सुभाष सिंह सुमन-
Pain is real. आपने भी इसे नोटिस किया होगा। 2-3 दिन से सरकार बौखलाई हुई है। प्रेस कॉन्फ्रेंस से भागने वाली सरकार अचानक ताबड़तोड़ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है। सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्राइवेट कंपनियों के लोग इथेनॉल को बढ़िया बता रहे हैं। मुझे ऐसा कोई प्रसंग याद नहीं आता, जब सरकारी मंच से प्राइवेट इंडस्ट्री का प्रेस कॉन्फ्रेंस हुआ हो। सरकार के कई मंत्री ताबड़तोड़ इंटरव्यू दे रहे हैं। पॉडकास्ट में बैठ रहे हैं। छोटे-बड़े हर तरह के एक्सपर्ट स्पॉन्सर किये जा रहे हैं। पीआईबी और तीनों सरकारी तेल कंपनियों को देखकर ऐसा लग रहा है, जैसे उनके सोशल मीडिया हैंडल्स सीधे भाजपा आईटीसेल से संचालित हो रहे हैं।
मतलब एक पोस्टर बन रहा है। उसे पीआईबी, इंडियन ऑयल, एचपी, बीपी सब अपना-अपना लोगो लगाकर अपने हैंडल से शेयर कर रहे हैं। अमृतलाल की भाषा में टूलकिट गैंग एक्टिव हो गया है। सरगना भाजपा आईटीसेल टूलकिट बना रहा है और उसके हिसाब से झूठ के साथ भाजपाई प्रयोग चल रहे हैं।
लेकिन झूठ को कितने भी जोर से कहा जाये और कितने ही मुँह से कहलवाया जाये, उसका वजन हल्का ही रहता है। मैं लगातार इथेनॉल पर लिख रहा हूँ और आधिकारिक आँकड़ों-तथ्यों से ही सरकार के झूठ उजागर कर रहा हूँ। आज उसी कड़ी में एक और विस्तृत पोस्ट।
आगे बढ़ने से पहले साफ कर देना उचित रहेगा कि भक्ति में गदहाये हुए लोग इससे आगे नहीं पढ़ें। यदि गदहपन लाइलाज हुआ, तो बीपी-शुगर बढ़ेगा। यदि इलाज की कोई गुंजाइश बाकी है, तो आँखें खुल जाने का खतरा रहेगा। बाकी लोगों के लिए सुझाव-अनुरोध सबसे लास्ट में।
कल वाले प्रेस कॉन्फ्रेंस को देखें, तो टोयोटा-मारुति जैसी कंपनियों के लोग एक ही बात पर जोर दे रहे थे कि ई20 सेफ है, इससे कोई खतरा नहीं है, इससे वारंटी वॉयड नहीं होती। इससे पहले कुछ इंश्योरेंस कंपनियों को सरकार ने अपना प्रवक्ता बनाया था और उनसे भी ऐसी बातें कहवाई गयी थीं कि ई20 से इंश्योरेंस क्लेम में कोई दिक्कत नहीं आयेगी। हमारे बिहार के एक पूर्व भाजपाई अंधभक्त इंफ्लुएंसर हैं। उनकी 40 लाख की गाड़ी खराब हुई। टोयोटा की गाड़ी है। भाई ने आदतन खूब गदर काटा, जो उचित भी था।
मामला काफी वायरल हो गया, तो टोयोटा की ओर से स्पष्टीकरण आया। उस स्पष्टीकरण पर सरकार समर्थक न्यूज पोर्टल्स ने हेडलाइन निकालने में पूरी क्रियेटिविटी निचोड़ दी। बस जो करना था, वो नहीं किया। सरकारी बयानों की भाषा हो या कॉरपोरेट के स्टेटमेंट, यदि आप बीटवीन द लाइन्स नहीं पढ़ना जानते हो, पूरे होश-ओ-हवास में आपका काट लिया जायेगा और आप उफ्फ तक नहीं कर पाओगे। उदाहरण के लिए- कंपनी कच्ची घानी लिख रही है, इसका यह मतलब नहीं कि तेल कच्ची घानी है। कच्ची घानी ट्रेडमार्क है। कंपनी बड़े अक्षरों में शुगरफ्री लिख रही है, इसका यह मतलब नहीं कि प्रोडक्ट शुगरफ्री है। शुगरफ्री ट्रेडमार्क हो सकता है। इसे समझने के लिए आपको लेबल्स देखने होंगे, जो 90% लोग कभी नहीं देखते हैं। अभी हम टोयोटा की सफाई में बीटवीन द लाइन्स समझेंगे, तो हमें बड़ा खेल भी काफी हद तक समझ आ जायेगा।
टोयोटा के हिसाब से यह कहना गलत है कि उसकी गाड़ी ई20 के कारण खराब हुई। कंपनी ने गाड़ी खराब होने का कारण अडल्टरेटेड फ्यूल यानी मिलावट वाला तेल बताया है। यहाँ एक आम उपभोक्ता की हैसियत से हमारे मन में सबसे पहला सवाल आना चाहिए कि मिलावट वाला तेल क्या चीज है? क्या ई20 को मिलावट वाला तेल नहीं कहा जायेगा? सरकार बहादुर और सरकार की प्रवक्ता बनीं कंपनियों की बात मान लें, तो ई20 को मिलावट वाला तेल नहीं कहा जा सकता। थोड़ी देर के लिए ऐसा ही मान लेते हैं। इसके बाद यही अर्थ निकलता है कि 20% से ज्यादा इथेनॉल वाले तेल को मिलावट वाला माना जायेगा? यदि ऐसा मान लें, तो मानते ही कई नये स्वाभाविक सवाल उठते हैं। सरकार तो खुद ही 20% से अधिक इथेनॉल मिलाने की तैयारी कर रही है, तो क्या बाद में मिलावट की फिर से नयी परिभाषा आयेगी?

