पटना के दो पत्रकारों वीरेंद्र यादव व नवल किशोर के बारे में

मेरे दो मित्र… बहुत समय से मन है कि पटना के दो पत्रकार मित्रों की अद्वितीय प्रतिभा और भयंकर जीवन संघर्ष और बारे में विस्‍तार से लिखूं। हिंदी में इस तरह के लेखन की समृद्ध परंपरा रही है। लेखकों के अपनी साथियों पर अनेक प्रशंसात्‍मक संस्‍मरण, रेखाचित्र आदि लिखें हैं, जिनसे आज हमें उन्‍हें समझने में मदद मिलती है। राजेंद्र यादव, कमलेश्‍वर और मोहन राकेश द्वारा एक दूसरे पर लिखे संस्‍मरण भी इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। लेकिन राजेंद्र जी ने हंस के पन्‍नों पर बाद के बर्षों में जो संस्‍मरण लिखे और लिखवाये वे किसी न किसी को ध्‍वस्‍त करने के लिए थे। उनहें साबित करना था कि ‘वे देवता नहीं है’।

फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन से हरि नारायण की बातचीत

फारवर्ड प्रेस ने दिया वंचित बहुसंख्यकों को स्वर

अप्रैल का महीना देश के दलित बहुजन समाज के लिए मायने रखता है क्योंकि इस महीने दो महापुरुषों की जयंती पड़ती है। पहले ज्योतिबा फुले और दूसरे डॉ. बी आर आंबेडकर। बहरहाल अप्रैल 2016 हिंदी प्रदेश में रहने वाले तमाम वंचित बहुजनों के लिए निराशा का सबब बनकर आया है। फुले और आंबेडकर की विचारधारा के विभिन्न आयामों को सामने लाने वाली देश की पहले द्विभाषी पत्रिका फॉरवर्ड प्रेस जून से अपना प्रिंट संस्करण बंद करने जा रही है। अब यह प्रकाशन केवल वेब पर उपलब्ध होगा।

‘पांचजन्य’ को ‘बहुजन’ अवधारणा से चिढ़ है… बहुजन विमर्श के कारण निशाने पर है जेएनयू…

-प्रमोद रंजन-

यह जानना जरूरी है कि 1966 में भारत सरकार के एक विशेष एक्ट के तहत बना यह उच्च अध्ययन संस्थान वामपंथ का गढ़ क्यों बन सका। इसका उत्तर इसकी विशेष आरक्षण प्रणाली में है। इस विश्वविद्यालय में आरंभ से ही पिछड़े जिलों से आने वाले उम्मीदवारों, महिलाओं तथा अन्य कमजोर तबकों को नामांकन में प्राथमिकता दी जाती रही है। कश्मीरी विस्थापितों और युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों और विधवाओं को भी वरीयता मिलती है। (देखें: बॉक्स) यहां की प्रवेश परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न भी इस प्रकार के होते हैं कि उम्मीदवार के लिए सिर्फ  विषय का वस्तुनिष्ठ ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। जिसमें पर्याप्त विषयनिष्ठ ज्ञान, विश्लेषण क्षमता और तर्कशीलता हो, वही इस संस्थान में प्रवेश पा सकता है। विभिन्न विदेशी भाषाओं के स्नातक स्तरीय कोर्स इसके अपवाद जरूर हैं, लेकिन इन कोर्सों में आने वाले वे ही छात्र आगे चल कर एम. ए., एमफिल आदि में प्रवेश ले पाते हैं, जिनमें उपरोक्त क्षमता हो। इस प्रकार, वर्षों से जेएनयू आर्थिक व सामाजिक रूप से वंचित तबकों के सबसे जहीन, उर्वर मस्तिष्क के विद्यार्थियों का गढ़ रहा है। यहां के छात्रों की कमतर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि और इसे लेकर उनकी प्रश्नाकुलता, उन्हें वामपंथ के करीब ले आती है।

