
संजय कुमार सिंह
जब पटाखों पर प्रतिबंध के आदेश का पालन नहीं हुआ था तो इस बार हरित पटाखों की इजाजत थी। ऐसे में जो हुआ उसका अंदाजा तो था ही। इसलिए मैंने अपनी और करीबियों की सुरक्षा की व्यवस्था कर ली थी। फिर भी प्रदूषण का असर महसूस हो रहा है और सुबह अखबार ही नहीं थे तो पता कैसे चलता कि क्या हुआ, कितना रहा। फिर भी पाठकों को यह बताना जरूरी लगा कि, अपनी तो जैसे-तैसे कट जाएगी, आपका क्या होगा जनाबे आली। अखबारों की कल की रिपोर्ट यही थी कि सरकार अपने खिलाफ लगने वाली खबरों को लेकर भ्रम फैलाती है, सोशल मीडिया पर लिखने वालों को धमकाती है। मैंने फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर का ही उदाहरण दिया था। बाद में लोक गायिका नेहा सिंह राठौड़ ने भी यही कहा।
जो भी हो, इंडिया टुडे की एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित समय-सीमा का उल्लंघन करते हुए लगातार पटाखे फोड़ने से दीवाली के एक दिन बाद मंगलवार को दिल्ली ज़हरीली धुंध में लिपट गई है। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) बिगड़कर ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुँच गया है। सुबह सात बजे औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 451 रहा – जो राष्ट्रीय औसत से 1.8 गुना (लगभग दोगुना) ज़्यादा है। दीवाली के प्रदूषण का जो असर लग रहा है उसमें दिल्ली का मोहल्ला क्लिनिक चल रहा होता तो लोगबाग शुरू में ही रोकथाम के उपाय कर सकते थे। अब कितने लोग दवा लेंगे, कितने लोग डॉक्टर की सलाह लेंगे और कितने लोगों को लाभ होगा राम जानें। बाकी के लिए आयुष्मान भारत की भाजपाई योजना है ही।
खबर यह है कि जब दिल्ली में अखबार नहीं छपने थे प्रधानमंत्री ने रक्षा निर्यात की बात की, तो राहुल गांधी ने मिठाइयों की। आज कोलकाता और मुंबई के डिजिटल अखबार तो पढ़े ही जा सकते हैं। यह वैसे नहीं है जैसे पहले जब जनसत्ता नहीं आता था या बिक जाता था तो हॉकर जागरण या नभाटा कुछ भी डाल देता था और जाहिर है, जनसत्ता की जरूरत जागरण या नभाटा से पूरी नहीं होती थी। फिर भी आज मुंबई या कोलकाता के अखबार से क्या काम होना है पर अखबार हैं तो चर्चा बनती है। इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड ऑपरेशन सिन्दूर पर प्रधानमंत्री का दावा है। शीर्षक है, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान तीनों सेनाओं के संयोजन ने पाकिस्तान को घुटने पर ला दिया। उपशीर्षक है, देश माओवादी उग्रवाद से आजादी के मुहाने पर है। उनका प्रभाव केवल तीन जिलों में दिखाई देता है।
आप जानते हैं और जानते तो इंडियन एक्सप्रेस के लोग भी हैं कि कश्मीर में चुनाव के समय आतंकवाद खत्म हो गया था और अब माओवादी उग्रवाद खत्म होने का दावा किया जा रहा है। यही खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में है। शीर्षक है, आईएनएस विक्रांत ने पूरे पाकिस्तान में डर का माहौल पैदा कर दिया। आज की दूसरी बड़ी खबर है, ट्रम्प ने रूसी तेल पर भारत को भारी टैरिफ की चेतावनी दी। हाल में प्रधानमंत्री से बातचीत का उनका दावा और आश्वासन चर्चा में था। उसपर सरकार ने जो किया और जो खबरें छपीं उसके आलोक में आज की खबर के राजनीतिक और कूटनीतिक मायने हैं लेकिन सरकार ने उसपर कुछ नहीं कहा है। या कहा हो तो दिखा नहीं। पहले जो कहा और किया था – उसपर मैं लिख चुका हूं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड बिहार चुनाव में विपक्ष की स्थिति है। कहने की जरूरत नहीं है कि राजग गठबंधन से संबंधित खबरें नहीं छपती हैं, जो छपती हैं वो प्रचार वाली होती हैं लेकिन विपक्षी गठबंधन को कमजोर और विवाद में दिखाने वाली खबरों को प्रमुखता दी जाती है। कायदे से दोनों पक्ष की खबर होनी चाहिए थी। अगर विपक्ष की स्थिति बताई जा रही है तो सत्तरूढ़ गठबंधन की क्यों नहीं। यही कहा जाना चाहिए था कि वहां सब ठीक है और उसे कोई हरा नहीं सकता। पर वह भी नहीं है और मकसद आप समझ सकते हैं। इसे देखना और रोकना जिसका काम है उसे आप जानते हैं। ऐसे में द टेलीग्राफ की प्रस्तुति निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। यह प्रधानमंत्री के मुकाबले विपक्ष के नेता, राहुल गांधी की हस्ती को बता रहा है जिसे भाजपा, सरकार और संघ परिवार ने कई वर्षों तक खराब करने की कोशिश की है। नरेन्द्र मोदी टक्कर के होते तो फिर भी नजरअंदाज किया जा सकता था लेकिन उनकी अलग कहानी है जो सुनाई नहीं जाती।
निश्चित रूप से अखबारों का काम ऐसे मौकों पर निष्पक्ष रहना है लेकिन वे जो कर रहे हैं उसे नोट भी नहीं किया जा रहा है। आलोचना तो बहुत बाद की बात है। मुझे लगता है कि टेलीग्राफ की प्रस्तुति काफी हद तक निष्पक्ष है। अखबार ने दीवाली संदेश के मुख्य शीर्षक के तहत आज की तीनों खबरों को छापा है। पहली का शीर्षक है, मोदी ने रक्षा निर्यात को मजबूत तेजी की शुरुआत की। दूसरा शीर्षक है, मिठाई की दुकान पर राहुल गांधी ने श्रम के सम्मान की मांग की। आप समझ सकते हैं कि एक व्यक्ति और नेता के रूप में दोनों में कितना अंतर है। पर हमारी मीडिया ने एक को महान और दूसरे को पप्पू साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। इस व्यवस्था को संरक्षण देने वाले देशभक्ति का दावा भी करते हैं। हिमाकत यह कि सोनम वांगचुक भी नहीं बचे। कहने की जरूरत नहीं है कि स्थिति बहुत खराब है लेकिन कोई समझना नहीं चाहे तो कुछ किया नहीं जा सकता है या कुछ होने वाला नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