कोई भी कार या बाइक वाला व्यक्ति अपने घर पर न तो पेट्रोल बना रहा, न इथेनॉल। जितने भी पेट्रोल पंप देश में चल रहे हैं, सारे सरकार से लाइसेंस प्राप्त हैं। अब यदि मिलावट वाला पेट्रोल सरकार से लाइसेंस प्राप्त पंपों पर ही मिल रहा है, यह किसका दोष है? एक आम उपभोक्ता ने न तो अपने घर पर कुछ मिलाया, न उसने पेट्रोल पंप को लाइसेंस दिया। फिर मिलावट वाले तेल से हो रहे नुकसान के लिए उसकी जेब से वसूली क्यों हो? ये सवाल नहीं पूछोगे बंधु और झूठी सरकार के झांसे में आओगे, बहुत बुरा झेलोगे। गाड़ी तुम्हारी अचानक खराब होगी। कंपनी के वर्कशॉप लेकर जाओगे। कंपनी कहेगी मिलावट वाले तेल से दिक्कत आयी। हम वारंटी नहीं देंगे। इंश्योरेंस में क्लेम लगाओगे। इंश्योरेंस कंपनी कहेगी मिलावट वाला तेल यूज किया था तुमने, क्लेम नहीं मिलेगा। बस कोई ई20 का नाम नहीं लेगा।
उसे अडल्टरेटेड बताकर, काम लेकिन सारा तुमको लूटने वाला ही करेगा। कैसे साबित करोगे कि तुमने जो पेट्रोल लिया था, वो मिलावट वाला नहीं था? बुखार आया कोविड के कारण। उसमें व्यक्ति निपट गया। सरकारी आँकड़ों में दर्ज हुआ बुखार से मौत। सरकारी आँकड़ा यह नहीं बताने आया था कि बुखार का कारण ही कोविड था। वही शब्दों का खेल और सरकारी जुमलेबाजी। मिलावट वाला तेल आया ई20 के कारण। सरकार और कंपनियाँ कहेंगी दिक्कत मिलावट वाले तेल से आयी। कोई यह नहीं कहेगा कि मिलावट वाले तेल का कारण ही ई20 है। देश में गाड़ियों के माइलेज/एवरेज ड्रॉप होने और इंजन में खराबियाँ आने के लाखों मामले पिछले डेढ़-दो महीने में आये हैं। देश के हर हिस्से से शिकायतें आ रही हैं।
सरकारी बात मानने पर एक और बड़ा सवाल आ जाता है कि अगर ई20 से नहीं, मिलावट वाले तेल से ऐसा हो रहा है, तो इसे रोकने का काम किसका है? ज्यादातर राज्यों में तुम्हारी सरकार, केंद्र में 12 साल से तुम्हारी सरकार, फिर भी पूरे देश में सरकारी लाइसेंस प्राप्त पंपों पर इतने बड़े पैमाने पर अगर पेट्रोल में मिलावट हो रही है, क्या इसका यह अर्थ नहीं निकलता कि सरकार चला पाना तुम्हारी क्षमता में नहीं है? कुछ नहीं होता, तो इसका दोष भी नेहरू के माथे मढ़ दो।
फिर टोयोटा और बाकी कंपनियों का सुझाव है कि अच्छे पंपों से ही पेट्रोल लें। यह कैसे पता करेगा कोई कि कौन पंप अच्छा है, कौन खराब? आदमी तो इंडियन ऑयल, एचपी, बीपी का नाम देखकर ही जा रहा पंप पर। आप जहाँ रहते हो, उसके आस-पास के पंपों के बारे में आपको जानकारी हो सकती है। जैसे मेरे घर से एक किलोमीटर के दायरे में इंडियन ऑयल के दो पंप हैं। मैं दोनों पर नहीं जाता, क्योंकि दोनों बदनाम हैं। एचपी वाला 3-4 किलोमीटर दूर है। वहीं भरवाता था हमेशा। इधर दो महीने में दो बार उससे पेट्रोल लिया, दोनों बार दिक्कत आयी। वहाँ जाना छोड़ दिया। अब कुछ और दूर बढ़कर जिओ वाले पंप पर जाता हूँ, भले ही सरकारी पंपों से 2-3 रुपये रेट टाइट है। घर के आस-पास है, इस कारण पता है या अपना अनुभव भी हो चुका है।
