विवेक शुक्ला-
गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड- 26 अगस्त 1978
आज 48 साल बीत गए, लेकिन दिल्ली की उस मनहूस शाम की सिहरन कम नहीं हुई है। 26 अगस्त 1978 को जब नौसेना अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 16 वर्षीय बेटी गीता और 14 वर्षीय बेटे संजय घर से निकले, तो वे कभी वापस नहीं लौटे। दो मासूम बच्चों का नृशंस हत्याकांड पूरे देश को स्तब्ध कर गया था। इमरजेंसी के बाद की अस्थिरता के माहौल में यह घटना न सिर्फ दो जिंदगियों का खात्मा थी, बल्कि मध्यवर्गीय परिवारों की सुरक्षा की भावना पर गहरा घाव थी। अब अमेज़न प्राइम पर रिलीज हुई वेब सीरीज़ ‘राख’ ने उस पुराने जख्म को फिर से हरा कर दिया है। यह क्राइम-थ्रिलर उस दिल दहलाने वाली सच्ची घटना पर आधारित है, जिसने 1978 में पूरे भारत को हिला दिया था।
दिल्ली में मूसलाधार बारिश हो रही थी। गीता जीसस एंड मेरी कॉलेज की दूसरी वर्ष की छात्रा थी, जबकि संजय मॉडर्न स्कूल, बाराखंबा रोड का छात्र था। दोनों आकाशवाणी भवन के युवा वाणी कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे थे। गीता को कॉम्पियरिंग करनी थी और संजय को भाग लेना था। वे घर से करीब 6:15 बजे निकले, लेकिन कभी आकाशवाणी नहीं पहुंचे।
बारिश के कारण दोनों भाई-बहन ने रास्ते में एक मस्टर्ड कलर की फिएट कार से लिफ्ट मांगी। कार में दो शातिर अपराधी सवार थे- कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला। पुलिस को इन दोनों की पहले से ही तलाश थी। वे चोरी की कार में घूम रहे थे और छोटे-मोटे अपराधों का इतिहास रखते थे। शुरू में उनका मकसद बच्चों से फिरौती मांगना था, लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके पिता नौसेना अधिकारी हैं और परिवार अमीर नहीं है, तो उनका इरादा बदल गया। क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ दी गईं।
ये दोनों बच्चों को अगवा कर अपर रिज रोड के घने जंगलों में ले गए। वहां बेरहमी से प्रताड़ित किया गया। संजय ने जबरदस्त प्रतिरोध किया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार उसके शरीर पर 25 से ज्यादा छुरे के घाव थे, ज्यादातर हाथों और बचाव के निशान। गीता पर भी अत्याचार हुए। उसके साथ बलात्कार का आरोप भी लगा। दोनों को मौत के घाट उतार दिया गया। उनके शव 28 अगस्त को जंगली इलाके में मिले। पूरा देश स्तब्ध रह गया। दिल्ली सिहर उठी। तब खबरिया चैनलों और सोशल मीडिया का जमाना नहीं था, फिर भी खबर जंगल की आग की तरह फैली। अखबारों की सुर्खियां दिन-रात इस घटना से भरी रहीं।
रंगा-बिल्ला की दहशत
रंगा और बिल्ला दिल्ली में पहले भी कई अपराध कर चुके थे। गीता-संजय के प्रतिरोध से उनके शरीर पर घाव हो गए थे, जो बाद में महत्वपूर्ण सबूत बने। पुलिस ने गहन तलाश शुरू की। राजेंद्र नगर थाने के इंस्पेक्टर वीपी गुप्ता और सब-इंस्पेक्टर राम चंदर की टीम ने अथक प्रयास किए। देशव्यापी छापेमारी चली। सितंबर 1978 में दोनों को ट्रेन में भागते हुए आर्मी जवानों- लांस नायक गुरतेज सिंह और एवी शेट्टी ने पकड़ा और पुलिस को सौंपा।
मामले की सुनवाई ने पूरे देश का ध्यान खींचा। दिल्ली सत्र न्यायालय ने दोनों को अपहरण, बलात्कार, हत्या और आपराधिक षड्यंत्र का दोषी ठहराया। सजा-ए-मौत सुनाई गई। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें खारिज कीं। 31 जनवरी 1982 को तिहाड़ जेल में दोनों को फांसी दी गई। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने दया याचिका खारिज कर दी थी। यह केस भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ केस की श्रेणी में रखा गया।
देश पर क्या असर पड़ा?
गीता-संजय हत्याकांड ने देश की सामूहिक चेतना को हिला कर रख दिया। 1970 के दशक के अंत में इमरजेंसी के बाद की अस्थिरता, बढ़ती अपराध दर और पुलिस सुधार की मांग इस घटना से और तेज हुई। मध्यवर्गीय परिवारों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भय व्याप्त हो गया। शाम को बाहर निकलने, लिफ्ट लेने या अकेले घूमने पर सख्त पाबंदियां लगीं। अभिभावक अब हर कदम पर सतर्क रहने लगे। सोशल वर्कर लेखक प्रीतम धारीवाल कहते हैं कि वे जब भी रिज से गुजरते हैं तो उन्हें उन बच्चों की याद आने लगती है।
इस केस ने फॉरेंसिक जांच को नई ऊंचाई दी। घावों के निशान, कपड़ों के टुकड़े और अन्य सबूतों ने अदालत में मजबूत आधार तैयार किया, जो बाद के आपराधिक मामलों के लिए उदाहरण बना। कैप्टन चोपड़ा परिवार की पीड़ा कल्पना से परे थी। माता-पिता ने न सिर्फ बच्चों को खोया, बल्कि पूरे समाज की उदासीनता को भी महसूस किया। इस घटना ने दिल्ली को ‘क्राइम कैपिटल’ का तमगा दिलाया, जो आज भी छाया रहता है। छात्रों और युवाओं में आक्रोश फूटा। प्रदर्शन हुए, मीडिया ने व्यापक कवरेज दिया और सरकार पर दबाव बढ़ा।
‘राख’ इस घटना को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही है। सीरीज उस दौर के दिल्ली के माहौल, अपराधियों की क्रूरता, पुलिस जांच की चुनौतियों और परिवार के दर्द को ड्रामेटिक तरीके से पेश करती है। अली फज़ल और सोनाली बेंद्र जैसी भूमिकाएं इसे और प्रभावशाली बनाती हैं। हालांकि कुछ कल्पनाशील तत्व जोड़े गए हैं, लेकिन मूल कहानी की ताकत बरकरार है। यह सीरीज युवाओं को याद दिलाती है कि सार्वजनिक स्थानों पर सतर्कता कितनी जरूरी है।
गीता और संजय की बहादुरी आज भी प्रेरणा है। संजय ने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी, गीता ने भी प्रतिरोध किया। उनके बलिदान ने समाज को जागरूक किया। आज भी दिल्ली की बुजुर्ग आबादी इस घटना को याद कर सिहर उठती है।
गीता-संजय चोपड़ा का कत्ल क्रूरता का चरम था। आधुनिक समय में भी बच्चों की सुरक्षा, पुलिस सुधार और फॉरेंसिक क्षमता पर चर्चा इस घटना से जुड़कर होती है। बहरहाल, दिल्ली और पूरा देश गीता-संजय के कत्ल को कभी नहीं भूल सकता।


