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सुख-दुख

दैनिक हिंदुस्तान के अभावग्रस्त पत्रकार खुशहाल गोस्वामी को कैंसर ने निगला!

रवि नेगी-

अलविदा दोस्त, जहां भी रहो अपनी ये मुस्कान बनाए रखो। हिंदुस्तान अखबार के वरिष्ठ पत्रकार खुशहाल गोस्वामी का आज सुबह जौलीग्रांट में निधन हो गया।

Man in a blue checkered shirt sits at a cluttered office desk with newspapers spread across the desk and two computer monitors in the background, smiling at the camera.

खुशहाल से पहली मुलाकात 21 अप्रैल 2008 को हिंदुस्तान के दिल्ली ऑफिस में साथी मनीष भट्ट के साथ इंटरव्यू के दौरान हुई। इसके बाद हिंदुस्तान अखबार की लॉन्चिंग से लेकर आज तक हमने साथ काम किया। शुरुआत में हिंदुस्तान ऑफिस में कंधे पर एक बैग लटकाए हुए सीधे साधे खुशहाल को देखकर लगता ही नहीं था कि उसके भीतर एक गजब का तेज तर्रार पत्रकार छुपा है। 2008 में हिंदुस्तान अखबार को देहरादून में स्थापित करने में जिन रिपोर्टरों की खबरों का योगदान रहा, उसमें खुशहाल सबसे आगे रहा। पहली बार उसने बताया कि व्यापारी रेलवे स्टेशन से कैसे वैट (अब जीएसटी) की चोरी करते हैं। उसकी खबरों से रेलवे के अफसरों से लेकर वैट के अफसरों में हड़कंप मच गया। व्यापारी तो खुशहाल को पीटने के लिए उसकी तलाश तक में जुट गए थे।

रोडवेज में भी खुशहाल ने जबरदस्त धमाल मचाया। धमाल इतना जबदस्त रहा कि एकबार तो पूरा राज्य ही हिल गया। रोडवेज वर्कशॉप में बसों की मेंटेनेंस से जुड़े घपलों को खुशहाल ने सिलसिलेवार तरीके से खोला, तो रोडवेज के भ्रष्ट अफसरों, कर्मचारियों ने साजिश के साथ खुशहाल पर वर्कशॉप में हमला बोल दिया। उसके बाद रोडवेज वर्कशॉप से लेकर दून अस्पताल तक में महासंग्राम जैसे हालात पैदा हो गए। संतोष चमोली, मनमीत रावत, मनीष भट्ट, शशि शेखर समेत कई साथी उस हमले की जद में आए, मैं भी बस मिनटों की फेर में उस हमले की जद में आने से बचा। उसके बाद रोडवेज में कई निलम्बित हुए।

खुशहाल यहीं नहीं रुके, उन्होंने थानों में एफआईआर दर्ज कराने में होने वाले भ्रष्टाचार को खोला, देहरादून से लेकर हरिद्वार तक कई थानों की कलई खोली।

देहरादून में नकली दूध, मावा के कारोबार का खुलासा किया। खुशहाल बिना घोड़ा गाड़ी के पैदल पैदल अपने मिशन में जुटे रहते। उसके कुछ समय बाद वो डेस्क पर अपनी सेवाएं देते रहे। नाम भले ही उनका खुशहाल रहा, लेकिन जीवन हमेशा कष्टप्रद, संघर्ष भरा रहा। कहता था कि अब बेटे बड़े हो गए हैं, दोनों की नौकरी लगने के बाद सभी कष्ट दूर होंगे और आराम से बाकी जीवन जिया जाएगा। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।

अलविदा मेरे दोस्त अलविदा


गुणानंद जखमोला-

वाह री तकदीर, कैसा था यह पत्रकार?

  • किराये का मकान, बीमारियां, बेबसी और नाकामियां सब छोड चल बसा, नाम खुशहाल..
  • नहीं मिला 20-22 साल बाद भी एक अदद प्रमोशन

उत्तराखंड में लगभग 2000 पत्रकार हैं, पोर्टल समेत। कुछ मजमा लगाते हैं और कुछ ईमान की बोली लगाते हैं। कुछ सत्ता के आगे दुम हिलाते हैं तो कुछ सब कुछ सहते हुए चुप रह जाते हैं। कुछ जोर से चिल्लाते हैं, लेकिन नक्कारखाने में भला किसकी तूती बोलती है? अधिकांश पत्रकारों की मौज है लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो आज भी स्वाभिमान के साथ भूखे पेट मैदान में डटे हैं।

Portrait of a man with a mustache and short hair against a gray background.
खुशहाल गोस्वामी

इन्हीं 2000 पत्रकारों में एक पत्रकार था खुशहाल गोस्वामी। आज सुबह जौलीग्रांट अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया। कैंसर से ग्रस्त था। भाग्य का खेल देखिए कि पहले पत्नी को कैंसर हुआ और फिर उसको। आमदनी वही चवन्नी और खर्च 100 रुपया। देश के एक प्रमुख मीडिया ग्रुप में था, लेकिन हालात किसी छोटे से न्यूजपेपर के पत्रकार जैसी। 20 साल में एक भी प्रमोशन नहीं। सब एडिटर का सब एडिटर रहा। उसने अखबार बदला नहीं और प्रबंधन ने उसके हालात को अपने लाभ में बदल दिया। हां, इतना जरूर है कि जीवन के कठिन दौर में उसके साथियों ने उसका साथ नहीं छोड़ा।

खुशहाल गोस्वामी को मैं फरीदाबाद से जानता था। पिछले ढाई दशक की उसकी पत्रकारिता का यदि आंकलन किया जाए तो बस उसके हिस्से में किराये का मकान, बीमारियां, बेबसी और नाकामियां ही पाता हूं। वह पहले से ही पतला था लेकिन आखिरी पांच-छह महीनों में उसका पेट-पीठ से जा चिपका था। नवम्बर माह में जब मैं उसे देखने करनपुर की एक हवेली में गया था तो पहली मंजिल पर जिस किराये के दो में वह, अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रहता था, उसे देख कर दिल में हूक सी उठी कि पहला कमरा तो शुरू होते ही खत्म हो गया था। दोनों बेटे अभी बेरोजगार हैं। बल्कि एक की तो पढ़ाई छूट गयी कि मां को ब्रेस्ट कैंसर हो गया और अब पिता हड्डियों के कैंसर का शिकार हो गया।

बस, यही है 20-22 साल की ईमानदारी से की गयी पत्रकारिता से कमाया धन। कैंसर का पता समय से चल गया था, लेकिन यह तो फैलता ही गया। मैंने सोशल मीडिया पर क्राउड फंडिंग की अपील की तो कुछ पैसा जुटा भी था, लेकिन इंजेक्शन बहुत महंगे थे। उस मीडिया हाउस के पत्रकार साथियों और संपादक ने भी उसकी खासी मदद की। धामी सरकार ने भी मदद की, लेकिन तब तक बात बिगड़ गयी।

खुशहाल ईमानदार था तो स्वाभिमानी होना लाजिमी है। उसने मुझे कहा कि क्राउड फंडिंग के लिए उसके संस्थान का नाम नहीं देना। मैंने नहीं दिया। आज भी मैं अपने उस साथी की इसी बात का मान रख रहा हूं। लेकिन उसकी किस्मत को कोस रहा हूं, कि वाह री किस्मत, ईमानदारी का ये कैसा सिला दिया? किराए का मकान, बेबसी और नाकामियों के बीच ही जीवन गुजार दिया।

अलविदा खुशहाल, विनम्र श्रद्धांजलि।

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