तौलकर, नापकर बराबर…. एक जैसी फोटो भी ।
संजय कुमार सिंह
पत्रकारिता का सामान्य सिद्धांत है, एक जैसी खबरें एक साथ और पक्ष-विपक्ष दोनों को समान महत्व। आज के अखबारों ने इन दोनों ही सिद्धांतों का पालन नहीं किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल आईआईटी दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह में शामिल हुए तो विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इलाहाबाद में युवाओं की रैली की। कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी की रैली में मौजूद युवाओं की संख्या दीक्षांत समारोह के मुकाबले बहुत ज्यादा होगी। दीक्षांत समारोह एक महत्वपूर्ण लेकिन औपचारिक आयोजन होता है। दूसरी ओर राहुल गांधी की रैली का इंतजार था, सरकार (या स्थानीय निकाय) ने इसकी राह में रोड़ा बनने की पूरी कोशिश की फिर भी रैली हुई लेकिन आज उसकी खबर दिल्ली के अखबारों में (पहले पन्ने पर) ढूंढ़नी पड़ी। प्रधानमंत्री की खबर लगभग सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। सिर्फ देशबन्धु अपवाद है। यहां राहुल गांधी की रैली की खबर लीड है। कोलकाता के द टेलीग्राफ और दि इंडियन एक्सप्रेस में दोनों खबरें लगभग बराबर में हैं। द टेलीग्राफ में दोनों मिलाकर लीड है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड झारखंड में छात्रों का विरोध है। अमर उजाला और द हिन्दू में छात्रों की खबर पहले पन्ने पर है लेकिन सिंगल कॉलम में है। आप जानते हैं कि झारखंड में भाजपा की सरकार नहीं है और जो है वह कांग्रेस समर्थित है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को केंद्र की भाजपा सरकार जेल भिजवा चुकी है। जेल जाने से पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरन ने इस्तीफा दे दिया था और जिन्हें मुख्यमंत्री बनाकर जेल गए थे वे भाजपा के पाले में जाकर बैठ गए थे। कहानी अलग लेकिन दिलचस्प है। ऐसी रिपोर्टिंग अब नहीं होती है। मुझे लगता है कि यह सही पत्रकारिता नहीं है लेकिन पत्रकारिता का हाल लंबे समय से बुरा है। यह मीडिया संस्थानों के साथ-साथ सरकार के कारण भी है। लेकिन अलग मुद्दा है। भाजपा के सत्ता में आने के बाद पत्रकारों को यह ज्ञान दिया जाता रहा है कि विरोध करते हैं तो तारीफ भी करें। स्पष्ट रूप से तारीफ करना पत्रकारिता नहीं है और न पत्रकारों का काम है। फिर भी पत्रकारों से इसकी अपेक्षा की जाती है और सरकार के खिलाफ खबरें न हों इसके लिए विज्ञापनों का लालच तो है ही, सरकारी एजेंसियों से परेशान करने के भी उदाहरण हैं। इस हद तक कि अन्य धंधों की तरह मीडिया का धंधा भी सरकारी सेठ ने खरीद लिया या उसे दिलवा दिया गया। ऐसी स्थिति में देशबन्धु ने उन्हें पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है तो गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन विज्ञापन के लिए जिन अखबारों ने प्रधानमंत्री को पहले पन्ने पर जगह दी है उन्होंने राहुल गांधी को जगह नहीं दी है तो उल्लेखनीय जरूर है।
आइए, पहले यह देखें कि प्रधानमंत्री ने आईआईटी के दीक्षांत समारोह में क्या कहा या पहले पन्ने पर क्या छपा है। मुझे नवोदय टाइम्स की लीड सबसे ज्यादा खटक रही है। शीर्षक है, युवा सशक्त होंगे तो देश सशक्त होगा। मुझे लगता है कि यह नरेन्द्र मोदी का पाखंड है और युवाओं पर लाठी-गोली चलवाने के बाद उनका यह दावा (या ज्ञान) पाखंड के सिवा कुछ नहीं है। मीडिया का काम है कि वह पाठकों को और असल में युवाओं को इससे सतर्क करे। शिक्षा, परीक्षा, कौशल विकास और युवा आंदोलन के साथ इस सरकार ने जो किया है उसमें प्रधानमंत्री को कोई हक नहीं है कि वे ऐसी बातें करें और करें तो मीडिया उसे जस का तस रिपोर्ट कर दे। मीडिया की हालत आप जानते हैं। सवाल पूछने वाले युवाओं के साथ क्या हुआ, कहने की जरूरत नहीं है। फिर उन्होंने कहा है और नवोदय टाइम्स की लीड का इंट्रो है, बिना सोचे-समझे स्वीकार की जाने वाली बातों पर सवाल उठाएं। मुद्दा यह है कि करण थापर के सवाल पर मोदी इंटरव्यू छोड़कर उठ गए थे और करण थापर ने अपनी किताब में बताया है कि उसके बाद कई साल तक मोदी के समर्थकों और प्रचारकों ने भी उन्हें इंटरव्यू नहीं दिया या उनके साथ औपचारिक बात नहीं की। नवोदय टाइम्स में झारखंड के छात्र आंदोलन की भी खबर है लेकिन राहुल गांधी के कार्यक्रम – छात्रों की गूंज की खबर नहीं है जबकि वह भी युवाओं के लिए थी। