एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को!

यूपी में रक्तहीन क्रांति पर भड़ास एडिटर यशवंत की त्वरित प्रतिक्रिया- ‘मीडियाकर्मियों का अंतहीन उत्पीड़न करने वाले अखिलेश राज का खात्मा स्वागत योग्य’

Yashwant Singh : यूपी में हुए बदलाव का स्वागत कीजिए. सपा और बसपा नामक दो लुटेरे गिरोहों से त्रस्त जनता ने तीसरे पर दाव लगाया है. यूपी में न आम आदमी पार्टी है और न कम्युनिस्ट हैं. सपा और बसपा ने बारी बारी शासन किया, लगातार. इनके शासन में एक बात कामन रही. जमकर लूट, जमकर झूठ, जमकर जंगलराज और जमकर मुस्लिम तुष्टीकरण. इससे नाराज जनता ने तीसरी और एकमात्र बची पार्टी बीजेपी को जमकर वोट दिया ताकि सपा-बसपा को सबक सिखाया जा सके.

प्रचंड बहुमत से यूपी में सत्ता पाने वाली भाजपा ने अगर अगले दो साल में शासन करने का ढर्रा नहीं बदला, सपा-बसपा वाली लूट मार शैली से इतर एक नया सकारात्मक कल्चर नहीं डेवलप किया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी में थउंस जाएगी यानि ढेर हो जाएगी. मैंने निजी तौर पर अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को हराने के लिए अपील किया था क्योंकि इन महोदय के राज में एक पत्रकार जिंदा जला दिया गया, पत्रकार ने मरने से पहले जलाने वाले मंत्री का नाम भी लिया लेकिन उस मंत्री को सत्ता से बेदखल नहीं किया गया. आपको यह भी याद होगा कि अखिलेश यादव ने यूपी में सरकार बनाते हुए मुझे कुछ भ्रष्ट पतित संपादकों और मीडिया हाउसों के इशारे पर उठवा कर अवैध तरीके से 68 दिनों तक जेल में बंद करवाया था.

मेरे बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को भी जेल में डलवाया गया. बाद में आफिस और घरों पर छापे डलवाए गए. खैर, हम लोग तो जेल से जश्न मनाते हुए निकले और ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिख डाला. पर फकीर का श्राप आह तो पड़ता ही है. एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को! मैंने सपा को वोट न देकर किसी को भी वोट देने की अपील की थी. ढेर सारे लखनवी चारण पत्रकारों और ढेर सारे मीडिया हाउसों के ‘अखिलेश जिंदाबाद’ वाली पेड न्यूज पत्रकारिता के बावजूद अखिलेश यादव को जनता ने दक्खिन लगा दिया.

बीजेपी वाले जश्न बिलकुल मनाएं, लेकिन ध्यान रखें कि जनता ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी दे दी है. अब शासन का नया ढर्रा विकसित करना होगा और जंगलराज-लूटराज से यूपी को मुक्ति दिलानी होगी. हम सबकी नजर यूपी की नई भाजपा सरकार पर रहेगी. फिलहाल मोदी और शाह की करिश्माई जोड़ी को बधाई… ये लोग सच में इस लोकतंत्र में वोटों की राजनीति-गणित के शहंशाह साबित हो रहे हैं. जैजै

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्ट स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें : YASHWANT FB POST

ये है वो खबर जिसे भड़ास की तरफ से यूपी चुनाव से ठीक पहले एक अपील के रूप में जारी किया गया था…

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आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने अखिलेश यादव के संरक्षण में हुए एक बड़े घोटाले का किया भंडाफोड़

Surya Pratap Singh : उद्योग मंत्री/ मुख्य मंत्री के संरक्षण में उत्तर प्रदेश में UPSIDC बना एक घोटालों का अड्डा…. मुख्यमंत्री/उद्योग मंत्री अखिलेश की नाक के नीचे UPSIDC में रु. २०,००० करोड़ का भूमि घोटाला हुआ हैं….मनमाने ढंग से साक्षात्कार के माध्यम से भू आवंटन किया गया है …. साक्षात्कार का मतलब रिश्वत की सौदागिरी !!!
मुख्यमंत्री/ उद्योग मंत्री अखिलेश यादव ने अपने मित्र के नाम पर ‘स्टील प्लांट’ लगाने के लिए UPSIDC के सिकंदराबाद औद्योगिक क्षेत्र में 111 ऐक़ड भूमि बिना किसी टेंडर पर वर्ष २०१३-२०१४ में औने-पौने मूल्य/बहुत सस्ते में वर्ष २०१४ में आवंटित की गयी है ….. जिसकी जाँच आने वाली सरकार क्या जाँच कराएगी ? मेरे इस सम्बंध में निम्न प्रश्न हैं:

1. क्या इस भूमि के आवंटन से पूर्व क्या कोई स्कीम निकाली गयी थी …विज्ञापन दिया गया था या नहीं? यदि नहीं तो क्यों? किसके अलिखित निर्देश पर यह भूमि आवंटित की गयी ?

2. क्या कोई open auction के लिए टेंडर निकला गया था। यदि नहीं, तो क्यों?

3. भूमि का क्या कोई रिज़र्व प्राइस रखा गया था ? यदि नहीं तो क्यों? यदि रिज़र्व प्राइस रखा गया था तो इसका आधार क्या था ?

4. क्या कलेक्टर द्वारा निर्धारित मूल्य पर या मार्केटिंग प्राइस पर आवंटन किया गया था?

5. आवंटन से पूर्व किस स्तर से स्वीकृति ली गयी। क्या मंत्री परिषद का अनुमोदन किया गया था ? यदि नहीं तो क्यों? आवंटन आदेश पर किसके हस्ताक्षर हैं?

6. आवंटन के लिए क्या कोई कमेटी बनायी गयी थी और उसके सदस्य कौन-२ थे ?

7. कितना नुक़सान UPSIDC को हुआ? इसका ज़िम्मेदार कौन?

इसी प्रकार दूसरा बड़ा घोटाला मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कहने पर ‘भसीन ग्रूप’ को Grand Venezia/Grand Venice Mall के लिए 10.5 ऐक़ड़ इंडस्ट्रीयल भूमि को वर्ष २०१४ में commercial में परिवर्तित करके भूमि आवंटन किया गया है। इस १.५ million sq. mt. में बन रहे मॉल के लिए निर्माण कार्य/नक़्शा पारित करने में बड़ा घुटाला हुआ है ..यह मॉल UPSIDC area near Kasna Site IV, Greater Noida में स्थित है। इसके कई फ़्लोर मुख्यमंत्री, उनके मित्रों व कई नौकरशाहों ने अपने नाम आवंटित कराए हैं। इस के sales rate Rs. १५,०००- २०,००० per sq ft. है। इसकी उच्च स्तरीय जाँच में सब सामने आ जाएगा। इस सम्बंध में निम्न प्रश्न हैं:

1. Industrial area में भू उपयोग परिवर्तन कर भसीन ग्रूप की दी गयी १०.५ ऐक़ड भूमि का land use change कर commercial किन परिस्थितियों में किया गया?

2. आवंटन का आधार क्या था? किस स्तर का अनुमोदन लिया गया? क्या मंत्री परिषद का अनुमोदन लिया गया?

3. इस १०.५ acre भूमि का open auction क्यों नहीं किया गया? नियमों का उल्लंघन कर इंडस्ट्रीयल भूमि का commercial स्वरूप क्यों किया गया? नियम विरुद्ध 40 लाख sq.ft. buildup किस दबाव में स्वीकृत कर दिया गया….

4. कितने नेताओं व IAS अधिकारियों के व उनके परिवारों के नाम कितने floors आवंटित हैं ? नेता-नौकरशाह-रियल इस्टेट माफ़िया का गठजोड़ का नमूना है, यह मॉल।

5. नॉएडा क्षेत्र से मिले होने के कारण इस भूमि के मूल्य व नॉएडा अथॉरिटी द्वारा सेक्टर-१८ में आवंटित भूमि के मूल्य में कितना अंतर था और क्यों?

6. कन्स्ट्रक्शन area में कितनी अतिरिक्त छूट दी गयी व कितनी बार नक़्शे व भू उपयोग परिवर्तनों में छूट दी गयी?

7. २० फ़्लोर कन्स्ट्रक्शन की अनुमति किन नियमों के तहत दी गयी है।

UPSIDC में भ्रष्ट इंजीनियरों की फ़ौज है जिनके ख़िलाफ़ CBI तक की जाँच चल रही है … जेल तक जा चुके हैं… ED द्वारा प्रापर्टी भी जप्त की गयी है फिर भी ये भ्रष्ट इंजीनियर प्रमोशन देकर joint MD तक बना दिए गए, सभी अधिकार MD लोगों ने प्रतिनिधायित कर दिए गए…. हाई कोर्ट व सप्रीम कोर्ट के अनेक आदेशों को ठेंगा दिखाया गया है। IAS ऑफ़िसर तक निलम्बित हुये हैं… लेकिन मुख्यमंत्री जो स्वमं उद्योग मंत्री है ने आँखे बंद कर रखी हैं… आख़िर क्यों ?

Troinka सिटी ग़ाज़ियाबाद में भी बड़े पैमाने पर भू आवंटन व land use change पैसे लेकर किए गए हैं। planstic city औरैया, कन्नौज में स्थापित फ़ूड पार्क, Trans-Ganga कानपुर , theme पॉर्क आगरा व इलाहबाद में नव स्थापित इंडस्ट्रीयल पार्क में निर्माण व भू आवंटन में भी घोटाले की पटकथा रची गयी है। सड़के व अन्य निर्माण एक ही स्थान पर बिना काम किए भुगतान प्राप्त किए गए….UPSIDC के प्रदेश सभी industrial areas में भूमि आवंटन व लैंड यूज़ परिवर्तन में घोटाले हुए हैं… क्या-२ बताऊँ?

अतः मैं माँग करता हूँ कि UPSIDC के उक्त घोटालों की CBI से जाँच करायी जाए ….. नेता-आईएएस अधिकारियों-इंजीनियरस-Real Estate माफ़िया के घोटाले की उच्च स्तरीय जाँच कराना आने वाली सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी….देखते हैं क्या आने वाली सरकार इन घोटालों की जाँच कराती या नहीं…. या फिर बातें है बातों का क्या ..वाली कहावत चरितार्थ होती है ….उत्तर प्रदेश में बड़े-२ घोटाले मुख्यमंत्रियों के संरक्षण में होते रहे हैं न कोई जाँच हुई और न कोई अभी जेल गया …. ये जनता के साथ विश्वासघात है, कोरा विश्वासघात…..

यूपी के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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बहुत उदार और उदात्त है यूपी पुलिस, थाने से भाग जाने देती है लफंगों को (देखें वीडियो)

यूपी की बहादुर पुलिस खुद भले चोर बदमाश न पकड़ पाए लेकिन जब कोई दूसरा पकड़ कर पुलिस को सौंपता है तो पुलिस वाले पूरी उदारता बरतते हुए उसे चले जाने देते हैं… शायद इसीलिए कहा जाता है चोर पुलिस मौसेर भाई.. नीचे कमेंट बाक्स में दिए गए एक वीडियो को देखिए…

लड़की बात रही है कि फीमेल बाथरूम में वीडियो बनाने वाले एक युवक को पकड़ कर पुलिस को सौंपा गया लेकिन पुलिस ने उस युवक को भाग जाने दिया… मामला आगरा का है…. धन्य है हमारी यूपी पुलिस.. एक सैल्यूट तो बनता ही है जी, इस अदभुत उदात्तता और मानवीयता के लिए…

देखें वीडियो…

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लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता का एक ताजा अनुभव

विष्णु गुप्त

क्या लखनऊ की पत्रकारिता अखिलेश सरकार की रखैल है? लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर क्यों बना हुआ रहता है? अखिलेश सरकार के खिलाफ लखानउ की पत्रकारिता कुछ विशेष लिखने से क्यों डरती है, सहमती है? अखिलेश सरकार की कडी आलोचना वाली प्रेस विज्ञप्ति तक छापने से लखनऊ के अखबार इनकार  क्यों कर देते हैं? अब यहां प्रष्न उठता है कि लखनऊ के अखबार अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने से डरते क्यों हैं? क्या सिर्फ रिश्वतखोरी का ही प्रश्न है, या फिर खिलाफ लिखने पर अखिलेश सरकार द्वारा प्रताडित होने का भी डर है?

सही तो यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने पर लखनऊ की पत्रकारिता को प्रताड़ित होने का भी डर है और रिश्वतखोरी से हाथ धोने का भी डर है। अखिलेश सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में पत्रकारों को अपने पक्ष में करने के लिए दोनों तरह के हथकंडे अपना रखे है। एक हथकंडा पत्रकारों और अखबार मालिकों को रिश्वतखोरी कराने और दूसरे हथकंडे में खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न करना।

अखिलेश सरकार के इस दोनों हथकंडों की परिधि में लखनऊ की पत्रकारिता पूरी तरह चपेट में हैं। ईमानदार और स्वतंत्र पत्रकारों की हत्या हुई, उत्पीड़न हुआ पर लखनऊ में अखिलेश सत्ता के खिलाफ पत्रकारों की कोई सशक्त आवाज नहीं उठी। यूपी के पत्रकारों की हत्या और उत्पीडन की आवाज दिल्ली तक तो पहुंची और दिल्ली में अखिलेश सरकार के खिलाफ पत्रकारों की आवाज भी उठी थी पर लखनऊ में सषक्त आवाज नहीं उठी। पत्रकारिता हमेशा सत्ता को आईना दिखाने के लिए जानी जाती है और यह धारणा विकसित है कि स्वच्छ और निडर पत्रकारिता ही अराजक, भ्रष्ट और निकम्मी सत्ता की कुंभकर्णी नींद से जगाती है और जन चेतना का संचार कर ऐसी सत्ता को जनाक्रोश का सामना कराती है। पर पत्रकारिता के इस धर्म का कहीं कोई वीरता है नहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए यह चितांजनक स्थिति है, जिस पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

अभी-अभी हमने लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर देखा है, अखिलेश सरकार की शरणागत पत्रकारिता को देखा है। कैसे एक मामूली प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम का अखबार या चैनल संज्ञान लेने से इनकार कर देते हैं कि वह प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम अखिलेश सरकार के खिलाफ था। प्रसंग मेरी पुस्तक से जुड़ा हुआ है। सर्वविदित है कि अखिलेश के गुंडा राज पर एक मेरी पुस्तक आयी है, पुस्तक का नाम है, ‘अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार’। लोकशक्ति अभियान द्वारा लखनऊ में मेरी पुस्तक पर एक परिचर्चा कार्यक्रम रखा गया था। परिचर्चा कार्यक्रम में कई हस्तियां शामिल थीं, कई पत्रकार भी शामिल थे। परिचर्चा कार्यक्रम में लोगों ने पुस्तक पर खट्टी-मिटठी चर्चा की। हमने यह सोचा था कि परिचर्चा कार्यक्रम को एक समाचार दृष्टि से जरूर जगह मिलेगी। जिन अखबारों के प्रतिनिधि नहीं पहुंचे थे उन अखबारों को परिचर्चा कार्यक्रम की प्रेस विज्ञप्ति कार्यक्रम के आयोजक लोकशक्ति अभियान द्वारा भेज दी गयी थी। पर परिचर्चा कार्यक्रम की खबर कहीं भी नहीं छपी।   

मैं एक कॉलमनिष्ट हूं। लखनऊ के कई अखबारों में मेरा कॉलम भी छपता है। इसलिए मैने कई संपादकों को कॉल कर पूछ लिया कि भाई परिचर्चा कार्यक्रम की खबर क्यों नहीं छापी? यह तो साधारण और सूचनात्मक खबर थी। पहले तो आनाकानी हुई फिर संपादकों का कहना था कि अखिलेश सरकार से कौन बैर लेगा, अखिलेश के गुंडों से कौन लडाई मोल लेगा, आप तो दिल्ली वाले हैं, लखनऊ से सीधे दिल्ली पहुंच जायेंगे, आपको डर नहीं है पर हमे तो लखनऊ में रहना है, अगर अखिलेश सरकार की वापसी हो गयी तो फिर अगले पांच साल तक हमारा अखबार निशाने पर रहेगा। संपादकों की यह चिंता और डर के पीछे एक नहीं कई अन्य रहस्य भी है जिन्हें बेपर्दा करना जरूरी है।

