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क्या ये पहले पन्ने की खबरें नहीं हैं?

संजय कुमार सिंह-

अक्सर ऐसा होता है कि द टेलीग्राफ के पहले पन्ने की खबरें दिल्ली के मेरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं होती हैं। आज भी नहीं है। सीबीएसई के परिणाम की खबर भी द टेलीग्राफ में दूसरे अखबारों से अलग है। और तो और बंगाल के एक मंत्री के करीबी के यहां छापे में करोड़ों की नकदी मिली वह भी द टेलीग्राफ में ही है, दूसरे अखबारों में नहीं जबकि सरकार समर्थक द टेलीग्राफ को न सिर्फ मोदी सरकार का विरोधी कहते हैं बल्कि ममला बनर्जी का समर्थक कहने से भी नहीं चूकते। आज का पहला पन्ना देखिए।

ठीक है कि द्रौपदी मुर्मू जीत गईं और पहली आदिवासी राष्ट्रपति होंगी। पर उनकी जीत का अंतर अब तक का सबसे कम है। यशवंत सिन्हा भले हार गए पर सबसे ज्यादा वोटों के साथ हारे हैं। यह खबर नहीं है? यही नहीं, पश्चिम बंगाल के एक मंत्री की करीबी के यहां करोड़ों (20) की नकदी मिली। द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर खबर है और कहीं है? वैसे तो यह ‘विपक्ष’ का मामला है और गोदी मीडिया चटखारे लेकर छापता रहा है लेकिन काले धन की बरामदगी पर यह सवाल उठता है कि वह तो स्विस बैंक में होता था, नोटबंदी से खत्म हो जाना था – इसलिए खबर पहले पन्ने पर जगह नहीं पाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने आजम खान को नियमित जमानत दी। हाईकोर्ट की शर्तें हटाईं। द हिन्दू में लीड है। बाकी अखबारों में? इसी तरह सीबीएसई की 10वीं और 12वीं की परीक्षा में लड़कियों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। द हिन्दू में पहले पन्ने में चार कॉलम की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है। यहां शीर्षक से बताया गया है कि 12वीं पास करने वालों और ज्यादा अंक पाने वालों का प्रतिशत बढ़ गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यही शीर्षक है। जोर इस बात पर है कि महामारी (या लॉक डाउन से) बच्चों की पढ़ाई का कोई नुकसान नहीं हुआ है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, महामारी के बाद सीबीएसई की परीक्षा में कक्षा 10 और 12 वीं में पास होने वालों का प्रतिशत कम हुआ। द टेलीग्राफ की खबर इन सबसे अलग है।

दरअसल क्या हुआ जानने के लिए किसी एक अखबार के भरोसे रहना छोड़िए, शीर्षक पर मत जाइए, पूरी खबर पढ़िये।

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