आशीष सागर दीक्षित-
बुंदेलखंड के जिला हमीरपुर में तहसील स्तर के क्षेत्रीय पत्रकारों के साथ हुआ यह घटनाक्रम बेहद हिंसात्मक, क्रूरतापूर्ण, अमानवीय एवं लोकशाही में भ्रस्ट व्यवस्था की बानगी है।
बीते शनिवार जब भड़ास ने लखनऊ की मान्यता प्राप्त पत्रकारों की समिति के लगातार मौन और इस तरह की प्रदेश व्यापी घटनाओं पर नजरअंदाजी के मद्देनजर घेराबंदी की तो थोड़ी सुगबुगाहट शुरू हुई है। बीते शनिवार इस क्रम में बाँदा में भी ज्ञापन मांग पत्र दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि पत्रकार ही छोटे ज़िले स्तर पर पत्रकार का दुश्मन बन बैठा है।
गौरतलब है फतेहपुर के एएनआई न्यूज़ एजेंसी संवाददाता मृतक दिलीप सैनी की हत्या का घटनाक्रम हो या हमीरपुर प्रकरण यह उत्तरप्रदेश की सरकारी और प्रजातांत्रिक ‘कोलैप्स’ कर चुकी व्यवस्था को उजागर करता है।
उल्लेखनीय है दिलीप सैनी केस में नामजद आरोपियों में 5 गिरफ्तार हो गए है। वीडियो पोस्ट के साथ है। वहीं हमीरपुर केस में बीजेपी नगर पंचायत अध्यक्ष द्वारा अपने साथियों के साथ दो क्षेत्र के पत्रकारों पर दबंगई की वारदात फिर क्रॉस केस बनाने को कूटरचित एफआईआर लिखवाना यह दर्शाता है कि खाकी का सिस्टम कैसे समाज को अदालती चक्रव्यूह में उलझाकर न्याय की गरिमा पर कुठाराघात कर रहा है।
जिस तरह हमीरपुर के दो पत्रकारों को नग्न कर जलील किया गया है उनके बयान सुनकर लगता है कि एक भीड़ है जो न्यायालय व कानून पर भरोसा न करके खुद ही न्यायदाता बनकर फैसला करने को तत्पर है।
खैर उत्तर प्रदेश में अब ईमानदार पत्रकारिता करना जीवन सुरक्षा को दांव में लगाने से कमतर रास्ता नहीं है। शायद इसलिए ही खांटी पत्रकार से मौसमी पत्रकार तक ब्यूरोक्रेसी के इर्द-गिर्द खपकर अपनी ऊर्जा आपसी वैमनस्यता मे खर्च कर रहे है। नितांत आवश्यक है कि पत्रकार सुरक्षा कानून दिल्ली के सदन में पारित हो और सत्ता पर विपक्ष इसके लिए प्रेशर ग्रुप की तरह निगरानी एवं पैरवी करे।
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