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आज के अखबार : दिल्ली-जयपुर सड़क गुड़गांव में धंस गई, सिर्फ दैनिक भास्कर और TOI ने पहले पन्ने पर छापा

Large sinkhole in a city street, tarps and orange traffic cones cordon off the hole while onlookers stand behind a barrier.

एनडीटीवी की फोटो। विकास का पर्याय बना दी गई सड़क पर ऐसा गड्डा होना इतना आम है कि आज यह फोटो दो ही अखबारों में पहले पन्ने पर है। वह भी छोटी सी, पोल खोलू नहीं। हे राम!

संजय कुमार सिंह

आज मेरे 10 में से दो ही अखबारों, दैनिक भास्कर और टाइम्स ऑफ इंडिया ने मानसून के कारण एनसीआर की बदहाली की खबर को महत्व दिया है। कल मैंने बताया था कि मौसम के कारण हवाई यातायात अस्त-व्यस्त होने की खबर को महत्व नहीं दिया गया। आज दिखाई दे रहा है कि जन-जीवन अस्तव्यस्त होने की खबर तो नहीं ही है दिल्ली जयपुर हाईवे पर इफ्फको चौक के पास बड़ा गड्ढा बन जाने की खबर को भी महत्व नहीं दिया गया है। गुरुग्राम में पानी भरने की खबर कल तो थी लेकिन इससे सड़कें धंसने और एनसीआर में जलभराव तथा उससे जाम लगना भी बड़ी खबर है। दिल्ली समेत पूरे एनसीआर में भाजपा की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी डबल इंजन की सरकार के मजबूत होने और बेहतर काम कर पाने जैसे दावे करते रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि अब कनाट प्लेस में भी पानी भर जाता है।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री ने केद्र सरकार के सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा है कि कार्यों को बेजोड़ गुणवत्ता के साथ पूरा किया जाना चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज इस खबर को पहले पन्ने पर ही छापा है। ना खाउंगा, ना खाने दूंगा के बाद भ्रष्टाचार के ढेरों मामले सामने आए हैं और सड़कें धंसने व पुल टूटने के कई मामले हैं। सरकार ने क्या कार्रवाई की उसकी खबर तो नहीं ही है आज टाइम्स ऑफ इंडिया की इस खबर से लगता है कि प्रधानमंत्री अभी भी अपनी छवि बनाने में लगे हैं और यह बताना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार और खराब कामों की जानकारी उन्हें नहीं है या सड़कों पर गड्डे हो जाने का कारण समझना मुश्किल है। यह सब तब जब वे यह दावा कर चुके हैं कि ड्रोन भेजकर निगरानी करते रहे हैं। जाहिर है, स्थिति बहुत खराब है और पुराने प्रचार का सच अब दिखने लगा है। फिर भी प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है और टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर में इसी के हवाले से हाईलाइट किया है। संबंधित अंश इस प्रकार है, “प्रधानमंत्री ने कहा कि काम तेज़ी से करने के साथ-साथ उसकी क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने मंत्रालयों, राज्यों और काम को लागू करने वाली एजेंसियों से कहा कि वे आधुनिक टेक्नोलॉजी अपनाएं और हर स्तर पर क्वालिटी एश्योरेंस और निगरानी को मज़बूत करें — पीएमओ”।

पहले पन्ने पर छपी इस खबर के साथ उसी पन्ने पर आज अखबार की लीड का शीर्षक है, इस मानसून के दौरान शहर में हुई बारिश अभी ही इस मौसम के सामान्य से सबसे ज्यादा है। यह सब तब हो रहा है जब देश के बाकी हिस्सों में बारिश कम हुई है। मुझे लगता है कि बारिश ज्यादा हुई है यह अलग खबर है लेकिन बारिश इतनी हुई कि पूरी व्यवस्था चरमरा गई। इसलिए, यह भी खबर है और सबसे बड़ी खबर यही होनी चाहिए। ऐसी खबर आज मेरे 10 अखबारों में सिर्फ एक, दैनिक भास्कर में है। फ्लैग शीर्षक है, थम गई दिल्ली। बारिश ने फिर खोली नालों की सफाई के दावों की पोल। मुख्य शीर्षक है, गुरुग्राम में सड़कें धंसी; हाईवे पर गहरा गड्ढा, एनसीआर में जल भराव से लगा जाम। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी फोटो का कैप्शन है, गुड़गांव के इफ्फको चौक के पास सड़ का एक बड़ा हिस्सा मंगलवार को दो दिन की भारी बारिश के बाद धंस गया। इससे 10 फीट चौड़ा गड्ढा हो गया। अखबार ने लिखा है कि तीन दिन से बारिश चल रही है। दैनिक भास्कर की खबर का फ्लैग शीर्षक है, बारिश ने फिर खोली नालों के सफाई के दावों की पोल। जाहिर है, सड़कों पर पानी भरने का कारण नालों की सफाई न होना या ठीक से नहीं किया जाना बताया जाता है। इससे मूल समस्या को नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन यह एक साल हो सकता है हर साल क्यों होगा?

