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जूही गुप्ता के मामले में राजस्थान पत्रिका को मुंह की खानी पड़ी, 20-जे अब मान्य नहीं

shashikant singh-

अन्य के लिए रास्ता हुआ साफ, लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट में अब प्रबंधन के पास नहीं बची कोई काट, अब 20-जे मान्य नहीं

जयपुर : मजीठिया लड़ाकों ने 20-जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जीत हासिल कर ली है। राजस्थान पत्रिका प्रा लि की कर्मचारी जूही गुप्ता के मामले में पत्रिका को मुंह की खानी पड़ी है। अब उस 20-जे की डिक्लरेशन/अण्डरटेकिंग का कोई महत्व नहीं बचा है, जिसके आधार पर मीडिया संस्थान पत्रकारों का हक दाबे बैठे थे।

वर्ष 2017 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह तय हो गया था कि पत्रकारों को एक बार फिर लेबर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर तय करना पड़ेगा। सेटबैक था पर कर्मचारियों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। विभिन्न प्रदेशों के पत्रकार साथियों ने आपसी सामंजस्य के साथ फिर से लड़ाई शुरू की और सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट तक का रास्ता तय कर लिया। ग्वालियर के हमारे वरिष्ठ साथी श्री जितेन्द्र जाट की सक्रियता और अथक प्रयास से जूही गुप्ता के मामले को सुप्रीम कोर्ट तक हरी झंडी मिल गई है। उनके मजीठिया के हिसाब से छह लाख रुपए बनते थे जो अब पत्रिका प्रबंधन को देने पड़ेंगे।

मजीठिया की लड़ाई कर रहे देशभर के अन्य पत्रकारों के लिए भी यह हर्ष और उत्साह की बात है क्योंकि अब जूही गुप्ता के मामले में दिए गए आदेश उनके मामलों में भी नजीर की तरह काम करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने जूही गुप्ता के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा दिए गए आदेश को सही मानते हुए उसमें दखल से इंकार कर दिया और संस्थान की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 19 जून 2017 को जारी आदेश की व्याख्या करते हुए 20 जे के आधार पर कम वेतन को गलत माना था। आदेश में लिखा था ” सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना 11- 11 -2011 में बताए गए वेतनमान से कम किसी भी रूप में नहीं दिया जा सकता। 20जे को भी इसी आलोक में देखा जाना चाहिए।”

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर खण्डपीठ ने सुनवाई के बाद माना कि उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिषेक राजा के मामले में दिए गए निर्णय के पैरा 26 को पढ़ने के बाद शंका की कोई गुंजाइश ही नहीं है। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 2(ई ), धारा 12 और धारा 16 को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से तय किया है कि धारा 12 के तहत जारी आदेश में बताए गए वेतनमान से कम वेतनमान नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय किया था कि 20-जे को इसी के आलोक में पढ़ना चाहिए।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में आगे जाकर फिर दोहराया है कि संस्थान ने सिर्फ क्लॉज 20 जे के आधार पर आपत्ति की थी, और हमारे मत में 20 जे के आधार पर कम वेतन नहीं दिया जा सकता। ऐसे में संस्थान की यह आपत्ति, कानून की नजर में कोई आपत्ति नहीं है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक अर्जरिया और नवनिधि पढरया ने जोरदार ढंग से कर्मचारियों की पैरवी की। ग्वालियर में अधिवक्ता जे एस सेंगर कर्मचारियों की पैरवी कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने 18 जुलाई 2019 को पत्रिका की याचिका खारिज की थी। इसी आदेश में कोर्ट ने 20-जे की हवा निकाली थी। आदेश का प्रभाव सभी संस्थानों पर पड़ने वाला था, इसलिए इस आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की गई। दिल्ली से बड़े-बड़े वकील बुलाए गए लेकिन दाल नहीं गली और पुनरीक्षण याचिका भी 18 दिसम्बर 2020 को खारिज हो गई। इसके खिलाफ पत्रिका प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट गया, जहां उसकी विशेष अनुमति याचिका खारिज हो गई।

व्यापक है असर

जूही गुप्ता केस मामले में उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के आदेशों का असर अब सभी मामलों पर होगा। लेबर कोर्ट और उच्च न्यायालयों को अब 20-जे को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश दिनांक 18 जुलाई 2020 की व्याख्या को स्वीकार करना पड़ेगा।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी
9322411335

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