मनरेगा में भ्रष्टाचार रोकने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए लागू की गई डिजिटल निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दावा किया जा रहा है कि मनरेगा श्रमिकों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने के लिए इस्तेमाल होने वाले नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) ऐप का क्लोन तैयार कर लिया गया है और उसके जरिए बिना श्रमिक की मौजूदगी के भी हाजिरी लगाई जा रही है।

राजस्थान की भजनलाल शर्मा (भाजपा) सरकार में सिस्टम की इतनी बड़ी लापरवाही और डिजिटल सेंधमारी का यह बड़ा खुलासा किया है राजस्थान पत्रिका संवाददाता संजय पारीक ने।
चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार जिस समय मनरेगा को नए नाम और नए स्वरूप में लागू करने की तैयारी कर रही है, उससे पहले ही उसकी सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल व्यवस्था में कथित सेंध लगने के दावे सामने आ गए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि वर्तमान सिस्टम ही सुरक्षित नहीं है तो नई योजना में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी?
घर बैठे लग रही हाजिरी, 3 से 5 हजार रुपये महीना लेने का दावा
सूत्रों के मुताबिक, कथित क्लोन ऐप को स्थानीय स्तर पर सरपंचों, मेटों और मनरेगा कार्यों से जुड़े लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। इसके एवज में 3 हजार से 5 हजार रुपये प्रतिमाह तक वसूले जाने का दावा किया गया है।
पत्रिका संवाददाता संजय पारीक से बातचीत में एक व्यक्ति ने दो अलग-अलग प्रकार के ऐप उपलब्ध कराने की बात कही। इतना ही नहीं, उसने इनके संचालन से जुड़े वीडियो भी साझा किए। यदि ये दावे सही साबित होते हैं तो यह मनरेगा की डिजिटल निगरानी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर सेंध का मामला हो सकता है।
फर्जी मस्टरोल रोकने के लिए लाई गई थी डिजिटल व्यवस्था
मनरेगा में पहले श्रमिकों की उपस्थिति ऑफलाइन दर्ज की जाती थी। वर्षों तक फर्जी मस्टरोल, फर्जी भुगतान और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने करीब दो वर्ष पहले NMMS आधारित ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली लागू की थी।
इस प्रणाली में कई सुरक्षा प्रावधान जोड़े गए थे, जिनमें शामिल हैं—
- कार्यस्थल की लाइव फोटो,
- जीपीएस आधारित लोकेशन,
- फेस ऑथेंटिकेशन,
- निर्धारित समय पर उपस्थिति,
- डिजिटल रिकॉर्ड का सत्यापन।
उद्देश्य साफ था—फर्जी श्रमिकों और कागजी हाजिरी के खेल को खत्म करना।
लेकिन अब दावा क्या है?
कथित क्लोन ऐप को लेकर दावा किया जा रहा है कि उसके जरिए इन सुरक्षा व्यवस्थाओं को दरकिनार किया जा रहा है। आरोप है कि इस ऐप में—
- कहीं से भी उपस्थिति दर्ज की जा सकती है,
- निर्धारित जीपीएस लोकेशन बदली जा सकती है,
- मौके पर फोटो लिए बिना हाजिरी लगाई जा सकती है,
- दूसरे व्यक्ति से सत्यापन कराया जा सकता है,
- श्रमिक की अनुपस्थिति में भी उसकी मौजूदगी दर्ज की जा सकती है।
यदि यह तकनीकी रूप से संभव पाया जाता है तो मनरेगा में डिजिटल भ्रष्टाचार का यह अब तक का सबसे संगठित तरीका साबित हो सकता है।
प्रदेश से देश तक फैलता नेटवर्क?
सूत्रों का दावा है कि इस कथित क्लोन ऐप का इस्तेमाल केवल किसी एक पंचायत या ब्लॉक तक सीमित नहीं है। राजस्थान के कई जिलों के अलावा अन्य राज्यों तक भी इसका नेटवर्क फैलने की चर्चा है।
बताया जा रहा है कि ऐप उपलब्ध कराने वाले लोग स्थानीय स्तर पर संपर्क स्थापित कर रहे हैं। एक बार ऐप उपलब्ध कराने के बाद ऑनलाइन माध्यम से उसका संचालन और तकनीकी सहायता भी दी जा रही है।
यदि जांच में यह सच साबित होता है तो यह मामला सिर्फ तकनीकी छेड़छाड़ का नहीं, बल्कि सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग और संगठित नेटवर्क का रूप ले सकता है।
‘जी राम जी’ से पहले नई चुनौती
केंद्र सरकार ने हाल ही में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को नए स्वरूप में लागू करने की तैयारी शुरू की है। प्रस्तावित नई योजना का नाम ‘जी राम जी’ (विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन) रखा गया है।
नई योजना में भी डिजिटल मॉनिटरिंग और ऑनलाइन उपस्थिति को प्रमुख आधार बनाए जाने की संभावना है। लेकिन उससे पहले ही NMMS ऐप के कथित क्लोन की खबरों ने सरकार की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल…
जिस डिजिटल व्यवस्था को भ्रष्टाचार खत्म करने का हथियार बताया गया था, क्या वही अब भ्रष्टाचार का नया जरिया बनती जा रही है?
क्या तकनीक ने फर्जी मस्टरोल खत्म किए हैं या भ्रष्टाचार ने खुद को डिजिटल रूप दे दिया है?
यदि घर बैठे श्रमिकों की हाजिरी लग रही है और इसके बदले मासिक वसूली हो रही है, तो यह सिर्फ एक तकनीकी खामी नहीं, बल्कि मनरेगा की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।
अब जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार, ग्रामीण विकास मंत्रालय और संबंधित जांच एजेंसियां इन दावों की तत्काल और स्वतंत्र जांच कराएं। क्योंकि यदि यह सच है, तो ‘डिजिटल इंडिया’ की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना में डिजिटल घोटाले की दस्तक हो चुकी है।