अब मैं निकल रहा हूँ लखनऊ या दिल्ली के लिए। बक्सर या गाजीपुर में पेट्रोल भराने की जरूरत पड़ती है। वहाँ कैसे पता करूँगा कि कौन पंप अच्छा है, कौन खराब है? वहाँ तो मैं इंडियन ऑयन, एचपी या बीपी देखकर ही टंकी फुल करवा लूँगा। सरकार क्यों न कथित अच्छे और बुरे पंपों की लिस्ट बनाकर सार्वजनिक कर दे। साथ में गारंटी दे दे कि उसके बताये अच्छे पंपों से पेट्रोल भराने पर कोई दिक्कत आती है, तो उसे सही करने का खर्चा सरकार उठायेगी। बिना मिलावट वाले तेल की जो भी परिभाषा तय करे सरकार बहादुर, उस परिभाषा वाला तेल ही सबको मिले, यह सुनिश्चित करना सरकार का ही काम है न?
अब दर्द की वजह समझने का प्रयास करते हैं। क्या वजह है कि सरकार छटपटाने लगी है? इथेनॉल को सही सिद्ध करने पर हमारी-आपकी जेब काटकर वसूले टैक्स से करोड़ों रुपये क्यों प्रोपेगेंडा पर फूंके जा रहे हैं? सरकार अपने बैनर पर प्राइवेट कंपनियों से क्यों प्रेस कॉन्फ्रेंस करा रही है? इसका जवाब मिलेगा जून महीने की बिक्री के आँकड़ों में। इसपर ज्यातादर खबरें मिलेंगी, जिसमें बिक्री के आँकड़े साल-दर-साल आधार पर बताये गये होंगे। इसे एक बार माह-दर-माह आधार पर ब्रेक करते हैं। सबसे बड़ी कार कंपनी है मारुति। जून में इसकी बिक्री रही 1,47,187, जो एक महीने पहले यानी मई के 1,90,337 से 22.67% कम है। हुंडई की बिक्री मई में 47,837 थी, जो जून में रह गयी 39,635 (यानी 17.15% की गिरावट)। टोयोटा की बिक्री 6.98% कम हुई। किआ की बिक्री 11% कम हुई। रेनॉ की बिक्री 1.22% कम हुई। कुछ कंपनियों की बिक्री बढ़ी भी। जैसे सबसे ज्यादा 25.13% बढ़ी जेएसडब्ल्यू एमजी की और 7,568 पर पहुँच गयी। टाटा की 5.05% बढ़कर 62,076 और महिंद्रा की 4.09% बढ़कर 60,393 हो गयी।
इस आँकड़े को समझने की जरूरत है। मारुति, हुंडई, किआ और टोयोटा चारों के पोर्टफोलियो में पेट्रोल कारों का वर्चस्व है। इथेनॉल की मिलावट से पेट्रोल कार वालों का कट रहा है। पेट्रोल वाली कार खरीदने से लोग डरने लगे हैं। टाटा-महिंद्रा में डीजल का अच्छा पोर्टफोलियो है और दोनों की ईवी कारें भी मार्केट पकड़ रही हैं। दोनों की बिक्री कुछ बढ़ी है। मतलब जिन्हें पेट्रोल वाली कार खरीदने का मन था, उनमें से कुछ लोगों ने डीजल या ईवी में जाना चुन लिया। एमजी की ईवी कारें बढ़िया बिक रही हैं। उसकी बिक्री भी बढ़ी है। लेकिन पेट्रोल कारों की बिक्री जितनी कम हुईं, डीजल-ईवी में उतनी वृद्धि नहीं आयी। मारुति (-43,150), हुंडई (-8,202), टोयोटा (-2,133) और किआ (-3,034) को मिलाकर बिक्री कम हुई 56,519 यूनिट। टाटा (2,986), महिंद्रा (2,372), एमजी (1,520) और निसान (58) को मिलाकर बिक्री बढ़ी 6,936 यूनिट। मतलब ओवरऑल ऑलमोस्ट 50,000 यूनिट का नुकसान एक महीने में। इस नुकसान का अकेला कारण ई20 नहीं है, लेकिन सबसे बड़ा कारण ई20 ही है।