अब यहां प्रश्न उठता है कि अखबारों और संपादकों के डर के पीछे अन्य रहस्य क्या है? संपादकों ने पूरा सच नहीं बताया। यह सही है कि राज्य सत्ता के खिलाफ लिखने और अभियानरत रहने से उत्पीड़न का खतरा रहता है। पर पत्रकारिता तो खतरों से खेलने का नाम है, पत्रकारिता तो जान पर खेलकर खबरें निकालने और सभी को सच का आईना दिखाने का नाम है? राज्य सत्ता से डरने वाले, गुंडों से डरने वाले, समाजविरोधी से डरने वाले, भ्रष्ट अधिकारियों से डरने वाले और ऐेसे लोगों के सामने शरणागत होने वाले लोग पत्रकार हो ही नहीं सकते हैं, ऐसे लोग चरणपादुका संस्कृति के होते हैं, दलाल किस्म के होते हैं, इनके लिए पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ की पूर्ति के लिए एक सशक्त माध्यम भर होती है, पत्रकारिता को सरकार, गुंडों, असामाजिक तत्वों और भ्रष्ट अधिकारियों का चरणपादुका बना कर अपनी झोली भरते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज पत्रकारिता में लोग एक मिशन के तहत नहीं आते हैं, वीरता दिखाने के लिए नहीं आते हैं, परिवर्तन के लिए नहीं आते हैं, क्रांति के लिए नहीं आते हैं। सिर्फ और सिर्फ पेट पालने और नौकरी करने आते हैं। फिर अन्य लोगों और पत्रकारों में अंतर क्या रह जायेगा? पत्रकार फिर अपने को विशेष क्यों और कैसे कह पायेंगे।

जब हमने जानने की यह कोशिश की आखिर असली रहस्य क्या है तो पता चला कि यह रहस्य रिश्वतखोरी का है। लखनऊ में पत्रकारों को रिश्वतखोरी कराने की एक बडी विषैली संस्कृति बन चुकी है। रिश्वतखोरी कराने के लिए प्रतिस्पर्द्धा होता रहा है। प्राय: सभी सरकारो में यह संस्कृति रही है। पर अखिलेश की सरकार मे यह संस्कृति और भी विषैली बन गयी है। लखनऊ ही नहीं बल्कि नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर और वाराणसी जैसे शहरों में सैकडों पत्रकारों को अखिलेश सरकार ने आवास की सुविधा दी है। सरकारी नियम के अनुसार जिसका जिस शहर में अपना आवास होता है उस शहर मेें ऐसे पत्रकार को सरकारी आवास नहीं मिल सकता है। पर दर्जनों-दर्जनों ऐसे पत्रकार हैं जिनका खुद का मकान है पर सरकारी मकान भी आंवटित करा रखे हैं। कई ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्होने वर्षों पहले पत्रकारिता छोड रखी है, जिनका अब पत्रकारिता से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है फिर पत्रकार कोटे से सरकारी आवास की सुविधा भोग रहे हैं। कई ऐसे लोग भी है जिनकी जिंदगी कब्र में लटकी हुई है फिर भी पत्रकार के नाम पर सरकारी मकान की सुविधा से अपनी दो पीढियों को लाभार्थी करा रहे हैं। ऐसे लोग अखिलेश सरकार से डर कर पत्रकारिता का गला तो घोटेंगे ही, यह तय है।

सरकारी विज्ञापन एक बड़ा कारण है। छोटा-बड़ा सभी अखबार और चैनल आज सरकारी विज्ञापन पर निर्भर हैं। सरकारी विज्ञापन के लिए अखबार और चैनल फर्जी सर्कुलेशन दिखाते हैं। लखनऊ में कई ऐसे अखबार हैं जिनका सर्कुलेशन लाख-लाख तक है पर ऐसे अखबारों का कार्यालय भी ढंग का नहीं है, नियमित कर्मचारी तक नहीं है, पत्रकार के नाम पर ऑपरेटर रख कर अखबार निकाल लिया जाता है। बडे़ अखबार भी कोई दूध के धोये हुए नहीं है। बडे़ अखबारों के कई धंधे होते हैं, बडे अखबारों के मालिक पैरवी और दलाली का कार्य करते हैं। बडे़ अखबारों के वैध और अवैध धंघे तभी तक चलते रहेंगे और इनकी पैरबी और दलाली तभी तक चलती रहेगी जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। विज्ञापन भी तभी तक मिलते रहेंगे जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। अगर अखबार और चैनल सत्ता के साथ मधुर संबंध नहीं रखेगे तो फिर सत्ता इनकी फर्जी सर्कुलेशन की पोल देगी और सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया जायेगा। सरकारी विज्ञापन बंद होने से छोटे अखबार बंद हो जायेगे और बडे अखबारों का भी बुरा हाल हो जायेगा।

जिन लोगों ने अखिलेश सरकार के खिलाफ जाकर लिखने का साहस दिखाया है उन सभी पत्रकारों को अखिलेश सरकार का कोपभाजन बनना पडा है। एक पत्रकार है जिनका नाम अपूप गुप्ता है, वे एक पत्रिका निकालते है, जिनका नाम दृष्टांत है। दृष्टांत नामक पत्रिका पिछले 15 सालों से सत्ता के खिलाफ बुलंदी के साथ लड रही है। अनूप गुप्ता और उनकी पत्रिका दृष्टांत की खासियत यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ आग उगलती रही है, अखिलेश सरकार के कुनबेवाद, गुंडावाद, भ्रष्टचारवाद के खिलाफ लिखते रहे हैं, एक पर एक भ्रष्टाचार, गुडागर्दी की कहानियां खोलते रहे हैं। पर इसकी कीमत अनूप गुप्ता को चुकानी पडी है।

पहले तो अखिलेश सरकार और उनकी भ्रष्ट नौकरषाही का बदबूदार चेहरों ने अनूप गुप्ता पर लालच का हथकंडा अपनाया। जब लालच के हथकंडे में अनूप गुप्ता नहीं फंसे तो फिर उन पर तरह तरह के जुल्म ढाये गये, उत्पीडन की कोई कसर नहीं छोडी गयी। अनूप गुप्ता की पत्रिका का निबंधन रद करा दिया गया, अनूप गुप्ता की हत्या तक कराने की कोषिष हुई। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रातोरात अनूप गुप्ता का आंवटित आवास का आंवटन रद कर दिया गया। अनूप गुप्ता का आवास से सारा सामान सडक पर फेक दिया गया। अगर अनूप गुप्ता भी अखिलेश सरकार की चाटुकारिता पंसद कर ली होती तो फिर न तो उनसे आवास छीना जाता और न ही उनका उत्पीडन होता। अखिलेश की सत्ता में एक पत्रकार को कैसे जला कर मार डाला गया था, यह भी उल्लेखनीय है।

लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता की जगह ईमानदार, निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता की स्थापना की उम्मीद भी तो नहीं बनती है।

लेखक विष्णु गुप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और इनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं। लेखक से मोबाइल नंबर 09968997060 या मेल आईडी guptvishnu@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

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काम बोलता है : चार घंटे तक इमरजेंसी में कराहती रही बूढ़ी मां, बेटे को जबरन थाने में बिठाये रखा

वाराणसी। यूपी में चल रहे चुनावी दंगल में भले ही ‘काम बोलता है’ का धुन आम मानुष के लिए सुशासन होने का दावा भर रहा हो पर जमीन पर थानों में वर्दी की दबंगई के आगे आम आदमी का गूंगापन और लाचारी बोल रहा है। बीते रविवार यही नजारा देखने को मिला जब अपनी 92 वर्षीय बूढ़ी मां माया देवी को उन्हीं की बहू कंचन और उसके मामा मंगला प्रसाद ने मार-पीट कर घायल कर दिया। बेटा घनश्याम जायसवाल ने तत्काल इसकी सूचना 100 नम्बर पर डायल कर दी और पुलिस से मदद मांगी तो मौके पर पहुंची पुलिस ने समझौते की बेशकीमती सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। 

घबराया बेटा जब एम्बुलेंस में चोटिल मां को लेकर कबीरचौरा स्थित मण्डलीय चिकित्सालय पहुंचा तो वहां मौजूद डाक्टर ने मामले को पुलिस केस बताकर पहले एफआईआर करने की सलाह दी। परेशान घनश्याम मां को वहां इमरजेंसी वार्ड में तन्हां छोड़कर सिगरा थाने पहुंचा तो उल्टे माताकुण्ड चौकी इंचार्ज लक्ष्मण यादव ने घनश्याम को थाने में रात 9 बजे तक बिठाये रखा। इस दौरान लगातार उस पर समझौता करने के लिए दबाव बनाया जाता रहा। उधर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पड़ी बूढ़ी घायल मां घंटो दर्द से कराहती रही।

घटना की जानकारी मिलने पर वहां पहुंचे चंद पत्रकारों ने जब डाक्टर से इस बारे में बात की तब कही जाकर उनका इलाज शुरू हुआ। असंवेदनशील तंत्र यहां किस तरह आम जन की जिदंगी से खेल रहा है, ये उसकी एक बानगी है।

घटना की जानकारी लेने थाने पहुंचे पत्रकारों के सामने एसओ सिगरा ने जब चौकी इंचार्ज से घटना के बारे में पूछा तो वहां भी चौकी इंजार्च मामले की लीपा-पोती करने में लगे रहे। चार घंटे तक फरियादी को थाने में क्यों रोके रखा, इस सवाल पर चौकी इंचार्ज महोदय के पास कोई जवाब नहीं था। फरियादी घनश्याम जायसवाल के तहरीर को भी चौकी इंचार्ज ने अपने पास दबा कर रख लिया। बाद में एसओ महोदय की फटकार के बाद चौकी इंचार्ज ने तहरीर उन्हें दिया।

घटना की गंभीरता को देखते हुए एसओ ने फौरन बहू कंचन और उसके मामा के खिलाफ मुकदमा कायम करने के साथ चौकी इंचार्ज को अस्पताल जाकर चोटिल माया देवी का बयान लेने का आदेश दिया। फिलहाल 92 साल की बूढ़ी माया देवी मण्डलीय अस्पताल के आर्थोपेडिक वार्ड के वार्ड न. 6 के बेड न. 10 पर जिस्मानी दर्द से ज्यादा समय के साथ अर्थहीन होते जा रहे रिश्तों और असंवेदनशील प्रशासन के दर्द से ज्यादा दुःखी है, जहां काम नारों और विज्ञापनों में बोल रहा है।

सोमवार को जब इस मामले में एसओ सिगरा से मोाबाइल पर बात की गई तो उनका जवाब था कि एफ.आई.आर दर्ज कर ली गई है, धाराओं के बारे में थाने से जानकारी लें। सिगरा थाने पर फोन करने पर दूसरी तरफ से आवाज आयी यह नम्बर इस समय काम नहीं कर रहा है। खबर लिखे जाने तक पीड़िता का मेडिकल मुआयना तक नहीं हुआ था।

वाराणसी के पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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मथुरा की मीडिया शहर के कोतवाल पर मेहरबान है या वाहन चोर गैंग पर?

अब तक आपने पुलिस की कार्यप्रणाली के खट्टे-मीठे अनुभव बहुत देखे और सुने होंगे किन्तु लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया के अनुभव शायद कभी-कभी महसूस किये होंगे या सुने होंगे लेकिन मेरे साथ घटी घटना को सुनकर शायद लोकतंत्र शर्मिंदा हो जाये लेकिन दोलत के भूखे भेड़ियों की सेहत पर इसका कोई असर पड़ेगा इसकी मुझे भी कल्पना नहीं है। वैसे मैने ढ़ाई दशक के पत्रकारिता के कार्यकाल में अपनी कलम के माध्यम से हजारों पीड़ितों की निस्वार्थ मदद कर उन्हैं राहत दिलाई है लेकिन पिछले दिनों 20 फरवरी को मेरे कार्यालय के बाहर से मेरी बाइक न. यूपी 85 यू 5666 चोरी हुई तो मुझे पुलिस के साथ-साथ मीडिया के सहयोग की जरूरत महसूस हुई। जिसमें पहले तो मुझे पुलिसिया कार्यशैली का सामना करना पड़ा और मथुरा कोतवाल से तड़का-भड़की हुई और जिसके चलते तहरीर लेने से इंकार कर दिया गया।

इसकी जानकारी मैने सभी मीडिया कर्मियों को लिखित तथा मोबाइल द्वारा दिये जाने के बावजूद भी दो-तीन पत्रकारों ने जो पुलिस की दलाली से दूर रहते हैं उन्होंने तो बाइक चोरी का समाचार प्रकाशित किया लेकिन प्रमुख समाचार पत्र एवं पत्रकार बाइक चोरी की घटना को छिपा गये। मेरे द्वारा करीब दो दर्जन करीब पत्रकारों से सहयोग की अपेक्षा की लेकिन कोई कोई मेरे साथ मदद के लिए खड़ा हुआ नजर नहीं आया। बल्कि कोतवाली पुलिस द्वारा पकड़े गये बाइक चोर गैंग की मदद करते हुऐ कई पत्रकार कोतवाली के चक्कर लगाते नजर आये। इसके अलावा कई लोग मुझे मीडिया कर्मियों को पार्टी, गिफ्ट, लिफाफा उनके साथ खर्चा करने या फिर पुलिस से लेन-देन कर एफआईआर दर्ज कराने का सुझाव देते रहे। जिसे मेरे जमीर ने मंजूर नहीं किया।

मीडिया की कार्यशैली को देखकर मुझे लगा कि जब मेरे साथी मीडिया कर्मियों का एक पुराने पत्रकार के साथ यही व्यवहार है तो उनका आम जनता और पीड़ितों के साथ कैसा व्यवहार होता होगा। इसे देखकर मैने अपने मित्र स्वच्छ छवि के तेज तर्रार मथुरा बार एशोसियेशन के तत्कालीन अध्यक्ष एवं वर्तमान प्रत्याशी विजयपाल सिंह तौमर एड. जिन्होंने जवाहरबाग को भी कब्जाईयों के कब्जे से जनहित याचिका के माध्यम से मुक्त कराया था को पूरी घटना से अवगत कराया तो उन्होंने एसएसपी मथुरा से मोबाईल पर सम्पर्क स्थापित किया लेकिन वार्ता न होने पर अगले दिन वह मेरे साथ एसएसपी कार्यालय पहुंचे जहां एसएसपी की अनुपस्थिति में एसपी क्राइम राजेश कुमार सौनकर से मुलाकात कर पुलिस की कार्यप्रणाली से अवगत कराया। जिसके बाद बाइक चोरी की घटना पांच दिन बाद दर्ज हो सकी। लेकिन एफआईआर दर्ज होने के बावजूद भी बाइक चोरी की खबर की एक लाइन भी प्रकाशित नहीं की गई।

मथुरा की मीडिया मथुरा कोतवाल पर मेहरबान है या फिर वाहन चोर गैंग पर यह तो वही जाने अथवा फिर मुझसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी है यह मेरी जानकारी से बाहर है। लेकिन मैं आम जनता पीड़ितों, शोषितों के साथ – साथ मीडिया कर्मियों के हर सुख-दुःख में अवश्य शामिल होता रहा हूं। इसके बावजूद भी मेरे साथ मीडिया के हुऐ इस व्यवहार ने – ‘‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया’’ की कहावत को सटीक चरितार्थ किया। एक तरफ प्रैस वार्ता के नाम पर समौसे, पकौड़े, लिफाफे, पटका, शराब की बोतल, कपड़े, तस्वीर की चाहत में पत्रकारों की भीड़ नजर आती है। बल्कि इसके बदले रस्सी को सांप बनाने में भी अपनी शान समझतें हैं। लेकिन मीडिया खबर अथवा सहयोग के बदले किसी अपने पीड़ित पीड़ित भाई से भी सुविधाशुल्क या फिर किसी अन्य सुविधा की उम्मीद करे तो उससे ज्यादा और शर्मनाक क्या हो सकता है।

मीडिया के इस व्यवहार को देखकर मुझे देश के रक्षामंत्री एवं पूर्वजनरल वी.के. सिंह के वो शब्द याद आ रहे हैं कि ‘‘पत्रकारों की स्थिति वैश्याओं से भी बदतरहै’’ जो आज के माहौल में सटीक साबित हो रहे हैं। जो दौलत और दलाली की चाहत में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के साथ – साथ अपनों का गला घोटनें में भी पीछे नहीं है। जिसने मानवता के नाम पर पुलिस और नेताओं को भी काफी पीछे छोड़ दिया है। हालांकि आज भी कुछ पत्रकारों की ईमानदारी पर कोई प्रश्न चिन्ह् नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन वह आज के माहौल में पुलिस-प्रशासन-नेताओं-माफियाओं से दूरी बनाकर जैसे तैसे अपना जीवन यापन करने पर मजबूर हैं। लेकिन वह ‘असली’ पत्रकारों की श्रेणी से बाहर होते दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि ‘‘जो सबसे बड़ा दलाल है, वही पत्रकारिता में मालामाल है’’ की पक्तियां को सटीक चरितार्थ है। और उसके लिये ‘‘दौलत है ईमान मेरा’’ सर्वोपरि है।

मफतलाल अग्रवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता
mafatlalmathura@gmail.com

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झंडा लगाने वाले भाजपा कार्यकर्ता को पुलिस ने बुरी तरह पीटा (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश में बेलगाम पुलिस के जंगलराज का एक और वीभत्स घटनाक्रम सामने आया है. मथुरा में भाजपा के एक जुनूनी कार्यकर्ता प्रदीप बंसल को कृष्णानगर पुलिस चौकी इंचार्ज ने बुरी तरह पीटा. सिर्फ इसलिए कि वे मोटर साइकिल पर भाजपा का और राष्ट्र का झंडा लगा कर घूम रहे थे.