जाहिर है, नाले साफ करने लायक नहीं हैं या उनकी सफाई हो ही नहीं सकती है। डबल इंजन वाले राज्यों में स्कूलों के वीडियो बनाने पर एफआईआर का नियम लागू हो गया है। ऐसी खबर भी है। सरकारी स्कूल का वीडियो पोस्ट करने के लिए हाथरस के ग्रामीण को जेल भेजने की खबर है। ऐसे में गाजियाबाद की सड़कों की हालत सरकार को मालूम है या नहीं, भगवान जानें। एक जागरूक या जरूरतमंद नागरिक के रूप में मैं मेल से मुख्यमंत्री को सूचना दूं तो जवाब आता है कि जन शिकायत पोर्टल पर दर्ज कराएं और पोर्टल पर नागरिक शिकायत कराए तो सरकारी बाबू क्या करेंगे? और उससे भी शिकायत दूर नहीं हो तो मुख्यमंत्री किसलिए हैं? जाहिर है, सरकार मन की बात ही करेगी।

जमीन के नीचे लग रहे नाले के ये पाइप सड़क के किनारे है लेकिन एक जगह भी बैठ जाए तो देर सबेर पानी निकलना बंद हो जाएगा। एक देश एक पार्टी एक सरकार के राज में यही हालत पूरे देश की है। निजी क्षेत्र में बनी कॉलोनी, मोहल्लों और पहले के मोहल्लों को अपवाद मानकर छोड़ दिया जाए तो बाकी देश में यही हालत लगती है। निश्चित रूप से यह बड़ा मामला है लेकिन खबर नहीं है और जो है वह सरकार का प्रचार करने वाली। उदाहरण के लिए अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “श्री बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावा चोरी नहीं होने देंगे : सुप्रीम कोर्ट”।

अयोध्या में चंदा चोरी के मामले में जो हुआ, जैसे हुआ और उसके बाद जो हुआ उसमें इस तरह की खबर या आश्वासन का मतलब, ‘ना खाउंगा, ना खाने दूंगा’ के हश्र के बाद क्या होना चाहिए मैं तय नहीं कर पा रहा हूं। राजनीति यह है कि अपराध की सजा बढ़ाकर या सख्त करके अपराध नियंत्रण की कोशिश की जाती है। कुलदीप सेंगर के खिलाफ कार्रवाई शुरू ही नहीं हुई। तमाम मामलों में एफआईआर ही नहीं लिखी जाती है और जब निचली अदालत से क्लिन चिट मिल जाए तो मामला खत्म हो जाता है। लेकिन सरकार कुछ खास मामलों में अपील करती है और सजा बढ़वाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट जाती है या जा सकती है। किसके खिलाफ जाएगी और किसके खिलाफ नहीं – उसमें पक्षपात दिख रहा है पर सब हो रहा है।

भाजपा के खिलाफ पत्रकारिता करने वाले तरुण तेजपाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट की शर्त है कि समर्पण करें तब अपील पर सुनवाई होगी। ब्रजभूषण शरण सिंह के मामले में ऐसा नहीं हुआ। पॉस्को मामले के बावजूद वे गिरफ्तार ही नहीं हुए, ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया है। पॉस्को मामला भी बंद हो गया और वह बयान बदलने तथा शिकायत वापस लेने के आधार पर है। इसे अदालत ने 2025 में ही स्वीकार कर मामला बंद कर दिया था। लेकिन तेजपाल की सजा बढ़वाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है। कोई भी नागरिक सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा कैसे लड़ेगा और सत्ता से कैसे जीतेगा? ठीक है कि सभी मामले एक जैसे नहीं होते हैं लेकिन सरकार समर्थक और विरोधी के मामलों में सरकार की कार्रवाई या सक्रियता तो साफ दिखाई दे रही है।

देशबन्धु की लीड पटना के छात्रों का आंदोलन है और दिल्ली में यह अकेला है। आपको याद होगा, जंतर मंतर के बाद झारखंड में छात्र आंदोलन शुरू हुआ तो राहुल गांधी को चुनौती दी गई, तमामत लोगों ने कहा रांची क्यों नहीं जाते, झारखंड के छात्रों की चिन्ता नहीं है आदि। उसकी खबरें खूब छपीं, सोशल मीडिया पर चर्चा रही और रिपोर्ट तो हुई ही। लेकिन पटना के साथ ऐसा नहीं है। कोई यह भी नहीं कह रहा है कि राहुल गांधी को पटना जाना चाहिए। कारण समझना मुश्किल नहीं है और यह सत्तारूढ़ दल की मजबूती मानी जाए तो सरकारी विज्ञापनों के कारण ही है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। नवोदय टाइम्स की लीड भी बांके बिहारी मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख की खबर है लेकिन छात्रों पर पेलेट गन चलने कील लगी लाठियां चलने पर सुप्रीम कोर्ट का रुख मुझे सख्त नहीं लगा। ना ऐसी कोई खबर छपी। या छपती तो जो स्थिति है उससे अलग होती।

