दैनिक भास्कर की खबर, ऑपरेशन सिन्दूर का जो हुआ, पाकिस्तान जो कर रहा है उसके बावजूद। प्रधानमंत्री वर्षों बाद अपने विश्वविद्यालय गए। मौका शिक्षक दिवस का भी था। लेकिन खबरों में ऐसा कुछ या इस पर कुछ नहीं है। बच्चों से भी उन्होंने वही और वैसी ही बातें की जो करते रहे हैं। यह पत्रकारिता का ढोंग है जिसमें प्रधानमंत्री ना खाउंगा ना खाने दूंगा का दावा करते हैं, प्रचार पाते हैं, इलेक्टोरल बांड सुप्रीम कोर्ट से रद्द होने के बावजूद भाजपा को सबसे ज्यादा चंदा मिलता है। अनाम सी पार्टियों को 4000 करोड़ से ज्यादा के चंदे की खबर का कुछ नहीं होता है। भ्रष्टाचार खत्म करने के दावे के बावजूद सिर्फ बीबीसी ने खबर को फॉलो किया और उसपर प्रधानमंत्री से सवाल नहीं पूछा जा रहा है। वे विरोधियों को दिमागी नक्सल कहकर खुश हैं।
संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला की खबर इस प्रकार शुरू होती है, करीब 12 साल बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स (एसआरसीसी) पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष पर तीखा हमला किया। देशबन्धु की खबर के अनुसार, शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के बिना विकसित भारत संभव नहीं। आज यह खबर दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं है। दूसरी ओर, देशबन्धु में प्रधानमंत्री की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में मेट्रो की सवारी कर रहे प्रधानमंत्री की तस्वीर स्कूली बच्चों के साथ छपी है। टॉप पर छपी खबर का शीर्षक है, विपक्ष को हजम नहीं हो रही विकास दर : मोदी।
अमर उजाला की खबर का इंट्रो है, 12 साल पहले सीएम रहते दिल्ली के कॉलेज में आए थे, अब 12 साल पीएम रहने के बाद पहुंचे। पहले पन्ने पर जो खबर है उससे पता नहीं चल रहा है कि 12 साल पहले प्रधानमंत्री एसआरसीसी ही आए थे या दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी और कार्यक्रम में आए थे। गूगल से पता चला कि 30 जून 2023 को प्रधानमंत्री दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह के समापन कार्यक्रम में भाग लेने गए थे। जाहिर है 12 साल वाली सूचना भ्रम फैलाने वाली है। दिलचस्प यह है कि शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण से संबंधित खबरों में ऐसा कुछ प्रमुखता से नहीं है। जो पहले पन्ने पर छपा है उसमें ज्यादातर राजनीतिक है और वह भी ज़ेन ज़ी के स्तर का नहीं है।
एआई ने याद दिलाया कि नरेंद्र मोदी फरवरी 2013 में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स गए थे। तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद 5 सितंबर 2026 (शिक्षक दिवस) को वे पहली बार एसआरसीसी के परिसर में गए। हालांकि, कार्यक्रम शताब्दी वर्ष का था। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी 29 जून 2023 को भी दिल्ली विश्वविद्यालय गए थे। उस दिन उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह के समापन कार्यक्रम को संबोधित किया था। आइये अब देखें कि प्रधानमंत्री ने बच्चों से जो कहा उसकी खबर अखबारों में कैसे छपी है।
अमर उजाला में खबर का शीर्षक है, मैंने होम्योपैथी की गोली दी तो सारे दिमागी नक्सल बौखला गए : मोदी। इसके साथ छपी एक और खबर का शीर्षक है, राहुल के ‘छात्रों की गूंज’ को बताया झूठ की गूंज। दैनिक भास्कर में इस खबर का शीर्षक है, एक गोली से खुद बाहर आ गए दिमागी नक्सल : मोदी। इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, आज सेना पाकिस्तान को घर में घुसकर मारती है….। इसमें बताया गया है, मोदी बोले – 2013 में अर्थव्यवस्था बेहाल थी। आतंकी बेलगाम थे। आज आतंकी पस्त हैं। पाकिस्तान कोई नापाक हरकत करता है तो भारत की सेना घर में घुसकर मारती है। नक्सली आतंक की कमर तोड़ दी गई है।