कृष्ण नगर पुलिस चौकी के इंचार्ज ने इस देश भक्त कार्यकर्ता को ना केवल मारा पीटा बल्कि अश्लील गाली भी दी और रात भर चौकी में बंद रखा. सरेआम भाजपा कार्यकर्ता को पीटे जाने से भाजपा कार्यकर्ताओं और आम जनता में आक्रोश है. वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=d9wbQor1Fqs

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आगरा में कवरेज कर रहे पत्रकार फरहान खान के साथ पुलिस ने की हाथापाई (देखें वीडियो)

आगरा की पुलिस ने पत्रकारों को भी नही बख्शा. थाना एत्माउद्दोला ट्रांस यमुना के चौकी इंचार्ज ने की टीवी चैनल के पत्रकार से की हाथापाई. वर्दी के रोब में धमकाते हुये कहा कि तुझे लौटकर देखता हूं. पूरा नजारा हुआ कैमरे में कैद. आगरा के पत्रकार फरहान खान थाना एत्मादौला पर कवरेज करने के लिए गये थे. तभी अचानक वहां चौकी इंचार्ज मनोज भाटी आ गए और कवरेज कर रहे पत्रकार से हाथापाई शुरू कर दी. भद्दी भद्दी गालियां दी.

पत्रकार को आगे देख लेने की धमकी दे डाली. इस दौरान वहां काफी संख्या में भीड़ जमा हो गई. दरअसल तीन दिन से लगातार थाना एत्माउद्दौला पुलिस की कार्यशैली की खबर दिखाने को लेकर नाराज थे चौकी इंचार्ज. संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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यूपी में सपा का गुंडाराज : मंत्री ने अमर उजाला के पत्रकार को जिंदा जलाने की धमकी दी (सुनें टेप)

उत्तर प्रदेश में सपा का गुंडाराज चुनावों के दौरान भी जारी है. अखिलेश यादव के नेतृत्व में पिछले पांच सालों में उत्तर प्रदेश के जंगलराज में एक से बढ़ कर एक दुर्दांत घटनाएं हुईं. अखिलेश हत्यारे और भ्रष्ट मंत्रियों को बचाते रहे. ताजा मामला भी सपा के जंगलराज से जुड़ा है. उत्तर प्रदेश में चिकित्सा और शिक्षा मंत्री राधे श्याम सिंह जो कि खुद एक प्रत्याशी भी हैं, ने अमर उजाला के पत्रकार को चुनाव में सपोर्ट न करने पर जिंदा जला देने की धमकी दी है. टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

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यूपी में इस बहादुर महिला पत्रकार के साथ पुलिस वालों ने की मारपीट, एक लाइन हाजिर

आरोपी चौकी प्रभारी समेत एक अन्य सिपाही पर अभी भी नहीं हुई कार्यवाही

शाहजहांपुर से खबर है कि कोतवाली की अजीजगंज पुलिस चौकी के तहत आने वाली कांशीराम कॉलोनी की निवासी रुखसार से पुलिस वालों ने गालीगलौज की. रुखसार पेशे से पत्रकार हैं. वे अपने एरिया में होने वाली हर खबर को प्रमुखता से छापती हैं. इसी बात से चौकी अजीजगंज के पुलिस कर्मी उनसे खफा रहते थे. इसी क्रम में 08 फ़रवरी को रात करीब 9 बजे के आसपास उनके घर चौकी का सिपाही शराब के नशे में घुस गया और गालियां देने लगा.

महिला पत्रकार रुखसाना ने जब इस बात का विरोध किया तो उक्त सिपाही ने रुखसार के साथ मारपीट की. इससे महिला पत्रकार के शरीर से लेकर हाथ में चोटें आयीं. उसने इस बात की लिखित शिकायत एसपी केबी सिंह से की. एसपी ने जांच सीओ सिटी को सौंप दी. जाँच के बाद आरोपी सिपाही विनोद यादव को लाइन हाजिर कर दिया गया. लेकिन मामले को काफी दिनों तक दबाये रखने वाले चौकी प्रभारी समेत एक सिपाही पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है.

योगेन्द्र सिंह
बरेली

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किसी को वोट दे लेना, पर सपा को नहीं… वजह बता रहे भड़ास एडिटर यशवंत

Yashwant Singh : हे मीडिया के साथियों, यूपी चुनाव में सपा को जरूर हराना. वोट चाहे बसपा को देना या भाजपा को या रालोद को या किसी को न देना, लेकिन सपा को कतई मत देना. वजह? सिर्फ पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके मंत्री राममूर्ति वर्मा के कहने पर कोतवाल और सिपाहियों ने पत्रकार जगेंद्र को शाहजहांपुर में जिंदा जला दिया था. जगेंद्र ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में मंत्री राममूर्ति वर्मा का नाम लिया था. जगेंद्र ने राममूर्ति के खिलाफ कई खबरें लिखी थीं. मंत्री राममूर्ति तरह तरह से जगेंद्र को धमकाता रहता था. जगेंद्र लिख चुके थे कि मंत्री राममूर्ति उसे मार डालना चाहता है क्योंकि वह उसकी पोल खोलता रहता है.

जिसकी आशंका थी, वही हुआ. मंत्री राममूर्ति के इशारे पर सारा पुलिस प्रशासन जगेंद्र को मारने के लिए जुट गया. बाकायदा घर में घुसकर पत्रकार जगेंद्र पर पेट्रोल डालकर जलाया गया. लखनऊ में भर्ती जगेंद्र ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर से लेकर जांच मजिस्ट्रेट तक को हत्यारों के नाम बताए लेकिन अखिलेश यादव ने आजतक हत्यारे मंत्री राममूर्ति वर्मा को बर्खास्त नहीं किया. अखिलेश यादव के युवा होने, इनके स्मार्टफोन देने के वादे, इनके विकास के प्रलाप पर मत जाना. यह अपने खानदान का सबसे काइयां नेता है. परम भ्रष्ट गायत्री प्रजापति से लेकर हत्यारे राममूर्ति वर्मा को पालने वाला यह युवा नेता अगर इस बार खुद के बल पर जीत गया तो समझो इसके राज में वो-वो नंगा नाच होगा जिसकी कल्पना नहीं कर सकते.

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता द्वारा बेलगाम नेताओं को शाक थिरेपी दिया जाना है. इन्हें पांच साल के लिए सत्ता से बाहर करो ताकि ये आत्मचिंतन और मनन करें. अखिलेश यादव ने पांच साल राज कर लिया. इन्हें पांच साल का ब्रेक दिया जाना चाहिए ताकि थोड़ी ज्यादा समझदारी हासिल कर सकें. अभी जो इन्होंने अपने खानदान से फिक्स मैच खेला है, उससे लॉ एंड आर्डर समेत तमाम सवाल परिदृश्य से बाहर हो गए और अखिलेश की छवि एक नए बहादुर युवा नेता की बना दी गई जो माफियाओं और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ है. लेकिन सच्चाई बिलकुल इसके उलट है. यह सारा कुछ मीडिया, मुलायम और अखिलेश द्वारा फिक्स था. अब तो आपको यकीन आ गया होगा जब मुलायम ने साफ साफ कह दिया कि वे अखिलेश और राहुल के लिए प्रचार करेंगे, शिवपाल नई पार्टी नहीं बनाएंगे, वे कभी किसी पर कोई गुस्सा न थे. सपा में आज भी हत्यारे, भ्रष्टाचारी और माफिया नेता-मंत्री अपने पूरे दमखम के साथ मौजूद हैं और साइकिल चिन्ह पर ही चुनाव लड़ रहे हैं. 

तो, हे यूपी के मतदाताओं, खासकर मीडिया के साथियों, मुझ भड़ासी की दिली अपील पर कान धरो, अपने वोट को किसी को भी दे डालो, बस सपा को मत देना. साथ ही सपा को वोट न देने के लिए आप लोग अपने दोस्तों, मित्रों और परिजनों को कनवींस करें. सिर्फ जगेंद्र हत्याकांड की कहानी बताओ. एक पत्रकार को घर में घुसकर जला मारने वाला मंत्री अगर अखिलेश यादव द्वारा बर्खास्त नहीं किया जा सकता तो सोचिए इनके राज में हमारा आपका और आम लोगों का क्या हाल होगा.

बाकी, दिल्ली और लखनऊ के कई बड़े दलाल पत्रकारों के लिखने बोलने पर मत जाना. ये लोग लगातार सपा और अखिलेश का चरण चुंबन करते हुए इनके पक्ष में गायन करते हुए मिल जाएंगे. ये लोग अपने-अपने चैनलों और अखबारों में अखिलेश यादव की छवि बनाते, इन्हें जीतता हुआ दिखाते मिल जाएंगे. इन पर ध्यान मत देना. इन लोगों ने बीते पांच साल में अखिलेश के रहमोकरम से अरबों रुपये कमा चुके हैं और इन्हें नमक का कर्ज तो अदा करना ही है.

99 प्रतिशत मुख्यधारा के मीडिया घराने, जिसमें अखबार और चैनल दोनों शामिल हैं, यूपी की सत्ताधारी पार्टी के रहमोकरम के तले दबे हैं. ये लोग इतना ब्लैक पैसा और नगद विज्ञापन पा चुके हैं कि इन्हें अखिलेश यादव को जीतता हुआ दिखाना मजबूरी है. ये लोग सोची समझी साजिश के तहत सपा के मुकाबले बसपा और भाजपा को कमजोर-कमतर दिखा रहे हैं. मीडिया वालों के पेड न्यूज और पेड सर्वे पर यकीन न करना. अपना दिल दिमाग लगाना. सपा को जरूर हराना. 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करें : Yash on FB

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यूपी के इस दरोगा ने खुद खोल दी अपनी पोल (सुनें टेप)

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में एक दरोगा और डॉयल-100 सिपाही के बीच बातचीत का एक ऑडियो वायरल हुआ है। इस ऑडियो में दारोगा ने डॉयल-100 के सिपाही से अपने अवैध कामकाज में दखल न देने की हिदायत दी है। इस तरह दरोगा ने खुद ही अपने तमाम अवैध कामकाज की पोल खोलकर रख दी है। दरोगा का नाम राकेश शर्मा है जो मूरतगंज पुलिस चौकी में प्रभारी के बतौर तैनात है। दरोगा की वायरल ऑडियो ने पुलिस महकमे को शर्मशार कर दिया है।

मूरतगंज हाइवे पर तैनात डॉयल-100 के सिपाही अकबर खां से बातचीत के दौरान दरोगा ने अपने तमाम अवैध सिस्टम में दखल न देने की हिदायत दी है। ऑडियो वायरल होने के बाद कौशांबी पुलिस के अफसर उस डॉयल-100 सिपाही के खिलाफ ही कार्यवाही की कवायद कर रहे है जिसने दरोगा की शर्मनाक करतूत को टेप किया है। कौशांबी के नेशनल हाइवे पर मूरतगंज पुलिस चौकी स्थापित है। हाइवे से गुजरने वाले वाहनों से अवैध वसूली की जाती है। प्रतिबंधित मवेशी से लदे वाहन ही नहीं बल्कि अवैध मिट्टी बालू व गिट्टी से लदी ओवरलोड गाड़ियां भी पुलिसिया सिस्टम को सलाम करके ही गुजरती हैं।

वायरल ऑडियो में डॉयल-100 के सिपाही अकबर खां ने सूचना के बाद प्रतिबंधित मवेशी से लदे वाहन को रोकने की हिमाकत की तो वाहन चालक मुरारगंज चौकी प्रभारी की हनक पर अभद्रता पर उतारू हो गया। डॉयल-100 सिपाही ने जब चौकी प्रभारी से बात की तो दरोगा ने साफ शब्दों में सिस्टम में न दखल देने की हिदायत दी। दरोगा ने कहा कि जितना भी अवैध कार्य हो रहा है वो सब थाना व पुलिस चौकी के सिस्टम में है और इस बात की जानकारी मुझे व मेरे इंस्पेक्टर को भी है। सिस्टम में किसी भी प्रकार का दखल बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।

टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

धारा सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : scribe.dsyadav@gmail.com

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शहीद DSP की पत्नी ने कोर्ट में कहा- ‘मथुरा कांड एक बड़े नेता द्वारा 300 एकड़ के पार्क पर कब्जा करने की साजिश का नतीजा’

मुकुल द्विवेदी की पत्नी अर्चना द्विवेदी ने यूपी पुलिस की जांच पर जताया अविश्वास, सीबीआई के हवाले मामले को सुपुर्द करने की अपील की….