महिषासुर प्रसंग में ‘फारवर्ड प्रेस’ मैग्जीन की ओर से प्रेस बयान

नई दिल्‍ली। नई दिल्‍ली से प्रकाशित ‘फारवर्ड प्रेस’ भारत की प्रथम द्विभाषी (अंग्रेजी-हिंदी) मासिक ​है, जो अप्रैल, 2009 से निरंतर प्रकाशित हो रही है। फूले-आम्‍बेडकरवाद की वैचारिकी पर आधारित यह पत्रिका समाज के बहुजन तबकों में  लो‍कप्रिय है। अभी इसके लगभग 80 हजार पाठक हैं तथा यह मुख्‍य रूप से उत्‍त्‍र भारत में पढी जाती है। दक्षिण भारत के द्रविड आंदोलनों तथा देश अन्‍य हिस्‍सों में सामाजिक न्‍याय से जुडे आंदोलनों, लेखकों से बुद्धिजीवियों से भी पत्रिका का गहरा जुडाव है। इस पत्रिका का एक महत्‍वपूर्ण अवदान यह भी माना जाता कि इसने  भारत की विभिन्‍न भाषाओं के सामाजिक न्‍याय के पक्षधर बुद्धिजीवियों को एक सांझा मंच प्रदान किया है, जिससे विचारों का आदान-प्रदान तेज हुआ है। 

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुट्ठी भर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित छात्रों ने जब 25 अक्टूबर, 2011 को पहली बार ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया था, तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह दावानल की आग सिद्ध होगा। महज चार सालों में ही ये इन आयोजनों न सिर्फ देशव्यापी सामाजिक आलोड़न पैदा कर दिया है, बल्कि ये आदिवासियों, अन्य पिछडा वर्ग व दलितों के बीच सांस्कृतिक एकता का एक साझा आधार भी प्रदान कर रहे हैं।

अगर ‘चूतिया’, ‘हरामी’ और ‘हरामखोर’ जैसी गालियां इस्तेमाल करते हैं तो आप दलित-ओबीसी विरोधी हैं!

Pramod Ranjan : आप अपने विरोधियों के लिए किस प्रकार की गालियों का इस्‍तेमाल करते हैं? ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव व अनेक स्‍त्रीवादी इस मसले को उठाते रहे हैं कि अधिकांश गालियां स्‍त्री यौनांग से संबंधित हैं। पुरूष एक-दूसरे को गाली देते हैं, लेकिन वे वास्‍तव में स्‍त्री को अपमानित करते हैं। लेकिन जो इनसे बची हुई गालियां हैं, वे क्‍या हैं? ‘चूतिया’, ‘हरामी’, ‘हरामखोर’..आदि। क्‍या आप जानते हैं कि ये भारत की दलित, ओबीसी जातियों के नाम हैं या उन नामों से बनाये गये शब्‍द हैं। इनमें से अनेक मुसलमानों की जातियां हैं।

पुलिस विरोध के बावजूद कोर्ट ने फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन को जमानत दी

Pramod Ranjan : अंतत: आज कोर्ट से मुझे भी अग्रिम जमानत मिल गयी। ख्‍याल नारीवादी लेखक अरविंद जैन इस मामले में मेरे वकील हैं। उन्‍होंने बताया कि पुलिस के पक्ष ने जमानत का घनघोर विरोध किया। अरविंद जैन जी कोर्ट में ‘फारवर्ड प्रेस’ का पक्ष तो रखा ही, साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 153 A (जिसके तहत मुकदमा दर्ज किया गया है) की वैधता पर भी सवाल उठाए। यही वह धारा है, जो अभिव्‍यक्ति की आजादी पर पुलिस का पहरा बिठाती है।

‘फारवर्ड प्रेस’ कार्यालय पर पुलिस का छापा, ‘बहुजन-श्रमण परंपरा विशेषांक’ के अंक जब्‍त

फारवर्ड प्रेस कार्यालय में आज सुबह पुलिस ने छापा मारा तथा हमारा ‘बहुजन-श्रमण परंपरा विशेषांक’ (अक्‍टूबर, 2014) के अंक जब्‍त करके ले गयी। हमारे ऑफिस के ड्राइवर प्रकाश व मार्केटिंग एक्‍सक्‍यूटिव हाशिम हुसैन को भी अवैध रूप से उठा लिया गया है। मुझे भूमिगत होना पड़ा है। मैं जहा हूं, वहां मेरे होने की आशंका पुलिस को है। इस जगह के सभी गेटों पर गिरफ्तारी के लिए पुलिस तैनात कर दी गयी है। शायाद वे जितेंद्र यादव को भी गिरफ्तार करना चाहते हैं ताकि आज (9 अक्‍टूबर) रात जेएनयू में आयोजित महिषासुर दिवस को रोका जा सके। हमें अभी तक किसी भी प्रकार के एफआइअार की कॉपी भी नहीं मिल पायी है। लेकिन जाहिर है कि यह कार्रवाई ‘महिषासुर’ के संबंध में फारवर्ड प्रेस द्वारा लिये गये स्‍टैंड के कारण कार्रवाई की गयी है।