अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को गंदा देश घोषित कर दिया!

-शीतल पी सिंह-

Filthy! ये क्या होता है?

साहेब के पक्के दोस टरम्प साब ने कहा है कि India/भारत एक फिल्थी देश है । अमेरिका में चुनाव चल रहे हैं इसलिये टरम्प तुरप के हर पत्ते को फड़ पर फेंक रहे हैं।

इन्हीं टरम्प साहेब के इसी फ़रवरी में देश में स्वागत समारोह करने के चलते हमारे साहेब ने देश में कोरोना आयात कर लिया था वरना दूसरे देशों की तरह हवाई अड्डे से ही जाँच होती तो हवाई यात्री कोरोना एयरपोर्ट पर ही धर दबोचा जाता।

टरम्प साहेब से दोस्ती ख़रीदने के लिये हमने अपने सूखते ख़ज़ाने से खुरच कर उनको हर बार नज़राना दिया और लड़ाई की मंहगी मंहगी मशीनें ख़रीदीं । उनका प्रचार करने के लिये उनके देश में जाकर साहेब ने हमारे गरीब देश के पैसे ख़र्च कर रैली की ।

पर टरम्प टरम्प हैं जब मुँह खोलते हैं तो सामने वाले की औक़ात खोलने से नहीं चूकते क्योंकि वो ट्रंप हैं यह बात हमारे एंटायर पालिटिकल साइंस में एम ए नहीं समझते !

साहेब ने चीन के “शी” साब के स्वागत में भी कितने पापड़ बेले थे , साबरमती के घाट पर झूला डाला था । पौन दर्जन बार उनसे देस विदेश में भेंटअंकवार का रिकार्ड भी बनाया पर “शी” लद्दाख में “ही” बनने में लगे पड़े हैं ।

दरअसल एंटायर पालिटिकल साइंस की अमदावादी डिग्री में अंतराष्ट्रीय राजनय का चैप्टर किसी हलवाई का लिखा हुआ लगता है जो झप्पियाँ डालने और हथियार ख़रीदने भर को राजनय समझता है !

देखते हैं टरम्प के फ़ोटू की आरती उतार चुकी साहेब की देशभक्त सोशल मीडिया ट्रोल सेना देश की इस खुली फ़ज़ीहत पर ट्रंप का बायकाट काल कब निकालती है या मौन धारण रखती है?


-यूसुफ किरमानी-

मोदी के दोस्त इतने घटिया निकलेंगे, इसकी उम्मीद नहीं थी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने आज वहां चल रही डिबेट में भारत, रूस और चीन को “गंदा” (Filthy) कहा। वो बोला कि वहाँ की हवा भी गंदी है। तो भैया जब यहाँ की हवा इतनी ही गंदी है तो यहाँ आप नमस्ते ट्रंप में आये ही क्यों थे?

हमें चीन और रूस से मतलब नहीं है। लेकिन भारत को गंदा कहने का मतलब है कि यहाँ के बहुसंख्यक लोग गंदे हैं। इसमें विदेशी आक्रमणकारी और उनके साथ यहाँ आकर बस गए लोग शामिल नहीं हैं। ….

बताइए आप लोगों की गंदगी पर ट्रंप ने मुहर लगा दी है। अब अमेरिकी राष्ट्रपति और ऊपर से मोदी का दोस्त…बात सही ही होगी।

क्या आपको इसमें भारत का कोई अपमान दिखता है? मुझे तो नहीं दिखता। जब हम लोग प्याज सौ रूपये किलो और हरा धनिया तीन सौ रूपये किलो ख़रीदकर खाने को तैयार हैं तो ऐसा छोटा मोटा अपमान गया तेल लेने। …मोदी के दोस्त ने कहा है। उसका सर्टिफ़िकेट सिर माथे पर।

हाउडी मोदी…नमस्ते ट्रंप…

अंग्रेज़ी मीडिया और अंग्रेज़ी वाले पत्रकार ट्रंप के बयान का समर्थन करेंगे और हिन्दी के दरिद्रनारायण पत्रकार इसे भारत का अपमान बतायेंगे। आज का एजेंडा सेट है।


-प्रकाश के रे-

ट्रम्प-बाइडेन डिबेट, भारत और भारत-अमेरिका संबंध पर एक संक्षिप्त टिप्पणी

राष्ट्रपति ट्रम्प चाहे जितनी ग़लतबयानी करते हों, झूठ बोलते हों, भारत की दूषित हवा के बारे में चुनावी डिबेट में उन्होंने जो कहा है, वह सही है. वायु प्रदूषण हमारे देश में मौतों की पहली वजह है. पिछले साल वायु प्रदूषण से पैदा हुईं बीमारियों 16 लाख लोग भारतीयों की मौत हुई थी. ताज़ा रिपोर्ट में बताया गया है कि मरनेवालों में 1.16 लाख नवजात शिशु थे, जिनमें से करीब 64 फीसदी की मौत घर के भीतर के प्रदूषण से हुई थी. बाहर की हवा की हालत यह है कि 2010 से 2019 तक हमारे देश में पीएम 2.5 की मात्रा 61 प्रतिशत बढ़ी है, जो आधे से अधिक मौतों का कारण है.

बहरहाल, आज की चुनावी डिबेट बेहद निराशाजनक रही. साफ़ दिख रहा है कि फ़र्स्ट और फ़्री वर्ल्ड के नेता होने का दावा करनेवाले अमेरिका का राजनीतिक नेतृत्व- इसमें दोनों नेता शामिल हैं- बुरी तरह थका, अनैतिक, घाघ और भ्रष्ट है. अमेरिकी साम्राज्य प्राचीन रोमन साम्राज्य के पतित दौर की तरह दिख रहा है. भाषा हो, नीतियाँ हों, प्रासंगिकता हो, किसी भी आधार पर नेताओं और उनकी सोच में आकर्षण नहीं बचा है. उनके पास अपनी जनता और दुनिया को देने के लिए कुछ नहीं है.

ख़ैर, यह भी अजीब सी बात है कि जब साफ़ दिख रहा है कि डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव हार रहे हैं और जनवरी में बाइडेन के नाम पर कमला हैरिस प्रशासन सत्ता संभालेगा, तो भारत फिर अगले सप्ताह अमेरिका के साथ एक अहम सुरक्षा समझौता करने की हड़बड़ी में क्यों है, और उस समझौते में ऐसा क्या ख़ास है कि दो वरिष्ठ अमेरिकी मंत्री इस महीने के आख़िरी हफ़्ते में भारत आ रहे हैं! मान लें कि ट्रम्प जीत भी जाएँ, तो कुछ दिन रुकने में क्या परेशानी थी? अगर यह समझौता इतना ही ज़रूरी है, तो फिर चुनाव का बहाना बनाकर अमेरिका के साथ व्यापार समझौता क्यों स्थगित कर दिया गया था? यह जो सुरक्षा समझौता है, यह भारत को अमेरिका का पिछलग्गू बनाने की दिशा में एक और पहल है. लेकिन, किसको पड़ी है! अब तो यह चलन ही बंद हो गया है कि सुरक्षा और विदेश नीति पर सवाल उठाए जाएँ या बहस हो, न विपक्ष करता है और न ही कथित एक्सपर्ट (कुछ अपवादों को छोड़कर).


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