मनोज अभिज्ञान-
भारत में आर्थिक विकास की चमक केवल कागजों तक सीमित रह गई है। जमीनी सच्चाई यह है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में ग्रामीण भारत के परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं, पुरुषों और महिलाओं के जीवन में अलगाव बढ़ रहा है और भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।
02 मार्च 2025 को वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, “पुरुष अपने घरों से दूर शहरों में मामूली मजदूरी के लिए पलायन कर रहे हैं, जबकि उनकी पत्नियां गांवों में खेतों में काम करने को मजबूर हैं।” यह स्थिति ग्रामीण समाज को छिन्न-भिन्न कर रही है।
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां केवल कॉरपोरेट हितों को साधने में लगी हैं। जो लोग ‘न्यू इंडिया’ की बात करते हैं, वे शायद यह देखना ही नहीं चाहते कि इस ‘नए भारत’ में ग्रामीण भारत के लोग गरीबी के दलदल में धंसते जा रहे हैं। वाशिंगटन पोस्ट ने बिहार की गीतांजलि देवी का उदाहरण दिया, जो इतिहास में स्नातक करने के बावजूद खेती करने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पति “दक्षिण भारत में निर्माण कार्य में लगे हैं, 1,000 मील दूर।” क्या यही मोदी सरकार के अमृतकाल की असली तस्वीर है?
विकास के खोखले दावों के बीच, वाशिंगटन पोस्ट ने बताया कि “भारत में कृषि में लगे लोगों की संख्या 1990 के दशक से घट रही थी, लेकिन अब महामारी के बाद यह बढ़ गई है।” साफ है कि मोदी सरकार रोजगार पैदा करने में पूरी तरह विफल रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में काम करने वाली दो-तिहाई महिलाएं खेतों में मजदूरी कर रही हैं, क्योंकि उनके लिए उद्योगों में कोई नौकरी नहीं है। अमृता दत्ता, जो IIT हैदराबाद में प्रोफेसर हैं, ने कहा, ‘हमें ऐसी नीति की जरूरत है जिससे लोग कृषि से निकलकर अच्छी नौकरियों में जा सकें, लेकिन हम फंसे हुए हैं।’
मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे नारों का ढोल तो खूब पीटा, लेकिन हकीकत यह है कि “2017 में भारत के औद्योगिक उत्पादन में ऐतिहासिक रूप से गिरावट आई और यह अब तक पूरी तरह से उबर नहीं पाया है।” नतीजा यह है कि मजदूरों को अनौपचारिक क्षेत्र में झोंक दिया गया, जहां न सामाजिक सुरक्षा है और न ही स्थायी रोजगार। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, “भारत अब प्रति व्यक्ति आय के मामले में होंडुरास से भी पीछे है, और कामकाजी उम्र के आधे से अधिक लोग औपचारिक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह नहीं बना पा रहे हैं।”
मोदी सरकार की प्राथमिकता रोजगार सृजन के बजाय ‘मुफ्त अनाज’ और ‘कैश हैंडआउट’ जैसी योजनाओं तक सीमित रह गई है। वाशिंगटन पोस्ट लिखता है,”सरकार की प्राथमिक प्रतिक्रिया अब तक नकद सहायता और अन्य कल्याणकारी योजनाओं तक ही सीमित रही है, जो कि संरचनात्मक समस्याओं को हल नहीं करतीं।” असली समाधान ग्रामीण उद्योगों और रोजगारपरक नीतियों को बढ़ावा देने में था, लेकिन मोदी सरकार ने इस पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा।
इस बर्बादी का सबसे करुण चित्रण वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में बिहार की करिश्मा और गीतांजलि देवी के संवाद में दिखता है। “हम यहां बस समय बर्बाद कर रहे हैं,” गीतांजलि ने कहा। करिश्मा ने स्वीकार किया कि जब उनका पति पहली बार केरल गया, तो “वह खाना भी नहीं खा पाती थी और उसके बच्चे लगातार रोते थे।” यह कैसा विकास है जो परिवारों को तोड़ रहा है और महिलाओं को घर-खेत तक सीमित कर रहा है?
