उर्मिलेश-
हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक-संपादक भाई Pankaj Bisht का आज 80वां जन्म दिन है. उन्हें बहुत-बहुत बधाई और शुभकामना।

पंकज जी ने काफी कुछ और बहुत सार्थक लिखा है। पर मैंने उनका सिर्फ एक उपन्यास ‘लेकिन दरवाजा’ ही पढ़ा है..हां, कहानियां कई पढ़ी हैं। यह तब की बात है, जब उपन्यास और कहानी पढ़ने के लिए हमारे पास समय होता था। मजे की बात है कि आज भी मेरे घर की लाइब्रेरी में उनकी दो किताबें: लेकिन दरवाजा और बच्चे गवाह नहीं हो सकते (कहानी संग्रह) रखी हुई हैं। ये दोनों मैंने खरीदकर पढी थीं। मेरी नज़र में वह हिंदी के एक महत्वपूर्ण, मौलिक और बहुत ऊर्जावान लेखक हैं।
एक संपादक और बुद्धिजीवी के रूप में वह हिंदी के उन गिने-चुने लेखकों में हैं, जिनके पास आज भी सच कहने-लिखने का साहस, समझ और जमीर है। यह बात 80वें जन्म-दिन पर महज उनकी बड़ाई करने के लिए मैं नहीं लिख रहा हूं। यह सच है और ‘समयांतर’ इसका जीवंत सबूत है।
हमारे हिंदी-भाषी क्षेत्र के ज्यादातर बुद्धिजीवियों के एक नहीं, कई-कई चेहरे होते हैं। प्रगतिशील और जनवादी कहे जाने वाले भी इसके अपवाद नहीं!
हाल के दो-तीन दशकों पर गौर करें तो हिंदी के लेखकीय और वैचारिक क्षेत्र में काफी कुछ बदलता नजर आयेगा। इस दौर में समाज के वंचित और सबाल्टर्न समूहों के बीच से लेखकों-रचनाकारों की अपेक्षाकृत अच्छी संख्या आई है और लगातार आ रही है। पहले इन वर्गों से यदा-कदा कुछ बडे नाम उभरते थे। पर आज इन समूहों से उभरने वालों में निरंतरता है! ऐसे लोग हिंदी लेखन की धार और धारा को बदलने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। नयी पीढी और सोच के इन नये लेखकों ने पुराने दौर के कुलीन मान-मूल्यों को चुनौती दी है. पहले के स्थापित लेखकों-प्रकाशकों-संपादकों के शब्द और कर्म के भेद का भंडाफोड़ भी किया है.
राजेंद्र यादव के निधन के बाद पुरानी पीढी के स्थापित और प्रसिद्ध हिंदी लेखकों-संपादकों में मुझे पंकज बिष्ट इकलौते ऐसे लेखक-संपादक नजर आते हैं जो सबाल्टर्न पृष्ठभूमि से उभरते इन नये लेखकों-रचनाकारों और पत्रकारों को लगातार प्रेरित करते आ रहे हैं।
पंकज जी से मेरी कभी निजी तौर पर बहुत निकटता नहीं रही। प्रोफेशनल कारणों और व्यस्तताओं के चलते साहित्यिक गोष्ठियों और हिंदी बुद्धिजीवियों की बैठकबाजी में मेरा आना-जाना लगभग नहीं रहा है। पर एक-दूसरे को जानने-समझने के लिए सिर्फ मिलना-जुलना ही एकमात्र विकल्प नहीं। लेखन खासतौर पर वैचारिक लेखन से भी इसे एक-दूसरे को काफी कुछ समझा जा सकता है।
जहां तक याद आ रहा, पंकज जी से हमारी पहली मुलाकात कनॉट प्लेस के मोहन सिंह प्लेस वाले कॉफी हाउस में हुई थी। पता नहीं, वह सन् 1978 या 79 था. दिल्ली में मैं नया-नया आया था। जे एन यू में एम.फिल./पीएच डी कोर्स में दाखिला हुआ था। एक शाम गोरख पांडेय के साथ दिल्ली के तरक्कीपसंद लेखकों-बुद्धिजीवियों से मिलने कॉफी हाउस आया। उसी कॉफी हाउस में पहली बार विष्णु प्रभाकर, विष्णु चंद्र शर्मा, डी प्रेमपति, सुरेश सलिल, कंचन कुमार, रामकुमार कृषक, कलाकार विभास दास और अनिल करंजई जैसे लोगों से मुलाकात हुई थी। पंकज जी से भी मेरी पहली मुलाकात यहीं हुई थी।
तब से अब तक का दौर देखता हूं तो पंकज जी की जन-प्रतिबद्धता अटूट और अविरल है! बीते ग्यारह-बारह सालों में अपने समाज और राजनीति में बहुत कुछ उल्टा-पुल्टा हुआ है। हिंदी के लेखकों-बुद्धिजीवियों पर भी इस दौर ने अपना असर दिखाया है। कुछ ने बहुत जल्दी अपना रंग बदल लिया, कुछ ने भाषा बदल ली और कुछ ने तो पूरा का पूरा अपना ‘ह्रदयांतरण’ ही कर डाला! लेकिन जो कुछ लोग आज भी अपनी वैचारिकता के साथ लेखन और विचार के क्षेत्र में जमे हुए हैं, उनमें पंकज बिष्ट एक प्रमुख नाम हैं!
पंकज भाई को उनके 80वें जन्म-दिन पर आदर और प्यार के साथ एक बार फिर बहुत-बहुत बधाई। आप स्वस्थ और सक्रिय रहें. ‘समयांतर’ लगातार निकलती रहे!


