arun srivastava-
सहारा इंडिया के नियंत्रण में निकलने राष्ट्रीय सहारा में “कुछ भी ” हो सकता है। अभी हाल ही में इसके लखनऊ संस्करण में स्थानीय संपादक के रूप में मनमोहन का अवतरण हुआ है। लखनऊ यूनिट के हेड अजीत वाजपेई ने ब्यूरो में अपनी सेवाएं देने वाले मनमोहन जी को स्थानीय संपादक की जिम्मेदारी सौंपी है। अब यह अलग बात है कि कभी इस तरह की जिम्मेदारी सहारा के मुखिया सुब्रतो राय ने मैनेजर के रूप में स्वतंत्र मिश्रा को और स्थानीय संपादक के रूप में रणविजय सिंह को सौंपते हुए इन अधिकरीद्वय को इनके चैंबरों तक ले जाकर बकायदा कुर्सियों पर बैठाया था। यही नहीं नाम के लिए ही सही रायशुमारी भी हुई थी। सहारा इंडिया के सर्वेसर्वा सुब्रत राय एक-एक कर्मचारी से मिले और उनकी राय जानी थी। इस समाचार को लिखने वाले ने भी अपनी राय दी थी।

बहरहाल मनमोहन जी 10वें स्थानीय संपादक के रूप में विराजमान हुए हैं। इस कुर्सी पर कब तक विराजमान रहेंगे यह तो ज्योतिषी भी नहीं बता सकता। मनमोहन जी से पहले राकेश सिंह जी कुछ दिनों के संपादक रहे तो विकास शुक्ला कुछ महीनों के।
अगर प्रिंट लाइन में मनमोहन जी का नाम जाने लगा तो भाग्यशाली होंगे। राष्ट्रीय सहारा लखनऊ संस्करण की शुरुआत कराने वाले स्व. सुनील दुबे ओर दैनिक हिंदुस्तान पटना से आये स्व. सीपी गुप्ता प्रिंट लाइन को तरस गए। शुरुआती दौर में प्रिंट लाइन में ‘संपादक मंडल’ लिखा जाता था और इसके आगे ‘सहारा इंडिया परिवार’ लिखा जाता था।
प्रिंटलाइन में स्थानीय संपादक के रूप में नाम जाने की शुरुआत रणविजय सिंह से शुरू हुई थी। नवोदित, अनिल पांडेय, दयाशंकर राय इसके हकदार थे। देहरादून संस्करण में दयाशंकर राय को न जाने क्यूं प्रिंट लाइन से वंचित रखा गया जबकि ब्यूरो से आये जितेन्द्र नेगी को प्रिंट लाइन नसीब हुई।
इन सबमें मनोज तोमर ही भाग्यशाली रहे। सिटी डेस्क से पत्रकारिता शुरू कर समूह संपादक तक की यात्रा तय की। जबकि उपेंद्र राय के सेफ एग्जिट प्लान के तहत सहारा छोड़ने वालों में वे भी थे।
यहां पर ध्यान देने वाली बात यह भी है कि, लखनऊ संस्करण के यूनिट हेड अजीत वाजपेई के साथ ही अरुण शाही स्थानीय संपादक हुए थे। श्री वाजपेई कुर्सी पर अब तक कुंडली जमाए हुए हैं जबकि स्थानीय संपादक तीन-चार बदल गए। सूत्रों का कहना है कि अजीत वाजपेई पर सहारा प्रमुख सुब्रत राय के पीएम डोगरा जी बहुत अधिक मेहरबान रहते हैं।
वैसे संपादकीय विभाग में चर्चा है कि जब ब्यूरो से मनमोहन जी को स्थानीय संपादक बनाना था तो कलानिधि मिश्रा क्या बुरे थे। वे मनमोहन जी की राह में “रोड़ा” भी नहीं थे। राष्ट्रीय सहारा लखनऊ संस्करण के ब्यूरो में कलानिधि जी जूनियर थे। वैसे जूनियारिटी-सीनियारिटी सहारा में कोई मायने रखती तो स्व. सुनील दुबे जी के बाद अभयानंद शुक्ला जी को स्थानीय संपादक होना चाहिए।
अरुण श्रीवास्तव
देहरादून।