सरकार को यह समझना चाहिए कि आर्थिक विकास सिर्फ GDP आंकड़ों की बाजीगरी से नहीं आता। असली विकास तब होता है जब रोजगार पैदा होते हैं, लोग सम्मानजनक मेहनताना कमाते हैं, और परिवार साथ रहते हैं। मोदी सरकार का ‘विकास मॉडल’ केवल आंकड़ों और चुनावी नारों तक सीमित है, लेकिन वाशिंगटन पोस्ट ने जो सच्चाई उजागर की है, वह भारत की पूरी एक पीढ़ी के लिए अंधकारमय भविष्य की चेतावनी है।
भारत की अर्थव्यवस्था का यह कैसा विकास है, जहां लाखों लोग विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं? वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार,”भारत में हाशिए पर खड़े परिवारों के लिए अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं।” किसी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया हाउस का यह कथन कोई साधारण आलोचना नहीं, बल्कि मोदी सरकार की खोखली आर्थिक नीतियों का जीता-जागता प्रमाण है।
आज़ादी के समय यह सपना देखा गया था कि इंडस्ट्रियल सेक्टर भारत की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाएगा। लेकिन सच्चाई क्या है? 1950 में जहां कृषि का योगदान 55.4% था, वहीं आज यह घटकर महज़ 16.5% रह गया है। दूसरी ओर, देश की 48.7% आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। सरकार ने विकास के नाम पर जिस इंडस्ट्रियल सेक्टर को ‘प्राइम मूविंग फ़ोर्स’ बनाया, वही आज रोजगार पैदा करने में सबसे बड़ा फेलियर साबित हुआ है।
हमें ऐसी नीति की जरूरत है जिससे लोग कृषि से बाहर निकलकर अच्छे रोजगार पा सकें, लेकिन हम फंस गए हैं। मोदी सरकार की ‘सबका विकास’ नीति आखिर किसका विकास कर रही है? अगर इंडस्ट्रियल सेक्टर वास्तव में अर्थव्यवस्था को लीड कर रहा होता, तो आज मजदूरों को पेट भरने के लिए 1000 मील दूर पलायन नहीं करना पड़ता। पति मज़दूरी करने दूर चले गए और महिलाएं खेतों में पसीना बहाने को मजबूर हैं।
सरकार को यह तक समझ नहीं आया कि इंडस्ट्रियल ग्रोथ पूरी तरह एग्रीकल्चरल ग्रोथ पर निर्भर है। अगर कृषि में 1% वृद्धि होती है, तो इंडस्ट्रियल ग्रोथ 0.5% और नेशनल इनकम 0.7% बढ़ जाती है। लेकिन यहां तो स्थिति उलटी हो गई। 2017 आते आते देश में मैन्युफैक्चरिंग भी बार सिकुड़ गई, और आज तक उबर नहीं पाई।
मोदी सरकार ने डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे तमाम खोखले नारे गढ़े, लेकिन ग्रामीण भारत में बकौल वाशिंगटन पोस्ट, “हम बस इंतजार कर रहे हैं, अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं।” यह निराशाजनक स्थिति दर्शाती है कि कैसे गलत आर्थिक नीतियों ने गांवों को रोजगारविहीन बना दिया है।
21वीं सदी की शुरुआत में सरकार को अपनी गलती माननी पड़ी कि भारत की अर्थव्यवस्था का असली ‘प्राइम मूविंग फ़ोर्स’ इंडस्ट्रियल सेक्टर नहीं, बल्कि कृषि है। लेकिन आज एक चौथाई 21वीं सदी बीत जाने के बाद भी एग्रीकल्चर सेक्टर की उपेक्षा करके यही गलती दोहराई जा रही है। क्या मोदी सरकार बताएगी कि देश के आधे से अधिक लोगों को गरीबी में धकेलकर कौन सा विकास किया जा रहा है?
वाशिंगटन पोस्ट कहता है,”भारतीय अब प्रति व्यक्ति आय में होंडुरास से भी गरीब हो गए हैं।” यह आंकड़ा केवल चेतावनी नहीं, बल्कि तमाचा है उन नेताओं पर, जो सिर्फ न्यूज चैनलों पर भारत को महाशक्ति बनाने के झूठे दावे करते हैं। आज भी हजारों बस्तियों में लोग घुप्प अंधेरे में बैठकर भविष्य की बाट जोह रहे हैं, जबकि मोदी सरकार डिजिटल इंडिया के आंकड़ों का जाल बुनने में व्यस्त है।



Govind Pratap Singh-
.@BlumeVentures की Indus Valley Report के मुताबिक
भारत के अंदर 3 तरह के भारत बन गए हैं
- पहले भारत में 14 करोड़ लोग हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति सालाना आय 13 लाख है
• दूसरे भारत में 30 करोड़ लोग हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति सालाना आय करीब 2.62 लाख है
- तीसरे भारत में 100 करोड़ लोग हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति सालाना आय करीब 87,470 रुपए है
रिपोर्ट के मुताबिक- इस तीसरे भारत की 100 करोड़ आबादी की आमदनी अफ़्रीका के गरीब देशों जैसी है.
इनके पास खर्च के लिए अलग से पैसा बचता ही नहीं है.


