संजय कुमार सिंह
आज फिर बस में आग लगने की खबर है। इससे पहले 14 अक्टूबर 2025 को जैसलमेर-जोधपुर मार्ग पर आग लगने की घटना हुई थी। इसमें एक निजी बस में आग लगने से कम-से-कम 21 लोग मारे गए थे। आज कुरनूल (आंध्र प्रदेश) के पास के हादसे की खबर छपी है। कार में आग लगने की घटना को गंभीर माना जाता है। संबंधित कंपनी भी बदनामी से बचने के लिए स्पष्टीकरण देती हैं। बसों के साथ ऐसी बात नहीं है। इसका कारण यह है कि उसका चेसिस कोई कंपनी बनाती है और बॉडी दूसरी। चेसिस बनाने वाली कंपनियां बड़ी और संगठित क्षेत्र की है लेकिन बॉडी बनाने वाले कई संस्थान हैं। ऐसे में आग लगने, मौत और सुरक्षा उपाय न होने या नाकाम रहने के मामले गंभीर हैं और यह सब देखना सरकार का काम है। हमेशा चुनाव जीतने में लगे नरेन्द्र मोदी ऐसे कामों पर ध्यान नहीं देते हैं और चूंकि उन्हें ही इससे मतलब नहीं है तो नीचे वाले क्यों परवाह करें। दूसरी ओर, उनका काम अभी भी जंगल राज की चर्चा से हो जाएगा तो उन्हें काम करने की जरूरत क्यों है। वैसे भी, नरेन्द्र मोदी की सफलता प्रचार आधारित है और अभी भी यही सब चल रहा है। सरकार ने कारों को मोडिफाई करने पर रोक लगा दी है। बसों के मामले में कोई मानक है या नहीं पता नहीं है। अभी तक जब सड़कें नहीं थीं और निजी बसें नहीं चल रही थीं तो नियम न हों, जंगल राज रहा हो, अलग बात है। लेकिन अब जब लोगों की जान जा रही है तो सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए पर उसकी चर्चा नहीं है।
देशबन्धु ने बस में आग लगने की खबर के साथ राहुल गांधी की मांग को भी पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा है। उन्होंने कहा है कि हादसों पर जवाबदेही तय हो। मुझे लगता है कि सत्ता पाने के लिए झूठे सच्चे आरोप लगाना और फिर काम की बात की बजाय मन की बात करना भी आधुनिक जंगल राज है। विपक्ष ऐसी राजनीति नहीं करता है और जो करता है उसे मीडिया में महत्व नहीं मिलता है और जनता को पता ही नहीं चलता है। जनता समझ रही होगी कि मीडिया में शिकायत ही नहीं है और मुफ्त राशन मिल रहा है तो सब ठीक ही होगा। लेकिन यह देश सेवा या देश भक्ति नहीं है। ऐसी स्थिति में देश के प्रधानमंत्री एक राज्य में चुनाव जीतने के लिए विपक्षी गठबंधन को लठबंधन कह रहे हैं। नवोदय टाइम्स ने चार कॉलम का शीर्षक लगाया है – मोदी बोले, महागठबंधन है ‘महालठबंधन’। यहां गौरतलब है कि राहुल गांधी विदेश में भारत से संबंधित सच भी बोल दें तो भाजपा के लोगों को तकलीफ होती है कि देश की बदनामी होगी। लेकिन मीडिया के लिए मुद्दा यह नहीं है कि देश का प्रधानमंत्री (जिसपर वोट चोरी का आरोप है) विपक्षी गठबंधन को ‘महालठबंधन’ कह रहा है तो कैसा आदमी है, उसके प्रशंसक कैसे हैं और देश में चुनावी व्यवस्था का क्या हाल है। चुनाव लड़ने वाली किसी पार्टी का नेता दूसरी पार्टी के बारे में ऐसा बोल रही है तो यह कोई अच्छा संदेश नहीं है। फिर भी किसी के लिए मुद्दा नहीं है। नागरिकों का एक वर्ग चाहता है कि विपक्ष को भी यही सब करना चाहिए और विपक्ष ऐसा नहीं कर रहा है तो उसकी आलोचना भी होती है लेकिन आदर्श आचार संहिता का अचार लग गया – यह मुद्दा ही नहीं है।

बिहार में जंगल राज – पुराने की चर्चा खबर के रूप में, मौजूदा स्थिति का चित्रण तस्वीर के रूप में। दि एशियन एज के सौजन्य से – प्रयोग या संयोग?
देश में सरकारी व्यवस्था का हाल बताने वाली एक खबर कई अखबारों में है। इसके अनुसार महाराष्ट्र में एक महिला डॉक्टर पांच महीने तक यौन शोषण व प्रताड़ना सहती रही। कार्रवाई नहीं हुई तो हथेली पर सुसाइड नोट लिखकर आत्महत्या कर ली। यहां आपको पश्चिम बंगाल के मामले की याद दिलाऊं जहां अपराध की एक वारदात में महिला डॉक्टर से बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। इसपर देश भर के भाजपाइयों और मीडिया का रुख अलग ही था। तब की खबरें निकाल कर कोई भी देख सकता है। यहां इस मामले में पांच महीने प्रताड़ना चलती रही, शिकायत पर कार्रवाई नहीं हुई तब भी भाजपाइयों की प्रतिक्रिया वैसी नहीं है जैसी कलकत्ता के मामले में थी। यह भाजपा की राजनीति है या उसके केंद्र की सत्ता में होने के कारण, सच है। खबर यह छपी है कि मुख्यमंत्री ने आरोपी को किया निलंबित। बंगाल मामले में आरोपी गिरफ्तार हो गया था फिर भी सीबीआई की जांच हुई। कुछ नया नहीं मिला वहां अपराध के लिए मुख्यमंत्री और सरकार जिम्मेदार थी। यहां शिकायत पर कार्रवाई नहीं करने वाले को निलंबित कर दिया और काम खत्म। मामला महाराष्ट्र के सतारा जिले का है। डॉक्टर सरकारी अस्पताल में तैनात थी। जहां तक गठबंधन को लठबंधन बताने की बात है, तेजस्वी यादव ने कहा है कि हमारी राजनीति झूठ नहीं, भरोसे की है (देशबन्धु)। लेकिन यह खबर वैसे नहीं छपी है जैसे रोज करोड़ों का विज्ञापन दे-दिला सकने वाले प्रधानमंत्री के फूहड़ बयान की छपी है।
खबरों के अनुसार, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने 27 जनवरी 2022 को एक अधिसूचना जारी करके कहा था कि “टाइप III” (लंबी दूरी की तथा स्कूल) बसों में भविष्य में फायर अलार्म तथा फायर प्रोटेक्शन सिस्टम अनिवार्य होंगे। नई बसों में फायर अलार्म तथा रक्षा प्रणाली (यात्रियों वाले हिस्से में) अनिवार्य होनी चाहिए होगी भी। फिर भी आग लग रही है, लोग मर रहे हैं अखबार नहीं बता रहे कि नियम क्या है, उनमें क्या चूक हुई और क्या कार्रवाई हुई। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा बताने लगें तो पाठक तय कर पाएंगे कि कौन सा जंगल राज बुरा है या जंगल राज बुरा था अथवा विकास। बस में आग लगने की दोनों घटना निजी बसों की है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आवश्यक सुरक्षा उपायों के बिना निजी बसों को चलने की इजाजत दे दी गई है। जोधपुर से पहले मई में उत्तर प्रदेश में एक बस में आग लगने से पांच लोगों की मौत हो गई थी। खबर यह भी थी कि चालक और कंडक्टर फरार थे। यह व्यवस्था की स्थिति है और इसे आधुनिक जंगल राज कहा ही जा सकता है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मन की बात कर रहे हैं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें जनता के मन की बात से मतलब नहीं है या जनता के मन की बात उन तक पहुंच नहीं रही है। अगर नरेन्द्र मोदी का शासन आदर्श है और वाकई राम राज्य है तो अखबारों को यही बताना चाहिए प्रधानमंत्री को झूठ और पाखंड का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। लेकिन अखबार वही कर रहे हैं जो संभवतः उनसे कहा जाता है या विज्ञापनों के बदले अपेक्षित होता है।
इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने की एक खबर से बताया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर्पूरी ठाकुर की विरासत का लाभ उठाने का निर्णय किया और समस्तीपुर में अपनी पहली रैली को संबोधित करने से पहले कर्पूरी ग्राम का दौरा किया। लोकसभा चुनाव से पहले कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की राजनीति वे पहले ही कर चुके हैं। ठीक है कि उन्हें यह सम्मान उनके जन्म शती वर्ष में दिया गया पर यह निर्णय उनके निधन से पहले या निधन के समय नहीं हुआ हो तो मृत्यु के बाद के वर्षों में कोई भी ऐसा कोई काम नहीं कर सकता है कि उसे भारत रत्न दे दिया जाए। जाहिर है, यह निर्णय राजनीतिक है और इसका पता इसी साल लाल कृष्ण आडवाणी को भी भारत रत्न दिए जाने से लगता है। यही नहीं, अभी तक हर साल अधिकतम तीन और इस बार अचानक पांच भारत रत्न चुन लिए जाने का कारण भी राजनीतिक और चुनावी ही होगा। ऐसे में विधानसभा चुनाव में कर्पूरी ठाकुर का उपयोग नहीं किया जाना असामान्य होता, उनके गांव जाना और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश का हक तो सम्मान देने के बाद ही मिल गया था। जो भी हो, भ्रष्टाचार मिटाने आए नरेन्द्र मोदी ने कैसे-कैसे और कौन-कौन से भ्रष्ट आचरण किए हैं उसपर एक किताब हो सकती है, भले वे दावा करें कि उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। हो या नहीं, अभी यह सब मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि गुजराती प्रधानमंत्री बिहार चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक लठैती कर रहे हैं और खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। शीर्षक में अंग्रेजी के ठग शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ होता गुंडा। मुझे नहीं लगता कि विपक्ष के नेताओं में कोई पूर्व तड़ीपार है फिर भी वे विपक्षी गठबंधन को गुडों का गठबंधन (लठबंधन) कहने की हिमाकत कर सकते हैं क्योंकि विपक्ष के नेता कार्यकर्ता और समर्थक उनके समर्थकों जैसे नहीं हैं कि, राहल गांधी के सवाल पर भी मुकदमा हो गया। दूसरे राज्य का मामला दूसरे राज्य में सुन लिया गया और जब सरकार को जरूरत थी तो फैसला आ गया और सरकार ने राहुल गांधी को डराने की अपनी कोशिश कर ली।
टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू की लीड बस में आग लगने की खबर है लेकिन दि एशियन एज में भी प्रधानमंत्री का ‘मास्टरस्ट्रोक’ लीड है। ऊपर लिख चुका हूं कि प्रधानमंत्री ने अपने और मित्र नीतिश कुमार के डबल इंजन वाले शासन से पहले के जंगल राज का जिक्र किया पर अपने आधुनिक और मौजूदा जंगल राज की चर्चा नहीं की। दि एशियन एज ने दोनों खबरों को साथ रखा है। कहना चाहिए कि आधुनिक जंगल राज के कई उदाहरणों में से एक को उनके आरोप के साथ दिखा दिया है। दि एशियन एज में प्रधानमंत्री के आरोप के साथ शुक्रवार को पटना स्टेशन की भीड़ की इस फोटो को छाप कर बताया है कि 10 साल की उनकी सरकार में बिहार को क्या मिला है। आप चाहें तो इसे प्रतीकात्मक मान सकते हैं, वास्तविकता तो यह है ही। 20 साल पहले के जंगल राज को प्रधानमंत्री अब कैसे मुद्दा बनाते हैं और कैसे यह लीड है – दोनों चीजें मेरी समझ से परे हैं। और कोई कहे तो यह खबर ही नहीं है, प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर बन सकती है लेकिन लीड तो होली की खबर भी न बने। खास कर इतने समय बाद, इस हालत में। द टेलीग्राफ की लीड भी बिहार में मोदी का चुनाव प्रचार है लेकिन शीर्षक है, “मोदी का एन : नीतिश? नहीं, एनडीए”। नरेन्द्र मोदी और भाजपा के 11 साल में न सिर्फ देश हिन्दू-मुसलमान में बंट गया है बल्कि पत्रकारिता भी सरकार समर्थक और विरोधी हो गई है। कायदे से आज खबर यह होनी चाहिए थी कि कौन अपना चुनाव प्रचार कैसे कर रहा है। देशबन्धु ने दोनों को अलग-अलग छापा भी है। बीट के कारण पार्टियों की खबर अलग आ सकती है लेकिन डेस्क का काम था कि बिहार चुनाव की एक कौम्पैक्ट खबर लगाता।