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है – सवाल ही न पूछें, समाधान भी दें। खबर के अनुसार प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि देश को आपके (युवाओं के) नेतृत्व का इंतजार है। अगले 35 साल युवा जो करेंगे, वही विकसित भारत का आधार होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे युवाओं की शिक्षा-परीक्षा का बुरा हाल रहा है। विरोध करने की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई और विरोधियों के साथ बर्बरता की गई और अब यह सब ज्ञान की बातें। राहुल गांधी की खबर सवा कॉलम में छपी है, सिस्टम ने युवाओं को चक्रव्यूह में फंसाया। दैनिक भास्कर में नरेन्द्र मोदी की खबर चार कॉलम में टॉप पर छपी है और शीर्षक है – “सिर्फ सवाल न पूछें, हल भी खोजें : मोदी”। इसके साथ यह भी है, करियर के फैसलों से जोड़ें देश का विकास….। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी ने कौशल विकास योजना की घोषणा बड़ी धूम-धाम से की थी लेकिन उसके लाभार्थी कहीं नजर नहीं आते। एक खबर जरूर थी कि सीएजी ने इनमें सैकड़ों करोड़ के घोटाले का अंदेशा जताया है। इसके बावजूद, दि एशियन एज की लीड के अनुसार, आईआईटी में प्रधानमंत्री मोदी ने आईआईटी जेन जी से कहा, आप विकसित भारत की यात्रा को शक्ति देंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि युवाओं की यह चिन्ता युवाओं के आंदोलन से नहीं आई है युवाओं के साथ हुई बर्बरता पर जवाब मांगने से हुई है। पर वह अलग मुद्दा है।
आज टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू की और दैनिक भास्कर की लीड छात्रों की खबर नहीं है। पहले इन खबरों को देख लें फिर उन खबरों को बात जिसमें प्रधानमंत्री के दीक्षांत समारोह और राहुल गांधी की रैली को बराबर महत्व दिया है। भले ही दीक्षांत समारोह औपचारिक कार्यक्रम है और छात्रों की गूंज सताए गए युवाओं को मंच और आवाज देने की कोशिश। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, एनडीए से अलग होने के छह साल बाद बादल परिसीमन पर जोर देने का समर्थन कर रहे बादल हैं। केंद्र को डीएमके, एनसीपी (एसपी) का भी भरोसा है। देश की मौजूदा राजनीति में यह भी एक महत्वपूर्ण खबर या सूचना है और बता रही है कि स्वार्थी राजनेता अपने लाभ के लिए पुराने मतभेद भूल जाते हैं। आप जानते हैं कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी है और परिसीमन से सांसदों की संख्या बढ़नी है। उससे जो असंतुलन होगा, दक्षिण भारत के साथ जो बुरा हो सकता है – सबको छोड़ भी दें तो सांसदों की संख्या डेढ़ गुना करने की कोई जरूरत नहीं है। खासकर तब जब सैकड़ों सरकारी पद खाली हैं और सांसदों का खर्च मामूली नहीं बढ़ेगा, देश की अर्थव्यवस्था वैसे भी पिछले सालों में चौपट ही हुई है। यहां तक पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था करने का प्रचार भी अब याद नहीं है। द हिन्दू की लीड भी मोदी की राजनीति से ऊपर और अलग, एसआईआर पर है। लीड का शीर्षक है, एसआईआर के नवीनतम चरण में वोटर लिस्ट से 1.5 करोड़ से ज़्यादा नाम हटाए गए। 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर का तीसरा चरण चल रहा है; 12 के लिए ड्राफ़्ट लिस्ट जारी की गई है; आंध्र प्रदेश में सबसे ज़्यादा 44.89 लाख नाम हटाए गए; कुछ राज्यों में गिनती का चरण बढ़ाया गया है। दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक है, ऑटो इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव – नई पॉलिसी अप्रैल 2027 से लागू होगी। मुख्य शीर्षक है – हाईब्रिड व ईवी कारें सस्ती होंगी और ज्यादा प्रदूषण वाली महंगी। इसके साथ एक एक्सप्लेनर भी है। इसका शीर्षक है – ई85 व ई100 इथेनॉल वाली कारें लेने पर भी फायदा होगा। मुझे लगता है कि कारें बाजार में आने दी जाएं। उपयोग करने वाले अपना अनुभव बताएंगे तो आगे लोग तय करेंगे। कंपनी भी प्रचार करेगी। ऐसे में ई20 को लेकर भी जब सरकारी दावे भी भ्रामक लग रहे हैं। सरकार नागरिकों की सुन नहीं रही है इसलिए सरकारी दावों से भ्रम फैलाने से बचा जाना चाहिए।

