संजय शर्मा-
सुदिव्य भाई… अभी तो आपको सहिया दिखानी थी, इतनी जल्दी क्यों चले गए?
लगभग तीन-चार साल पहले झारखंड से एक फोन आया. परिचय पूछा तो बड़ी सहजता से बोले, मेरा नाम सुदिव्य कुमार सोनू है, यहाँ विधायक हूँ. संजय जी, मैं 4PM रोज देखता हूँ. आपका चैनल बहुत पसंद है. आप 4PM झारखंड भी शुरू करिए.
यह बात दिल को छू गई. उसके बाद कभी-कभी हमारी बातचीत होती रही.
फिर मैंने अपनी फिल्म सहिया बनाने का फैसला किया. कहानी जंगलों के बीच की एक प्रेम कहानी थी. लोकेशन तलाशते हुए नेतरहाट पहुँचा तो वहाँ के जंगल, पहाड़ और झरने देखकर तय कर लिया कि शूटिंग यहीं होगी.
इसी सिलसिले में मुख्यमंत्री से मिलने रांची गया. मुलाकात के बाद उनके सचिव ने बताया कि सुदिव्य जी अब मंत्री हैं और अभी आपका ही जिक्र कर रहे थे. फोन खोला तो उनकी पाँच-छह मिस्ड कॉल थीं.
फोन किया तो वही गर्मजोशी. बोले, शाम का खाना मेरे घर पर ही खाकर जाइए. मैंने कहा, नेतरहाट निकलना है. बोले, पहले घर आइए, फिर जाइएगा.
टीम के साथ उनके घर पहुँचा तो जिस आत्मीयता से उन्होंने स्वागत किया, वह कभी नहीं भूल सकता. फूलों का बुके, शॉल और उससे भी बढ़कर उनका अपनापन. लगा ही नहीं कि किसी मंत्री के घर आया हूँ, लगा अपने भाई के घर बैठा हूँ.
सहिया की शूटिंग करीब डेढ़ महीने चली और इस दौरान उनका लगातार फोन आता रहा. कोई परेशानी तो नहीं? कुछ जरूरत हो तो बताइएगा. उन्होंने अधिकारियों से भी कह रखा था कि शूटिंग में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.
सुदिव्य भाई को झारखंड और खासकर नेतरहाट से बेइंतहा प्यार था. वह मुझसे कहते थे, संजय जी, बॉलीवुड के लोगों को नेतरहाट लेकर आइए. उन्हें दिखाइए हमारे पास कितने खूबसूरत जंगल, झरने, नदियाँ और पहाड़ हैं. दुनिया को पता चलना चाहिए कि झारखंड कितना खूबसूरत है.
वह झारखंड के पर्यटन को दुनिया के नक्शे पर देखना चाहते थे और इसके लिए लगातार काम कर रहे थे.
और सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि सिर्फ दो दिन पहले ही उनसे बात हुई थी.
सहिया के सेंसर विवाद से वह बहुत दुखी थे. बोले, आपने झारखंड की खूबसूरती दुनिया को दिखाई और फिल्म को रोका जा रहा है, यह बहुत खराब बात है. फिर कहा, संजय जी, झारखंड आइए. हम बैठकर फिल्म देखेंगे, मुख्यमंत्री जी भी देखेंगे.
मैंने कहा था, अगले हफ्ते आता हूँ. आपको सहिया दिखानी है. क्या पता था यह हमारी आखिरी बातचीत होगी.
आज सुबह सोकर उठा तो उनके निधन की खबर मिली. कुछ देर यकीन ही नहीं हुआ.
इतना जिंदादिल, हँसमुख और सहज इंसान. इतने बड़े पद पर रहकर भी इतना आत्मीय. अपने प्रदेश के लिए इतने सपने.
मेरे लिए वह सिर्फ झारखंड सरकार के मंत्री नहीं थे. वह मेरे मित्र थे. मेरे भाई जैसे थे.
अब उनकी तस्वीर देखता हूँ तो यकीन करना मुश्किल है कि उनका फोन फिर कभी नहीं आएगा. कोई नहीं पूछेगा, संजय जी, झारखंड कब आ रहे हैं?
सुदिव्य भाई, अभी तो आपको सहिया दिखानी थी. अभी तो बहुत सारी बातें बाकी थीं. आप इतनी जल्दी कैसे चले गए?
ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करें. आप जहाँ भी हों, वैसे ही हँसते, जिंदादिल और मस्त रहिएगा. बहुत याद आएँगे सुदिव्य भाई. बहुत ज्यादा.


