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आज के अखबार : बंगाल में जीत के बाद भाजपाई तांडव की खबर दैनिक भास्कर और इंडियन एक्सप्रेस में

Front page of a Hindi newspaper with a bold main headline about protests over deaths, a small photo of boats at sea, and a red sidebar box with a brief subheading.

संजय कुमार सिंह

पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतकर सरकार बनाने के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने मनमानी और लापरवाही की हद कर दी है। तृणमूल पार्टी के नेताओं को मारा-पीटा और धमकाया जा रहा है तो मनमानी का आलम यह है कि ममता बनर्जी की अनुपस्थिति में उनके घर पर और फिर अभिषेक बनर्जी की अनुपस्थिति में उनके घर पर छापा पड़ा। अभिषेक बनर्जी के घर का ताला तोड़कर तलाशी ली गई और बरामदगी शून्य है। यही स्थिति ममता बनर्जी के घर पर छापे के बाद थी। वहां भी कुछ नहीं मिला और सीजर लिस्ट में जब्ती निल या शून्य लिखी थी। कल एक सरकारी बिल्डिंग में आग लगने की खबर थी जिसमें 4000 ईवीएम जलकर खाक हो जाने का अनुमान था। उसकी खबर जैसे छपी थी उस पर मैंने यहां लिखा था। आज अभिषेक बनर्जी के घर छापे की खबर लगातार आ रही ऐसी खबरों के क्रम में है और मुझे लगता है कि पुलिस या राज्य सरकार की मनमानी की खबर अब सामान्य से ज्यादा हो रही है। इसलिए दिल्ली में भी प्रमुखता से छपना चाहिए। कहने की जरूरत नहीं है कि ईवीएम जलने की खबर ही नहीं थी तो उसके फॉलोअप की क्या बात करूं। ऐसे में आज अभिषेक बनर्जी के घर छापा, ताला तोड़कर तलाशी लेना और शून्य जब्ती सारी बातें कहती है। अपने आप में यह बड़ी खबर है। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर छपी एक तस्वीर का कैप्शन है – सोनारपुर के कामराबाद में तृणमूल कांग्रेस का एक बंद पड़ा दफ़्तर; बेलेगहाता में टीएमसी के एक दबंग नेता से जुड़ी इमारत को तोड़ा जा रहा है। जब ममता और अभिषेक बनर्जी को परेशान किया जा रहा है तो किसी दबंग नेता की बिल्डिंग तोड़ना बड़ी बात नहीं है लेकिन खबर क्यों नहीं है? वैसे भी बुलडोजर न्याय का हाल हम देख रहे हैं। सरकार और न्यायालयों को देखना है कि यह सब कानून के अनुसार हो रहा है कि नहीं पर उसका तो राष्ट्रीय स्तर पर बुरा हाल है। अभिषेक बनर्जी के घर पर छापा और तलाशी की खबर आज दिल्ली के अखबारों में सिर्फ देशबन्धु और दैनिक भास्कर में है। इंडियन एक्सप्रेस में चर्चा है और कोलकाता के द टेलीग्राफ में होना ही था। नवोदय टाइम्स में बंगाल की ये खबरें नहीं हैं।

इंडियन एक्सप्रेस में भाजपा की ज्यादाती की सूचना तो है लेकिन प्रमुखता जिस शीर्षक को मिली है वह है, टीएमसी टूटने के करीब है क्योंकि प्रमुख सांसद बागियों के साथ आ गए हैं और भाजपा से बात की है। फ्लैग शीर्षक है, ममता के खिलाफ बगावत को गति मिली। यह सिर्फ शिखर पर नहीं है,सिंडिकेट स्तर पर नाराजगी के बीच एकदम जमीनी स्तर पर भी दरार है। खबर से पता नहीं चलता है कि बगावत इतनी ज्यादा है तो भाजपा से वार्ता करने वाले नेता अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं या भाजपा की ओर से आकर्षण, लालच, दबाव या कुछ और है। उदाहरण के लिए कल कीर्ति आजाद ने लिखा था कि उनकी सुरक्षा वापस ले ली गई है लेकिन दबाव के आगे वे नहीं झुकने वाले हैं। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस ने दबंग तृणमूल नेता की जिस बिल्डिंग की तस्वीर लगाई है वह पांच मंजिल की तो है ही। जाहिर है, यह कार्रवाई कोर्ट के आदेश के बिना की जा रही होगी या आदेश पहले से होगा उसे लागू अब किया जा रहा है। आप जानते हैं कि बंगाल में तृणमूल की सरकार बनने के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और आदेशों की बड़ी भूमिका रही है। चुनाव में गड़बड़ी का अंदेशा तो रहता ही है और अदालत में शिकायत करने का समय अभी है। फिर भी मुख्य सबूत जल जाने की खबर है और शंका है कि आग लगी नहीं, लगाई गई है। जो भी हो, जांच होगी और कार्रवाई भी होगी। लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं है। मुझे लगता है कि चुनाव के संबंध में जितनी शिकायतें थीं, जिस ढंग से एसआईआर हुई और होने दी गई, जिस ढंग से नतीजे आए हैं, जो सवाल हैं उनका जवाब तो मिलना नहीं है। पहले भी कई राज्यों के चुनाव आंकड़ों को लेकर कई तरह के सवाल है। ऐसे में अदालत को अपनी पक्ष स्पष्ट करना चाहिए और जैसा कहा जाता है, न्याय होना ही नहीं चाहिए, होता हुआ देखना चाहिए। ऐसे में भारत का सुप्रीम कोर्ट अगर यह संदेश देना चाहता है कि वह न्याय और अपने ऊपर लगे आरोपों तथा भ्रष्टाचार से संबंधित पाठ्य पुस्तक के अध्याय और उससे संबंधित अपने आदेश को वापस लेने जैसी स्थितियों को लेकर गंभीर है तो वह चुनाव रद्द करके यह जता सकता है कि बहुत हुआ। मुझे नहीं पता है कि ऐसा होगा कि नहीं या हो पाएगा कि नहीं फिर भी मुझे लगता है कि सरकारी मनमानी कुछ ज्यादा ही चल रही है और यह बदले की कार्रवाई है जो अमित शाह के गृहमंत्री बनते ही पी चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई से शुरू हो गई थी और मुकदमे का क्या हुआ – अभी तक बताया नहीं गया है। सरकार ने बताया हो तो अखबारों ने नहीं ही बताया है।

