानमंत्री की डिग्री से संबंधित आरटीआई के आदेश को सरकार ने चुनौती दी है और सरकार (दिल्ली विश्वविद्यालय) की ओर से अदालत में कहा गया है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से संबंधित अपने रिकॉर्ड अदालत को दिखाने के लिए तैयार है, लेकिन आरटीआई के तहत इसका खुलासा अजनबी लोगों के सामने नहीं किया जायेगा। आप जानते हैं कि डिग्री देखने-दिखाने की मांग प्रधानमंत्री की शिक्षा के संबंध में किसी जानकारी की पुष्टि के लिए नहीं की गई थी। मामला यह है कि चुनाव लड़ने के लिए शपथपूर्वक की जाने वाली घोषणाओं में प्रधानमंत्री ने जो दावा किया है उसकी पुष्टि की जानी है।
इसका कारण भी उनकी शिक्षा से संबंधित जानकारी लेना या उसकी पुष्टि नहीं है क्योंकि अशिक्षित और निरक्षर भी चुनाव लड़ सकता है। बहुमत पाने वाले दल या गठबंधन का ससंदीय दल नेता चुने तो प्रधानमंत्री भी हो सकता है। पर शपथ पूर्वक गलत घोषणा करना या गलत शपथ पत्र दाखिल करना किसी भी नागरिक के लिए कानूनन गलत है। देश को यह जानने का हक है कि प्रधानमंत्री ने शपथपूर्वक असत्य तो नहीं बोला है। वैसे भी प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह शपथ ली है कि, “मैं, विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के प्रधान मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं संविधान और विधि के अनुसार सभी प्रकार के लोगों के साथ भय या पक्षपात, राग या द्वेष के बिना न्याय करूँगा।” मेरी जानकारी में ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे लगता है कि इस शपथ का उल्लंघन हुआ है। इसलिये शपथपत्र में दी गई घोषणा की पुष्टि एक अलग कानूनी जरूरत समझी जा सकती है। चूंकि यह शपथ चुनाव आयोग के समक्ष दायर की गई है इसलिए उसके मुखिया को यह हक है और यह देश के प्रति उनका कर्तव्य भी है कि वे शपथ पत्र की पुष्टि करें। भले इसमें उनकी कोई दिलचस्पी न हो। मैं नहीं जानता कि अदालत में क्या मांग की गई थी पर मांग यह होती कि शपथपत्र की सत्यता की पुष्टि के लिए डिग्री के संबंध में जानकारी चाहिये और अगर जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती है तो दिल्ली विश्वविद्यालय शपथ पत्र के संबंधित तथ्य की पुष्टि कर दे तो शायद बात अलग होती। कारण जो हो इसकी पुष्टि कई वर्षों में नहीं हुई है फिर भी प्रधानमंत्री पारदर्शी शासन का मॉडल देने का दावा कर रहे हैं और नवोदय टाइम्स ने इसे पहले पन्ने पर दो कॉलम में छापा है।
प्रधानमंत्री ने पारदर्शी मॉडल देने का यह दावा तब किया है जब वे अपने विदेश दौरों पर विमान की खाली सीटों पर भी पत्रकारों को ले जाना बंद कर चुके हैं। प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते और चुनिन्दा पेशेवर पत्रकारों के अलावा ऐसे लोगों को इंटरव्यू दिया है जो उनसे यह पूछते रहे हैं कि आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर। दूसरी ओर, आरटीआई कानून में संशोधन कर उसे कमजोर किया गया है और पारदर्शिता तो है ही नहीं। कई मामलों में नहीं है। पुलवामा का क्या हुआ से लेकर एक मंत्री पर विदेश में सैकड़ों करोड़ के लेन-देन और गांजे की खेती के आरोपों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं