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सुख-दुख

पटना के दो पत्रकारों वीरेंद्र यादव व नवल किशोर के बारे में

मेरे दो मित्र… बहुत समय से मन है कि पटना के दो पत्रकार मित्रों की अद्वितीय प्रतिभा और भयंकर जीवन संघर्ष और बारे में विस्‍तार से लिखूं। हिंदी में इस तरह के लेखन की समृद्ध परंपरा रही है। लेखकों के अपनी साथियों पर अनेक प्रशंसात्‍मक संस्‍मरण, रेखाचित्र आदि लिखें हैं, जिनसे आज हमें उन्‍हें समझने में मदद मिलती है। राजेंद्र यादव, कमलेश्‍वर और मोहन राकेश द्वारा एक दूसरे पर लिखे संस्‍मरण भी इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। लेकिन राजेंद्र जी ने हंस के पन्‍नों पर बाद के बर्षों में जो संस्‍मरण लिखे और लिखवाये वे किसी न किसी को ध्‍वस्‍त करने के लिए थे। उनहें साबित करना था कि ‘वे देवता नहीं है’।

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मेरे दो मित्र… बहुत समय से मन है कि पटना के दो पत्रकार मित्रों की अद्वितीय प्रतिभा और भयंकर जीवन संघर्ष और बारे में विस्‍तार से लिखूं। हिंदी में इस तरह के लेखन की समृद्ध परंपरा रही है। लेखकों के अपनी साथियों पर अनेक प्रशंसात्‍मक संस्‍मरण, रेखाचित्र आदि लिखें हैं, जिनसे आज हमें उन्‍हें समझने में मदद मिलती है। राजेंद्र यादव, कमलेश्‍वर और मोहन राकेश द्वारा एक दूसरे पर लिखे संस्‍मरण भी इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। लेकिन राजेंद्र जी ने हंस के पन्‍नों पर बाद के बर्षों में जो संस्‍मरण लिखे और लिखवाये वे किसी न किसी को ध्‍वस्‍त करने के लिए थे। उनहें साबित करना था कि ‘वे देवता नहीं है’।

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बहरहाल, पटना में रह रहे मेरे वे दो दोस्‍त – बीरेंद्र यादव और नवकिशोर कुमार- भी देवता नहीं हैं। लेकिन विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों के अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इन जैसी कर्मठता और पत्रकारिता की अंत‍दृष्टि विरल ही है। खबरों को लेकर नवल किशोर की प्रश्‍नाकुलता ऐसी होती है, जैसे वह उनके लिए जीवन मरण का प्रश्‍न हो। जबकि बीरेंद्र यादव की रूचि खबरों के पीछे झांकने में होती हैं।

बीरेंद्र पटना राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिष्‍ठानों पर अपनी छोटी सी टिप्‍पणी से ऐसी निगाह डालते हैं कि पाठक के सामने सबकुछ एक जीवंत दृश्‍य की तरह खुलता जाता है। प्रवाहमान भाषा और ऐसी अंतदृष्टि विरल ही होती है। मैं उन्‍हें हिंदी का युवा पी साईनाथ कहना चाहता हूं।

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बीरेंद्र प्रभात ख्‍बर, हिंदुस्‍तान समेत कई अखबारों में रहे। मुखिया का चुनाव भी लडा और उस अनुभव पर एक किताब भी लिखी। वह किताब प्रकाशित नहीं हुई लेकिन बीरेंद्र ने उसे इंटरनेट पर धारावाहिक जारी किया है। उसे पढते हुए यह ख्‍याल आता है कि ऐसे कितने पत्रकार हैं जो अपने लेखन के लिए जमीनी अनुभव की तलाश में अपनी लगी-लगाई नौकरी छोडने की हिम्‍मत कर रखते हों। वे आजकल एक चार पन्‍ने का अखबार निकालते हैं ‘बीरेंद्र यादव न्‍यूज’ और उसे अपनी साइकिल पर घूमते हुए रिपोर्टिंग करते हुए बांटते भी चलते हैं। पटना के पत्रकारों की करोडों की संपत्ति और कारों के बीच उनकी साइकिल हीरे सी दमकती है।