द टेलीग्राफ की आज की रिपोर्ट संतुलित, सधी हुई और दोनों पक्षों की है। आप कह सकते हैं कि झारखंड आंदोलन की खबर नहीं है जैसा इंडियन एक्सप्रेस में है। मुझे लगता है कि बोफर्स दलाली का प्रचार करने वाले इंडियन एक्सप्रेस में मामला खत्म होने की खबर कल पहले पन्ने पर नहीं होना और आज छात्रों के प्रदर्शन को लीड बनाया जाना बताता है कि क्यों वह सामान्य खबर नहीं है। वैसे भी, सरकार में बैठे लोग और सरकार के समर्थक पूछते रहे हैं कि राहुल गांधी झारखंड क्यों नहीं जा रहे हैं। एक्स पर किरेन रिजिजू ने भी ऐसा ही कुछ लिखा है। राज्यसभा के सभापति (सीपी राधाकृष्णन) ने संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से कहा था कि वे विपक्ष की भावनाओं को गृह मंत्री (अमित शाह) तक पहुंचाएं। रिजिजू ने यह नहीं बताया है कि गृहमंत्री या सरकार की ओर से क्या प्रतिक्रिया दी गई है जबकि यह निर्देश मुख्य रूप से विपक्ष की मांग को आगे पहुँचाने के लिए आसन की तरफ से दिया गया था। किरेन रिजिजू ने सदन में यह कहा है कि विपक्ष यह तय नहीं कर सकता कि कौन सा मंत्री सदन में आएगा और उन्होंने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही में बाधा डालने का आरोप लगाया। आप समझ सकते हैं कि रिजिजू अपना काम कैसे कर रहे हैं और जो कर रहे हैं वह क्या है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री ने छात्रों तक स्पष्ट और अलग संदेश पहुंचाए। राहुल गांधी ने युवाओं के गुस्से को मंच दिया। साथ छपी तस्वीर में मंच पर राहुल गांधी के साथ कुछ छात्र भी हैं। कैप्शन में बताया गया है कि राहुल गांधी ने शनिवार को इलाहाबाद में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में छात्रों से बातचीत की। राहुल गांधी की खबर का शीर्षक है, राहुल ने युवाओं की नाराजगी को मंच दिया। प्रधानमंत्री मोदी की खबर का शीर्षक है, आईआईटी के स्नातकों के लिए मोदी का बड़ा मंत्र : सवाल पूछें।
मुझे लगता है कि इससे दोनों राजनेताओं की राजनीति और कार्यशैली भी स्पष्ट हो जाती है। खबर यही है और यही होनी चाहिए। अखबार प्रधानमंत्री या राहुल गांधी की छवि बनाने का काम पैसे लेकर या बिना लिए भी कर सकते हैं लेकिन उनका यह काम नहीं है। मीडिया का काम है, तथ्यों को स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से प्रस्तुत करना ताकि पाठक जानकार निर्णय ले सकें। लेकिन देश की मीडिया ने पहले तो भाजपा और नरेन्द्र मोदी के इशारे पर कांग्रेस को भ्रष्ट और हिन्दू विरोधी प्रचारित किया। अदालत में जो मामला था वह साबित नहीं हुआ और नरेन्द्र मोदी अभी भी बच्चों को ज्ञान दे रहे हैं जबकि अपनी शिक्षा पर बात नहीं करते हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर दोनों नेताओं को बराबर और एक जैसा दिखाने की कोशिश लगती है। ठीक है कि राहुल गांधी को बराबर महत्व दिया गया है और नहीं देते तो कोई क्या कर लेता। दूसरे बोफर्स प्रचारक ने ऐसा ही किया है। नरेन्द्र मोदी की खबर दो कॉलम में है, एक कॉलम की फोटो मंच की है और राहुल गांधी की खबर सिंगल कॉलम में फोटो भी कटआउट और वह भी फाइल से। साफ है कि आज के अखबार युवाओं को मोदी ज्ञान देते हुए उनका प्रचार कर रहे हैं और इसमें पत्रकारिता के सामान्य सिद्धांतों का भी पालन नहीं हो रहा है। रांची का आयोजन केंद्र सरकार या भाजपा प्रायोजित नहीं भी हो तो उसका इस्तेमाल भाजपा के प्रचार में और राहुल गांधी को मुश्किल में डालने के लिए खूब हो रहा है। जो किरेण रिजिजू वेतन भत्ते मिलने और बिना छुट्टी, रोज 18-20 घंटे काम करने करने का दावा करने वालों के लोकसभा-राज्यसभा में नहीं आने का बचाव कर रहे हैं वही एक्स पर लिख रहे हैं, राहुल गांधी जी को प्रयागराज की जगह रांची जाना चाहिए था जबकि ऐसी सलाह देना उनका काम नहीं है और अधिकार तो नहीं ही है। दूसरी तरफ राहुल गांधी कहां जाएं उनका निर्णय है और वे अपने (या पार्टी) खर्च पर फैसला कर रहे हैं, सरकार कोई मदद नहीं कर रही है, उल्टे परेशान कर रही है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