है। यही नहीं, अदाणी पर हिन्डनबर्ग के आरोप गलत थे तो भारतीय उद्यमी की सुरक्षा के लिए सरकार ने क्या किया, खुद उनने शिकायत की या नहीं और सरकार ने जांच क्यों नहीं करवाई या कैसे संतुष्ट हो गई कि आरोपों में दम नहीं है – जैसे मामलों में पारदर्शिता का अता-पता नहीं है। प्रधानमंत्री के नियुक्त किये मुख्य चुनाव आयुक्त उनके शपथ पत्र की सत्यता को लेकर चिन्तित नहीं हैं और सुप्रीम कोर्ट उनकी नियुक्ति के मामले पर सुनवाई नहीं कर रहा है सरकार संसद में चुनाव आयोग के काम (एसआईआर) पर चर्चा नहीं होने दे रही है और मीडिया यह प्रचार कर रहा है कि एसआईआर पर चर्चा की मांग नाजायज है और विपक्ष गुमराह कर रहा है जबकि प्रधानमंत्री स्वयं देश को गुमराह करने के लिए करोड़ों खर्च कर मन की बात करते रहे हैं। स्वतंत्र मीडिया को बिना इमरजेंसी के ऐसा बना दिया गया है कि वह प्रचार ही करता है, खबर नहीं देता है। खबरें सरकार (विपक्षी सरकारें भी) विज्ञापन की तरह छपवाती हैं।
आरटीआई को कमजोर करने वाले संशोधनों में खास इस प्रकार हैं, चैट जीपीटी ने टाइम्स ऑफ इंडिया के हवाले से बताया है 1) 2019 का संशोधन — सूचना आयोगों की स्वतंत्रता पर असर कार्यकाल को पांच वर्षों से घटाकर तीन वर्ष कर दिया गया। वेतन, भत्ते एवं सेवा की शर्तें अब सरकार द्वारा तय की जाती हैं, जबकि पहले ये चुनाव आयोग से तुलनीय होती थीं — इससे सूचना आयोगों की स्वायत्तता प्रभावित हुई है। भर्ती में देरी का भी मुद्दा है। कई पद खाली पड़े रहे। इससे आरटीआई अपीलो ज्यादा समय तक लंबित रहे और जवाबदेही प्रभावित हुई। बाद की सूचना दि हिन्दू, टेलीग्राफ के अनुसार। डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 के माध्यम से आगे के संशोधन (डाउन टू अर्थ, द हिन्दू के हवाले से) धारा 8(1)(j) में बदलाव करके ‘व्यक्तिगत सूचना’ को अब आरटीआई से पूरी तरह बाहर रखा गया—पहले इसमें “जनहित की स्थिति” में अपवाद था, जो अब हटाया गया। सार्वजनिक और पारदर्शिता संगठनों ने इस संशोधन का विरोध किया, क्योंकि इससे भ्रष्ट अधिकारियों की जवाबदेही कमजोर होती है। पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एपी शाह ने इसे लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए खतरा बताते हुए इस संशोधन की तत्काल वापसी की मांग की। उन्होंने कहा कि यह आरटीआई के मूल उद्देश्य पर हमला है।
दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजग संसदीय दल की बैठक में यह कहा कि एसआईआर के मामले में विपक्ष पूरे देश को गुमराह कर रहा है और इस पर चर्चा की मांग नाजायज है तो उसे पहले पन्ने पर चार कॉलम में छापने वाले अमर उजाला ने आज पहले पन्ने पर वह नहीं छापा है जो विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है। देशबन्धु में आज पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश को पत्र लिखकर एसआईआर पर तत्काल चर्चा की मांग की है और कहा है कि यह मुद्दा देश के करोड़ों मतदाताओं, खासकर कमजोर वर्गों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यही नहीं, प्रियंका गांधी ने पूछा है, चर्चा से क्यों डर रही है सरकार। खबर के अनुसार, संसद के बाहर