और नवल? नवल के साथ होने का मतलब है कि वे आप पर निरंतर स्‍टोरी आइडिया की बमबारी करते रहेंगे। वे अकेले रोज इतना लिखते हैं कि हैरत होती है। वे पटना दैनिक तरू भारत में काम करते हैं। ‘अपना बिहार’ नाम से एक वेब पोर्टल चलाते हैं। आइबीएन 7 के वेबपोर्टल के लिए लिखते हैं। ये तो इनके नियमित काम हैं। इसके आलवा अन्‍य वेब पोर्टलों, पत्र-पत्रिकाओं के लिए वे भी लगभग रोजना ही लिखते हैं। मुझे लगता है कि वे रोज कम से कम चार लेख तो लिखते ही होंगे। वैसे मेरा यह अनुमान मात्र है। हो सकता है इतनी कम संख्‍या बताने के लिए नवल इसका खंडन भी जारी कर दें और बताएं कि उनके रोजाना के लेखों की संख्‍या मेरे अनुमान से कम से कम दुगनी है।

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नवल के बारे में आज की ही घटना बताता हूं। रात ठीक 2 बजे उनका फोन आया था। उनका इरादा शायद छोटा सा मिस्‍ड कॉल करने का रहा होगा कि अगर मैं जाग रहा होऊं तो उन्‍हें फोन कर लूं। खैर, बात हुई और चुंकि लंबे समय बाद हम फुरसत में बतिया रहे थे इसलिए लगभग एक घंटा तक बतियाते रहे। अब इतनी विचारोत्‍तेजक बात के बाद नींद आने में कोई आधा घंटा तो लगा ही होगा। यानी, सुबह 3.30 बजे मैं सोया होऊ्गा। नवल कितने बजे सोये, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन सुबह 8.30 फिर उनके कॉल से मेरी नींद खुली। गहरी नींद में था, इसलिए स्‍वाभाविक कोफ्त हुई और मैंने फोन नहीं उठाया। ले‍किन नींद तो खुल ही चुकी थी। लेटे-लेटे ही मोबाइल पर पर ईमेल चेक किया तो पाया कि उन्‍होंने वह लेख भेज दिया है, जिसका वादा उन्‍होंने रात दो बजे की बातचीत में किया था। वे कब सोये और कब जगे?

जगने के बाद से ही मैं लगतार नवल के बारे में सोच रहा हूं। अभी सुबह के 9.30 बजे हैं। नवल दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे होंगे, या अपनी मोटरबाइक पर किसी खबर के पीछे निकल चुके होंगे। वे पटना के बाहरी इलाके दीघा अपने बीमार माता पिता और तीन बच्‍चों के साथ रहते हैं। उन्‍हें रोज एक लंबा सफर करना पडता है। रात लग्‍भग 10 बजे वे घर लौटते होंगे।

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सोच रहा हूं‍ कि कब उन्‍हें फोन करके बताऊं, मैंने उनका लेख पढ लिया है और वह बहुत अच्‍छा है। उन्‍हें फोन करके के‍ लिए कौन सा समय मुफीद रहेगा?

इसे खुशकिस्‍मती ही मानता हूं कि इन दोनों मित्रों के साथ काम करने का अवसर मुझे उपलब्‍ध हुआ। बीरेंद्र तो आज भी फारवर्ड प्रेस के कार्यकारी बिहार ब्‍यूरो प्रमुख हैं, जबकि नवल ने 2012-13 में लगभग एक साल तक दिल्‍ली में फारवर्ड प्रेस में रहे। फारवर्ड प्रेस के लिए नवल द्वारा ब्रह्मेश्‍वर मुखिया पर लिखी गयी कवर स्‍टोरी ‘किसकी गोलियों ने ली बिहार के कसाई की जान?’ पत्रिका की सर्वश्रेष्‍ठ स्‍टोरियों में से एक है। बीरेंद्र ने भी बिहार के समाज और राजनीति पर फारवर्ड प्रेस के लिए जिस गहन अंत‍दृष्टि से लिखा है, वह पत्रकारिता पर शोध करने वालों के लिए मूल्‍यवान सामग्री साबित हो सकती है।

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बीरेंद्र यादव और नवल किशोर के लेखन से गुजरते हुए एक सबसे बडा सवाल जो सवाल पैदा होता है वह यह है कि आखिर क्‍या कारण है कि मुख्‍यधारा की पत्रकारिता इन्‍हें खुद में समाहित नहीं रख पायी? क्‍या सिर्फ इनकी प्रतिभा और प्रचंड श्रम की आंच को न सहन कर पाने के कारण या कुछ और भी सामाजिक कारण रहे होंगे?

लेखक प्रमोद रंजन दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका फारवर्ड प्रेस के संपादक हैं. उन्होंने पटना के दो पत्रकारों वीरेंद्र यादव व नवल किशोर को लेकर अपना शब्द चित्र फेसबुक पर लिखा है.

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