अभी जो छपा है उसे पढ़कर ही लगता है कि एक पक्ष की खबर है, दूसरा गोल। लेकिन ज्यादातर अखबारों ने नरेन्द्र मोदी का प्रचार किया है। टेलीग्राफ में नरेन्द्र मोदी का प्रचार तो नहीं है लेकिन विपक्ष की खबर भी नहीं है। ऐसे में बीस साल पुराने जंगल राज की चर्चा अब करना और अपने 10 साल पर चुप्पी साध लेना भी खबर है। यह भी किसी अखबार में नहीं दिखी और कारण यही है कि सरकार को नाराज नहीं कर सकते हैं। लिहाजा चुनावी मुद्दा यह हो गया है कि किसने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया, किसने यादवों को दिया और, गठबंधन की सरकार बनेगी तो मुख्यमंत्री कौन होगा (हालांकि अब इसकी घोषणा हो गई है)। दूसरी ओर, भाजपा सरकार बनाने का तो दावा कर रही है लेकिन मुख्यमंत्री कौन होगा, पता नहीं है और नीतिश नहीं होंगे – यह भी लगभग स्पष्ट है। कुल मिलाकर, आज की पत्रकारिता सरकार का प्रचार करने और नहीं करने की मजबूरी है। हालांकि, अमर उजाला जो प्रचार करता है वह मजबूरी नहीं भागीदारी है। उदाहरण के लिए आज टॉप की खबर का शीर्षक है, “जो नौकरी के बदले जमीन हड़प गए, वो नौजवानों को रोजगार क्या देंगे : मोदी”। उपशीर्षक है, पीएम मोदी ने बिहार चुनाव का फूंका बिगुल, राजद-कांग्रेस के भ्रष्टाचार मॉडल पर कड़ा प्रहार। तथ्य यह है कि तेजस्वी ने रोजगार देकर दिखाया है। उसकी साख इसी कारण है। उससे परेशानी का कारण भी यही है। आप जानते हैं कि चुनाव जीतने के बाद पलटू नीतिश ने तेजस्वी के साथ सरकार बनाई थी और भाजपा के दबाव में कहने लगे कि तेजस्वी को इस्तीफा दे देना चाहिए। उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई, सरकार गिरी, और पलटू राम ने फिर शपथ ली। उसके बाद शुरू हुए मुकदमे की खबर से अभी संघी सिस्टम ने चुनाव का बिगूल फूंका था और सारा खेल टाइमिंग का था पर वह सब पुरानी बात है। आज के इस आरोप के जवाब में तेजस्वी उनसे पूछ सकते थे कि आप तो बड़ी-बड़ी बातें करके आए थे उसका क्या हुआ। चौकीदार बनना था और वोट चोरी के आरोप से बरी नहीं हो पा रहे हैं तो क्या होता। मीडिया स्वतंत्र होता तो यही होता और वो नहीं होता जो हो रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



अनन्त वर्मा
October 25, 2025 at 6:48 pm
संजय सर मै बहुत दिनों से आपका ये कालम नियमित रूप से पढ रहा हूं पर एक बात समझ नहीं पा रहा हूं की आप ये हर दिन लिखते हैं कि प्रधानमंत्री ने अपने इस गलत काम के लिए कुछ नहीं बोला सर अपनी मां को डायन कौन बोलता है और वो भी इस सरकार से जिसके कभी कोई गलती होती ही नहीं है और जो कभी गलत काम ही नहीं करती उनके पुराने वादे याद दिलाने पर पूरी बेशर्मी से उन्हें चुनावी जुमला बता कर किनारा कर लेती है तो आप क्या उम्मीद करते हैं की पूरी सरकार और विशेषकर मोदी जी अपनी गलत बयानबाजी/ कार्य के लिए माफी मांगेगे या खेद प्रकट करेंगे?????