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उत्तर प्रदेश

जिले में ‘मान्यता प्राप्त पत्रकार’ कौन है; अब सभासद/प्रधान तय करेंगे!

सीतापुर। पत्रकारिता की दुनिया में आमतौर पर यह माना जाता है कि किसी पत्रकार की वरिष्ठता और पहचान का फैसला उसका काम, अनुभव और संस्थान करते हैं। लेकिन सीतापुर में इसका उल्टा मॉडल सामने आया है, जहां अब मान्यता प्राप्त पत्रकार कौन है, यह तय करने का अधिकार संपादकों/ आलाधिकारियों से छीनकर सीधे सभासद और प्रधान के हाथों में सौंप दिया गया है।

जिले में पत्रकारों की मान्यता जांच को लेकर जारी एक व्हाट्सऐप संदेश के मुताबिक, मान्यता प्राप्त पत्रकारों से आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, शपथ पत्र, संस्थान का आईडी कार्ड, समाचार प्रति के साथ-साथ अब सभासद या ग्राम प्रधान का लेटर भी अनिवार्य कर दिया गया है। यानी पत्रकार होने का प्रमाण अब पत्रकारिता से नहीं, बल्कि स्थानीय जनप्रतिनिधि की सिफारिश से तय होगा।

इस नई व्यवस्था ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या अब रिपोर्टर की पहचान न्यूज़ डेस्क नहीं, बल्कि राजनीतिक सर्टिफिकेट तय करेगा? क्या पत्रकारिता की मान्यता अब संपादकीय मानकों की बजाय स्थानीय सत्ता के अनुमोदन पर निर्भर होगी?

वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि यह व्यवस्था न सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पेशेवर गरिमा पर सीधा हमला भी है। अगर किसी पत्रकार को अब मान्यता के लिए सभासद या प्रधान के चक्कर लगाने पड़ें, तो साफ है कि निष्पक्ष रिपोर्टिंग की जगह सिफारिश और दबाव की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा।

सीतापुर का यह मामला दिखाता है कि कैसे धीरे-धीरे पत्रकारिता को एक स्वतंत्र पेशे से हटाकर प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण के दायरे में लाने की कोशिश की जा रही है — जहां पहचान कलम से नहीं, बल्कि लेटरहेड से तय होगी।


वरिष्ठ पत्रकार कौन है, ये अब संपादक नहीं तय करेंगे… ये अधिकार सभासद/प्रधान के पास चला गया है। अद्भुत व्यवस्था! इस पोस्ट में किसे टैग करें…और फ़ायदा भी क्या है। आदेश ही ऊपर से आया है। -आशुतोष त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार

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