‘अंकल जजों’ से कैसे मिले छुटकारा ?

लेखक मदन तिवारी बिहार के गया जिले के जाने-माने वकील, पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.


जस्टिस काटजू के आरोपों की होनी चाहिए जांच…

उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति में होता है पक्षपात …

18वें लॉ कमीशन की रिपोर्ट (संख्या 230) में लिखा है- अंकल जजों से ग्रसित उच्च न्यायपालिका….

क्या है इसका निदान …. ???

अभी जस्टिस मारकंडे काटजू ने एक उच्च न्यायालय के जज की नियुक्ति राजनीतिक पैरवी पर करने का आरोप पूर्व के मुख्य न्यायाधीश पर लगाया है. यह एक गंभीर आरोप है. उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति में पक्षपात को ला कमीशन ने भी स्वीकार किया है  तथा उससे निअपताने के सुझाव भी दिए है परन्तु उन सुझावों पर अमल न करना  हमारी सरकारों और न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल पैदा करता है. अभी तक कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसके तहत उच्च न्यायालय के जजों के उपर आम आदमी द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच की जा सके. ऐसी स्थिति में यह प्रश्न खडा हो जाता है कि आखिर न्याय कैसे मिलेगा? 18वें लॉ कमीशन ने अपने रिपोर्ट में जो पाया है उसका उल्लेख हम नीचे कर रहे है.

वर्तमान व्यवस्था के तहत एक व्यक्ति जो उसी राज्य में स्थित जिला न्यायालय का जज है या उच्च न्यायालय में प्रेक्टिस करने वाला अधिवक्ता, उसे ही उस राज्य में अवस्थित उच्च न्यायालय का जज नियुक्त किया जाता है. अक्सर इन ‘अंकल जजों’ के बारे में शिकायते सुनने को मिलाती है. अगर कोई व्यक्ति 20-25 साल तक उस न्यायालय में अधिवक्ता के रूप के कार्य कर चुका हो और उसे उसी उच्च न्यायालय में जज नियुक्त किया जाता है तो उसमें रातोरात बदलाव संभव नहीं है. उसके मित्रगण होते हैं, जूनियर और सीनियर अधिवक्ता होते हैं, परिवार-रिश्तेदार होते हैं जिन्होंने उसके साथ प्रेक्टिस/वकालत की है. यहाँ तक की कुछ जिला जज जो उच्च न्यायालय के जज बनाए जाते हैं, उनके परिवार, बेटे बेटी उसी उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करते हैं. ऐसी स्थितिया भी आती हैं जब वकील से उच्च न्यायालय के जज बने व्यक्ति द्वारा अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी वकील के साथ बदले की भावना से कार्य करते हैं या फिर अपने मित्र वकील के प्रति नरम रवैया अपनाते है इन दोनों परिस्थितियों में यह न्यायालय की निष्पक्षता को प्रभावित करता है और न्याय पराजित होता है. न्याय का तकाजा है कि वह न सिर्फ प्रदान किया जाय बल्कि यह परिलक्षित हो कि न्याय प्रदान किया गया. सेवाओं में, खासकर क्लास दो और उससे ऊपर के अधिकारियों की पोस्टिंग विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, उनके गृह क्षेत्र में नहीं की जाती है. किसी भी परिस्थिति में वैसे जज जिनके नजदीकी उसी उच्च न्यायालय में प्रेक्टिस करते है, उनकी उसी उच्च न्यायालय में पोस्टिंग न हो तभी इस अंकल जज जैसे अभिशाप से मुक्ति पाई जा सकती है.

कभी कभी यह प्रतीत होता है कि इस उच्च पद को संरक्षण प्राप्त है. एक व्यक्ति जिसका नजदीकी रिश्तेदार और शुभचिंतक उच्च न्यायालय में जज है या वरीय अधिवक्ता है या उच्ची पहुँच वाला राजनीतिक है, उस वकील का जज बनने का चांस ज्यादा होता है. कोई जरुरी नहीं की वह व्यक्ति योग्य ही हो, ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है. जब कम योग्य व्यक्ति भी जज बना दिया जाता है . इस तरह के व्यक्तियों की नियुक्ति उसी उच्च न्यायालय में नहीं होनी चाहिए. अगर ये दूसरे उच्च न्यायालय में नियुक्त किये जाते है तो कानूनी क्षेत्र में उनकी क्षमता और श्रेष्ठता का परीक्षण भी हो जाएगा.

As a matter of practice, a person, who has worked as a District Judge or has practised in the High Court in a State, is appointed as a Judge of the High Court in the same State. Often we hear complaints about ‘Uncle Judges’. If a person has practised in a High Court, say, for 20-25 years and is appointed a Judge in the same High Court, overnight change is not possible. He has his colleague advocates – both senior and junior – as well as his kith and kin, who had been practising with him. Even wards of some District Judges, elevated to a High Court, are in practice in the same High Court. There are occasions, when advocate judges either settle their scores with the advocates, who have practised with them, or have soft corner for them. In any case, this affects their impartiality and justice is the loser. The equity demands that the justice shall not only be done but should also appear to have been done. In government services, particularly, Class II and upward, officers are not given posting in their home districts except for very special reasons. In any case, the judges, whose kith and kin are practising in a High Court, should not be posted in the same High Court. This will eliminate “Uncle Judges”.

Sometimes it appears that this high office is patronized. A person, whose near relation or well-wisher is or had been a judge in the higher courts or is a senior advocate or is a political high-up, stands a better chance of elevation. It is not necessary that such a person must be competent because sometimes even less competent persons are inducted. There is no dearth of such examples. Such persons should not be appointed and at least in the same High Court. If they are posted in other High Courts, it will test their calibre and eminence in the legal field.

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