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हमारे साथ अगर कोई व्यक्ति लगातार खड़ा रहा तो वे उमाकांत लखेड़ा थे!

उमाकांत लखेड़ा को क्यों बनना चाहिए प्रेस क्लब का अध्यक्ष… कोरोना संकट के दौरान राज्य सभा टीवी से जब 37 लोगों को अचानक 30 सितंबर 2020 को बाहर कर दिया गया तो हमें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। पत्रकारों के तमाम संगठनों के दरवाजों पर हमारे कई साथियों ने दस्तक दी, लेकिन अधिकतर लोग चिट्ठी लिख कर उप राष्ट्रपति से विरोध जताने को तैयार नहीं थे। उस दौरान हमारे साथ अगर कोई व्यक्ति लगातार खड़ा रहा तो वे उमाकांत लखेड़ा थे। वे तब न तो किसी पत्रकार संगठन के पदाधिकारी थे और न ही प्रेस क्लब के। लेकिन उनके स्तर पर जो प्रयास चले उससे मीडिया में देश के तमाम हिस्सों तक हमारी आवाज पहुंची। कई लोग हम लोगों को मदद करने के लिए खड़े हुए। इस पूरे संकट में हमारी मदद जिन लोगों ने की, साथ दिया और चिट्ठी पत्री लिखी लिखायी उसमें हमारे वरिष्ठ साथी अरविंद कुमार सिंह के मित्र और IFWJ के नेता श्री परमानंद पांडेय, वर्किंग जर्नलिस्ट्स आफ इंडिया के महासचिव श्री नरेंद्र भंडारी और भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य श्री आनंद राणा के साथ भारतीय किसान यूनियन और कुछ अन्य किसान संगठनों के नेता शामिल थे। इनके प्रति हम लोग आभारी हैं। लेकिन हम लोगों की जिस तरह से मदद इस पूरे दौर में लखेड़ाजी ने किया, उसे लेकर हम लोगों ने तय किया है कि हम प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में अध्यक्ष पद पर उनकी मदद करें।

उमाकांत लखेड़ा

कोरोना संकट के दौरान राज्य सभा टीवी से जिन 37 लोगों की सेवाएं समाप्त की गयी थी उसमें से श्री राहिल चोपड़ा महासचिव का चुनाव लड़ रहे हैं। RSTV के हमारे साथी रवींद्र श्योराण भी कार्यकारिणी में लड़ रहे हैं। हममें से कई लोग प्रेस क्लब के सदस्य नहीं हैं। फिर भी इनकी मदद हम अपने स्तर पर कर रहे हैं और मानते हैं कि क्लब को इस समय उमाकांत लखेड़ा जैसे जुझारू साथी की जरूरत है। कोरोना संकट के बाद मीडिया की दुनिया जैसी बदली है, उसमें अभी हम जैसे जाने कितने लोगों को मदद की जरूरत होगी। लेकिन अगर हम ऐसे लोगों को चुन देंगे जिनको अपने साथियों के लिए चिट्ठी लिखने में भी संकोच होगा तो यह दुर्भाग्य होगा।

हम लोग क्लब की राजनीति से हमेशा दूर रहे हैं। राज्य सभा टीवी की टीम से अरविंद कुमार सिंह से लेकर इरफानजी से लेकर जितने लोगों को बाहर किया गया उसकी कहानिय़ां अब छिपी नहीं रह गयी हैं। पूरे सचिवालय में यह चर्चा अब आम है कि इनको केवल इस नाते हटाया गया था क्योंकि संसद टीवी में ये अपनी योग्यता, अनुभव और सक्षमता से उन लोगों की दुकानें बंद करा सकते थे जो पिछले दरवाजे से आ कर तीन-तीन लाख से अधिक वेतन ले रहे हैं। लेकिन इस षडयंत्र के मुख्य नायक रहे राज्य सभा टीवी के सीईओ मनोज कुमार पांडेय और निदेशक अब विदा हो चुके हैं। उनके बाद जो बचे हैं, उनको खुद यह नहीं पता है कि अगले दिन उनके साथ क्या होगा। जो गड्ढा खोदता है, वह उसमें गिर सकता है, राज्य सभा टीवी की कहानी दोहरा रही है। जिनको लगता था कि संसद टीवी पर उनका कब्जा हो जाएगा वे अब दरवाजे पर बैठे इंतजार कर रहे है कि उनको बुलाया जाएगा भी या नहीं।

2011 में राज्य सभा टीवी के आरंभ होने के बाद इसने जो वैश्विक प्रतिष्ठा हासिल की उसमें हम सबका योगदान भी था। लेकिन मर्जर का फैसला कुछ लोगों ने ऊपर से ले लिया और स्टाफ के लोगों से संवाद तक नहीं किया। कोरोना संकट में राज्य सभा टीवी से जब लोगों को हटाया गया तो हमारा साथ लखेड़ा जी ने दिया। उन्होने राज्य सभा सचिवालय के अधिकारिय़ों पर दबाव बनाया कि अगर संसाधन का संकट है तो फिर लोगों को निकालने की जगह 75 हजार से एक लाख तक वेतन वालों के वेतन से 20 फीसदी और एक लाख से अधिक वालों के वेतन पर 30 फीसदी कटौती कर ली जाये। लेकिन रिटायर और मजबूत आर्थिक पृष्ठभूमि वाले वे लोग बने रहे जिन पर तीन लाख से अधिक व्यय हो रहा है लेकिन दिव्यांगों तक को हटा दिया गया। उनके घरों के चूल्हे बुझा दिए गए। सभापति राज्य सभा को भी सारी कहानियों का अंदाज बाद में हुआ लेकिन तब तक गंगा य़मुना में काफी पानी बह चुका था।

खैर बातें बहुत सी हैं और हमें तमाम पत्रकार संगठनों औऱ उनके नेताओं से बहुत तकलीफ है जिनको सारे तथ्यों से हम लोगो ने अवगत कराया लेकिन वे हमारे साथ खड़े नहीं हुए। फिर भी उमाकांत लखेड़ा जैसे वरिष्ठ पत्रकार का हमें साथ लगातार मिला। वे एक जुझारू व्यक्ति हैं और तीन दशकों से राष्ट्रीय पर पत्रकारों के हितों व संस्थानों व सरकारों द्वारा उत्पीड़ित पत्रकारों व उनके परिजनों के साथ खड़े होते रहे हैं। RSTV की एक महिला पत्रकार साथी के खिलाफ भी जब एक वरिष्ठ अधिकारी ने उत्पीड़ित करने का प्रयास किया तो वे खुद उनके पक्ष में गवाही देने पहुंचे और IWPC की भी मदद ली। 2015 से 2018 के बीच डीयूजी के सचिव रहने के दौरान भी लखेड़ा जी हम लोगों की मदद करते रहे हैं।

हमें लगता है कि एक जुझारू और प्रतिष्ठित पत्रकार जिसका तीन दशको से अधिक समय तक राष्ट्रीय समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों से जुड़ाव रहा है, वह क्लब को अधिक बेहतर तरीके से चला सकता है और नेतृत्व देते हुए बहुत से सताए लोगों की मदद कर सकता है। उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होते हुए जमीनी स्तर पर पत्रकारिता करते हुए वे दिल्ली तक पहुंचे हैं। रक्षा संवाददाता के रूप में भी हिंदी में उन्होने बेहतरीन काम किया और देश के तमाम हिस्सो को बहुत करीब से जाना समझा है। संसदीय पत्रकारिता की भी लंबी समझ रहने साथ ये लोकसभा की मीडिया सलाहकार समिति के सचिव भी रहे। तमाम देशों को भी करीब से जाना समझा है। लेकिन एक बेहतरीन इंसान और सताए लोगों के साथ खड़े होने की उमाकांत लखेड़ा की आदत के नाते हम लोग उनके साथ हैं।

RSTV कांटक्चुअल इंप्लाईज एसोसिएशन के सदस्यों की ओर से जारी.

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