प्रियदर्शन-
महंगा होता जीवन सस्ता होता लेखन : साल 1993 में मैं दिल्ली आया था- अगले तीन साल मैंने फ़्रीलांसिंग की। 1995 में शादी की तब भी फ्रीलांसर ही था- एक तरह से बेरोज़गार। स्मिता के घरवाले परेशान थे कि लड़का करता क्या है। लेकिन फ्रीलांसिंग में मैं फिर भी इतने पैसे कमा लेता था कि छोटी-मोटी नौकरियों के प्रस्ताव ठुकरा सकूं।
सितंबर 1995 में हमने पांडव नगर में किराये का एक मकान लिया। वह पचास फुट के मकान की पहली मंज़िल पर एक कमरे का घर था जिसके साथ छत थी और एक कोने पर बाथरूम था। रसोई नहीं थी। तो उस लंबे से सफ़ेद दीवारों वाले कमरे में हमने चार कुर्सियां लगाईं, एक चौकी लगाई, एक बड़ा सा बॉक्स बना कर उसके ऊपर छोटू सिलिंडर वाला चूल्हा रखा, उस बॉक्स में रसोई का सामान रखा और हमारी गृहस्थी चल पड़ी।
तब जेब और बैंक मिलाकर हमारे पास 26 या 34 रुपये थे। लेकिन अगले तीन महीनों में हमने क़रीब 33,000 रुपये कमाए और ख़र्च किए। अप्रैल 1996 में ‘जनसत्ता’ में नौकरी शुरू करने से पहले तक इस फ्रीलांसिंग से हमारा गुज़ारा शान से चलता रहा।
लेकिन क्या अब मैं इतने पैसे कमा सकता हूं कि फ्रीलांसिंग से गुज़ारा कर सकूं? उन दिनों तीन महीने में कमाए गए 33,000 यानी महीने के 11,000 रुपये आज की तारीख़ में मुद्रास्फीति के लिहाज से कम से कम एक लाख रुपये पड़ेंगे। साल 1994 में ‘आजकल’ ने मुझे एक परिचर्चा के लिए 2,200 रुपये का भुगतान किया था जिससे मैंने एक छोटा पोर्टेबुल ब्लैक ऐंड वाइट टीवी ख़रीदा था।
मुश्किल यह कि इन तीस वर्षों में सबकुछ महंगा हुआ है, लेखक और लेखन सस्ता होता चला गया है। पत्र-पत्रिकाओं में लेखों की गुंजाइश भी घटी है और लेखक का पैसा भी। 1993 में जिस लेख के मुझे 1500 रुपये मिलते थे, उसके अब अधिकतम 3,000 मिलते हैं, जबकि कायदे से इसे 10,000 रुपये के ऊपर होना चाहिए।
इस गणित का आधार क्या है? तब दूध दस रुपए लीटर आता था, अब 72 रुपए लीटर है- यानी सात गुना ज़्यादा। तब जो मकान 2000 रुपए महीने के किराए पर मिलता था, वह कम से कम 25,000 रुपए का हो चुका है- यानी बारह गुना महंगा। मयूर विहार में जो फ्लैट छह लाख में बिकता था, अब दो करोड़ में नहीं मिलेगा- यानी करीब 35 गुना महंगा।
जबकि लेखक का पारिश्रमिक या तो बंद हो चुका है या घटता जा रहा है। जो वेब पोर्टल पहले लेखक को पैसे देते थे, उन्होंने पारिश्रमिक देना बंद कर दिया है, क्योंकि वे ‘घाटे’ में चल रहे हैं। किताबों की रॉयल्टी इतनी कम मिलती है कि बताने में कोई शर्मिंदा हो जाए। मेरी बीस प्रकाशित किताबों की सालाना रॉयल्टी 20,000 रुपये भी नहीं पड़ती। 50 करोड़ पार के हिंदीभाषी समाज में किताबें सैकड़ों में भी नहीं बिकतीं।
प्रकाशन की दुनिया में पैसे देकर- या अपनी अफ़सरी या नेतागीरी के बूते किताबें बिकवा कर- किताबें छपवाने का जो नया चलन शुरू हुआ है, उसने लेखकों के सामने एक नई मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी किताबें प्रकशकों के यहां पड़ी रहती हैं- उनका प्रकाशन टलता जाता है। किताबों के प्रचार का ज़िम्मा भी लेखक का है प्रकाशक का नहीं।
यह सब क्यों कह रहा हूं? क्योंकि अगले महीने रिटायर हो रहा हूं। निजी क्षेत्र की नौकरी है, इसलिए पेंशन नहीं है। नई नौकरी करने का इरादा नहीं है। लेखन के अलावा कुछ आता नहीं। तो लेखन के सहारे गुज़ारे की गुंजाइश देखूंगा। इसलिए मैंने तय किया है कि अब ‘मुफ्त’ में नहीं लिखूंगा। अगर आप कागज़ के लिए, मुद्रण के लिए, जिल्दसाज़ी के लिए पैसे दे सकते हैं तो लेखन के लिए क्यों नहीं? जो मुझसे लिखवाना चाहते हैं, उन्हें कुछ न कुछ पारिश्रमिक तो मुझे देना ही होगा। हां, बेशक अनुवाद और संपादन भी करूंगा- लेकिन सम्मानजनक पारिश्रमिक पर ही। अब ‘मुफ्त’ में नहीं लिखूंगा।
अगर आप कागज़ के लिए, मुद्रण के लिए, जिल्दसाज़ी के लिए पैसे दे सकते हैं तो लेखन के लिए क्यों नहीं? जो मुझसे लिखवाना चाहते हैं, उन्हें कुछ न कुछ पारिश्रमिक तो मुझे देना ही होगा। हां, बेशक अनुवाद और संपादन भी करूंगा- लेकिन सम्मानजनक पारिश्रमिक पर ही।
आज से एक दशक पहले जब मैं भी एक बड़े राष्ट्रीय दैनिक के संपादक पद से रिटायर हुआ था तब ऐसा ही दुख हुआ था। एकदम से एकमुश्त आने वाली डेढ़ लाख की तनखा घट कर शून्य पर आ गई। अखबारों और अन्य मीडिया हाउस में कहीं भी अब फ्री लांसरों को कोई सम्मानजनक राशि नहीं मिलती। अधिकांश तो देते ही नहीं। महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले पाँच दिन में ही घर का खर्च 10 प्रतिशत बढ़ गया पर नियमित आय का कोई स्रोत नहीं दिखता। पत्रकारों की बड़ी दुर्गति है। -शंभुनाथ शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार


