इंडियन एक्सप्रेस की मानें तो प्रधानमंत्री ने कहा कि डर फैलाने वाले कामयाब नहीं हुए। सच्चाई यह है कि कार बनाने वाले पुरानी गाड़ियों को इथेनॉल मिले पेट्रोल से चलाने के नुकसान बताते रहे हैं लेकिन सरकार चाहती है कि कोई न डरे। अब तो कार कंपनियों के प्रतिनिधियों से भी गोल-मोल बयान दिलवा दिया गया है।
संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, एक और दावा, सोने से मढ़ी पांच करोड़ की राम चरित मानस गायब! उपशीर्षक है, पूर्व केंद्रीय गृहसचिव का गंभीर आरोप…. ट्रस्ट को सौंपी थी मानस, पर रसीद नहीं मिली। इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, कर्नाटक से लौटे (गोपाल) राव, विमान में लगे नारे। आप जानते हैं कि चढ़ावा चोरी की जांच कर रही उत्तर प्रदेश पुलिस की एसआईटी ने गुरुवार को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पदाधिकारियों व गोपाल राव से पूछताछ की थी। कर्नाटक से लौटते वक्त विमान यात्रियों ने उन्हें पहचान लिया और उनके खिलाफ नारेबाजी की। यह सब खराब होते माहौल का संकेत है लेकिन ‘जांच’ की खबरों से अखबार रंग देने वाले लोगों ने आज इस खबर को महत्व नहीं दिया है। आप जानते हैं कि पिछले कुछ महीनों में मोदी सरकार की साख पर एक-एक करके कई बार बट्टा लगा है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना, उसके बदले कोई छूट नहीं देना, अदालत में कहना कि प्रयोग चल रहा है और प्रेस कांफ्रेंस में कहना कि सब जांच लिया गया है, बचाव में कार निर्माताओं के प्रतिनिधियों को उतारना जबकि वे पहले कह चुके हैं कि पुरानी कारों में नया मिलावटी पेट्रोल डालना नुकसानदेह हो सकता है – स्थिति का वर्णन कर रहे हैं लेकिन उसपर खबरें नहीं हैं। हालत यह है केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी माइलेज जैसी बात को गलत ढंग से समझाने की कोशिश करके दोबारा अपनी खिल्ली उड़वा चुके हैं। इससे पहले एपस्टीन फाइल में नाम होने की खबरों के बाद एपस्टीन से मिलने के मामले में झूठ बोलकर अपनी हंसी उड़वा चुके हैं। कुल मिलाकर, भाजपा और उसके समर्थक यह प्रचारित करते रहे हैं कि कट्टर हिंदुत्व भाजपा की जीत का ईंधन रहा है। अब उसी ईंधन में इथेनॉल मिलाने, स्वीकार करने और माइलेज कम होने जैसी बातों को स्वीकार करके भी यह दावा करने से कि इसका उपयोग रेसिंग कारों में होता है सरकार ने हिन्दुत्व की अपनी योग्यता में चढ़ावा चोरी का इथेनॉल मिला लिया है। प्रचारक मीडिया की आज की रिपोर्टिंग यही दिखा रही है।
यह अलग बात है कि सारे हिन्दू चढ़ावा चोरी के खिलाफ नहीं हैं और पांच करोड़ की राम चरित मानस दान करने वाले की कुल आय का हिसाब लगा रहे हैं जबकि वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं यह दान उनकी मां की तरफ से है। मुझे लगता है कि सरकार भारी संकट से गुजर रही है इसीलिए सरकार के ‘काम’ और प्रधानमंत्री के दावों को आज अखबारों में पूरी प्रमुखता मिली है। अमर उजाला ने भी भले राम चरित मानस के दान और उसके गायब होने की खबर को लीड बनाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह दावा सेकेंड लीड का शीर्षक है, 21वीं सदी के सबसे बड़े ऊर्जा संकट से उबरा भारत। उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा – जंग के चलते गैस सिलेंडर के दाम दो हजार रुपए तक पहुंच सकते थे। पर भारत ने संकट को छोटा किया। दुनिया जानती है कि गैस के लिए कैसी लाइन लगी, लोग कितना परेशान हुए फिर भी प्रधानमंत्री का यह दावा है तो वे कोविड से निपटने का भी दावा कर चुके हैं जब लाशें