आज अखबारों के पहले पन्ने पर ज्यादातर एक जैसी खबरें हैं। मैं आम खबरों से अलग, उन खबरों की बात करूंगा जो कम दिखे या ज्यादा ही दिखे। इनमें एक खबर है, असम में 18 से अधिक उम्र वालों का आधार कार्ड नहीं बनेगा। क्यों नहीं बनेगा और असम ही ऐसा नियम क्यों लागू होगा समझना मुश्किल नहीं है उसपर भी तुर्रा यह कि जिनके बने हुए हैं उन्हें वोटर नहीं बनाया गया। तर्कों की बात आप जानते हैं। जब जो ठीक लगता है वही तर्क दे दिए जाते हैं। मतदाता सूची में नाम लिखाने के लिए आधार वैध नहीं है और मतदान व चुनाव होने के बाद 18 साल से ऊपर का आधार नहीं बनेगा। मुझे यह अटपटा लग रहा है। कानूनी स्थिति क्या है पता नहीं। जो भी हो, स्पष्ट होना चाहिए वरना बेरोजगार जनता आधार और मतदाता कार्ड ही बनाती रहेगी। भाजपा और इसके लोग मनमानी करते रहेंगे, देश का धन और नागरिकों का समय बर्बाद होता रहेगा। चुनाव में सब लोग वोट डाल पाएं – यह भी सुनिश्चित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट कह देगा कि अगली बार डाल लेना। यहां तक ठीक मान भी लिया जाए तो इस बार जीतने वाली पार्टी या सरकार को मनमानी क्यों करने दिया जाए जबकि वह हटाए गए मतदाताओं के साथ, या इस बार चुनाव में जो खास बाते हुईं उसके बिना नहीं जीत पा रही थी। जाहिर है, जीत संदिग्ध है और पहली बार 4000 ईवीएम जल जाने या जलाने की कोशिश से भी मामला संदिग्ध लगता है। अखबारों का काम है सवाल उठाना, मांग करना पर अब वे ऐसा नहीं करते हैं या कर पाते हैं। सरकारी की चापलूसी में अमर उजाला ने 94 साल में पहली बार बेटियों को स्थायी कमीशन की खबर को लीड बनाया है जबकि जबकि आज ही भारतीय वायु सेना के मालवाहक विमान एएन-32 के दुर्घटनाग्रस्त होने से 5 सैनिकों के शहीद होने की खबर द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। टीओआई ने शीर्षक में बताया है कि को-पायलट बच गया। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, एनडीए की कसौटी पर उतरीं खरी… पहली बार सेना-वायु सेना में 14 बेटियां अफसर।

मुझे लगता है कि डॉक्टर बनना चाहने वाले जब आत्महत्या करने को मजबूर हैं तब यह बहुत खुशी की बात नहीं है। दैनिक भास्कर के शीर्षक के अनुसार यह वायुसेना में 7 साल का सबसे बड़ा हादसा है। विदेशी संस्थानों के लिए नाविक की नौकरी करने वाले तीन भारतीय अमेरिका के हाथों मारे जा चुके हैं और अमेरिका ने जो कहा है, भारत ने जैसा विरोध किया है – ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण खबर होनी चाहिए थी। खबर तो यह भी होनी चाहिए थी कि सोफिया कुरैशी के लिए अपमानजनक बातें करने वाले मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री को भाजपा ने बचा लिया और इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने वाले जज को तबादले की वही (असल में उससे बहुत बुरी) सजा दी गई जो सीबीएसई के पेपर लीक के लिए जिम्मेदार ठहराए या बताए गए अफसरों को दी गई है (असल में यह सजा ही नहीं है)। इसलिए खबर यह होनी थी और अखबारों का काम नहीं है कि वह सरकार की खुशी में ताली-थाली बजाए। आज हिन्दी के मेरे बाकी तीन अखबारों में से दो की लीड ट्रम्प के दावे की है। दैनिक भास्कर का शीर्षक ऐसा है कि उसे लीड बनाने का कारण समझना मुश्किल नहीं है जबकि नवोदय टाइम्स का शीर्षक पढ़कर लगता है कि इसमें खबर क्या है। नवोदय टाइम्स ने लिखा भी है, ‘ट्रम्प का दावा’ उनके दावों की कहानी हम जानते हैं। झेलते रहे हैं। फिर भी लीड बनाया जा सकता है लेकिन दूसरी खबर नहीं हो तो या फिर दैनिक भास्कर की तरह – यही बताने के लिए कि ट्रम्प क्या कर रहे हैं। दो लाइन के शीर्षक में पहला है – आज होगी डील : ट्रम्प दूसरी लाइन है तारीख तय नहीं : ईरान जाहिर है, ट्रम्प डील करने के लिए परेशान हैं और ईरान को जल्दी नहीं है। यह पुरानी स्थिति है और काफी समय से चल रही है। मुझे लगता है कि यह लीड लायक खबर नहीं है।

