विनोद खन्ना भगवान रजनीश की ‘शरण’ में गए तो फिर दस साल बाद ही लौट सके

विनोद खन्ना स्टार थे। वे सुपरस्टार कभी माने नहीं गए, लेकिन हमारे सिनेमा के संसार के इतने बड़े सुपरस्टार रहे हैं, कि बहुतों को चमकने-चमकाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। विनोद खन्ना ऐसे एक स्टार रहे, जिनका कभी कोई अपना युग नहीं रहा।  लेकिन सिनेमा की दुनिया में उनके आने और छा जाने के बाद कोई भी सुपरस्टार ऐसा नहीं रहा, जिसकी सफलता में विनोद खन्ना का वजूद नहीं रहा हो। सन 1971 में विवाह करना, फिर दो पुत्रों का पिता बन जाने के बाद सिर्फ चार साल बाद ही सन 1975 में उस जमाने के भगवान रजनीश की ‘शरण’ में खुद को सौंप देना उनके जीवन की अहम घटनाएं रहीं। लेकिन ठीक 10 साल तक अंतर्मन को टटोलने के बाद  लौटकर फिर सिनेमा के संसार में आ जाना, कविता दफ्तरी से दूसरा विवाह करना, उसके बाद कई सारी फिल्मों में जमकर काम करने के बाद राजनीति में चले जाना।

पंजाब के गुरदासपुर से सांसद होने के बाद केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में मंत्री बनना उनके जीवन की बेहतरीन घटनाएं रहीं। बेहद मेहनती, जबरदस्त हिम्मतवान और गजब के कलाकार विनोद खन्ना  के बारे में सही कहें, तो उनके अभिनय को वैसी सराहना अंत तक नहीं मिली, जिसके वे असली हकदार थे। ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि विनोद खन्ना असल में सिर्फ कलाकार थे। दुनियादार इंसान नहीं थे। विनोद खन्ना को अपनी कला को पेश करने के अलबेले अंदाज तो आते थे, लेकिन उसे पेश करने के बाद लगातार किए हुए काम को चमकाते रहने की कलाबाजियां नहीं आती थी। सही कहा जाए तो वे कलाकार थे, दुनियादारी जानते नहीं थे। जानते होते, तो सुपर से भी ऊपर के स्टार होते। लेकिन फिर भी, अब जब वे चले गए हैं, तो इतना सच तो कहने की छूट ली ही जा सकती है कि विनोद खन्ना के बिना किसी सुपरस्टार का स्टारडम निखरकर सामने आना संभव नहीं था।

दरअसल विनोद खन्ना अपने जमाने के बेहद हैंडसम कलाकार थे और उनके अभिनय का अपना अलग संसार था। विनोद खन्ना ने जब अमिताभ बच्चन के साथ ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में काम किया तो वकील साहब के उनके किरदार ने अमिताभ के सिकंदर के किरदार को कालजयी बना दिया। भले ही आज दुनिया ‘मुकद्दर का सिकंदर’ को अमिताभ बच्चन की फिल्म के रूप में याद करते हैं। लेकिन ‘वकील साहब’ से उनकी दिलदार दोस्ती के बिना ‘सिकंदर’ के किरदार को दर्शकों के दिलों की गहराइयों में उतर जाने की हम कल्पना नहीं कर सकते। इसी तरह ‘अमर अकबर एंथनी’ में ‘एंथनी’ बने अमिताभ का भी’अमर’ के बिना उतना सफल होना संभव नहीं था। शत्रुघ्न सिन्हा के साथ आई इनकी फिल्म ‘मेरे अपने’ में ‘छेनू’ बने शत्रुघ्न सिन्हा के सामने ‘श्याम’ के किरदार में विनोद खन्ना भुलाए नहीं भूलते। इसी तरह ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘कच्चे धागे’, ‘बंटवारा’, ‘क्षत्रिय’ में निभाए उनके किरदार भी हमेशा याद रहने वाले हैं।

किसी डाकू और ठाकुर के किरदारों को जिस तरह से उन्होंने जीवंत किया, उतना कोई और कर ही नहीं सका। भरोसा नहीं हो तो उनकी ‘मेरा गांव मेरा देश’ में उनका किरदार देख लीजिए। देश के सबसे खूबसूरत सितारों में सबसे ज्यादा चमकनेवाले सितारे के रूप में बी विनोद खन्ना को याद किया जाएगा। उन्होंने ‘हेराफेरी’, ‘परवरिश’ और ‘खून पसीना’ में अमिताभ बच्चन के साथ, ‘कुर्बानी’ और ‘दयावान’ जैसी सुपरहिट फिल्मों में फिरोज़ खान के साथ, ‘चांदनी’ में ऋषि कपूर के साथ और ‘द बर्निंग ट्रेन’ में अपने समय के कई स्टारों के साथ काम किया। लेकिन हर फिल्म में उनके किरदार किसी भी अन्य कलाकार से किसी भी मायने में कम नहीं थे। दरअसल, हमारे सिनेमा के संसार मे बहुत कम कलाकार ऐसे हैं, जिनमें विनोद खन्ना जितना दूसरों को दमदार बनाने का दम हो। ज्यादा साफ साफ कहें, तो विनोद खन्ना के एक स्टार होने का मतलब ही यही था कि वे किसी दूसरे को सुपरस्टार बना रहे होते थे। 

लेखक निरंजन परिहार मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक हैं.



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