अंग्रेजी अखबारों में कोलकाता के द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर होने की सूचना जरूर है। खबर इस प्रकार है, प्रधानमंत्री ने नीतियों के मामले में तेज़ी की तारीफ़ की (पीएम हेल्स पॉलिसी डायनमिज्म)। खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि देश 2013 में पॉलिसी के मामले में आई सुस्ती (पॉलिसी पैरालिसिस) से निकलकर अब पॉलिसी में तेज़ी (पॉलिसी डायनमिज़्म) के दौर में आ गया है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने भारत को “फ़्रैजाइल फ़ाइव” (कमज़ोर पाँच अर्थव्यवस्थाओं) की श्रेणी में धकेल दिया था, वे अब भारत की 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ को पचा नहीं पा रहे हैं।
दि एशियन एज में यह खबर तीन कॉलम की फोटो के साथ चार कॉलम की लीड है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि की प्रशंसा की, आलोचकों की निन्दा की; जेन जी पर दांव लगाया। दो बुलेट प्वाइंट उपशीर्षक है – पहला, प्रधानमंत्री ने 13 साल बाद एसआरसीसी में कहा, भारत ने लंबी दूरी तय कर ली है। दूसरा, स्वतंत्रता दिवस पर दिमागी नक्सलों को होम्योपैथी की खुराक दी। इस खबर के साथ छपी एक और खबर का शीर्षक है, “मोदी ने शिक्षकों से कहा : जिज्ञासा को बढ़ावा दें, किताबों से आगे बढ़ें”।
दि इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर दो कॉलम की फोटो के साथ पांच कॉलम की लीड है। शीर्षक है – प्रधानमंत्री ने छात्रों से कहा, 2013 और अब को देखिए, विपक्ष को भारत का विकास पच नहीं रहा है। इस खबर का इंट्रो है, एक और ‘उछाल’ का वादा, विकास की राह पर ‘नकारात्मक’ रवैया रखने वाले आलोचकों पर निशाना साधा। अमर उजाला ने भाषण के जिस अंश को सिंगल कॉलम से कुछ ज्यादा की आठ लाइनों में शीर्षक समेत निपटा दिया है उसे इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक बनाया है। अमर उजाला की खबर है, पूर्व छात्र ओजी, मोदी का अंदाज जेन-जी। इसमें कहा गया है, पीएम ने भाषण की शुरुआत जेन-जी के सीनियर को याद करने से की। कहा, आपकी भाषा में कहूं तो यहां के पूर्व छात्र ओजी (ओरिजनल गैंगस्टर-पुराने खिलाड़ी) हैं, जिन्होंने हर क्षेत्र में धूम मचाई है। हमारे अरुण जेटली जी यहीं पढ़े थे। और मैं कह सकता हूं कि हमारी ऐसी कोई मुलाकात नहीं हुई, जहां उन्होंने एसआरसीसी की बात न की हो।
इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक और खबर कुछ इस तरह है। फ्लैग शीर्षक है, अतीत बनाम वर्तमान और भविष्य गढ़ा। जेन जी से सहमति : ओजी, नाराज़ फूफा धुरंधर, ‘आपके सीनियर सपने नहीं देख सकते थे’। इसमें अपने समय की बात नहीं करना और की तो उसका उल्लेख नहीं होना अखरता है। विकास पाठक और गायत्री मणि की बाईलाइन वाली खबर इस प्रकार है, (गूगल अनुवाद, संपादित) फरवरी 2013 में, इसी जगह पर उन्होंने एक चुनौती देने वाले नेता के तौर पर बात की थी और लड़खड़ाती हुई यूपीए सरकार के आखिरी दिनों में “मोदी लहर” का संकेत दिया था। तकरीबन 13 साल बाद, शनिवार को नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री के तौर पर श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स (एसआरसीसी) लौटे। यह दौरा राजधानी में छात्रों के ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शनों के बाद हुआ। इसने उनकी सरकार को मजबूर कर दिया था। और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े का कारण बना। इसलिए, उन्होंने जो गढ़ा वह स्पष्ट है। वे एसआरसीसी जैसे बहुत चुनिंदा कॉलेज के छात्रों से बात कर रहे थे—एक ऐसी पीढ़ी जो 2029 में पहली बार लोकसभा चुनाव में वोट देगी, लेकिन 2013 में बमुश्किल स्कूल में होगी। वे उन नाराज़ युवाओं को भी संबोधित कर रहे थे, जिन्होंने 2014 में उनकी जीत के बाद पहली बार दूसरी पार्टियों पर उनकी पार्टी के दबदबे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सब इनके विरोध-प्रदर्शनों से ही हो पाया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर आज लीड है। शीर्षक है, भारत को ‘फ्रेजाइल 5’ (भंगुर, कमजोर, नाजुक आदि) में रखने वाले जीडीपी पर शक कर रहे हैं : प्रधानमंत्री। इस खबर का इंट्रो है, ‘भारत की ग्रोथ और सरकारी पहल को पचा नहीं पा रहे हैं’। इस खबर के साथ दो खास बातें हाईलाइट की गई हैं। एक तो शीर्षक में है दूसरा नहीं। मैं दोनों हिन्दी में लिख रहा हूं, आपको दो तरह के लोग मिलेंगे – एक वे जो समाज की ताकत को सकारात्मक रूप से देश की ताकत में बदलते हैं, और दूसरे वे जो कोई भी काम शुरू होने पर नाराज़ फूफा की तरह व्यवहार करने लगते हैं…। दूसरा, मैंने अपने (स्वतंत्रता दिवस के भाषण में) ‘दिमागी नक्सल’ के रूप में होम्योपैथिक गोलियां दी थीं और सभी दिमागी नक्सल बाहर निकलकर आने लगे। लोग उन लोगों का असली चेहरा देख रहे हैं। जो इस बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं।