मैं लगातार लोगों से यही कह रहा हूँ। सोशल मीडिया पर हमारे लिखने-बोलने से सरकार पर सीधे कोई असर नहीं पड़ने वाला है। कुछ भाई आज जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने वाले हैं। उन्हें 200 लोगों के प्रदर्शन की मंजूरी मिली है। उन्हें शुभकामनाएँ। उनकी भी आवाज बढ़ायें। लेकिन यह कभी न भूलें कि इस सरकार की नजर में हम-आप जैसे आम लोगों की हैसियत कीड़े-मकोड़े वाली है। हमें सीधे वहीं पर चोट करना चाहिए, जहाँ दर्द सबसे ज्यादा हो। जून में उसी जगह पर चोट पड़ता दिख रहा है। इसे आगे और बढ़ाने की जरूरत है। नयी कार खरीदने का निर्णय तबतक टालें, जबतक सरकार का रावण वाला अहंकार नहीं टूट जाता। पेट्रोल वाली कार तो बिल्कुल नहीं लें। डीजल में भी ऐसी ही स्थिति बनेगी। आइसोब्यूटेनॉल की मिलावट उधर भी शुरू होने वाली है या हो चुकी है। ईवी के लिए इंफ्रा नहीं है।
250-300 किलोमीटर से अधिक अप-डाउन की यात्रा नहीं करते हैं, घर पर ही चार्जिंग की व्यवस्था कर सकते हैं, तो ईवी देख सकते हैं। वर्ना उधर भी परेशानी डीजल-पेट्रोल से कम नहीं होगी। जब आप कारें खरीदना बंद करेंगे, कंपनियाँ बिलबिलाने लगेंगी। इस सरकार को हमसे-आपसे कोई डर नहीं है, लेकिन जब कंपनियाँ प्रेशर बनायेंगी, उनकी बात बिल्कुल सुनी जायेगी। अभी कंपनियों को विशेष दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि उन्हें ई20 से नुकसान कम और फायदे अधिक दिख रहे हैं। ई20 या अधिक ब्लेंड वाले तेल से कारों की सर्विसिंग का खर्च बढ़ेगा, पार्ट्स जल्दी खराब होंगे। इससे कंपनियों को कमाई होती रहेगी। कई कार कंपनियाँ कारों की बिक्री से ज्यादा पैसे सर्विसिंग और पार्ट्स बेचकर कमाती हैं। इसे पलटने के लिए बिक्री को 40-50% गिराने की जरूरत होगी। याद रखिये, कॉरपोरेट क्रांति नहीं करता, लेकिन मुनाफे पर चोट भी एकदम बर्दाश्त नहीं करता।
इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर सरकार का जिद्दी रवैया समझ से बाहर है। .. अकेले गडकरी जी इतने ताकतवर नहीं हैं कि बिना टॉप ब्रास की सहमति के अपनी जिद या मनमानी चला पाएं। इतनी बड़ी नीति निश्चित रूप से शीर्ष स्तर की सहमति से ही आगे बढ़ रही होगी।
माइलेज की समस्या जगजाहिर, बल्कि एक्सपर्ट भी मान रहे है। इथेनॉल के साथ मॉइस्चर आना भी सामान्य बात है। दूसरे देशों के उदाहरण दिए जा रहे हैं, लेकिन उन देशों का इंफ्रास्ट्रक्चर, वाहन तकनीक, भी तो देखना चाहिए।
जितनी बचत सरकार को इथेनॉल मिलाने से फ्यूल बिल में होगी, उतना नुकसान तो केवल माइलेज घटने से बढ़ी हुई फ्यूल खपत में हो सकता है। बाकी इंजन की मेंटेनेंस और और लॉन्ग टर्म परफॉर्मेंस की समस्याएं अलग हैं। .. इस मुद्दे पर क्या सरकार समर्थक और क्या विरोधी, दोनों तरफ के लोग नाराज और चिंतित हैं। लेकिन सरकार शायद सुनने और समझने को तैयार नहीं दिख रही।
नीति का उद्देश्य अच्छा हो सकता है, लेकिन उसे जमीन की वास्तविकता, उपभोक्ता की परेशानी और तकनीकी तथ्यों को ध्यान में रखकर ही लागू करना चाहिए। .. जिद से नीति नहीं चलती, व्यवहारिकता से चलती है।
-गौरव अग्रवाल