विपक्ष ने जोरदार प्रदर्शन किया लेकिन बाकी कई अखबारों के लिए यह पहले पन्ने की खबर नहीं है। वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट ने (बिहार के) मतदाता सूची से हटाये गये लोगों की जानकारी मांगी है। यह खबर आज देशबन्धु में लीड है तो दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में है। इस अखबार में सिंगल कॉलम की एक और खबर है, सरकार ने एसआईआर पर चर्चा की मांग नहीं मानी क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में है। ऐसे में विपक्ष ने मांग की है कि बीच के रास्ते के रूप में चुनाव सुधार पर चर्चा हो। पर वास्तविकता यह है कि चुनाव सुधार के क्रम में जब ईवीएम आया था तो भाजपा ने इसका विरोध किया था और सत्ता में आने के बाद से इसका बचाव कर रही है। पारदर्शी मॉडल में इसपर स्पष्टीकरण दिया जाता लेकिन भ्रष्टाचार के तमाम आरोपियों को पार्टी में शामिल करने वाली भाजपा पारदर्शी तो नहीं ही है एसआईआर पर चर्चा भी नहीं करवा रही है।
ईडी के जरिये विपक्ष को नियंत्रित परेशान करने की आरोपी भाजपा सरकार के बारे ने चैट जीपीटी ने द प्रिंट और इकनोमिक टाइम्स के हवाले से बताया है कि पिछले पाँच वर्षों (2019–2024) के बीच पीएमएलए के 911 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई। इनमें से 654 मामलों में मुकदमा शुरू हुआ। 42 मामलों में कथित आरोपी दोषी पाए गए अर्थात सजा होने की दर 4.6% है। इसके लिए तमाम निर्वाचित जन प्रतिनिधियों और व्यवसायियों को परेशान किया गया जो न सिर्फ पैसे कमाते और टैक्स देते हैं बल्कि सैकड़ों-हजारों लोगों को रोजगार देते हैं। इसके मुकाबले जनहित में सरकार के काम बहुत कम हैं। पारदर्शी मॉडल की बात हम कर ही रहे हैं। एक अन्य रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 654 मुकदमों में से 42 में ही फैसला हुआ, बाकी 71.7% मामले अभी भी लंबित हैं। अगर एक जनवरी से 30 जून 2025 तक के मामलों की बात की जाये तो ईडी ने पीएमएलए के तहत 5,892 मामले दर्ज किए। इनमें से 1,398 मामलों (23%) में चार्जशीट दाखिल की गईं। इनमें 353 सप्लीमेंट्री भी शामिल हैं। केवल 8 मामलों (~0.1%) में दोष सिद्ध हुए और 15 लोग दोषी ठहराए गए। कहने की जरूरत नहीं है कि जांच की यह कार्रवाई सिर्फ सरकार के विरोधियों के खिलाफ हुई है और जांच के दौरान हुई परेशानी (तथा गिरफ्तारी) के कारण उनके काम और व्यवसाय पर असर पड़ा होगा और इस कारण लोगों की नौकरियां गई होंगी। इससे सरकार को भी राजस्व का नुकसान हुआ होगा। पारदर्शिता का तकाजा था कि नोटबंदी पर एक श्वेत पत्र जारी कर बताया जाता कि नफा-नुकसान की स्थिति क्या रही है।
मिलावटी पेट्रोल का बचाव और कीमतें कम करने पर लाचारी
द हिन्दू में आज छपी खबर के अनुसार केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि ई20 ईंधन से संबंधित डर फैलाने के अभियान के पीछे पेट्रोल लॉबी हो सकती है। द हिन्दू के एक आयोजन, ‘माइंड’ में गडकरी ने कहा, परीक्षणों से पता चलता है कि 20% से अधिक इथेनॉल वाले नए पेट्रोल मिश्रण का उपयोग करने से पुराने वाहनों को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होता है। उन्होंने नए ई20 मिश्रण के खिलाफ सोशल मीडिया पर चल रहे आक्रोश को “राजनीतिक साजिश” बताया और कहा कि यह संभवतः पेट्रोल लॉबी द्वारा भड़काई गई है। श्री गडकरी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जैव ईंधन अपनाने से तेल आयात में कटौती करके देश को आत्मनिर्भरता की राह पर लाने में मदद मिलती है, साथ ही प्रदूषण में कमी आती है। किसानों को उनकी फसलों का बेहतर मूल्य सुनिश्चित करके उनकी जान बचती है। वैसे तो अप्रैल 2025 से ई20-ट्यून्ड वाहन आने शुरू हो गए हैं, लेकिन मौजूदा मालिक अपने पुराने वाहनों पर पड़ने वाले प्रभाव और रख-रखाव लागत में वृद्धि को लेकर चिंतित हैं। मंत्री ने कहा, “पुणे स्थित ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई) ने कुल एक लाख किलोमीटर की दूरी तक पुराने वाहनों का परीक्षण किया है और उन्हें कोई समस्या नहीं मिली है।”
इसका मतलब यह नहीं है कि जनता को बताये बगैर, कीमतों में कमी किये बगैर पेट्रोल में मिलावट कर दी जाये। प्रचार यह किया जा रहा है कि सरकार एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा देकर अपने ग्रीन फ्यूल पॉलिसी का तेज़ी से विस्तार कर रही है। इसकी शुरुआत ई10 (10 प्रतिशत एथेनॉल) से हुई और अब इसे देश भर के पेट्रोल पंपों पर ई20 (20 प्रतिशत एथेनॉल) तक बढ़ाया जा रहा है। इधर लोगों में इस एथेनॉल ब्लेंड फ्यूल को लेकर चिंता बढ़ गई है। कुछ वाहन मालिकों को इथेनॉल ब्लेंड फ्यूल से वाहन के इंजन को होने वाले नुकसान की चिन्ता है। यहां मुझे अनलेडेड पेट्रोल और इसके लिए गाड़ियों में संशोधन की याद आती है। भारत में जब इसे लागू किया गया तो महीनों तक इसकी चर्चा रही। वाहन मालिकों ने आवश्यक पूछताछ की और तब जाकर अनलेडेड पेट्रोल की शुरुआत हुई लेकिन यहां पेट्रोल में मिलावट (जो भले फायदे के लिए हो) बिना बताये कर दी गई है और कीमतें वही हैं। बहाना यह कि सरकार इथेनॉल-मिक्स पेट्रोल के प्रयोग को बढ़ावा देकर ईंधन आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है। लेकिन कार मालिक, खासकर वे जिन्होंने कुछ साल पहले गाड़ियाँ खरीदी थीं, महसूस कर रहे हैं कि उनके लिए ये नुकसान का सौदा है। हाल के दिनों में, कई वाहन मालिकों ने एथेनॉल-ब्लेंड पेट्रोल से इंजन को होने वाले संभावित खतरों के बारे में चिंता जताई है, इस आशंका के साथ कि पुरानी कारों में, एथेनॉल-ब्लेंड फ्यूल का उपयोग न केवल माइलेज पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है बल्कि इंजन की उम्र को भी कम कर सकता है, और यहाँ तक कि मरम्मत का खर्च भी भारी पड़ सकता है। दूसरी ओर, यह पूछे जाने पर कि क्या सस्ते इथेनॉल विकल्प से अंतिम उपयोगकर्ता के लिए पेट्रोल की लागत कम होगी? श्री गडकरी ने कहा कि पेट्रोल की कीमतें तय करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। खबर है कि मिलावटी पेट्रोल के उपयोग से माइलेज में भी 5% से 6% की गिरावट आती है। गडकरी ने वाहनों के माइलेज पर पड़ने वाले प्रभाव को स्वीकार किया, लेकिन उपभोक्ताओं को आवश्यक छूट या राहत देने की जरूरत ही नहीं समझी और इसके खिलाफ अभियान को साजिश करार दिया। उन्होंने ई20 ईंधन मिश्रण अपनाने से देश को होने वाले कई लाभों का ज़िक्र किया।