मथुरा के जवाहर बाग में हुई हिंसा की सीबीआई द्वारा जाँच कराने की मांग पर शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी अर्चना द्विवेदी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता और उत्तर प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता वीसी मिश्र ने हाईकोर्ट में बहस किया। उन्होंने प्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि मथुरा कांड कोई कानून व्यवस्था का मामला नहीं है बल्कि यह एक बड़े नेता द्वारा 300 एकड़ में फैले पार्क पर कब्जा करने की साजिश का परिणाम है।

जवाहर बाग पार्क की बाजार कीमत 5000 करोड़ रुपये है। शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उनके पति राजनीतिक साजिश के शिकार हुये हैं जिसमें प्रदेश के दो बड़े नेता शामिल हैं। इस मामले में राज्य के दो बड़े नेता शामिल हैं और उनसे आजतक पूछताछ नहीं की गयी। इसीलिये पुलिस जाँच पर कोई भरोसा नहीं है और सीबीआई जाँच के बिना उन्हें न्याय नहीं मिलेगा।

सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने कहा कि शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी की तरफ से बहस कर रहे वीसी मिश्रा सरकार पर गलत आरोप लगा रहे हैं क्योंकि उन्हें इसी सरकार ने महाधिवक्ता पद से हटा दिया था। इस पर मिश्रा ने जवाब दिया कि वह इसी सरकार में महाधिवक्ता रह चुके हैं इसीलिये जानते हैं किस प्रकार पिछले पांच वर्ष में सरकारी जमीनों पर कब्जा किया जा रहा हैं। उन्होंने कहा कि इस हिंसा की मुख्य वजह बाबा जय गुरुदेव की अरबों रुपये की चल-अचल संपत्ति है जिस पर दो बड़े नेताओं में आपस में शीत युद्ध चल रहा है।

मुख्य याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की तरफ से बहस करते हुये अधिवक्ता राजीव लोचन शुक्ल ने कोर्ट को बताया कि 101 लोगों की गिरफ्तारी हुयी है लेकिन किसी में भी नियम और कानून का पालन नहीं हुआ है। पुलिस कस्टडी में मृत्यु होने पर न्यायिक जाँच जरूरी होती है लेकिन वह भी नहीं हुयी। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट भी अधूरी है। जो प्रपत्र 2013 में बंद हो चुका है उस पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट जानबूझ कर भरी गयी। याचिकाकर्ता विजयपाल तोमर की तरफ से अधिवक्ता अमित डागा और क्षमा दूबे की तरफ से अधिवक्ता अमित सक्सेना ने बहस किया। अंतिम सुनवाई 6 फ़रवरी को होगी।

याचिका इस प्रकार है…

IN THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
INTERLOCUTORY APPLICATION NO… OF 2017
ON BEHALF OF APPLICANT:
Archana Dwivedi, aged About 43 years, w/o late Sh Mukul Dwivedi, Resident Of 3G, Officers Colony, Block-A, Sector Gamma-1, Greater Noida-201306,UP, Ph-9456278792
IN
PUBLIC INTEREST LITIGATION (CRIMINAL) 14226 / 2016
DISTRICT-MATHURA
IN THE MATTER OF:
Ashwini Kumar Upadhyay    , s/o Suresh Chandra Upadhyay
G-284, Govindpuram, Ghaziabad-201013         
…Petitioner
VERSUS
State of UP,  Through the Chief Secretary,
Shastri Bhawan Secretariat, Hazarat Ganj, Lucknow-01   
Union of India, Through the Secretary,
Ministry of Home Affairs, North Block, New Delhi-01                                           
..Respondents
APPLICATION FOR IMPLEADMENT AS PETITIONER
AFFIDAVIT ON BEHALF OF:

…Deponent

To,
HON’BLE CHIEF JUSTICE
AND LORDSHIP’S COMPANION JUSTICES
OF HON’BLE HIGH COURT OF ALLAHABAD
HUMBLE APPLICATION OF ABOVE-NAMED APPLICANT 
THE MOST RESPECTFULLY SHOWETH AS UNDER:
That applicant requests for this Hon’ble Court monitored C.B.I. investigation into Case Cr. No. 0242 u/s 147/ 148/ 149/ 307/ 302/ 336/ 332/ 333/ 436/ 186/ 188 I.P.C.  dated 02.06.2016 P. S. Sadar Bazar, District Mathura in which applicant’s husband Sh. Mukul Dwivedi, Additional Superintendent of Police-Mathura was brutally murdered.
That Jawaharbagh Park, which is a government property, situated in the heart of Mathura City, had been under wrongful occupation by one Ram Briksh Yadav and his criminal associates for more than two years. However, no sincere effort was ever made to vacate it because he enjoyed protection of powerful politicians the State. Due to the political-cult nexus, State authorities ignored the Order of this Hon’ble Court to vacate the park. Authorities came into action only in 2016, when Contempt Application was filed to get the Park vacated. Accordingly a plan was chalked out by Senior Administrative and Police Officers. However, the powerful politicians of the State interested to scuttle the plan by creating a serious law and order situation beforehand. Therefore on their instruction, on  02.06.2016, the DM and SSP Mathura abruptly ordered applicant’s husband Additional SP late Sh. Mukul Dwivedi to go with only a few policemen without firearms to get the boundary wall broken and assess the extent of reaction. This resulted in extreme violence in which applicant’s husband Sh. Mukul Dwivedi and SHO Farah were brutally killed and many others were injured.
That State Government initially ordered an enquiry by the Divisional Commissioner and later announced a judicial enquiry by a retired Judge when applicant demanded CBI investigation. It was said that the judicial enquiry would be completed within two months. However, seven months have been passed and yet applicant, powerful politicians and top officials of the State have not been interrogated. No punitive action has been taken against the D.M. and S.S.P. Mathura who intentionally ordered applicant’s husband to take action to vacate the park with unarmed policemen. Applicant finds a larger conspiracy in this matter and believes that truth will not come out if State Police will investigate the matter. The judicial enquiry and State police investigation is an eyewash and meant to protect delinquent politicians and top officers.
That Ram Briksh Yadav and his associates had political and bureaucratic patronage and as such, there is no chance of an impartial and honest enquiry by State Police.
That applicant’s husband was under tremendous pressure due to political-cult nexus and higher authorities. He was not eating properly in the last few days before he was brutally killed. On one hand, he was given responsibility of vacating Jawahar Bagh and on the other side, senior officers restrained him to take stern steps. Under mysterious circumstances, he was ordered to get the boundary wall of Jawahar Bagh broken a day prior to the scheduled operation. He was accompanied by only a few newly recruited policemen, armed with lathis only. The senior officers did not permit firearms that’s why his armed gunmen, escort party and even his service revolver was not with him. This is very suggestive of a larger criminal conspiracy against in this matter.
That policemen have witnessed this gigantic violence so an investigation by UP Police itself is bound to be influenced by politicians and top officers. Till date, no punitive action, even suspension has been taken against the higher State authorities, accountable for this gigantic violence that is why applicant has every reason to doubt the credibility and fairness of the State Police investigation. 
That nobody contacted the applicant for any interrogation and even her husband’s and SHO Farah’s phone call records were not examined till date.
That the forensic investigation such as DNA test, does not appear to be done so it is not clear whether the main accused Ram Vriksh Yadav is dead or alive. Neither his nor his close associate’s phone call details were examined.
That there are more than two dozen cases against Ram Vriksh Yadav in Mathura only and many other cases are pending in other districts throughout the State. However, police was not permitted to file charge sheet against him.
That there were more than 80 intelligence reports against the criminals but police was not permitted to take appropriate steps to vacate the park. Evidence at site of the violence have been destroyed by authorities itself to snap links leading to politicians and higher officers.
That  squatters, an armed group led by Ram Vriksh Yadav, occupied the park in January 2014 and was running parallel government within the park with armed men but the top State administration was unwilling to act against him.  It is necessary to state that SP-Mathura Office, SDM Office, DM-Mathura Office, District Court, Police Control Room, Reserve Police Line and Jail is near by the Jawahar Bagh Public Park.
That even the top most authorities received many intelligence reports about movement of criminals, illegal arms and ammunition inside the Park but did not take appropriate steps to comply the Order of this Hon’ble Court  dated 20.05.2016 for eviction of the park.
That due to the blessings of powerful politicians, district authorities could not muster the courage of getting the Public Park evicted. There were numerous cases when Ram Vriksh and his associates openly misbehaved with police and district administration officers but no official wanted to get involved in any controversy with them.
That for more than two years, all those stayed in the park were being provided breakfast, lunch and dinner, and this is impossible without a very strong financer. It needs to be thoroughly investigated but honest probe is not expected from the State Police because fund was arranged by powerful politician. It is no secret that Ram Vriksh himself did not have capability to feed 3000-4000 people, 03 meals a day for more than 02 years.
That present matter is required to be investigated by the CBI because of many suspicion and large magnitude of crime committed by Ram Vriksh and his associates under the very nose of the State administration. Applicant has no faith in State Police investigation.
That truth needs to be investigated for crime and conspiracy of such magnitude, can only be investigated by the CBI, as no other agency has resources, methods and independence, required to investigate crime, conspiracy of such magnitude, which has national ramification.
That it is reported by leading newspapers that State administration was taking steps to grant 99 years lease of Jawahar Bag Public Park to the criminals, who were encroaching the same for more than 02 years, thus it is very clear that wrong doers are in a capacity to influence the State Police and State administration hence the present case is fit case to be transferred to the CBI.
That the Mathura violence is not a simple matter of law and order that is why this Hon’ble Court monitored CBI investigation is only hope left to victim families.
That applicant has many reasons to believe that her husband was made a scapegoat. Truth will not come out and complete justice is impossible without the Court monitored CBI Investigation. She demanded CBI investigation but appropriate authorities declined it.
That the same Government has recommended CBI investigation into Mohanlalganj rape and murder case of a 36 year old Dalit woman as desired by the victim’s family members. The Government recommended CBI probe into the Kunda incidents leading to the death of DSP Zia-ul-Haque and two others as desired by DSP’s wife.  The Government recommended CBI investigation into the murder of Akhil Gupta, a witness in the alleged rape case against self-styled Godman Asaram Bapu but in this gigantic violence, the Government is not ready for CBI investigation and reiterating that a Judicial enquiry is going on. Although, this Hon’ble Court and the Apex Court has said in catena of decision that Judicial Commission has its own limitations and has ordered CBI probe in many cases. In this case, Government is trying to cover-up entire deep-rooted land grabbing conspiracy and political-cult nexus that is why this Hon’ble Court monitored CBI investigation is necessary not only to secure justice but also to instill confidence among victim families.  
That this gigantic incident has national and international ramification. Mathura is well-know religious place where People come from across the world. People involved in this incident are residents of many States and even few are resident of Nepal. It is almost impossible for the State police to interrogate the foreigners. This Hon’ble Court monitored CBI investigation is not only necessary to secure complete justice but also essential to provide credibility and instill confidence in the investigation.
That if the real conspirators involved in this case are not properly prosecuted and punished, victim families will lose the confidence in the Rule of Law. There is doubt in applicant’s mind whether a One Member Judicial Commission and State Police will secure justice to every affected person in such a complex land grabbing operation due to two reasons – firstly, the involvement of the powerful politicians and secondly, the patronage of top State officials. Terms of reference of Commission of inquiry is confined to Administrative/Police failures only. It has no jurisdiction to enquire into Political-Cult nexus, interrelationship between Ram Vriksh Yadav and powerful politicians, misuse of Executive Power and complex land grabbing worth 5000 crores. In addition, report of the Commission is not binding upon the State and thus prosecution of such a gigantic criminal offence cannot be made to depend upon the unbridled exercise of discretion of the Executive. Hon’ble Chief Minister and the Director General of Police has said very next day on 03.06.2016 that root-cause of gigantic incident is intelligence failure and LIU-Inspector said that Government ignored 80 intelligence reports so in such circumstances, State Police investigation cannot investigate the incident impartially and won’t instill confidence in victim families
That State Government completely failed to take appropriate steps to ensure the Rule of Law in this matter due to political-cult nexus and conspiracy for land grabbing worth 5000 crores. If the majesty of the rule of law is to be upheld and it is to be ensured that guilty is punished in accordance with the law notwithstanding their status and authority, it is desirable to entrust the investigation to CBI.
That Applicant see no hope of honest and credible investigation if it will remains in the hand of State Police, which has done nothing despite 80 intelligence reports against extremist group led by Ram Vriksh Yadav, who may has managed his death falsely and may actually alive.
That in view of the aforesaid facts and circumstances of the case and materials on record, it is most expedient in the interest of justice and to instill confidence in victim families, this Hon’ble Court may graciously be pleased to direct the CBI investigation, otherwise complete comprehensive credible and independent investigation would not be possible in this gigantic violence and thus victim’s families will suffer irreparable loss and. The Constitution empowers this Hon’ble Court to issue such directions to secure complete justice and to instill confidence among victim families.
That in view of the aforesaid facts and circumstances of the case and materials on record, it is most expedient in the interest of justice and to instill confidence among victim families, this Hon’ble Court may graciously be pleased to direct the CBI to investigate the Jawahar Bag matter, otherwise fair trial and complete justice would not be possible in this gigantic violence thus victim’s families will suffer irreparable loss and injury.
That applicant is equally interested in the result of above stated petition. Therefore, implore that this Hon’ble Court may implead it as one of the petitioner and allow it to urge its case before this Hon’ble Court.
That it is in the interest of justice that the applicant is impleaded as petitioner in the above-stated petition.

PRAYER

It is, therefore, most respectfully prayed that this Hon’ble Court may be pleased to implead the applicant Archana Dwivedi, aged about 43 years, wife of late Sh. Mukul Dwivedi, resident of 3G, Officer Colony, Block-A, Sector Gamma-1, Greater Noida-201306, as Petitioner in above stated petition, in the interest of justice.   

16.01.2017                     

Allahabad               

(Advocate for Petitioner)

I, the deponent above named do hereby swear and verify on oath that contents of paragraph no 1 to………and page no 1 to…………of the affidavit is based on the media reports and true to my personal knowledge; contents of paragraph no……to……., page…….to……..of this Affidavit is based on perusal records; annexure no……to……page no……..to………are based on media reports; which all I believe to be true, that no part of it is false and nothing material has been concealed in it. So help me God.                                              

DEPONENT

I,………………………., Advocate, High Court, Allahabad, do hereby declare that the person making this affidavit and alleging himself to be the deponent is known to me from the perusal of papers produced before me for the preparation of present case.

ADVOCATE
Solemnly affirmed before me on this    day of January, 2017 at about       am/pm by the deponent; who has been identified by the aforesaid person. I have satisfied myself by examining the deponent that he understands the contents of this affidavit; which have been read over and explain to him by me.

OATH COMMISSIONER

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चुनाव आयोग की सख्ती के बाद भी भदोही में बाहुबली विजय मिश्रा का आतंक

सौ से अधिक आपराधिक मामलों का आरोपी विजय मिश्रा भदोही का एक ऐसा बाहुबली है, जो अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या कराने के लिए कुख्यात हैं। इसके इसी हरकत पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने पांच साल तक जेल के सलाखों के पीछे रखा। लेकिन, जैसे ही सपा की सरकार बनी, यादवी कुनबे के आकाओं की चरणवंदना कर न सिर्फ जेल से बाहर आया, बल्कि पांच साल के कार्यकाल में हर वह कुकर्म किया, जिससे जनता खौफ में जीने को विवश रही। अब जब चचा-भतीजे की लड़ाई में अखिलेश ने टिकट काट दिया है, तो उन्हें ही धमकी देते हुए कहा है वह भदोही ही नहीं, पूर्वांचल से सपा को नेस्तनाबूद कर देंगे। हालांकि यह उसका सिर्फ और सिर्फ गीदड़भभकी से अधिक कुछ नहीं है। इस धमकी के पीछे उसकी मंशा है किसी दूसरे दल में शामिल होकर टिकट हासिल करने की…

सुरेश गांधी

चुनाव में स्वच्छ छवि बनाने के लिए सपा के सर्वेसर्वा अखिलेश यादव ने ज्ञानपुर (भदोही) के विधायक विजय मिश्रा का टिकट काट दिया। इस बौखलाहट में उसने न सिर्फ पूर्वांचल से सपा का सूपड़ा साफ करने की धमकी दी, बल्कि भदोही के कई जनप्रतिनिधियों को धौंस के बल पर सपा से इस्तीफा भी दिलवा दिया। माना जा रहा है कि उसकी इस धमकी व करोड़ो-अरबों की काली कमाई के घनचक्कर में कोई दूसरा दल उसे अपना उम्मींदवार बना सकता है। सूत्रों पर यकीन करें तो विजय मिश्रा पिछले छह महीने से बीजेपी के संपर्क में है। प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या के साथ उसकी कई मीटिंग भी हो चुकी है। लेकिन उसके आतंक वाली छवि को लेकर बीजेपी किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती है। यही कारण है कि केशव प्रसाद मौर्या से डील होने के बाद भी पार्टी आलाकमान उन्हें सीधी इंट्री देने से कतरा रहा है।

कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी विजय मिश्रा को अपना दल के अनुप्रिया गुट के जरिए अपने साथ जोड़ेगी। मतलब साफ है बीजेपी एक तीर से दो निशाना साधना चाहती है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है कि चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा का यही असली मुखौटा है। हालांकि भाजपा से भी दुत्कारे जाने पर वह प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के प्रेम चंद बिन्द से भी मिलकर चुनाव लड़ सकता है। हो जो भी, सपा ने इस बार विजय मिश्रा का टिकट काटकर रामरति बिन्द को मैदान में उतारा है।

गौरतलब है कि मुलायम, शिवपाल व रामगोपाल से नजदीकियों के चलते पूरी पार्टी ने हमेशा विजय मिश्रा को सिर आंखों पर बैठाये रखा। मौजूदा दौर में जब सपा के अंदर सत्ता का संग्राम व काली कमाई के बंटवारे को लेकर झगड़े में जब शिवपाल का कद घटा तो उसने अपना नया ठौर खोजने में ही भलाई समझी। जब अखिलेश ने टिकट काटकर बाहर का रास्ता दिखा दिया है तो अकेले ही चुनावी समर में उतरने का फैसला लिया है। उसका दावा है कि भदोही समेत आसपास के कई जिलों में अपने उम्मीदवार उतारकर सपा से अपने अपमान का बदला लेगा। उसने एमएलसी पत्नी रामलली मिश्र, उसके टुकड़ों पर पलने वाले पूर्व विधायक शारदा प्रसाद बिंद, जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लाक प्रमुख, क्षेत्र पंचायत सदस्य आदि से इस्तीफा भी दिलवा दिया है।