जलाने के लिए लाइन लगती थी। अस्पतालों में बिस्तर और ऑक्सीजन का संकट होता था। प्रधानमंत्री ने पीएम केयर्स के नाम से जो कोष बनाया उससे खरीदे वेंटीलेटर काम नहीं ही आए और पैसे खर्च नहीं हुए सो अलग। कोविड के नाम पर किससे कितने पैसे लिए गए या आए उसे छिपाना पड़ा यह अलग संकट है। फिर भी दावे तो दावे हैं। और पुरस्कार के लिए दौड़े चले आने जैसी खबरें छप रही हैं तो उसका बचाव भी किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने ऊर्जा संकट से निपटने की बात की तो मौका देश की पहली ग्रीनफील्ड एकीकृत रिफाइनरी देश को समर्पित करने का था। दैनिक भास्कर ने इस खबर को लीड बनाया है पर साथ में मोदी की बड़ी बातें भी हैं। इसका शीर्षक है – कूटनीति…. 40 से अधिक देशों से ईंधन खरीदा। इसके तीन बिन्दु हैं 1) 3,000 की यूरिया बोरी 300 में… यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक बाजार में यूरिया 3,000 प्रति बोरी पार कर गया था, लेकिन सरकार ने भारी सब्सिडी देकर किसानों को इसे 300 में उपलब्ध कराया। 2) पहले भारत केवल 25-26 देशों से कच्चा तेल खरीदता था। ईरान-इजरायल युद्ध के समय बेहतरीन कूटनीति का इस्तेमाल कर भारत ने 40 से अधिक देशों से ईंधन खरीदा। 3) भाजपा ने दशकों पुराना जल विवाद खत्म किया है। राजस्थान व हरियाणा में भाजपा सरकार होने का लाभ मिला। अब हथनीकुंड से सीकर, चूरू और झुंझुनूं को पानी मिलेगा। देशबन्धु में शीर्षक है, भारत सबसे बड़े ऊर्जा संकट से उबरा : मोदी। उपशीर्षक है, ऊर्जा संकट पर नए भारत की इच्छा शक्ति और प्रयास भारी पड़े। इस खबर के साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, गैस सिलेंडरों की कीमत दो हजार तक जा सकती थी। आप कह सकते हैं कि ये प्रधानमंत्री के दावे हैं और अखबारों में जस का तस छपते रहे हैं लेकिन राहुल गांधी की शिकायतें, आरोप आदि को महत्व नहीं मिलता है या बहुत कम मिलता है। आज देशबन्धु में एक शीर्षक है, “सड़कें धंसती रहेंगी, जानें जाती रहेंगी, सरकार टैक्स वसूलती रहेगी : राहुल”।
नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक भी नरेन्द्र मोदी का वही दावा है, देश सबसे बड़े ऊर्जा संकट से उबरा। आज मेरे अंग्रेजी अखबारों की लीड भी ज्यादातर यही खबर है। द टेलीग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया अपवाद है। आज द हिन्दू और दि एशियन एज की किसी खास खबर का उल्लेख नहीं कर रहा हूं क्योंकि (या लेकिन) लीड वही है जो दूसरे अखबारों में है। टेलीग्राफ ने बंगाल सरकार, बंगाल भाजपा और कलकत्ता की खबरों को प्राथमिकता दी है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया ने मोदी की खबर को पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है। आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी अधपन्ना है लेकिन मोदी का प्रचार ही अखबार ही लीड है। यही स्थिति इंडियन एक्सप्रेस की भी है। इंडियन एक्सप्रेस ने भारत के जलवे और हार्डवर्क की भी बात की है। आपको याद होगा 2014 में नरेन्द्र मोदी हार्ड वर्क के दम पर हावर्ड का भी मजाक उड़ाते थे। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार अब कह रहे हैं कि डर फैलाने वाले कामयाब नहीं हुए। आप जानते हैं कि हिन्दुओं के खतरे में होने का डर फैलाकर नरेन्द्र मोदी चुनाव जीत गए। मंदिर बन गया और अब चढ़ावे की चोरी का मामला चल रहा है। सब मोदी की नाक के नीचे हुआ है और मोदी या उनके समर्थक नहीं मान रहे हैं कि कुछ गड़बड़ हुई है। अभी भी कह रहे हैं कि डर फैलाई जा रही है और उन्हें कामयाबी नहीं मिली। यह इंडियन एक्सप्रेस का फ्लैग शीर्षक है। प्रधानमंत्री ने रिफाइनरी का उद्घाटन करने के बाद ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर होने के दावे किए हैं। इससे पहले स्वदेशी अपनाने की बात भी करते थे। राजस्थान के पचपदरा में रिफाइनरी-सह-पेट्रोकेमिकल परिसर का राष्ट्र को समर्पण निस्संदेह एक महत्वपूर्ण औद्योगिक परियोजना है लेकिन 12 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद हुआ है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसी परियोजनाएँ रोजगार, पेट्रोकेमिकल उत्पादन और क्षेत्रीय औद्योगिक विकास में योगदान दे सकती हैं। लेकिन किसी परियोजना के उद्घाटन के मंच से यह कहना कि देश ऊर्जा संकट से उबर गया है, एक ऐसा दावा है जिसकी कसौटी भाषण नहीं, बल्कि तथ्य हैं।
पिछले वर्षों में देश ने ऊर्जा क्षेत्र में अनेक कठिन दौर देखे हैं। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल के दौरान पेट्रोल और डीज़ल की खुदरा कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। रसोई गैस की कीमतें भी इतनी बढ़ीं कि बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं ने सिलेंडर भरवाना कम कर दिया और सरकार को बाद में राहत देने के लिए सब्सिडी तथा अन्य उपायों का सहारा लेना पड़ा। उर्वरक, विशेषकर यूरिया, पर सरकार ने भारी सब्सिडी दी, लेकिन वह किसी निजी स्रोत से नहीं, बल्कि करदाताओं के पैसे से ही दी गई। इसलिए सब्सिडी देना सरकार की मजबूरी है। वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा कह सकते हैं लेकिन यह ऐसा कोई चमत्कार नहीं जिसे प्रशासनिक कौशल माना जाए और अपनी पीठ खुद थपथपाई जाए। ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल नई परियोजनाओं का उद्घाटन नहीं होता। इसमें कच्चे तेल और गैस की आयात निर्भरता कम होना, उपभोक्ताओं को स्थिर और किफायती कीमतों पर ईंधन उपलब्ध होना तथा आपूर्ति श्रृंखला का मजबूत होना भी शामिल है। भारत आज भी अपनी तेल आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता का दावा अभी भी एक लक्ष्य है, पूर्ण उपलब्धि नहीं। पचपदरा परिसर का महत्व अपनी जगह है, लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी विशाल रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल परियोजना का लाभ उद्घाटन के दिन से पूरी क्षमता में नहीं मिलने लगता है। उत्पादन को स्थिर होने, सभी इकाइयों के पूर्ण संचालन, आपूर्ति नेटवर्क के विकसित होने और आर्थिक प्रभाव दिखने में समय लगता है। वास्तविक सफलता का आकलन आने वाले वर्षों में उत्पादन, क्षमता उपयोग, रोजगार और उपभोक्ताओं को मिलने वाले लाभ के आधार पर होगा, न कि उद्घाटन समारोह के भाषणों से। वैसे भी, लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन दावों से नहीं, परिणामों से होता है। इसलिए किसी भी नई परियोजना का स्वागत होना चाहिए, लेकिन उसके आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकालना कि देश ऊर्जा संकट से पूरी तरह उबर चुका है, तथ्यों की अपेक्षा राजनीतिक वक्तव्य अधिक है। दिलचस्प और खास बात यह है कि दिल्ली के तकरीबन सभी अखबारों ने इसे ही लीड बनाया है जबकि उत्तर प्रदेश का अमर उजाला और कलकत्ता का द टेलीग्राफ अपवाद रहा। उपलब्धियों का सबसे विश्वसनीय प्रमाण भाषण नहीं, बल्कि आम नागरिक को मिलने वाली सस्ती, स्थिर और भरोसेमंद ऊर्जा है। इस मामले में मोदी सरकार का रिकार्ड बताने की जरूरत नहीं है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



