सुशोभित-
पुस्तकों पर हस्ताक्षर करते हुए मेरा एक चित्र देखकर एक मराठी मित्र ने कहा- “मुझे भी ऐसे ही ‘स्वाक्षरी’ लेनी है!” यह शब्द सुनकर मैं चौंका। मैंने यह पहले नहीं सुना था। ऑटोग्राफ़ के लिए ‘स्वाक्षरी’ कितना सुंदर पर्याय है! फिर आज एक समाचार-पत्र में देख रहा था, पर्सनैलिटी या व्यक्तित्व शब्द के लिए मराठी में उन्होंने जिस शब्द का उपयोग किया, वह है- ‘स्वभाववैशिष्ट्य!’ बड़े पॉइंट में, शीर्षक में उन्होंने यह शब्द छापा है। हिन्दी के अख़बारों में ऐसे शब्द का उपयोग भीतर के टेक्स्ट में भी नहीं किया जा सकता, क्लिष्ट कहकर तुरंत उसे बदल दिया जावेगा। किन्तु मराठीभाषी मूलत: पुस्तकप्रेमी-संस्कृतिप्रेमी होते हैं और तत्समनिष्ठ भाषा उन्हें सहज ही रुचिकर लगती है। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के बहुतेरे शब्द मराठी में भी प्रयुक्त होते हैं। मराठियों का ऐसा ही लगाव कन्नड़ कथाओं के साथ भी है।

मराठी भाषा ऐसे अनेक दाक्षिणात्य शब्दों से भरी है, जो तत्समनिष्ठ होने के बावजूद खड़ी बोली में भी सामान्यतया उपयोग नहीं किए जाते। जैसे सिनेमा को मराठी में वो लोग ‘चित्रपट’ कहेंगे, शुभकामना को ‘शुभेच्छा’ और स्मृतिचिह्न को ‘स्मरणिका’ कहेंगे, हवाई अड्डा वहाँ ‘विमानतल’ कहलावेगा, शताब्दी के लिए वहाँ ‘संवत्सरी’ शब्द प्रचलित है, विवाह वर्षगाँठ के लिए ‘लग्न-वार्षिकी’। सचिव के लिए मराठी शब्द ‘चिटणीस’ है और मंत्री के लिए ‘पंत’- इसी से प्रधानमंत्री वहाँ ‘पंत-प्रधान’ हो जाता है। कुछ साल पहले मैं पुणे गया था तो देखा कि स्टेशन को वो लोग ‘स्थानक’ कहते हैं। अस्पताल को ‘रुग्णालय’। नेत्रहीनों के स्कूल को ‘अंधशाला’। फ़ुटपॉथ वहाँ ‘पादचारी मार्ग’ कहलाता है। यह सब देखना बहुत रोमांचक था।
मराठीभाषी पक्षीशास्त्री मारुति चितमपल्ली ने संस्कृत साहित्य का गहरा अनुशीलन किया था। उनकी पुस्तकों के तत्सम ध्वनि वाले शीर्षक देखें : ‘पक्षी जाय दिगंतरा’, ‘सुवर्ण गरुड’, ‘निसर्गवाचन’, ‘मृगपक्षीशास्त्र’, ‘चित्रग्रीव’, ‘वनोपनिषद्’, ‘वृक्षकोश’ आदि। कौवों की बस्ती के लिए उन्होंने ‘काकागर’ शब्द गढ़ा था। बगुलों-तीतरों की बस्ती के लिए ‘सारंगागर’। आप भेद नहीं कर पाएँगे कि हिन्दी की परम्परा कहाँ समाप्त होती है और मराठी की परम्परा कहाँ शुरू होती है और उनकी जड़ें धरती के भीतर कितनी हिली-मिली हैं।
यही बात गुजराती प्रभृति भाषाओं के लिए भी समीचीन है। जैसे ‘हिन्द स्वराज्य’ के मूलपाठ में महात्मा गांधी ने सम्पादक को ‘अधिपति’ और पाठक को ‘वाचक’ लिखा है, अलबत्ता खड़ी बोली में वाच्य और पाठ्य के स्वरूप में भेद है। बांग्ला में तो कितने ही शब्द वैदिक-औपनिषदिक पृष्ठभूमि से आए हैं। जैसे ‘पूषन’ बंगाल में एक प्रचलित नाम है, हिन्दी-पट्टी में यह आपको कहीं नहीं मिलेगा। यह एक वैदिक देवता का नाम है। ‘पिनाक’ नाम भी बंगाल में मिलता है। यह शिव के धनुष के लिए प्रचलित शब्द है। श्रीमद्भगवद्गीता में ‘धृति’ शब्द का बहुत उल्लेख आया है। बंगाल में ‘धृतिमान’ जैसे नाम आपको आसानी से सुनने को मिल जावेंगे, वो हिन्दी में कभी नहीं मिलते। ‘सात्यकि’ नाम भी बांग्ला में मिलता है, यह महाभारत के एक पात्र से आया है।
तब तमिल-संस्कृत सम्बंधों की तो बात ही क्या करें? वास्तव में मध्यकाल में एक समूची ‘मणिप्रवालम्’ शैली ही विकसित हो गई थी, जिसमें तमिल और संस्कृत के शब्दों व व्याकरण को मिलाकर एक साथ लिखा जाता था। कई दक्षिण भारतीय आचार्यों ने दोनों भाषाओं में काम किया है। जैसे रामानुज, जिन्होंने संस्कृत में भाष्य लिखे हैं, किन्तु उनकी परम्परा में तमिल आलवारों की वाणी भी समाहित है।
भाषा तो बहता नीर है। भारतीय-भाषाओं का परिसर भी बहुत व्यापक, उर्वर, समृद्ध-संकुल है और केवल संस्कृत या हिन्दी के अध्ययन पर चुकता नहीं है। बहुभाषी हुए बिना भारतीयता की थाह नहीं मिल सकती। कोई समान्तर-कोश वैसा भी बनाया जाना चाहिए, जिसमें विभिन्न भारतीय-भाषाओं के पर्याय एक साथ प्रस्तुत किए गए हों। एक ही शब्द की अर्थछटा को विभिन्न भारतीय-भाषाओं के परिप्रेक्ष्य से देखना बहुत सुरुचिकर होगा।