पुलिस रिकार्ड के मुताबिक रुंगटा अपहरणकांड से सुर्खियों में आए विजय मिश्रा पर भदोही, इलाहाबाद समेत अन्य जनपदों में लूट, हत्या, डकैती, चोरी आदि के कुल 105 मामले दर्ज हैं। इसमें सबसे बड़ा जघन्य अपराध साल 2002 के चुनाव में ज्ञानपुर विधानसभा से बीजेपी से चुनाव लड़ रहे गोरखनाथ पांडेय के भाई रामेश्वर पांडेय की 22 फरवरी को मतदानबूथ पर हत्या किए जाने का है। हालांकि तीन-तिकड़म से इस घटना से वह बरी हो गया है। इलाहाबाद में अमवा निवासी कांस्टेबिल महेन्द्र मिश्रा व राकेशधर त्रिपाठी के भाई धरनीधर त्रिपाठी की नृशंस हत्या, पूर्वमंत्री नंदगोपाल नंदी पर आरडीएक्स विस्फोटक से प्राणघातक हमला, इलाहाबाद के प्रतापपुर में चुनाव के दौरान फायरिंग की घटना में आरोपी होने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने पुलिस लगा दी। हालांकि वेश बदलकर फरारी काटने के बाद दिल्ली पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन्हें नैनी जेल समेत कई जेलों का सफर करना पड़ा।

सपा की सरकार बनते ही मानो उसकी लाटरी लग गयी। विधानसभा चुनाव 2017 में फिर से सत्ता पाने को बेताब कुनबे के आका शिवपाल ने पूर्वांचल के ईनामी माफियाओं को एकजुट करने का जिम्मा विजय मिश्रा को सौंपा। मन इतना बढ़ा कि अखिलेश यादव की मौजूदगी में भदोही की एक सभा मंच पर मुलायम के करीबी कालीन निर्यातक को धमकी दी थी कि अखिलेश से यारी करनी है तो घर बुलाकर करो, सभा में नहीं। इस धमकी का ही असर रहा कि अखिलेश जनता से विकास की बात कहने के बजाय विजय की शान में कसीदें पढ़ने लगे थे। विजय मिश्रा की ही साठगांठ व तीन-तिकड़म का नतीजा है कि अतीक इलाहाबाद के मंच पर चढ़े तो अंसारी बंधुओं की पार्टी कौमी एकता दल का विलय सपा में हुआ।

बता दें, यह वही बाहुबली विधायक विजय मिश्रा है जो मुख्तार अंसारी के करीबियों में से एक तो है ही भदोही समेत पूर्वांचल में सौ से अधिक हत्या, लूट, डकैती, अपहरण रंगदारी आदि के मुकदमें दर्ज है। रुंगटा अपहरण कांड में मुख्तार के साथ आरोपी भी बनाएं जा चुके है। इनकी सेटिंग-गेटिंग का हाल यह है कि अपनी बात मनवाने व अपना जलवा कायम करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है। एमएलसी चुनाव में अपनी पत्नी रामलली को जितवाने के लिए मुख्तार के धुर विरोधी बृजेश सिंह से हाथ मिलाना और उन्हें जितवाना तो एक बानगी है। इनके एक-दो नहीं सैकड़ों किस्से व कारनामे क्षेत्र में मशहूर है जिसमें वह सगे-संबंधियों को भी वाट लगाने में नहीं हिचकिचाते।

हालांकि पार्टी में अंदरुनी कलह तो काफी दिनों से थी, लेकिन बाहुबली विधायक विजय मिश्रा द्वारा बालू खनन से लेकर सड़क निर्माण सहित अन्य योजनाओं की धन के बंदरबाट व डीएम-एसपी से मिलकर पार्टी कार्यर्ताओं के उत्पीड़न, पत्रकार, कालीन निर्यातकों व संभ्रात नागरिकों पर फर्जी मुकदमा कराने के साथ ही जमीन कब्जा आदि प्रकरण के बाद सत्ता के शिखर प्रोफेसर रामगोपाल यादव, मुलायम सिंह यादव व शिवपाल सिंह यादव को अपने अकूत धन के बूते अपना गुलाम बनाकर अपनी बिटिया सीमा मिश्रा को टिकट हथिया लेने से बेबस संगठन व पार्टी कार्यकर्ता घुटन सा महसूस करने लगे थे। जिलाध्यक्ष प्रदीप यादव सहित तमाम कार्यकर्ताओं ने पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव से मिलकर अनुरोध किया कि अगर प्रत्याशी नहीं बदला गया तो न सिर्फ हम चुनाव हार जायेंगे, बल्कि पार्टी की छवि भी धूमिल हो रही है।

विजय मिश्रा के अकूत धन से दबे मुलायम सिंह यादव ने इन जांबाज कार्यकर्ताओं को डांटने के बाद यह कहकर भगा दिया कि जाओ सभी मिलकर सीमा को हरवा देना, मैं कह रहा हूं। निराश कार्यकर्ता वापस तो चले आए, लेकिन अंदर ही अंदर घुटते रहे। संगठन सहित पार्टी के जुझारु कार्यकर्ताओं को तवज्जो न देकर बाहुबली विधायक ने बूथ स्तर पर किराए के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंप दी और संगठन से यहकर बैठने को कहा कि रुपये में बड़ी ताकत होती है, 50 करोड़ रुपये खर्च कर मैं चुनाव जीत जाउंगा। लेकिन जनता ने हरा दिया।

आम जनमानस में एक ही चर्चा है, दगा किसी का सगा नही। तीन-पांच के घनचक्कर में भले ही विजय मिश्रा बरी हो गया, लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं। तिहरेकांड में मारे गए सूर्यनारायण शुक्ला के हत्यारों को सजा दिलाने का श्री मिश्रा भले ही दंभ भरता हो, लेकिन पूरा जिला जानता है कि लड़ाई वर्चस्व व ठेकेदारी की रही। डाक्टर को सजा दिलाकर पूरे जनपद में सड़क से लेकर बालू खनन तक पर कब्जा कर लिया गया। प्रतिदिन अवैध तरीके से 150-180 ट्रक बालू इब्राहिमपुर-बिहरोजपुर से विजय मिश्रा फिलिंग टोकन से जा रहा है, आखिर क्यों मौन है प्रशसन। ब्राह्मण समाज घड़ियाली आंसू बहाने वाले श्री मिश्रा को समझ चुकी है, इंतजार है तो बस उस वक्त का। निर्यातक व बुनकर वर्ग कह रहा है कि माफिया विधायक द्वारा विकास का पैसा खुलेआम बंदरबाट करने, भ्रष्टाचार को बढ़ावा व जिले को माफियाओं के हवाले कर पिस्तौल की राजनीति पनपाने के लिए इस बार सबक सिखाएंगी।

लेखक सुरेश गांधी भदोही के वरिष्ठ पत्रकार हैं. SURESH GANDHI से संपर्क iamsureshgandhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी के इस बवाली और तानाशाह डीएम ने मीडियाकर्मियों को सरेआम हड़काया (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के जंगलराज में विविध प्रजातियों के अधिकारी खूब फलते-फूलते पाए जाते हैं. एक महोदय हैं बहराइच जिले के डीएम उर्फ जिलाधिकारी. इन्हें लोग प्यार से अब ‘बवाली DM’ कह कर पुकारने लगे हैं. ये खुद ही बवाल करते कराते रहते हैं. इन महाशय को तानाशाही पसंद है. जब चाहेंगे तब मीडिया को दौड़ा लेंगे. कैमरे बंद करा देंगे. डांट लगा देंगे. जब चाहेंगे तब किसी होमगार्ड को डंडे से पीट देंगे. होमगार्ड की पिटाई करने वाले डीएम के रूप में कुख्यात जिलाधिकारी अभय का ताजा कारनामा है पत्रकारों को डांट डपट कर कैमरा बंद कराना और कवरेज से रोकना.

बहराइच के विवादों में घिरे रहने वाले जिलाधिकारी अभय ने आचार संहिता की आड़ में मीडिया कवरेज के दौरान चालू कैमरे को न केवल बन्द कराया बल्कि पत्रकारों को डांट लगाते हुए धारा 144 का हवाला देकर कार्यवाही की धमकी दी. नीचे दिए गए वीडियो को देखिए. डीएम साहब के ये बोल आपको सुनाई पड़ेंगे : ”बन्द करो कैमरा, तुमको बोला सबको बोला.. समझकर बात किया कीजिये… आवाज मत करो वहां पर….इसकी रिकार्डिंग हटाओ….”.

दरअसल बहराइच पालीटेक्निक कालेज की छात्र छात्राएं अपने प्रिंसिपल द्वारा छात्राओं का शोषण किये जाने से आक्रोशित होकर जिलाधिकारी का घेराव कर अपना दर्द बयां कर रही थी. इसी दौरान पत्रकार जब डीएम के घेराव को कैमरे से शूट करने लगे तो जिलाधिकारी भड़क गए. उन्होंने तमाम अफसरों, पुलिस कर्मियों व छात्र छात्राओं की मौजूदगी में पत्रकारों को अभद्रता पूर्वक डांट लगाते हुए न केवल उनका कैमरा बन्द कराया बल्कि उन्होंने अपने स्टाफ से रिकार्डिंग देखने को भी कह दिया. साथ ही धारा 144 का हवाला देकर कार्यवाही की धमकी दी. जिलाधिकारी बहराइच की बेअंदाजी को देखकर सारे लोग हतप्रभ हो गए.

जिलाधिकारी अभय का ये कारनामा कोई नया नहीं है. इससे पहले अपने बंगले पर तैनात सुरक्षा कर्मियों (होमगार्ड) की डंडे से पिटाई करने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही की मांग को लेकर हजारों की तादात में होमगार्डों ने कई दिन धरना प्रदर्शन किया था. सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाले डीएम अभय के विरुद्ध अब तक कई बार शिकायत हुई है लेकिन हर बार वो सत्ताधरी दल के करीबी होने के कारण कार्यवाही से बचते रहे हैं. शायद यही कारण है जिलाधिकारी की बेअंदाजी बदस्तूर कायम है. जिलाधिकारी के बर्ताव को लेकर जिले के मीडियाकर्मियों में भारी रोष है. पत्रकारों ने प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से बात कर कार्यवाही की मांग की है.

देखें वीडियो >>

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दंगों के दाग और अपराधों की आग से कैसे बचेंगे अखिलेश यादव

अलीगढ़ में हुई महिलाओं से मारपीट और लूटपाट की दो घटनाओं ने बुलंदशहर कांड की याद फिर ताजा कर दी है। उत्त्तर प्रदेश में दंगों के सवाल पर सपा सरकार को विपक्षी दल पहले से ही घेरते आ रहे हैं। तो ऐसे में सवाल उठ रहा है कि चुनाव के समय अब अखिलेश यादव दंगों के दाग और अपराधों की आग से खुद और पार्टी को कैसे बचाएंगे ?

धीरज सिंह

घटनाएं होती हैं और कुछ समय बाद लोग उन्हें भूल जाते हैं मगर चुनाव आते ही राजनैतिक दल एक- दूसरे का लेखा-जोखा कुरेद कर फिर बाहर निकाल देते है। लोग जिन बातों को भूल चुके थे, चुनाव के ऐन पहले फिर से सुर्खियां बनने लगती हैं। प्रदेश में हुए दंगे और आपराधिक वारदात, कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं जो समाजवादी पार्टी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पीछा नहीं छोड़ेंगे। मार्च 2012 में उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम आने के बाद जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने युवा पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया तो जनता प्रदेश के विकास का सपना देख रही थी। लैपटॉप मिलने की आशा में प्रदेश के युवाओं में भारी उत्साह था।

मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद अखिलेश भी अपने चुनावी वादे करने में जुट गये। प्रदेश भर में हजारों छात्र-छात्राओं को लैपटॉप बांटे गए। अखिलेश की महत्वाकांक्षी योजना प्रदेश में मेट्रो दौड़ाने की थी, उस पर भी अमल शुरू हो गया। यह सब कुछ ऐसे होता रहा, मानों अगला चुनाव मेट्रो और लैपटॉप के दम पर ही जीतना हो। चुनाव की अधिसूचना आने से पहले मुख्यमंत्री ने जैसे-तैसे मेट्रो का रन ट्रायल भी करवा ही दिया। हालांकि अभी लखनऊ में मेट्रो का काफी काम अभी बाकी है और मेट्रो को चलने में काफी समय लगने वाला है।

यूपी मिशन-2017 का लक्ष्य सामने आया तो सपा के दिग्गज फिर माथापच्ची में जुट गए। लैपटॉप तो बांट चुके, अब इस बार क्या? काफी सोच-विचार के बाद घोषणा हुई कि इस बार स्मार्ट मोबाइल फोन बांटे जाएंगे। आखिर युवाओं में मोबाइल फोन का क्रेज जो है। तो क्या मोबाइल और मेट्रो अखिलेश भइया की चुनावी नैया पार लगा देंगे। विपक्षी दल इस बात को जोर-शोर से प्रचारित करते हैं कि सपा की सरकार बनते ही उत्तर प्रदेश में अपराध बढ़ने लगते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा मुखिया बहन मायावती जब भी प्रेस कान्फ्रेंस में पहले से ही लिखा-लिखाया भाषण पढ़ती हैं तो यह जिक्र करना कभी नहीं भूलती हैं कि प्रदेश में अपराधों की बाढ़ आ गई और जंगल राज कायम हो चुका है। भाजपा और कांग्रेस के नेता भी सपा सरकार पर ऐसे आरोप लगाते रहते हैं। भाजपा नेता कह चुके हैं कि अखिलेश की सरकार आने के बाद से प्रदेश में 500 से ज्यादा छोटे-बड़े दंगे हो चुके हैं। अखिलेश के राज में सबसे बड़ा दाग मुजफ्फरनगर में हुए दंगे हैं। प्रदेश के कुछ हिस्सों से हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा भी राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन चुका है।

बुलंदशहर हाईवे पर जुलाई 1016 को हुई शर्मनाक घटना अखबारों और न्यूज चैनलों की सुर्खी बनी थी, मां-बेटी से दुष्कर्म की घटना की गूंज विदेशों तक हुई थी। इस कलंक को धोने के लिए राज्य सरकार ने यूपी-100 डायल योजना लांच की। इस योजना का जोर शोर से प्रचार किया गया और वाहवाही लूटने की कोशिश की गई। पुलिस के आला अधिकारी प्रदेश में कानून व्यवस्था चुस्त- दुरुस्त होने का दावा करने लगे। वूमेन्स हेल्पलाइन और यूपी- 100 डायल चालू होने के बाद तो क्या वाकई प्रदेश में अपराध थम गये हैं। चुनावी बेला में बुलंदशहर जैसा कांड होने से अखिलेश सरकार को फिर भारी धक्का लगा है। 22 जनवरी 2017 को अलीगढ़ के टप्पल क्षेत्र के गांव जिकरपुर में एक रिटायर डीआईजी के फार्म हाउस पर मां-बेटी के साथ मार-पीट और लूटपाट की वारदात और एक्सप्रेस वे पर बस यात्रियों से लूटपाट की वारदात ने प्रदेश में कानून व्यवस्था के दावों की सच्चाई उधेड़ कर रख दी है। बताया जा रहा है कि ये दोनों ताजा वारदात बुलंदशहर कांड की तर्ज पर ही अंजाम दी गई हैं और अपराधियों के बढ़े हौसले को उजागर कर रही हैं। क्या राज्य की जनता मेट्रो, मोबाइल और लैपटॉप को राज्य की खुशहाली मान लेगी। विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश और उनकी पार्टी को दंगों और अपराधों पर भी जवाब देना होगा।

धीरज सिंह
dhirajsinghdv@gmail.com

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लखनऊ में नभाटा की महिला पत्रकार से छेड़खानी, विरोध करने पर पिटाई

