मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल भीतर ही अपना तेज खो दिया!

छवि बदलने के अंतर्द्वंद में योगी

लखनऊ : उत्तर प्रदेश की सियासत में काफी कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर क्यों योगी सरकार खुल कर फैसले नहीं ले पा रही है? क्यों डर-डर का काम कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि नौकरशाही पर लगाम नहीं लगा पाने के कारण योगी सरकार के फैसलों पर उंगलियां उठाई जा रही हैं? राज्य में बहुत कुछ ऐसा घट रहा है जिसे योगी सरकार और आम चुनाव की सेहत के लिये ठीक नहीं कहा जा सकता है।

बात चाहें तन्वी सेठ को कायदे कानून तोड़कर पासपोर्ट दिये जाने की बात हो या फिर अलीगढ़ विश्वविद्यालय में जिन्ना को लेकर अथवा लखनऊ विवि के कुलपति और शिक्षको के साथ कुछ कथित दबंग छात्रों गुंडागर्दी का मसला जिसे हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान में लिया था। इसी प्रकार अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दलितों और पिछड़ों के लिये आरक्षण के मुद्दे को खाद-पानी देने की सियासत। एक मुद्दा ठंडा नहीं पड़ पाता है दूसरा उठा दिया जाता है। अगर ऐसा न होता तो मदरसों में ड्रेस कोड का शिगूफा योगी सरकार के मंत्री न छोड़ते, जिस पर बाद में पीएमओं ने हस्तक्षेप करना पड़ा कि सरकार की कोई ऐसी मंशा नहीं है, जबकि इस मसले पर प्रदेश का मुखिया होने के नाते योगी को पहले बयान देना चाहिए था।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि योगी के अधिकारी पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के प्रति ज्यादा वफादार हैं। इस क्रम में तमाम फैसले गिनाये जा सकता है। बात चाहें ‘लॉ एंड आर्डर’ में सुधार की हो या फिर जन-सुविधाओं में सुधार के लिये उठाये जाने वाले कदमों की। अधिकारी वहीं ‘हंटर’ चला रहे हैं जिस क्षेत्र की पहचान बीजेपी के गढ़ के रूप में होती है। बिजली चोरों की धरपकड़ को ही ले लिया जाये। बिजली विभाग का डंडा वहां ज्यादा चलता है जहां उसे विरोध की उम्मीद नहीं रहती है। जो लोग ईमानदारी से बिलों का भुगतान करते हैं उन्हें कभी लोड बढ़ाने के नाम पर तो कभी सरचार्ज लगाकर तंग किया जाता है। ऐसी कार्रवाई से अधिकारी और कर्मचारी फाइलों का ‘पेट’ भी भर देते हैं।

घनी आबादी वाले इलाकों में जहां पूरा का पूरा मोहल्ला या कस्बा बिजली चोरी करता है, वहां जाने की यह लोग हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। इसी प्रकार से सड़क से अतिक्रमण हटाने, अवैध निर्माण को तोड़ने आदि में भी अधिकांश वही लोग शिकार हो रहे हैं जिन्होंने बहुत उम्मीदों के साथ बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाया था। आज स्थिति यह है कि अवैध बूचड़खानों का मसला ठंडे बस्ते में चला गया है। खुले में गोश्त की बिक्री का ग्राफ बढ़ गया है, लेकिन अधिकारी इस ओर आंखें मुंदे हुए हैं। मदरसों में सुधार के बड़े-बड़े दावे किये गये थे, लेकिन वोट बैंक की सियासत के चलते योगी सरकार ने इस ओर से नजरें घुमा ली हैं।

आश्चर्य होता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल भीतर ही अपना तेज खो दिया है। सत्ता संभालते समय उनकी जो हनक और धमक दिखाई दी थी, अब वह गुजरे जमाने की बात हो गई है। सरकारी अधिकारी कर्मचारी अपनी मनमानी कर रहे हैं तो उनके (योगी) मंत्री अपनी ही सरकार को आंखे दिखा रहे हैं। वहीं योगी इन बयानों के बाद भी चुप्पी साढ़े बैठे है। बात चाहे वो बयान राष्ट्र की बेटी के लिए दिया गया हो अथवा बैरिया विधानसभा सीट से भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह का योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर की तुलना एक कुत्ते से किया जाना।

बता दें, सुरेंद्र इससे पहले भी उन्नाव बलात्कार काण्ड में भी बेतुका सा बयान दे चुके है। उन्होंने कहा था कि तीन बच्चों की माँ से कौन बलात्कार करेगा। सुरेन्द्र 2019 के चुनाव को इस्लाम बनाम ईश्वर करार दे चुके है। इसी प्रकार फूलपुर की चुनावी रैली में सीएम योगी की मौजूदगी में नागरिक उड्डयन मंत्री नंद गोपाल नंदी जब अपने पद की गरिमा भूल गए तो उन्होंने भाषण के दौरान दोनों पार्टियों के नेताओं को रामायण के किरदारों से तुलना करते हुए मजाक उड़ाया। उन्होंने रावण मुलायम सिंह, कुंभकरण शिवपाल, मेघनाद को अखिलेश का रूप बताकर मायावती की शूर्पणखा से तुलना की।

