नई दिल्ली- UPI पर मर्चेंट चार्ज को लेकर चल रही बहस के बीच BharatPe के सह-संस्थापक अश्नीर ग्रोवर ने सुभाष चंद्रा से जुड़े करीब ₹22,000 करोड़ के insolvency claims का हवाला देते हुए सरकार और NPCI पर सवाल उठाए हैं। ग्रोवर ने कहा कि अगर सुभाष चंद्रा के मामले में ₹22,000 करोड़ की रकम माफ नहीं होती, तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ₹8,000 करोड़ की सब्सिडी से UPI को अगले 20 साल तक मुफ्त चलाया जा सकता था। उनका यह बयान 15 सितंबर को सोशल मीडिया पर सामने आया।
ग्रोवर ने अपने पोस्ट में यह भी दावा किया कि UPI चलाने वाली NPCI के पास करीब ₹6,119 करोड़ की नकदी और करीब ₹1,900 करोड़ का प्री-टैक्स ऑपरेटिंग प्रॉफिट है। उनका तर्क है कि NPCI अपने नकद भंडार और मुनाफे के आधार पर UPI को मुफ्त चला सकती है। ये आंकड़े ग्रोवर के अपने दावे हैं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से NPCI के ताजा वित्तीय आंकड़ों से इस खबर के लिए सत्यापित नहीं किया गया है।
ग्रोवर की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सरकार ने 14 सितंबर को UPI के चुनिंदा P2M यानी व्यक्ति से कारोबारी भुगतान पर MDR व्यवस्था को लेकर नया ढांचा जारी किया है। ₹2,000 तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड लेनदेन पर बैंक या पेमेंट सिस्टम द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लिया जा सकता। ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट लेनदेन के लिए MDR व्यवस्था लागू करने की बात सामने आई है। वित्त मंत्रालय ने 15 सितंबर को इस संबंध में प्रेस रिलीज और FAQ भी जारी किए हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक प्रस्तावित व्यवस्था में ₹2,000 से अधिक के P2M UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR की बात है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 बताई गई है। इसका भुगतान ग्राहक के बजाय मर्चेंट-पेमेंट इकोसिस्टम में होगा। सरकार का पक्ष है कि UPI के बड़े होते नेटवर्क, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड रोकने और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते खर्च के लिए एक टिकाऊ वित्तीय व्यवस्था जरूरी है।
दूसरी ओर, सुभाष चंद्रा से जुड़े ₹22,000 करोड़ के मामले को लेकर भी स्थिति सीधी नहीं है। NCLT ने अगस्त में ₹22,006 करोड़ के admitted claims के मुकाबले करीब ₹6.25 करोड़ के settlement plan को मंजूरी दी थी। कई कर्जदाताओं ने इसका विरोध किया। बाद में NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने पहले के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया।
सुभाष चंद्रा ने अपने पक्ष में कहा है कि ₹22,000 करोड़ का आंकड़ा उनकी सभी personal guarantees को मिलाकर बना है और उनका व्यक्तिगत borrowing शून्य था। उनके मुताबिक भारतीय बैंकों का दावा ₹5,311 करोड़ था, जिसमें से ₹1,049 करोड़ के दो खाते पहले ही निपटाए जा चुके थे और ₹4,262 करोड़ का दावा बाकी था। उन्होंने यह भी कहा कि जिन borrowing entities के लिए उन्होंने guarantee दी थी, वे बकाया रकम चुकाने के लिए तैयार हैं।
इस बीच UPI का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। NPCI के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2026 में UPI पर करीब 24.51 अरब लेनदेन हुए, जिनकी कुल वैल्यू लगभग ₹29.82 लाख करोड़ रही।
ऐसे में अश्नीर ग्रोवर का बयान UPI की लागत और उसकी फंडिंग को लेकर चल रही बहस में एक नया सवाल जोड़ता है—जब UPI पर शुल्क लगाने की जरूरत बताई जा रही है, तो डिजिटल पेमेंट सिस्टम की मौजूदा वित्तीय स्थिति और सरकार की सब्सिडी व्यवस्था को किस तरह देखा जाना चाहिए।

भारतीय UPI पेमेंट मार्केट का तकरीबन 86% हिस्सा दो अमेरिकी कंपनियों के पास है।
फोनपे की मुख्य पेरेंट कंपनी Walmart है जिसकी फोनपे में सबसे बड़ी 71.77% की हिस्सेदारी है। यानी मालिकाना उसी के पास है।
गूगल पे का मालिकाना हक गूगल और इसकी मूल कंपनी अल्फाबेट इंक के पास है।
ट्रेड डील के स्टेटमेंट में कहा गया कि भारत ट्रेड बैरियर हटाने पर काम करेगा। इसके एक महीने बाद अमेरिका ने कहा कि UPI पर जीरो चार्ज ट्रेड बैरियर है, जिसे हम स्वीकार नहीं करते। इसके तीन हफ्ते बाद UPI पर चार्ज लगाने का बिल पास हो गया।
अब सोचिए कि भारत सरकार किसके दबाव में UPI पर चार्ज लगा रही है?
राहुल गांधी का आरोप सही है। नरेंदर एक बार फिर सरेंडर बोल गए।
-कृष्णकांत