100 नंबर पर कॉल की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला, 17 घंटे से ज्यादा का वक्त बीतने के बाद भी पुलिस आरोपियों को पकड़ नहीं सकी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करते हैं लेकिन हकीकत इससे बिलकुल अलग है। राजधानी लखनऊ में बेंगलुरु जैसी वारदात को अंजाम दिया गया। सोमवार की रात दफ्तर से घर लौट रही नवभारत टाइम्स की महिला रिपोर्टर के साथ अलीगंज जैसे व्यस्त इलाके में कार सवार गुंडों ने छेड़खानी की। रिपोर्टर के विरोध करने पर गुंडों ने रिपोर्टर को कार से दौड़ाया और ओवरटेक करके उसकी कार रोक ली। इसके बाद अभद्रता करते हुए मारपीट की।

इस दौरान पीड़िता ने 100 नंबर पर कॉल कर यूपी पुलिस से मदद लेनी चाही लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। मीडिया के जरिए रिपोर्टर से छेड़खानी की खबर फैली तो पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। सीओ अलीगंज डॉ. मीनाक्षी फोर्स के साथ मौके पर पहुंचीं। देर रात तक गुंडों की तलाश में चेकिंग हुई लेकिन पुलिस उनको ढूंढ नहीं पाई। कार का रजिस्ट्रेशन बलिया में तैनात एडीओ पंचायत जयप्रकाश सिंह की पत्नी मीरा सिंह के नाम पर है। 

जानकारी के मुताबिक नवभारत टाइम्स समाचार पत्र में कार्यरत महिला रिपोर्टर सोमवार की रात करीब दस बजे अपनी कार से अलीगंज के सेक्टर बी स्थित अपने घर जा रही थी। निशातगंज पुल के पास से फिएट एवेंचुरा गाड़ी (यूपी 60 एक्स 9696) ने रिपोर्टर की गाड़ी को फॉलो करना शुरू कर दिया। कार सवार फॉलो करते हुए लगातार हार्न बजा रहे थे। रिपोर्टर इस घटना को नजरअंदाज करके आगे बढ़ी तो उनका दुस्साहस बढ़ गया। उन लोगों ने रास्ते में रिपोर्टर की कार को ओवरटेक करते हुए रोकने की कोशिश की। रिपोर्टर किसी तरह से आगे बढ़ी। इस पर गुंडो ने रिपोर्टर की कार को पीछे से दौड़ाया। रिपोर्टर ने विरोध किया तो कार सवार तीनों युवक अभद्रता करने लगे। 

रिपोर्टर ने पुलिस को फोन करने और कार सवारों की रिकॉर्डिंग के लिए मोबाइल फोन निकाला तो उसके साथ हाथापाई करने लगे। रिपोर्टर ने शोर मचाया तो वे सत्तारूढ़ दल के नेताओं का नाम लेकर उसे जान से मारने की धमकी देते हुए चले गए। उनके जाने के बाद रिपोर्टर ने मदद के लिए 100 नंबर पर फोन मिलाया लेकिन कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला। इसके बाद रिपोर्टर ने अपने दफ्तर में सहकर्मियों को मामले की जानकारी दी। इसके बाद पुलिस से संपर्क हुआ और अलीगंज पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस आरोपियों और उनकी कार को तलाश नहीं कर पाई। 

कार के नंबर के बारे में पता किया गया तो बताया गया कि कार बलिया के जिला पंचायत में तैनात एडीओ जय प्रकाश सिंह की पत्नी मीरा सिंह के नाम पर है। लखनऊ पुलिस ने बलिया के एसपी को मामले की जानकारी दी। पुलिस ने अज्ञात कार सवारों के खिलाफ अलीगंज थाने में छेड़खानी, मारपीट और जान से मारने की धमकी का मामला दर्ज कर लिया है। 17 घंटे से ज्यादा का वक्त बीतने के बाद भी पुलिस अभी तक आरोपियों को पकड़ नहीं पाई है। एसएसपी मंजिल सैनी का कहना है कि एसपी बलिया आरपी सिंह को पूरे मामले की जानकारी दे दी गई है। बताया गया है कि जयप्रकाश सिंह का बेटा सोनू सिंह सोमवार को लखनऊ में था। जयप्रकाश सिंह से कई बार मोबाइल फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया लेकिन वह फोन नहीं उठा रहे हैं। उनके बेटे व उससे जुड़े लोगों को मोबाइल फोन स्विच ऑफ है। आरोपियों की कॉल डिटेल निकलवा कर उनकी तलाश की जा रही है। क्राइम ब्रांच की टीम को पड़ताल में लगाया गया है।

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नेता जी, आपके उसी सवाल का बस जवाब दिया है अखिलेश ने!

Nadeem : आदरणीय नेता जी, आप बेहद दुखी हैं। आपका दुखी होना लाजिमी भी है। मुझे मालूम है कि आप इतने दुखी नहीं होते अगर यह बगावत आपके बेटे की जगह किसी और ने की होती लेकिन जो कुछ हुआ उसके लिए कहीं न कहीं आप खुद जिम्मेदार है।

याद कीजिये 24 अक्टूबर 2016 का वो दिन, जिस बैठक का पूरे देश में लाइव टेलीकास्ट हो रहा था, उस बैठक में आपने बहुत ही हिकारत भरे अंदाज़ में अखिलेश से मुखातिब होते हुए कहा था, ‘अखिलेश तुम्हारी हैसियत क्या है? अमर सिंह हमारे भाई हैं, उन्होंने हमें कई बार बचाया।’

माफ़ कीजियेगा नेता जी, अखिलेश ने तो आपके उसी सवाल का जवाब भर दिया है।

उसने तो बस यह दिखाया है कि उसकी हैसियत यह है कि उसके एक बुलावे पर 224 में से 197 विधायक उसके साथ खड़े होते है, इनमे भी तमाम वो जिन्हें आपने टिकट देने का एलान कर रखा है। अखिलेश ने अगर अपनी हैसियत नहीं बताई होती तो उसे यह सवाल न जाने कितने और मौकों पर सुनना पड़ता।

हां, एक बात और, हो सकता है अमर सिंह जी ने तमाम मौकों पर आपको बचाया हो लेकिन आपके खून पसीने से खड़ी पार्टी को टूटने से नहीं बचा सके। नेता जी, पार्टी आपकी, बेटा आपका, मुझे आपके विवाद में पड़ने का कोई हक नही, लेकिन बस इतना भर कहना चाहता हूं अक्सर दम्भ की परिणित ऐसी ही होती है।

आपका एक प्रशंसक

नवभारत टाइम्स अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार नदीम की एफबी वॉल से.

ये वीडियो देखें…

अखिलेश के पावरफुर होने से किन्नर खुश https://www.youtube.com/watch?v=Yafh-jUHW8k

इन्हें भी पढ़ें…

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‘नई उमंग’ के जरिए सपा मुस्लिमों को बरगला रही, रिहाई मंच ने उर्दू पत्रिका को भेजा नोटिस

लखनऊ । रिहाई मंच नामक संगठन ने आरोप लगाया है कि अखिलेश सरकार मुसलमानों को गुमराह करने के लिए उनके बीच अपनी उपलब्ध्यिों के झूठे दावों वाली उर्दू की सरकारी पत्रिका ‘नई उमंग’ प्रकाशित कर वितरित करा रही है जिसमें बेगुनाह मुसलमानों के रिहा किए जाने का वादा पूरा कर दिए जाने का दावा किया गया है। रिहाई मंच ने ‘नई उमंग’ पत्रिका के खिलाफ नोटिस भेजा है।

लाटूश रोड स्थित रिहाई मंच कार्यालय पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में रिहाई मंच अध्यक्ष मो0 शुऐब ने कहा कि ‘नई उमंग’ नाम से सूचना विभाग द्वारा जारी उर्दू पत्रिका के पृष्ठ संख्या 34 और 35 पर प्रदेश के एडीशनल एडवोकेट जनरल जफरयाब जीलानी ने दावा किया है कि ‘अखिलेश सरकार ने बेकसूरों पर से मुकदमा खत्म कराने के मामले में बेहद संजीदगी से काम किया तथा निमेष कमीशन की रिपोर्ट की सिफारिशात को कबूल करते हुए उन्हें भी अमल में लाया गया’।

वहीं इस इंटरव्यूव में उन्होंने यह भी दावा किया है कि सरकार ने 5 हजार बेगुनाहों की रिहाई कराई है जबकि सच्चाई तो यह है कि पूरे देश में आतंकवाद के नाम पर 5 हजार बेगुनाह मुसलमान बंद भी नहीं हैं। वहीं निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर सरकार ने कोई कार्यवाई ही नहीं की है। अगर कार्यवाई की होती तो तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद को फंसाने वाले पुलिस और खुफिया विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाई की होती और उन्हें जेल भेजा होता। वहीं उल्टे सरकार ने अदालत द्वारा 9 साल बाद बरी हुए 6 मुस्लिम युवकों नौशाद, जलालुद्दीन, मोहम्मद अली अकबर हुसैन, शेख मुख्तार, अजीजुर्रहमान सरदार और नूर इस्लाम मंडल के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी है। जिसकी सुनवाई की तारीख 31 जनवरी 2017 को नियत है।

रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि समाजवादी पार्टी ऐसी पत्रिकाओं के जरिए मुसलमानों को बरगलाने की कोशिश कर रही है। जिसके खिलाफ रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जफरयाब जीलानी, अपर महाधिवक्ता, ‘नई उमंग’ के संरक्षक श्री नवनीत सहगल, सुधीश कुमार ओझा, प्रकाशक, डाॅ आरएस पांडेय, सम्पादकीय सलाहकार, सैय्यद अमजद हुसैन सम्पादकीय सलाहकार, सैय्यद वजाहत हुसैन रिजवी, निगरां, सुहैल वहीद, सम्पादक को पार्टी बनाते हुए कानूनी नोटिस भेजा है। जिसमें आरोप लगाया गया है कि पुस्तक द्वारा सबने एक राय से साजिश करके सपा को राजनीतिक लाभ पहंुचाने के लिए राजकीय धन का जिसके वे न्यासी हैं, राजकीय कार्य से अतिरिक्त व्यय करके न्यास भंग किया है। नोटिस के जरिए सभी से सामूहिक रूप से तथा अलग-अलग स्पष्टीकरण मांगी गई है। जिसके न मिलने पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने और विधिक कार्यवाई कर प्रकाशन में होने वाले व्यय को उनसे वसूलने और राजकीय कोष में जमा कराने और इस प्रक्रिया में होने वाले खर्च को उनसे वसूल करने की बात कही गई है।

लखनऊ रिहाई मंच के महासचिव शकील कुरैशी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि सपा ने न सिर्फ वादा खिलाफी की है बल्कि ऐसे झूठे दावे करके मुसलमानों के जख्म पर नमक छिड़कने का काम किया है। जिसका खामियाजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ेगा। श्री कुरैशी जिनका पिछले दिनों भोपाल फर्जी एनकांउटर के खिलाफ धरना देते वक्त पुलिस ने हमला करके हाथ तोड़ दिया था, ने कहा कि मुसलमानों को बरगलाकर सपा के लिए वोट दिलवाने का काम करने वाले का तो जमीर तभी बिक गया था जब उन्होंने बाबरी मस्जिद को चांदी की तश्तरी में रखकर विहिप को सौंप दी थी। जिसके एवज में उनको माडल हाउस में रामभवन नाम की एक शानदार कोठी विहिप ने बतौर तौफा सौंपी थी। उन्होंने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव में मुसलमान सपा के 5 साल के मुस्लिम विरोधी शासन मंे 300 से ज्यादा हुए दंगों का हिसाब मांगने जा रहा है। 

नजीब के लिए इन्साफ मांग रहे एएमयू छात्रों पर सपाई पुलिस के हमलों ने खोली विकास अभियान की पोल 

अलीगढ : जेएनयू के लापता छात्र नजीब के लिए अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों के इन्साफ मार्च पर मार्च उत्तर प्रदेश की सांप्रदायिक सपा सरकार के बर्बर पुलिसिया हमले की रिहाई मंच ने घोर निंदा की है। अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी से छात्रों का जनसैलाब नजीब के लिए इंसाफ मार्च की शक्ल में शुरू हुआ। यह मार्च पूरी तरह से शांतिपूर्ण था। छात्रों की मांग थी की नजीब को वापस लाया जाये और उसपर हमला करने वाले एबीवीपी के गुंडों पर कार्यवाही की जाये| छात्रों ने रेल रोकने का ऐलान किया था। उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा पहले तो छात्रों को यूनिवर्सिटी कैंपस में ही रोकने की कोशिशें की गयी और बाब-ए-सय्यद पर भारी पुलिस और आर.ए.एफ बल लगा दिया गया लेकिन छात्रों के शांतिपूर्ण जनसैलाब को रोका नहीं जा सका। छात्रों द्वारा निकाले  इन्साफ मार्च को बरगलाने में जब गए सपा सरकार की सांप्रदायिक पुलिस नाकाम रही तो अपनी तीन नाकाम कोशिशों के बाद आगे बढ़ रहे छात्रों पर पुलिस ने हमला कर दिया।

बाब ए सय्यद से निकलकर छात्र का जनसैलाब घंटाघर पहुँच गया जहाँ उत्तर प्रदेश की  सांप्रदायिक सपा सरकार की पुलिस ने छात्रों पर वाटर कैनन का प्रयोग किया और हमला कर दिया। इस बर्बर पिटाई में बहुत से छात्र घायल हुए। पुलिस ने मार्च में शामिल छात्राओं को भी नहीं बख्शा और उन पर भी लाठियां बरसाईं। इस बर्बर पिटाई के बाद नजीब के लिए इन्साफ मांग रहे छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया| 

रिहाई मंच इस पुलिस कार्यवाही के लिए सपा और भाजपा के नापाक और सांप्रदायिक गठजोड़ को जिम्मेदार मानता है। रिहाई मंच के मोहम्मद आरिफ ने कहा कि सपा सरकार का विकास एक जुमला भर है। पहले मदसों के छात्रों को आतंकवादी बताकर फर्जी फंसाया जाता था अब यह मदरसों से बढ़कर जेएनयू और एएमयू जैसे संस्थानों में पढने वालों को निशाना बनाया जा रहा है। रोहित वेमुला और नजीब जैसों को जब पढने की आजादी और सुरक्षा नहीं है तो क्या उन्हें जेलों में डालकर सपा सरकार विकास करना चाहती है। इन्साफ मांग रहे एएमयू छात्रों को उत्तर प्रदेश  पुलिस द्वारा यह कहना कि तुम्हे भी नजीब बना देंगे, सपा की सामाजिक न्याय और विकास के दावों की पोल खोल देता है। सपा सरकार की मौजूदा कलह को उन्होंने दरअसल अखिलेश और शिवपाल के बीच लूट को लेकर झगड़ा बताया जिसका विकास से कोई लेना देना नहीं है।

रिहाई मंच के साथी और एएमयू के शोध छात्र अमानुल्लाह ने कहा कि आनेवाले २०१७ चुनाव में सपा सरकार को हर एक लाठी का हिसाब देना होगा और एएमयू छात्रों पर पड़ी हर एक लाठी सपा के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी। रिहाई मंच के साथी और एएमयू के शोध छात्र सलमान हबीब ने कहा कि भोपाल फर्जी एनकाउंटर के विरोध में लखनऊ में राजीव यादव पर पुलिसिया हमला और एएमयू छात्रों पर हमला अखिलेश के सारे विकास दावों की पोल खोल देता है। अखिलेश के लिए विकास का मतलब अपना विकास है जिसमें लूट के हिस्से को लेकर उनकी पार्टी में खुद घमासान मचा हुआ है। इस में दलित और मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है। उन्हें केवल झूठ, जेल और लाठियां, और दंगे ही मिले हैं। नजीब के लिए इन्साफ मार्च में एएमयू छात्रसंघ के सभी पदाधिकारी मौजूद रहे साथ में रिहाई मंच अलीगढ के मोहम्मद आरिफ, सलमान हबीब, अमानुल्लाह, तौसीफ खान, दाऊद इब्राहीम आदि भी इस मार्च में शामिल हुए।

द्वारा जारी :
रिहाई मंच
लखमऊ / अलीगढ़

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नेताजी को दादरी कांड, मुज्जफरनगर कांड और हाईवे रेप कांड के समय अनुशासनहीनता क्यों नहीं दिखाई दी?