पत्रकारिता का काम है कि पाठकों को वास्तविकता बताए। लोकतंत्र में, स्वतंत्र मीडिया के रहते यह नहीं हो सकता है कि प्रधानमंत्री गलत नैरेटिव बनाएं, चुनाव आयोग लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित न करें। प्रधानमंत्री नैरेटिव बनाने की अपनी कोशिशों को मजबूती देने की कोशिश कर रहे हैं। अर्थव्यवस्था के विकास के दावे को चुनौती देने के कई कारण हैं। सबसे पहले तो चुनौती देने वाले पूर्व सरकारी अधिकारी हैं और विपक्षी दल में शामिल होने की कोई सूचना नहीं है। बचाव करने वाले एंकरों के अलावा प्रचारक और सरकारी सुविधा पाने वाले लोग हैं।
मेरा मुद्दा सिर्फ इतना सा है कि जो अर्थव्यवस्था 2022 में और संशोधन के बाद 2024 में पांच ट्रिलियन की हो जानी थी वह अभी तक नहीं हुई है। प्रधानमंत्री ने भले ही इसे विकास कहा था पर तब पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि यह जादू नहीं है। सामान्य प्रक्रिया है और विकास दर पर निर्भर करेगा। समय उसी हिसाब से लगेगा तब उन्होंने उदाहरण भी दिए थे और एक अर्थशास्त्री या वित्त मंत्री की तरह बात की थी। अब वित्त मंत्री के पति सरकारी दावों से अलग होते हैं और वित मंत्रालय के आंकड़े प्रधानमंत्री जारी करते हैं जिनके बारे में चिदंबरम ने 2013 में ही कहा था कि अर्थशास्त्र का उनका ज्ञान डाक टिकट के पीछे लिखने के बराबर है। इस लिहाज से अर्थव्यवस्था अभी तक पांच ट्रिलियन की नहीं हुई है तो विकास के दावे का क्या मतलब?
जहां तक दो तरह के आंकड़े या दो पैमाने के आंकड़ों की बात है, ऐसा हुआ कैसे या क्यों? खासकर तब जब भारत के सरकारी डेटा की विश्ववसनीयता पहले से दांव पर है। इस बार जो हुआ वह यही कि सरकार ने जीडीपी का जो पिछला डेटा दिया था वह नए पैमाने (असल में बेस ईयर) से बदल गया, कम हो गया। सरकार ने नया डेटा कम करने की घोषणा किए बगैर बदले डेटा के मुकाबले वृद्धि का दावा किया है। उसी को कम करके सुभाष चंद्र जैन कह रहे हैं कि असल वृद्धि 2.6 प्रतिशत के आस-पास है। सरकार समर्थक और प्रचारक कह रहे हैं कि उसे कम नहीं किया जा सकता है क्योंकि पैमाना बदल गया है।
खबरों से लगता है कि पैमाना बदलने के कारण पिछले साल घोषित आंकड़ा बदला जिसे बताया नहीं गया और नया आंकड़ा इस कम किए गए आंकड़े के मुकाबले में बता कर विकास का दावा किया जा रहा है। अव्वल तो यह गलत है लेकिन डेटा की साख के लिए सरकार को चाहिए था कि पैमाना बदलने औऱ इस कारण पिछले साल के डेटा बदलने (कम होने) की घोषणा करती। नहीं किया था तो इस बार के डेटा के साथ बताती कि यह पिछली बार के आंकड़े को कम करने के बाद है। अगर पहले ही बता दिया गया होता तो एससी गर्ग क्या बताते? एससी गर्ग को मौका मिला क्योंकि पारदर्शिता है नहीं, रखी नहीं जाती है। इस तरह सरकारी आंकड़ा सही हो तो भी विरोध गलत नहीं है और यह वैसा ही तथ्य है जैसे अविवाहित व्यक्ति फूफा हो ही नहीं सकता है।
इस तथ्य के बावजूद आज ज़ी वाले सुभाष चंद्र के खिलाफ एफआईआर की खबर है और उसका आधार डेटा की गड़बड़ी ही है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, कर्ज के लिए संपत्ति बढ़ाकर दिखाने के आरोप में सुभाष चंद्रा पर एफआईआर। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। और प्रधानमंत्री की खबर सिंगल कॉलम। उसमें भी शीर्षक जीडीपी वृद्धि या उसकी दर नहीं है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस प्रकार होगा, पॉलिसी पैरालिसिस से गतिशीलता (तेजी) की ओर: एसआरसीसी में मोदी ने विकास का खाका पेश किया। द हिन्दू में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, प्रधानमंत्री ने कहा, लाल किले के भाषण के बाद और ‘दिमागी नक्सली’ सामने आ रहे हैं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