इस लिहाज से इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक नया और अभिनव है। मोदी और ट्रम्प जी7 में जा रहे हैं तो भारतीय नाविकों की मौत पर सामना हो सकता है। अखबार ने लिखा है कि दोनों नेता सम्मेलन के मौके पर मिल सकते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है – ट्रम्प-मोदी की मुलाकात की संभावना, प्रधानमंत्री फ्रांस पहुंचे। दि एशियन एज ने प्रधानमंत्री के दौरे की खबर को लीड बनाया है और बताया है कि फ्रांस और स्लोवाकिया के दौरे भारत-ईयू, जी-7 संबंधों को मजबूत करेंगे। नई दिल्ली डेटलाइन से यह खबर रवाना होने से पहले जारी किए गए बयान के आधार पर है और नई दिल्ली डेटलाइन से है। द टेलीग्राफ की लीड अभिषेक बनर्जी के घर पर छापे की खबर है। इस फ्लैग और मुख्य शीर्षक के साथ दो और खबरें हैं। इनमें एक भाजपा नेता की शिकायत है जो 2020 के 200 करोड़ रुपए के तूफान राहत में अनियमितताओं के संबंध में है। तीसरी खबर तृणमूल सांसद सुदीप बंदोपाध्याय के दिल्ली में होने और बागियों का साथ देने वाले 20 वें सांसद होने की है। अखबार के पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है इसलिए इन तीन खबरों के अलावा दो ही अन्य खबरें हैं। इनमें एक असम के नए आधार नियम के बारे में है तो दूसरा भारतीय नाविकों पर अमेरिकी हमले के खिलाफ भारत का विरोध दर्ज कराने के लिए विदेश मंत्रियों की बात चीत से संबंधित है। इससे आप इन दोनों खबरों का महत्व समझ सकते हैं। असम वाली खबर तो असम के लोगों को ही प्रभावित करेगी लेकिन तीन भारतीय नाविकों की हत्या अपने किस्म की पहली खबर है और न सिर्फ विदेश में बल्कि विदेशी नौकरी में भारतीयों की रक्षा और उसपर भारत सरकार के रुख तथा साख से संबंधित है। आज इस खबर को भी महत्व मिलना चाहिए था लेकिन सरकार ने मौत का (हत्या का नहीं) विरोध किया जैसी खबरें हैं। अमर उजाला तो अमेरिकी भाषा बोल रहा है, नाविकों की मौत पर भारत का विरोध खारिज, अमेरिका ने कहा – होर्मुज का आदेश मानें, नाकेबंदी का उल्लंघन न करें। दूसरी तरफ देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, पेपर लीक के खिलाफ राहुल गांधी का देशव्यापी शंखनाद। 17 जून को राजस्थान के कोटा से होगी छात्र सम्मेलन की शुरुआत। इन दो खबरों के सरकार के काम, उसका हाल और विपक्ष के तेवर को समझ सकते हैं। अखबारों की रिपोर्टिंग तो जो है सो है ही। मोटा मोटी मामला यह है कि ओमान की खाड़ी में एक तेल टैंकर पर अमेरिकी नौसेना के हमले में मारे गए तीन भारतीय नाविकों की दुखद मृत्यु को लेकर काफी नाराजगी है। भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर लोग इस हमले को अमेरिकी नौसेना की “जल्दबाजी और अहंकार का परिणाम” बता रहे हैं। लोग लिख रहे हैं कि बिना किसी ठोस चेतावनी के एक निहत्थे वाणिज्यिक जहाज पर मिसाइल दागना अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों और अभिनेता प्रकाश राज जैसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस मुद्दे पर कथित चुप्पी को लेकर सवाल उठाए हैं। पूछा है कि भारत सरकार अमेरिका के खिलाफ सख्त कदम क्यों नहीं उठा रही है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से फोन पर बात कर कड़ी आपत्ति जताई। इसपर अमेरिकी सरकार के आपत्तिजनक रवैये को आज अमर उजाला ने खबर बनाया है और यही शीर्षक है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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