यूपी में अनुशासनहीनता का कड़वा सच…

मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक माहौल ने गंभीर चिंतन के लिए मजबूर कर दिया है। मैं ही नहीं मेरे जैसे हर कलमकार के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है। यहां एक बार फिर राजनीतिक मूल्य हाशिये पर चढ़ते दिखाई दे रहे हैं। स्वयं को सही साबित के लिए बाप-बेटे में ठन गई है तो, कुछ लोग विभीषण की भूमिका भी बखूबी निभा रहे हैं। खैर ये समाजवादी पार्टी का निजी मामला है, इस पर ज्यादा समय व्यर्थ करना उचित नहीं लगता। मेरा सवाल यहां नेता जी उर्फ मुलायम सिंह साहब से है।

मुलायम जी, आपकी पार्टी में आपके मुख्यमंत्री बेटे, आपके भाई पार्टी के नियमों से हटकर कुछ करते हैं तो वो आपको अनुशासनहीनता लगती है। आपने इस अनुशासनहीनता के खिलाफ बड़ी ही तत्परता के साथ बेटे और भाई को पार्टी से निकालने का खेल भी खेला। खैर, चलो मान लिया ये भी आपका निजी मामला है, हालांकि अब इसमें निजता जैसा कुछ रहा नहीं। मैं यहां मुलायम सिंह जी की तारिफ करना चाहूंगा कि उन्होंने पार्टी में अनुशासनहीनता के खिलाफ काफी कड़े तेवर अपनाय। लेकिन मैं नेता जी से यहां सवाल पूछता हूं कि क्या उस वक्त आपको अनुशासनहीनता नहीं दिखाई दी जब दादरी कांड की सांप्रदायिक आग उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में फैली। क्या उस वक्त आपको अनुशासनहीनता नहीं दिखाई दी जब मुज्जफरनगर के दंगों में उत्तर प्रदेश जल रहा था। क्या उस वक्त आपको अनुशासनहीनत नहीं दिखी जब हाई वे पर एक मजबूर बाप के सामने ही उसकी पत्नी और बेटी से घंटों बलात्कार किया जाता है।

नेता जी ऐसे सैकड़ों मामले हैं जब अनुशासन को खूंटी पर टांगकर उत्तर प्रदेश की अस्मत लूटी गई है। तब आपने अनुशासनहीनता के खिलाफ कार्रवाई करते हुए अपनी पार्टी से किसी को क्यों नहीं निकाला। या फिर मैं यह मान लूं, समाज में,  आपके राज्य में अनुशासनहीनता से आपको कई फर्क नहीं पड़ता बस पार्टी में अनुशासनहीनता आप बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। या फिर इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि हर राजनीतिक पार्टी का यही असली चेहरा है। देश की अनुशासनहीनता से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है बस वोट की राह में पार्टी में आने वाले हर रोड़े, अनुशासनहीनता की कसौटी में आते हैं।

विनोद विद्रोही
Blog: www.vinodngp.blogspot.in 
Email: vinody37@gmail.com

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फैजाबाद में दैनिक जागरण के चार पत्रकारों को जिंदा जलाकर मारने की कोशिश

नोटबंदी के फैसले के बाद हो रही कैश की समस्या के चलते पत्रकारों को जिंदा जलाने की घटना सामने आई है। उत्तरप्रदेश के फैजाबाद में एक पेट्रोल पंप के कर्मचारियों पर आरोप है कि उन्होंने चार पत्रकारों को जिंदा जलाकर मारने की कोशिश की। ये चारों वहां के एक हिंदी अखबार दैनिक जागरण में काम करते हैं। पत्रकार पेट्रोल पंप पर झगड़ा होने के बाद पास ही में अपने दफ्तर में जाकर छिप गए थे। लेकिन पेट्रोल पंप का स्टाफ वहां भी पहुंच गया और ऑफिस के अंदर घुसकर पत्रकारों और बाकी स्टाफ से साथ भी मारपीट की। बाद में किसी ने पुलिस को सूचना दी। उसके बाद जाकर मामला शांत हुआ।

पत्रकार ऑफिस के पास वाले पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाने गया था। उसे 200 रुपए का पेट्रोल भरवाना था। इसके लिए उसने 10-10 के बीस सिक्के पेट्रोल भर रहे शख्स को देने चाहे। लेकिन उसने उनको लेने से मना कर दिया और कहा कि उसे नोट चाहिए और वह सिक्के नहीं लेगा।जब पत्रकार ने उससे वजह जाननी चाही तो वह लड़ने लगा। लड़ाई कुछ ही देर में हाथापाई पर पहुंच गई। जिन पत्रकारों पर हमला हुआ उसमें से एक का नाम कृष्ण कांत गुप्ता है। उन्होंने कहा, ‘मेरे कुछ दोस्त झगड़े की सुनकर पेट्रोल पंप की तरफ आए थे। उन लोगों को देखकर पेट्रोल पंप के स्टाफ ने उनके ऊपर पेट्रोल छिड़क दिया और उन्हें जिंदा जलाने की कोशिश की।’

भारत के कई राज्य पत्रकारों के लिहाज से सुरक्षित नहीं कहे जा सकते। 12 नंवबर को बिहार में हिंदी के अखबार दैनिक भास्कर के पत्रकार की कुछ अज्ञात लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके अलावा भी ऐसे कई किस्से मौजूद हैं। इससे पहले मई में हिंदी के अखबार हिंदुस्तान के सीनियर पत्रकार राजदेव रंजन को सिवान जिले में गोली मारी गई थी। सीबीआई अबतक उस केस की जांच कर रही है। इस साल (2016) दुनियाभर में कम से कम 57 पत्रकार अपना दायित्व निभाते हुए मारे गए हैं। यह रिपोर्ट प्रेस स्वतंत्रता समूह ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ ने दी थी।

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लखनऊ में नाराज पीसीएस अफसर हड़ताल पर गए

लखनऊ से खबर है कि सभी पीसीएस अफसर हड़ताल पर गए. ये PCS अफसर सामूहिक रूप से गिरफ्तारी देने डीएम आवास पहुंचे हैं. दरअसल कलेक्ट्रेट में वकीलों ने पीसीएस अफसर के साथ मारपीट की थी. इसके बाद लखनऊ पुलिस ने 3 सीनियर अफसरों के खिलाफ ही FIR दर्ज कर दी. इससे नाराज यूपी के 1100 पीसीएस अफसरों ने हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी. पीएसएस अफसरों ने प्रदेश में सारा काम ठप करने की चेतावनी दी.

बताया जा रहा है कि पुलिस ने तीन सीनियर पीसीएस अफसरों पर जो एफआईआर दर्ज की है उसमें उन पर सिर्फ 300 रूपए लूट का मामला दिखाया गया है. पीसीएस महासंघ के अध्यक्ष उमेश प्रताप सिंह ने आपातकालीन बैठक बुलाई है. बैठक में आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा. अगर अफसरों की मांगें न मानी गई तो लखनऊ की हड़ताल पूरे प्रदेश में फैल सकती है. इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से प्रदेश में एक बड़े संकट की स्थिति पैदा हो गई है.

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यूपी में शराब विक्रेता जमकर लूट रहे हैं खरीदारों को, भ्रष्ट आबकारी विभाग ने चुप्पी साधी

बिक्री मूल्य व वास्तविक दर में अंतर से ही रोजाना लाखों की उपरी कमाई…

बरेली | यूपी में जंगलराज हर फील्ड में है. शिक्षा, सेहत, आबकारी… कोई विभाग उठा लो, उसके पीछे एक लंबा चौड़ा घोटाला नजर आएगा जिसे शीर्ष लेवल के सत्ताधारियों द्वारा संरक्षण प्राप्त है. प्रदेश में शराब विक्रेती जमकर खरीदारों को लूट रहे हैं. निर्धारित रेट से बहुत ज्यादा पैसे वसूल रहे हैं. भ्रष्ट आबकारी विभाग सब जानकर भी चुप्पी साधे है. आबकारी विभाग उन सरकारी विभागों में से एक है जहां सब कुछ जानकारी में होने के बावजूद खुलेआम भ्रष्टाचार के कीचड़ में सना हुआ होने के कारण भयंकर चुप्पी साधी रखी जाती है. मामला नशे के विभाग यानी शराब से जुड़ा होने के चलते हर कोई इसके कीचड़ में ईंट मारने से बचता है कि कहीं कीचड़ की छीट उस पर ही न पड़ जाए. इसलिए सब कुछ जगजाहिर है फिर भी सुनवाई कहीं नहीं. हो भी कैसे. सीधे-सीधे देशी पव्वे पर पांच रुपये के ओवर रेट से आने वाले रोजाना लाखों रुपयों की रकम की महक व जायका उपर तक सभी इमानदारों को हिस्सानुसार पहुंचा दिया जाता है शिकायतों पर पर्दा डालते रहने के नाम पर.

शराब की बिक्री और क्वालिटी पर नजर रखने के लिए जिम्मेदार आबकारी विभाग उन चुनिंदा सरकारी विभागों में शुमार है जिसमें मलाई सबसे ज्यादा है. चाहे अवैध दारू बनाने से बिकने तक की बात हो या प्रतिबंधित जगह दूसरे स्थान की लाईसेंसी दुकान चलाने की बात हो, सब संभव है, यहां सुविधा शुल्क की बदौलत. विश्वास ना हो तो किसी दुकान से दारू खरीदने के दौरान पक्की रसीद मांगकर तो देखिए. दुकानदार से लेकर पुलिस से लेकर प्रशासन हर जगह बेभाव की रूसवाई यानी बेइज्जती झेलनी पड़ सकती है. यानी भारत सरकार से लेकर संविधान से लेकर अन्य नियम कानून, यहां कोई लागू नहीं होता है. बिना परिचय बताए आबकारी विभाग के ही निरीक्षक से पूछने पर एक जिम्मेदारी वाला पद निर्वहन करने के बावजूद गैर-जिम्मेदाराना जवाब देते हुए बताया कि यहां रसीद नहीं दी जा सकती. क्यूं? के जवाब में बताया गया कि हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं है.

इसी तरह दुकानदारों ने जानकारी दी कि त्योहारों पर तो विभाग द्वारा हर दुकान के हिसाब से 3500 से 5000 रुपए अवैध वसूली भी की जाती है. एक बड़ी कम्पनी को विभाग ने बाकायदा नियमावली बना कर शराब बिक्री का जिम्मा देकर मनमानी करने को छोड़ दिया है. अब इन के विरुद्ध कुछ भी बोलने का मतलब है कि किसी भी मिलावट अदि के अवैध केस में फर्जी ढ़ग से फंसाकर शिकायत से भी कई गुना ज्यादा का जुर्माना भुगतना.

बरेली से टीवी जर्नलिस्ट योगेन्द्र सिंह की रिपोर्ट.

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शिक्षक रामाशीष सिंह की हत्या के लिए सत्ता के नशे में चूर अखिलेश जिम्मेदार

लखनऊ की ‘मित्र पुलिस’ सपाईयों की मित्र, जनता की शत्रु : चचा-भतीजे में माल के बंटवारे के झगड़े में आए सपाई गुंडों की दामादों की तरह खातिर : पेंशन मांगने वालों पर कातिलाना हमला : हजरतगंज में सिर्फ गंजिंग हो सकती है, इंसाफ की आवाज नहीं उठ सकती : लखनऊ, 08 दिसम्बर 2016 । रिहाई मंच ने लखनऊ में शिक्षकों पर पुलिसिया हमले और उसमें शिक्षक रामाशीष सिंह की मौत के लिए अखिलेश यादव को जिम्मेदार ठहराया है। मंच ने कहा कि पिछली 2 नवंबर को भी हजरतगंज गांधी प्रतिमा पर इंसाफ मांगते रिहाई मंच नेताओं पर इसी तरीके से कातिलाना हमला पुलिस ने किया था। आज जिस तरह पुलिस ने शिक्षक का कत्ल किया और सैकड़ों को गंभीर रूप से घायल किया, वह साफ करता है कि यह हमले सिर्फ पुलिसिया नहीं है बल्कि यह सब सरकार की सरपरस्ती में हो रहे हैं।

रिहाई मंच के लाटूश रोड स्थित कार्यालय पर हुई बैठक में मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने शिक्षक रामाशीष सिंह के कत्ल के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि अखिलेश अपनी धूमिल छवि को बचाने के लिए इंसाफ मांगते लोगों पर कातिलाना हमले करवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव और रिहाई मंच लखनऊ इकाई के महासचिव शकील कुरैशी पर भी इसी तरीके से हजरतगंज पुलिस ने कातिलाना हमला किया था। अगर सूबे के प्रशासन ने ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई की होती तो आज शिक्षक रामाशीष सिंह का कत्ल करने की हिम्मत इस पुलिस में नहीं होती।
 
रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि जिस तरीके से सूबे की राजधानी में शिक्षक रामाशीष सिंह की दौड़ा-दौड़ा पीटा और हत्या की, वह साबित करता है कि सूबे में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि इस सरकार में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पुलिस और नेता कत्ल करते हैं और फिर अखिलेश मुआवजा देते हैं। यह इंसाफ को कुचलने की एक परंपरा सी बन गई है। जिस तरीके से पिछले दिनों बांदा में पांच मुस्लिम युवकों को मार-मार कर पुलिस ने चमड़ी उधेड़ ली, इलाहाबाद के एक युवक आरिफ को इतना मारा कि वह कोमा में है- ठीक इसी तरीके से सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा ने पत्रकार जगेन्द्र को जिन्दा जलवा दिया। बाराबंकी में पत्रकार की मां से थाने में बलात्कार की कोशिश और फिर उन्हंे जिन्दा जला दिया जाना, बहराइच में आरटीआई कार्यकर्ता को पुलिस की मौजूदगी में दौड़ा कर मार दिया जाना- ये सिर्फ घटनाएं नहीं हैं बल्कि अखिलेश सरकार का वह क्रूरतम चेहरा है जिस पर विकास का नकाब लगाकर अखिलेश राजनीति करना चाहते हैं।   उत्तर प्रदेश दलित, मुस्लिम और महिलाओं के खिलाफ हिंसा में सर्वोच्च स्थान पर है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी मूलभूत सुविधाएं फेल हैं। पर हमारे मुख्यमंत्री को सूबे के किसानों से छीनी गई जमीन पर हाइवे बनाने में ही गर्व है।
 
रिहाई मंच नेता जैद अहमद फारूकी ने कहा कि लखनऊ पुलिस को इंसाफ की मांग करने वालों का कत्ल करने के लिए ही ‘मित्र पुलिस’ का तमगा दिया गया है। जो नेताओं के लिए तो मित्र है लेकिन अपने पंेशन की मांग करने वाले शिक्षकों और गरीब जनता के लिए शत्रू है। अम्बेडकर कांग्रेस के फरीद खान ने आरोप लगाया कि अखिलेश सरकार में पुलिस सपा कार्यकर्ताओं की तरह काम कर रही है।
 
रिहाई मंच लखनऊ इकाई महासचिव शकील कुरैशी ने कहा कि बुधवार को राजधानी की सड़कों पर जिस तरीके से शिक्षकों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा जा रहा था, उसने 2 नवंबर की रिहाई मंच के धरने पर नेताओं पर हुए पुलिसिया हमले को एक बार फिर से दोहराया है। ठीक इसी तरह 2 नंबर को जब हम भोपाल फर्जी मुठभेड़ के सवाल पर धरने पर बैठे थे, उस वक्त हमारे साथी राजीव यादव और हमें न सिर्फ दौड़ा-दौड़ा कर ठीक इसी तरह पीटा गया और घंटों पुलिस हिरासत में जिस तरीके से हमारे बेहोश साथी को पुलिस पीट रही थी और बार-बार यह कहने के बावजूद कि साथी की मौत हो जाएगी, मारे जा रही थी से साफ हो जाता है कि हमले जानबूझ कर किए जा रहे है। जिसके नतीजे के रूप में आज रामाशीष सिंह की मौत हमारे सामने है।
 
शरद जायसवाल ने कहा कि काला धन के बंटवारे के लिए चचा-भतीजे की लड़ाई में शामिल होने आए प्रदेश भर के सपाई गुंडों की तो ‘मित्र पुलिस’ दामादों की तरह सेवा करती है लेकिन अपने वाजिब हक की मांग करने वाले शिक्षकों को पीट कर मार डालती है।
 
रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि सूबे में जिस तरह से लोकतांत्रिक आवाजों पर अखिलेश का पुलिसिया हमला बढ़ रहा है, वह साफ करता है कि वह ऐसी आवाजों को दबाकर नाइंसाफी की हकीकत पर परदा डालने की कोशिश कर रहे हंै। उन्होंने कहा कि राजधानी जेसे संवेदनशील जगहों पर आपराधिक प्रवित्ति वाले पुलिस अधिकारियों को तैनात कर अखिलेश की सरपरस्ती में ऐसी क्रूरतम कारवाइयां हो रही हैं। मंच प्रवक्ता ने कहा कि फर्जी विकास की राजनीति हर वक्त हिंसात्मक होती है जिसका मोदी उदाहरण हैं और अखिलेश भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं। तारिक शफीक ने कहा कि विधानसभा पर इंसाफ की गुहार करती गरीब आम जनता पर सिर्फ इसलिए पुलिसिया हमले किए जा रहे हैं ताकि गंजिंग करती टाइल्स मार्का जनता शोषितों के शोषण की इन सच्चाइयों को न जान पाए। उन्होंने अखिलेश से सवाल किया कि आम गरीब जिस तरह के हालात में हैं वह उनसे इंसाफ की मांग नहीं करेंगे तो क्या सिर्फ मैट्रो और हाइवे देखकर अपना पेट भरेगें?
 
