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सुख-दुख

दिबांग का खौफ मेरे दिल से कब कम होगा?

अविनाश दास-

दिबांग मेरे बॉस थे। प्रिंट से टीवी में ये मुझे लेकर आये, तो वहां ज़ीरो से शुरू करना था और इन्होंने दृश्यों के समंदर में संपादकीय मगरमच्छों के बीच लाकर मुझे छोड़ दिया था। कभी सहारा नहीं बने। कभी मुस्कुरा कर नहीं देखा। कभी सलाम का सम्मानजनक जवाब नहीं दिया।

मेरे मन में अपनी शख़्सियत के प्रति इतना डर बिठा दिया कि आज भी कहीं आमने-सामने पड़ते हैं, तो पांव बग़ावत कर देते हैं कि इधर से मोड़ लो रस्ता, यही बेहतर!

लेकिन सच ये भी है कि इनके जैसा मेहनती पत्रकार मैंने बहुत कम देखा है। सद्दाम हुसैन को जब फ़ांसी देने की क़वायद शुरू हुई, तो वह आधी रात के ठीक बाद का वक़्त था। मैं रात की शिफ़्ट का इंचार्ज था और मुझे कुछ नहीं सूझा, तो दिबांग को कांपते हुए हाथों से फ़ोन लगा दिया। उन्होंने बस इतना कहा कि आ रहा हूं। लाइव विज़ुअल्स काटते रहो। वो तीन से चार बजे के बीच ऑफ़िस आ गये और स्टूडियो में जाकर बैठ गये। मैं पीसीआर (प्रोडक्शन कंट्रोल रूम) में। वह स्टूडियो में घंटों बैठे रहे और मैं अपनी शिफ़्ट ख़त्म होते ही घर चला गया।

आज दिबांग ने कहा भी कि पहले तुम कामचोरी करते थे, अब बहुत सही कर रहे हो! तो आज हुआ ये कि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में, जब मैं सुबह के नाश्ते के लिए पहुंचा, तो वहां दिबांग कुछ लोगों के साथ बैठे हुए थे।

मैंने उन्हें देखा, उन्होंने मुझे – मैंने नज़रों से सलाम किया और उनसे थोड़ी दूर एक किनारे जाकर बैठ गया। नाश्ता ख़त्म करके मैंने हाथ हिलाकर उनसे विदा लिया और जाने लगा, तो उन्होंने पुकार कर बुलाया। मेरा परिचय अपने साथ के लोगों से कराया और फिर मुझसे लंबी बात की।

मैंने कहा कि सर, आपके साथ आज तक मेरी कोई तस्वीर नहीं है, तो उन्होंने मुझसे मेरा फ़ोन लेकर ये सेल्फ़ी ली। ये भी कहा कि जब दिल्ली आओ, तो कॉल करो। हम मिलेंगे।

हम ज़रूर मिलेंगे सर, लेकिन आपका ख़ौफ़ मेरे दिल से कब कम होगा?

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