- बांबे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ डबल बेंच के आदेश पर मजीठिया योद्धाओं को सुप्रीमकोर्ट से मिली राहत
- संविधान का ‘अनुच्छेद 142’ (Article 142) बना ‘ब्रह्मास्त्र’; देश भर के पत्रकारों के उच्च न्यायालय और लेबर कोर्ट में फंसे मामलों को मिलेगी गति।
शशिकांत सिंह-
मजीठिया वेतन आयोग (Majithia Wage Board) के हक की बकाया राशि के लिए पिछले 10 वर्षों से अविरत संघर्ष कर रहे श्रमिक पत्रकारों का गला घोंटने के अखबार’ प्रबंधन के तकनीकी मंसूबे को सर्वोच्च न्यायालय ने पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के डबल बेंच के आदेश का हवाला देते हुए औरंगाबाद उच्च न्यायालय ने तकनीकी त्रुटि पर उंगली उठाते हुए पत्रकारों के पक्ष में आए फैसले को सीधे खारिज कर दिया था। उस अन्यायपूर्ण आदेश को दरकिनार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाळे और उनके सहयोगियों और बांबे जर्नलिस्ट यूनियन (बीयूजे) के मामले को संविधान के अनुच्छेद १४२ (Article 142) के तहत प्राप्त सर्वोच्च विशेषाधिकार का उपयोग करके जीवित कर दिया है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने प्रबंधन की तकनीकी पक्ष को कानूनी दायरे में ही रोकते हुए तीखा प्रहार किया कि, “केवल प्रशासनिक ढांचे की गलती के कारण वर्षों से लड़ने वाले गरीब श्रमिक पत्रकारों को फिर से ‘शून्य’ (Zero) से लड़ने के लिए मजबूर करना घोर अन्यायपूर्ण होगा।” इस टिप्पणी के साथ न्यायालय ने श्रमिक पत्रकारों की 10 वर्षों की कानूनी लड़ाई को ऐतिहासिक संजीवनी दी है।
सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले से प्रभावित पत्रकारों को बड़ी राहत मिली है और तकनीकी कारणों से उनके मामले पूरी तरह से रद्द नहीं होंगे, जिसके कारण उन्हें अब फिर से शून्य से न्यायिक लड़ाई लड़ने की आवश्यकता नहीं होगी।
दैनिक भास्कर समूह के ‘दिव्य मराठी’ प्रबंधन को सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से बड़ा कानूनी झटका लगा
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले और उनके सहयोगियों के पक्ष में औरंगाबाद के श्रम न्यायालय (Labour Court) ने बकाया राशि मंजूर करने का अंतिम ‘अवार्ड’ पारित किया था। इसके खिलाफ डीबी कॉर्प लिमिटेड ने औरंगाबाद हाई कोर्ट में रिट याचिकाएं दायर की थीं। हाई कोर्ट ने एक ‘तकनीकी मुद्दे’ (कि श्रम उपायुक्त को यह संदर्भ लेबर कोर्ट भेजने का कानूनी अधिकार नहीं था) का आधार लेकर लेबर कोर्ट के उस आदेश को सीधे खारिज कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने औरंगाबाद हाई कोर्ट के उस खारिज करने वाले आदेश को दरकिनार कर दिया है और पत्रकारों को उच्च न्यायालय में जाकर उस पुराने आदेश को रिकॉल (Recall) करने तथा अपने मामले को ‘जीवित’ करने की पूरी छूट दी है। इसके चलते प्रबंधन का तकनीकी रास्ता अब पूरी तरह से बंद हो गया है।
बांबे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के आदेश के बाद प्रबंधन का यह उद्देश्य लगभग सफल हो गया था; क्योंकि यदि लेबर कोर्ट के फैसले सीधे रद्द हो जाते, तो पत्रकारों को नए ‘लेबर कोड 2025’ के अनुसार फिर से शून्य से पूरी प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती, जो श्रमिकों के साथ घोर अन्याय होता।