आप जानते हैं कि 20 जुलाई को दिल्ली में जंतर मंतर के प्रदर्शनकारियों के साथ हुई बर्बरता के खिलाफ गृहमंत्री का इस्तीफा मांगा जा रहा है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं, इसके लिए एक टीम बनाई है। खबरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में जांच का दायरा बढ़ाने के लिए याचिका दायर की गई है और इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, 20 जुलाई की घटना की जांच शुरू होने दें। आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड यही खबर है। इस खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पांच सदस्यों वाली हाई-पावर्ड जांच समिति को दिल्ली में 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की स्वतंत्र जांच करने देना चाहिए। पूर्व जज जस्टिस आर सुभाष रेड्डी इस समिति के प्रमुख हैं। याचिकाकर्ताओं ने समिति के पुनर्गठन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा सरकार और पुलिस के कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की कथित भूमिका की व्यापक जांच की मांग की है।

दि एशियन एज की लीड का फ्लैग शीर्षक है, सरकार ने रक्षा उत्पादन में आत्म निर्भरता को बढ़ावा दिया। मुख्य शीर्षक है, डीआरडीओ के मिसाइल इंडिया इंक द्वारा बनाए जाएंगे। रक्षा उत्पादन में आत्म निर्भरता तो ठीक है लेकिन विदेशी कारों की क्या जरूरत? वह भी चल रहा है। 23 अगस्त को अमर उजाला में पहले पन्ने पर खबर थी, फर्जी आयात ऑर्डर से एक लाख करोड़ विदेश भेजे। अगर हम आत्म निर्भर हैं, होना चाह रहे हैं, प्रधानमंत्री इसपर जोर देते रहे हैं फिर भी फर्जी आयात की गुंजाइश है तो कैसी आत्मनिर्भरता? जो आयात होता है और जरूरी है उसकी बात अलग है। खबर बताती है कि देश भर में 36 सीए और 394 संदिग्ध संस्थाओं की आयकर जांच में पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ। जाहिर है, आत्मनिर्भरता और उसकी कोशिश एक तरफ दूसरी तरफ फर्जी आयात का गोरखधंधा। वह भी ना खाउंगा ना खाने दूंगा के 12 साल बाद – आखिर चल क्या रहा है? कौन बताएगा?

द टेलीग्राफ की लीड एसआईआर के तहत हुए कारनामों में से एक पर है। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट को मंगलवार को बताया गया कि एसआईआर ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित 38 लाख अपील में से सिर्फ सा लाख अपील नाम हटाने के लिए हैं जबकि बाकी के 31 लाख नाम शामिल किए जाने के खिलाफ अपील हैं। यह जानकारी आरटीआई से मिली है और आरटीआई के जवाब के अनुसार, 38 लाख अपील में से 82,000 पर ट्रिब्यूनल ने निर्णय दे दिए हैं। इनमें करीब 75,000 या 91 प्रतिशत मतदाताओं के पक्ष में हैं जो मतदाता सूची में अपना नाम बहाल किए जाने की मांग कर रहे थे। आप समझ सकते हैं कि एसआईआर के नाम पर बंगाल में क्या हुआ है और उससे काम नहीं चला तो दल बदल की भी कोशिश हुई और मामला लोकसभा अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, भारत और चीन ने सीमा तय करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। उपशीर्षक है, बीजिंग में विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक के दौरान दोनों देशों ने सीमावर्ती इलाकों में शांति बनाए रखने पर ज़ोर दिया; राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा कि रिश्ते ‘धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं’ जबकि चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि दोनों देशों को इतिहास से सीखना चाहिए। खबर के अनुसार, डोभाल ने मंगलवार को बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ बातचीत की। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, अगले महीने दिल्ली में बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ शी जिनपिंग के ब्रिक्स में शामिल होने की संभावना। खबर के अनुसार चीन की एडवांस टीम दौरे के लिए जमीन तैयार करने पहुंच गई है। दूसरी ओर, डोभाल और वांग सीमा परिसीमन पर प्रगति के प्रयास में हैं। अखबार ने लिखा है, संबंध बहाल करने की कोशिशों के बीच शीन जिनपिंग सात साल बाद भारत आएंगे।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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