गोपाल नंदी बस यहीं नहीं रुके उन्होंने आगे बोलते हुए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को मारीच बताकर मोदी को विभीषण और योगी की हनुमान से तुलना कर डाली। इसी तरह योगी के अल्पसंख्यक मंत्री मोहसिन रजा भी अक्सर उलटा सीधा बोलते और करते हैं। मंत्रियों के विवादित बोल और कार्यशैली समाज के बीच खाई पैदा कर रही है, लेकिन लगता है कि सरकार से लेकर संगठन तक में उच्च पदों पर बैठे नेताओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि विपक्ष को घेरने के चक्कर में योगी सरकार अपनी उपलब्धियों को जनता तक नहीं पहुंचा पा रही है। वर्ना भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, अपनी सरकार की साफ-सुथरी छवि और कानून व्यवस्था पर नियंत्रण की कोशिशों के बारे में योगी सरकार जनता को बहुत कुछ बता सकती थी। जब से मोदी ने सत्ता संभाली है तब से लेकर चार-सवा चार साल बाद तक प्रदेश सहित पूरे देश में कहीं किसी प्रकार की कोई आतंकवादी घटना का न घटना मोदी सरकार की एक बड़ी कामयाबी है,लेकिन इसके बारे में कोई मंत्री नहीं बोलता है, जबकि सब जानते हैं कि मोदी राज से पहले कभी इतना लंबा समय नहीं गुजरा है, जब चार-सवा चार साल तक देश को दहलाने में आतंकवादी सफल नहीं हुए हों।

योगी सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि वह गुंडाराज और भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा देकर सत्ता में आई थी। हालांकि सरकार ने इन दोनों ही मुद्दों को हमेशा प्राथमिकता में ही रखा, लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। यह सच है कि योगी राज में कुछ भ्रष्टाचारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई, लेकिन इसे लेकर और ज्यादा सख्त कदम उठाने की जरूरत है। सतर्कता अधिष्ठान समेत जांच एजेंसियों ने भ्रष्टाचार के तमाम लंबित जांचों की फाइलों को फिर से खंगालना शुरू कर दिया गया है। इतना सब होने के बावजूद भ्रष्टाचार नहीं रुक पा रहा है। गरीबों और किसानों के लिए शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं में खासतौर से भ्रष्टाचार नजर आ रहा है। किसानों के गन्ने का भुगतान समय पर नहीं होना? किसानों की कर्ज माफी में सरकारी तंत्र की मनमानी समेत तमाम समस्याओं के कारण किसान की योगी सरकार से नाराजगी बढ़ती जा रही है।

आज स्थिति यह है कि गांव से लेकर शहर तक में तमाम अफसर हैं भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। शासन स्तर पर सतर्कता अधिष्ठान, भ्रष्टाचार निवारण संगठन, एसआइटी और आर्थिक अनुसंधान अपराध शाखा जैसी जांच एजेंसियों के पेंच कसा जाना बेहद जरूरी है। अगर योगी सरकार ऐसे करने में सफल रही तो निसंदेह नतीजे बेहतर आयेंगे। इससे आम जनता का उत्पीड़न करने वाले तो कार्रवाई की जद में आएंगे ही, सपा-बसपा कार्यकाल में हुए घपले-घोटालों की जांच में भी तेजी आएगी।

योगी सरकार पिछली सरकारों के शासनकाल के घपले-घोटालों को लेकर क्या करने जा रही है, यह तो वक्त के गर्भ में है, लेकिन सबसे पहली जरूरत है आम जनता के लिए शुरू की गई विकास योजनाओं का लाभ उन तक उचित रूप में पहुंचाना, जो कि उन्हें नहीं मिल पा रहा है। गरीब जनता का काम या तो समय पर नहीं हो रहा है या फिर बिना सुविधा शुल्क कोई सुनवाई नहीं हो रही है। दलाल भी पूरी तरह सक्रिय हैं। सरकार गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार तो खत्म करे ही, आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए भी खास उपाय भी करे।

लब्बोलुआब यह है कि योगी जी अपनी पुरानी हिन्दुत्व वादी छवि को ‘खूंटी’ पर टांग कर अपनी नई इमेज बनाना चाह रहे हैं। वह ऐसा केन्द्र के दबाव में कर रहे हैं या फिर उनकी अपनी कोई मजबूरी है, यह तो योगी जी ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि छवि बदलने के चक्कर में योगी जी अंतर्द्वंद में फंसते जा रहे हैं। मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण रोकने के चक्कर में योगी जी ने प्रदेश हित से भी समझौता कर लिया है। यह सच कै कि सीएम योगी को प्रदेश की 21 करोड़ जनता के बारे में सोचना चाहिए,लेकिन ऐसा करते समय वह उस ढर्रे पर भी न चलने लगे जिस पर चलते हुए उनके ऊपर तुष्टिकरण के दाग लगने लगे।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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One comment on “मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल भीतर ही अपना तेज खो दिया!”

  • मोहन says:

    अधिकारी नहीं चाहते की सीएम आदित्यनाथ राजधानी लखनऊ में रहे अधिकारी दौरा लगाकर मजा ले रहे है महराज जी है जो दौड़ रहे सरकार दौड़ने से नहीं चलती हनक से चलती है जैसे पुलिस ..जनरल रोडिंग्स ने कहा था कि सेना राजपूत की तलवार की तरह होनी चाहिए जो म्यान से एक बार बाहर निकल जाएं तोो लक्ष्य प्राप्ति करने के बाद ही म्यान में आए ठीक उसी प्रकार का मुख्यमंत्री का तेज होना चाहिए जो एक बार किसी जिले में गया तो उसका संदेश पूरे प्रदेश में जाए यानि कमी है तो नापे वरना दौड़ कर काम नहीं करवाया जा सकता …

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