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने प्रबंधन की इस चाल को पहचान लिया और अपने आदेश के अनुच्छेद 33, 37 और 38 में स्पष्ट किया कि तकनीकी निर्णय के कारण श्रमिकों के मामलों का अंत (Termination) नहीं होगा और चल रही प्रक्रियाएं बंद नहीं की जाएंगी। सुप्रीमकोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्ति से रुकी हुई प्रक्रिया को सुरक्षित कर दिया और 6 महीने के लिए ‘यथास्थिति’ (Status Quo) रखते हुए राज्य सरकार को ‘वैध संदर्भ’ देने की जिम्मेदारी सौंपी है।
सुप्रीमकोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के अनुसार, मुख्य याचिकाकर्ता वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले और उनकी टीम को अपनी न्यायिक लड़ाई फिर से ‘शून्य’ (Zero) से शुरू करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। औरंगाबाद उच्च न्यायालय ने तकनीकी कारणों से जिस चरण पर उनका मामला खारिज किया था, ठीक उसी चरण से यह मामला फिर से जीवित हो जाएगा। उन्हें निम्नलिखित कानूनी कदम क्रमानुसार (Sequence) उठाने होंगे:
1. राज्य सरकार के पास पुनर्विचार का आवेदन जमा करना (तत्काल कदम): सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले को सबसे पहले महाराष्ट्र सरकार के श्रम विभाग (मंत्रालय/श्रम आयुक्त कार्यालय) में एक आधिकारिक लिखित आवेदन जमा करना होगा। इस आवेदन के माध्यम से, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई 6 महीने की समय-सीमा के भीतर, उनके पुराने मामले के सभी दस्तावेजों की नए सिरे से जांच कर राज्य सरकार को अपने हस्ताक्षर से ‘वैध नया संदर्भ’ (Valid Fresh Reference) श्रम न्यायालय या उच्च न्यायालय के समक्ष जारी करने का कानूनी अनुरोध करना होगा।
- औरंगाबाद उच्च न्यायालय में ‘रिस्टोरेशन’ (पुनर्स्थापना) आवेदन दायर करना: राज्य सरकार से मूल संदर्भ की जांच पूरी होने और सरकार का ‘नया संतोष’ (Fresh Satisfaction) रिकॉर्ड पर आने के बाद, सुधीर जगदाले को मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ का रुख करना होगा। वहां औरंगाबाद हाई कोर्ट के पुराने खारिज करने वाले आदेश को रद्द करने के लिए ‘रिकॉल’ (Recall) और अपने मूल मामले को पूर्ववत करने के लिए ‘रिस्टोरेशन’ (Restoration) आवेदन दायर करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय के परिच्छेद 40 के निर्देशानुसार, उच्च न्यायालय उस मामले को तत्काल बहाल कर गुण-दोष (Merits) पर अंतिम निर्णय देगा।
- चूंकि श्रम न्यायालय पहले ही सुधीर जगदाले के पक्ष में फैसला दे चुका है, इसलिए आगे का रास्ता साफ है और हाई कोर्ट में जमा एरियर्स की राशि को भी निकालने (Withdraw) का मार्ग अब प्रशस्त हो गया है।
संविधान का ‘अनुच्छेद 142’ (Article 142) क्या है? जिसके एक ही इस्तेमाल से सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया हाई कोर्ट का फैसला!
कानून के तकनीकी दायरे में जब श्रमिकों का गला घोंटा जाता है, तब सर्वोच्च न्यायालय इस ‘ब्रह्मास्त्र’ का उपयोग करता है!
इस पूरे मामले में ‘अनुच्छेद 142’ (Article 142) शब्द सबसे महत्वपूर्ण रहा है। सामान्य पाठकों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के इस ‘ब्रह्मास्त्र’ को समझना बेहद दिलचस्प है:
असीमित और विशेष अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को मिला एक ऐसा विशेष अधिकार है, जिसका उपयोग करके न्यायालय कानून के तकनीकी दायरे से परे जाकर ‘पूर्ण न्याय’ (Complete Justice) कर सकता है।