द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता रिहाई मंच
9415254919

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यूपी का महाभ्रष्ट मंत्री गायत्री प्रजापति आजकल मुलायम और अखिलेश दोनों की आंखों का तारा-दुलारा हो गया है!

Yashwant Singh : दिन रात नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिख-लिख के इस शख्स को पीएम बनवा चुके सेकुलर / कामरेड / दलित / पिछड़े / मुस्लिम किस्म के भाइयों-बहनों से अनुरोध करूंगा कि कभी-कभी अपने ‘घर-परिवार’ यानि सपा-बसपा की कारस्तानी पर भी कलम चला लिया करें. उत्तर प्रदेश का महाभ्रष्ट मंत्री गायत्री प्रजापति आजकल मुलायम और अखिलेश की आंखों का तारा दुलारा हो गया है. बरेली में मंच पर भाषण दे रहे नेताजी मुलायम सिंह यादव अपनी बात सीएम अखिलेश यादव तक पहुंचाने के लिए बार बार गायत्री प्रजापति को निरखते-संबोधित करते रहे.

उफ्फफ… इस अदा पर कौन न मर जाए. दिन रात समाजवाद की दुहाई देने वाले ये बाप-बेटे असल में जंगलराज के प्रवर्तक हैं. बाप भदेस टाइप का जंगलराज चलाता था तो बेटा थोड़ा साफिस्टिकेटेड तरीके से चला रहा है. जनता के अरबों रुपये लुटा कर दिन रात अखबारों चैनलों विज्ञापन चलवा देख कर ये बाप बेटे आपस में ही यूपी को उत्तम प्रदेश घोषित करते हुए तालियां पीट कर एक दूजे की पीठ थपथपा लिया करते हैं.

जानने वाले जानते हैं कि गायत्री तो बहाना है, असल में यूपी में उगाही / करप्शन की सारी नदियां वाया गायत्री एंड अदर दरअसल यादव खानदान के समुद्र में ही विलीन होती हैं. कुछ लैपटाप बांटकर, कुछ सड़क बनाकर, कुछ घोषणाएं करके ये टीपू मान चुका है कि उससे बड़ा विकास पुरुष कोई न हुआ है न होगा. और धन्य हैं इसके पेड हरकारे जो इसकी हर अदा पर वाह वाह कहते लिखते गाते रहते हैं और बदले में भ्रष्टाचार के संगम से कुछ सीपियां चुन लाते हैं.

इन कथित समाजवादियों से तो लाख गुना अच्छी थीं जयललिता जिन्होंने गरीबों के लिए जीना, खाना, पढ़ना, इलाज कराना, इलाज कराना, शादी करना… सब कुछ लगभग फ्री कर दिया था. सच्ची समाजवादी तो जयललिता को कहना चाहिए, भले ही वो ब्राह्मण खानदान में पैदा हुईं.

जाति की राजनीति करने वालों को धर्म की राजनीति करने वालों का विरोध करने का कोई नैतिक हक नहीं है. सबसे पहले आप आज के समय का मनुष्य बनिए, तार्किक होइए, वैज्ञानिक सोच से लैस होइए, जाति-धर्म से उपर उठिए, अपने संस्कार-सोच को अपग्रेड कर माडर्न बनाइए, जो गलत हो तो उसे गलत कहने का साहस रखिए.

सेलेक्टिव होकर, चूजी होकर, एजेंडा लेकर आलोचना करते रहना असल में एक किस्म का फीसावाद ही है. उनका धर्म और झूठ आज देश को आतंकित किए है तो आपका जातिवाद और जंगलराज प्रदेश को चिरकुट किस्म का बनाए है.

फिलहाल तो आज मुलायम और अखिलेश को शेम शेम कहने का दिल कह रहा है क्योंकि भ्रष्टाचारियों, अपराधियों, लुटेरों को गले लगाए बाप-बेटा जब लोकतंत्र, जनता व समाजवाद की बात करते हैं तो उत्तर प्रदेश के साथ इनका छल, झूठ और दगा खुद-ब-खुद सार्वजनिक हो जाता है व इनके प्रति भी एक नफरत का भाव पैदा हो जाता है, वैसे ही जैसे धर्म के कारोबार से अंधविश्वास /  नफरत / अज्ञान / दलाली  फैला कर जनविरोधी राज चलाने वाले सवर्ण सामंती मानसिकता के नेताओं के प्रति होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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सरहद की रक्षा करने वाला फौजी और उसके परिजन यूपी में सुरक्षित नहीं (देखें वीडियो)

यूपी में जंगलराज का आलम ये है कि सेना का एक जांबाज़ जवान यूपी पुलिस से न्याय की मांग कर रहा है और पुलिस कान में तेल डाले सोई है. आगरा के रहने वाले फौजी के घर हुई थी चोरी, लेकिन पुलिस ने अब तक नहीं की कोई कार्रवाही. पीड़ित सैनिक काट रहा है थानों चौकियों के चक्कर. जम्मू-कश्मीर में तैनात अरविन्द कुमार पिछले बीस वर्षों से भारत माता की हिफाज़त बॉर्डर पर खड़े होकर कर रहा है. रविन्द्र के कंधे पर देश की इज्जत और हिफाज़त की जिम्मेदारी है, लेकिन उसका खुद का घर असुरक्षित है.

आगरा के थाना एत्मादौला क्षेत्र अंतर्गत गायत्री विहार कॉलोनी निवासी अरविन्द कुमार सेना के घर में उनकी पत्नी और माँ रहती हैं. कुछ दिन पूर्व उसके घर कुछ बदमाशों ने धावा बोल दिया और लाखों के जेवरात और नकदी पार कर ले गए. इसकी जानकारी जब अरिवन्द को दी गई तो वह आगरा दौड़ा चला आया. वह शिकायत करने थाने पहुँचा. उसका आरोप है कि पहले तो पुलिस उसकी चोरी की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए तैयार ही नहीं थी. जैसे तैसे उसकी एफआईआर दर्ज की, लेकिन अब तक न तो चोरों को गिरफ्तार किया गया है और न उसकी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाही की गई.

अरविन्द इस सिलसिले में आगरा डीएम से भी मिल चुके है लेकिन वह भी आश्वासन देकर भगा देते हैं. फौजी अरविंद ने कहा जब भारत देश में सैनिक का घर सुरक्षित नहीं हो सकता है तो आमजन कैसे सुरक्षित रह सकता है. उसका कहना है आगरा पुलिस से उसको कोई उम्मीद नहीं है. अब उसका पुलिस से विश्वास उठ गया है. वीडियो देखने के लिए इन लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/pZp37521XN8

https://youtu.be/7RVu1Rv2Njo

आगरा से फरहान खान की रिपोर्ट.

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दरोगा ने किशोर बच्चों की लाशों पर पैर रखकर किया पंचनामा (देखें वीडियो)

चंदौली : गुंडे दरोगा की पूरी तस्वीर देखिए। चंदौली के सकलडीहा थाने का यह दरोगा किशोर बच्चों की लाशों पर पैर रखकर कर रहा है पंचनामा। शुक्रवार को तड़के कोहरे में ट्रेन की चपेट में आकर थे कट गए थे सकलडीहा क्षेत्र के तीन किशोर। मानवीयता को तार-तार करता मनबढ़ दरोगा। खाकी वर्दी पर लगा दाग, मगर चंदौली के एसपी ने अभी तक नहीं की कोई कार्रवाई।

बनारस के पत्रकार विजय विनीत ने बताया कि इस असंवेदनशील और अमानवीय दरोगा को तत्काल बर्खास्त कर देना चाहिए ताकि दूसरे पुलिस वाले पार्थिव शरीरों के साथ ऐसी हरकत न कर सकें.

देखें वीडियो : https://youtu.be/BMPPX1_V5OY

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ये दरोगा है या गली छाप गुंडा, देखें वीडियो

ताजनगरी आगरा में एक दबंग दरोगा की दादागिरी का वीडियो वायरल हुआ है। नोटबंदी के बाद बैंको और एटीएम के बाहर पैसा निकालने-बदलने के लिए लोगों की अच्छी खासी भीड़ देखी जा रही है। ताजगंज इलाके में एचडीएफसी बैंक के बाहर भीड़ लगी हुई थी तभी एक दबंग दरोगा बैंक के गेट पर पहुँच कर जबरन लाइन में लग गया। इस पर वहां घंटों से लाइन में लग रहे लोगों ने विरोध किया तो दबंग दरोगा खाकी की हनक दिखाने लगा.

दरोगा एक व्यक्ति पर खाकी की दादागिरी दिखाते हुए उस पर हावी हो गया. भद्दी-भद्दी गालियां देने लगा. इस पर दूसरे लोगों ने भी आवाज उठाते हुए दरोगा का विरोध किया तो दबंग दरोगा ने न सिर्फ गालियां दी बल्कि मारपीट शुरू कर दी. दरोगा ने सर्विस रिवाल्वर भी निकालने का प्रयास किया. इस दौरान सुरक्षा में तैनात वहाँ मौजूद सिपाही दबंग दरोगा की दादागिरी मूक दर्शक बन देखते रहे. जब बात बढ़ने लगी तो पुलिस वाले दरोगा को ले जाने लगे. लेकिन दरोगा की दबंगई सातवें आसमान पर नजर आ रही थी. बाद में बमुश्किल दरोगा को सिपाही समझा बुझाकर अपने साथ ले गया.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/qdNil9XD_To

आगरा से फरहान खान की रिपोर्ट.

इस वीडियो को भी देखिए…

नोटबंदी से खुश इस बनारसी महिला की बातें सुनिए

https://youtu.be/pbTcDjPZadA

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उफ्फ!!! यूपी में इसलिए भी दे दिया जाता है अमिताभ ठाकुर को कारण बताओ नोटिस

उत्तर प्रदेश सरकार ने आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर को एक और कारण बताओ नोटिस भेजा है. यह नोटिस 13 जुलाई 2015 को उनके निलंबित होने के बाद जनता के लोगों द्वारा भेजे गए प्रत्यावेदनों के सम्बन्ध में है. नोटिस में 13 से 21 जुलाई 2015 बीच प्रधानमंत्री और गृह मंत्री, भारत सरकार को आये 09 प्रत्यावेदनों का उल्लेख किया गया है जिनमे अमिताभ के निलंबन के बाद लोगों द्वारा अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए उनकी सुरक्षा और न्याय की मांग की थी.

इनमें 02 प्रत्यावेदन यूएसए, 02 कर्नाटक और बाकी अन्य राज्य के लोगों के थे. इनमें मुख्य रूप से यह कहा गया था कि अमिताभ और उनका परिवार सत्तारूढ़ पार्टी के प्रधान से भयभीत है, उनके उत्पीड़न को रोका जाये और उनके प्राणों की रक्षा की जाये. भारत सरकार ने ये प्रत्यावेदन राज्य सरकार को अगस्त 2015 में भेजे थे जिनपर अब राज्य सरकार ने संज्ञान लेते हुए इसे अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली के नियम 18 में बाहरी दवाब और पेशबंदी बताते हुए अमिताभ को आचरण नियमावली का उल्लंघन का दोषी मानते हुए उनसे स्पष्टीकरण माँगा गया है.

Notice issued on public uproar

The Uttar Pradesh Government has issued another show cause notice to IPS officer Amitabh Thakur. The notice is as regards the various representations sent by people after his suspension on 13 July 2015. The notice mentions 09 such representations received by the Prime Minister and the Union Home Minister office between 13 to 21 July 2015, where these people expressed their resentment to Amitabh’s suspension and sought justice and security for him. Of these 02 representations came from USA, 02 from Karnataka and the rest from other States.

They primarily said that Amitabh and his family are being terrorized by the Samajwadi Party Chief, hence their persecution must be stopped and their lives must be saved. The Central government sent these representations to the UP Government in August 2015. The State government has taken cognizance of now and has called it an illegal attempt by Amitabh to create external pressure on his service matter, calling it the violation of Rule 18 of the All India Services Conduct Rules and seeking his explanation within 15 days.

Attached- Copy of Show cause notice

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यूपी के जंगलराज में छेड़छाड़ से डरी रेडियो जॉकी ने लाइव प्रोग्राम में इस्तीफे का ऐलान किया

यूपी के जंगलराज में महिलाएं किस कदर असुरक्षित हैं, इसका वाकया इलाहाबाद में देखने को मिला जब मनचलों ने रेडियो जाकी को सरेआम पॉश इलाके की सड़क पर छेड़ा. घटना से डरी आरजे ने रेडियो पर लाइव कार्यक्रम के दौरान ही इस्तीफा देने की घोषणा कर दी. इलाहाबाद में छेड़खानी और मनचलों से परेशान 93.5 एफएम की आरजे निधि के प्रोग्राम में लाइव ही इस्तीफा देने से हड़कंप मच गया. बाद में लोगों की अपील पर आरजे ने फैसला बदला और नौकरी जारी रखने की जानकारी अपने एफबी पेज पर अपडेट की है.

आरजे निधि 93.5 रेड एफएम में काम करती हैं. तीन दिन पहले घर लौटते समय बाइक सवार तीन मनचलों ने निधि को जबरन रोककर छेड़खानी की. घटना हाईकोर्ट के नजदीक सिविल लाइंस और महिला पुलिस स्टेशन से महज सौ मीटर की दूरी पर हुई. लड़कों ने भद्दे व अश्लील कमेंट्स किए. बाद में उन्होंने शोर मचाकर मनचलों को भागने पर मजबूर किया. निधि ने किसी तरह से खुद को गुंडों से बचाया. घटना के बाद वो काफी डर गयीं. दहशत में लाइव शो के दौरान नौकरी छोड़ने का ऐलान कर दिया. वह बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं.

रेडियो जॉकी ने शो के दौरान कहा, “मैं अब शो नहीं करना चाहती और शायद आज का यू- टर्न आखिरी यू-टर्न होगा इसके बाद आप मुझे नहीं सुन पाएंगे रेडियो पर, क्योंकि मेरा शो 5 से 9 होता है मुझे रात को घर वापस जाना होता है और जब मैं सेफ फील नहीं करती हूं, वो मुझे तोड़ रही है, अंदर से मैं नहीं करना चाहती.”

इस ऐलान के तुरंत बाद पूरे इलाहाबाद में हड़कंप मच गया. लाइव शो में ही डीएम ने खुद फोन कर उनसे बात की और कहा कि वह उनकी बहादुरी की प्रशंसा करते हैं लेकिन उन्हें नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए. इसके बाद तमाम लोगों ने आरजे के शो में फोन कर उनसे नौकरी नहीं छोड़ने की अपील की. अब आरजे मान गईं हैं. आरजे ने महिला थाने में इस घटना की लिखित शिकायत भी की है. तीन दिन बीतने के बाद भी नाकारा इलाहाबाद पुलिस किसी को पकड़ नहीं पाई है.

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