शुक्रिया इंदौर, इंसानियत में यक़ीन बचाये रखने का जज्बा दिखाने के लिए!

अन्याय के खिलाफ नर्मदा घाटी के लोगों के संघर्ष के साथ इंदौर की एकजुटता

नर्मदा के मसले पर एक नोट : छत्तीसगढ़ में सुनते हैं कि गायों के लिए रमन सिंह सरकार ने राजयव्यापी  एम्बुलेंस योजना शुरू की है। और इधर न कोर्ट को ४० हज़ार परिवार दिख रहे हैं न सरकार को। वो उन्हें डुबोकर या खदेड़कर ज़मीन पर अपना कब्ज़ा जमा लेना  चाहते हैं।  अहिंसक आंदोलन से इस केन्द्र और राज्य, दोनों की ही सरकारों पर कोई जूँ नहीं रेंगती। फिर जब हालात नाज़ुक हो जाते हैं और सरकार को “स्थिति पर नियंत्रण पाने और आत्मरक्षा के लिए” गोली चलानी पड़ती है तब फिर मुर्दों की बोली का दौर शुरू होता है, जैसा मंदसौर में हुआ था। 

हमसे थोड़ी ही दूर नर्मदा घाटी के इलाके में रहने वाले हजारों परिवार सरदार सरोवर बांध में पानी भरने से ‘लाई जा रही’ अन्यायपूर्ण डूब का सामना कर रहे हैं। बग़ैर उचित पुनर्वास का प्रबंध किए सरकार, बांध के गेट बंद करके उन्हें उनके घर, खेत, गांव से खदेड़ने या इन सब समेत डुबोने पर आमादा है। यह सारी अमानवीयता विकास के नाम पर की जा रही है, और लोगों को चुटकुलों, देशभक्ति, दूसरे देश से खतरों आदि के नाम पर बरगलाया जा रहा है, और असंवेदनशील किया जा रहा है। यहां तक कि महात्मा गांधी , कस्तूरबा गांधी और महादेव भाई देसाई की अस्थि अवशेषों के स्मारक को भी बख्शा नहीं गया। उन्हें रात के अंधेरे में उखाड़कर विस्थापित करने की निंदनीय कोशिश की गयी। जिन ग्रामीणों ने इसे रोकने की कोशिश की उन पर शासकीय कार्य में बाधा डालने के मुकदमें दर्ज़ कर दिए गए।

लेकिन इंसान की सोचने और तर्क की क्षमता तथा प्रतिरोध को हमेशा नहीं भरमाया जा सकता है, और हर समय में कुछ लोग तो होते ही हैं जो चमकदार पर्दों के पीछे छिपी काली, अंधेरी साज़िशों को पहचान लेते हैं।  ३१ जुलाई २०१७ को अलग अलग समूहों  के लोग, गांधीवादी, सर्वोदयी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, कांग्रेसी, संवेदनशील स्वतंत्र मनुष्य और अन्य सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोग इंदौर में दोपहर ३ बजे से करीब ५ बजे तक महात्मा गाँधी मार्ग पर नर्मदा घाटी में अन्यायपूर्ण डूब के खिलाफ लड़ रहे लोगों, अनशनरत आंदोलनकारियों के समर्थन में बनी मानव श्रृंखला में जुटे। 

अनेक वरिष्ठजन असुविधा के  बावजूद आये और हाथों में तख्तियाँ लेकर खड़े रहे।  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कॉमरेड रुद्रपाल  यादव, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कॉमरेड कैलाश लिम्बोदिया ने लोगों को जुटाने में काफी मेहनत की।  लोगों को खबर लगी तो अपने आप भी आये। दोनों पार्टियों के लोग तो थे ही, साथ ही इप्टा, प्रलेस, रूपांकन, लोकमैत्री, सप्रेस, कस्तूरबाग्राम, आम आदमी पार्टी, एसयूसीआई, ट्रेड यूनियंस, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी आदि के लोग भी पहुंचे  और सबने विस्थापितों के इस संघर्ष के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। पूर्व कुलपति डॉ भारत छापरवाल, सर्वोदयी श्री मणीन्द्र कुमार, वरिष्ठ कॉमरेड श्री वसंत शिंत्रे, मानवाधिकारों की लम्बे समय से लड़ाई लड़ते आ रहे प्रोफेसर आर. डी.  प्रसाद, पूर्व सांसद कल्याण जैन, वरिष्ठ गांधीवादी सुश्री पुष्पा  बहन, समाजसेवी फादर डॉमिनिक, फादर रोइ, अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता, वरिष्ठ एक्टिविस्ट राहुल बनर्जी, तपन भट्टाचार्य, दिनेश कोठारी, भाकपा के सोहनलाल शिंदे, कैलाश गोठानिया, ओमप्रकाश खटके, दुर्गादास सहगल, सत्यनारायण वर्मा, एस. के. दुबे, माकपा के  वरिष्ठ कॉमरेड गौरीशंकर शर्मा, एस.के. मिश्रा, रूपांकन के अशोक दुबे, शारदा बहन, डोलू ,दीपिका, विक्की, दिनेश दीक्षित,  कांग्रेस के प्रमोद टंडन, राजेश  शर्मा, इंटक के वरिष्ठ श्रमिक नेता श्री श्यामसुंदर यादव, वरिष्ठ अभिभाषक अनिल त्रिवेदी, अभ्यास मंडल से जुड़े शिवाजी मोहिते, संस्कृतिकर्मी और बैंक ट्रेड युनियनों और इप्टा से जुड़े श्री विजय दलाल, श्री अरविन्द पोरवाल, श्री सुरेश उपाध्याय, इप्टा के वरिष्ठ साथी प्रमोद बागड़ी, समाजसेवा से जुड़े कृष्णार्जुन, आनंद लाखन, राकेश चंदोरे, दीपमाला, वसीम, सर्वोदय प्रेस सर्विस के चिन्मय मिश्र, महिला फेडरेशन की वरिष्ठ साथी शैला शिंत्रे, शिक्षक माया शिंत्रे, एसयूसीआई के नौजवान साथी प्रमोद नामदेव, आम आदमी पार्टी से जुड़े युवराज सिंह, जयप्रकाश, राहुल इंक़लाब, और भी काफी सारे लोग इस अमानवीयता के खिलाफ आज सड़क पर एकजुट हुए, बहुत अच्छा लगा। 

२५ लाख में हम २००-२५० लोग आज होंगे। ऐसे भी अनेक हैं जो नहीं आ पाए लेकिन जो अन्याय के खिलाफ  नर्मदा घाटी के लोगों की इस लड़ाई में उनके साथ हैं।  वे भी निकलेंगे। आज नहीं तो कल।  हारना अन्याय की नियति है। इसलिए नहीं कि ये किसी धर्मग्रन्थ में लिखा है, या किसी महान व्यक्ति ने कहा है या ये कोई भावुक नैतिकता की बात है, बल्कि इसलिए क्योंकि जो सोचता समझता है, वो हमेशा दमन और अत्याचार नहीं सह सकता।  ये सीधा सीधा विज्ञान है।

बहरहाल शुक्रिया इंदौर का, जिसने अभी तक इंसानियत में यक़ीन बचाये रखा है।

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