संजय शर्मा-
एक स्कूल में कार्यक्रम के दौरान एक छात्र ने खड़े होकर सवाल पूछा कि कार्यक्रम के स्पॉन्सर में रजनीगंधा का नाम क्यों है?
सवाल छोटा है, लेकिन बहुत बड़ा है.
अगर स्कूलों में पान मसाला ब्रांड की स्पॉन्सरशिप को यह कहकर सही ठहराया जाएगा कि हम सीधे पान मसाले का प्रचार नहीं कर रहे, तो कल यही तर्क शराब और दूसरे नशीले उत्पादों के ब्रांड के लिए भी दिया जा सकता है. फिर बच्चों को हम आखिर क्या संदेश दे रहे हैं?
मुझे कोरोना का वह दौर याद आ गया, जब मैंने पान मसाला कंपनियों को दी जा रही अनुमति के खिलाफ PIL की थी. उस मामले में रजनीगंधा की ओर से अदालत में यह बात रखी गई थी कि कंपनी ने PM CARES Fund में ₹10 करोड़ दिए हैं.
तब भी मेरा सवाल यही था और आज भी यही है — क्या किसी फंड में करोड़ों रुपये देने से ऐसे उत्पादों के प्रचार का नैतिक लाइसेंस मिल जाता है?
और अब सवाल और गंभीर है, क्योंकि मामला स्कूल और बच्चों का है.
उस छात्र को सलाम, जिसने खड़े होकर वह सवाल पूछने की हिम्मत दिखाई, जिसे बड़े-बड़े लोग पूछने से बचते हैं.
स्कूल शिक्षा के मंदिर हैं, पान मसाला ब्रांडों की मार्केटिंग की जगह नहीं.
रजनीगंधा गुटखे का प्रचार वो भी विश्विधालय परिसर में, जहाँ ऐसा नियम है की सौ मीटर के दायरे में कोई पान बीड़ी गुटखे की दुकान नहीं होगी,वहाँ विश्वविधालय कैंपस में हज़ारो छात्रो के सामने ये कहा जा रहा है
रजनीगंधा खाओ और कदमों में दुनिया पाओ।
वेसे प्रशासन की तरफ़ आया जवाब भी सुनने लायक है-
कोई भी कार्यक्रम बिना स्पॉन्सर के नहीं होता इसीलिए रजनीगंधा लाए है, इस हिसाब से तो कल को ये सट्टे वाले को ला सकते, दारू वाले को ला सकते, और भी उच्च नशे वाले को ला सकते है।
समझ के बाहर है जिस जगह के आस पास ऐसी चीज़ों का बेचना और सेवन बैन है वहा अंदर लोगों को गुटखा खाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
-सुमित नेहरा
आशीष सागर दीक्षित-
विश्वविद्यालय में आए दैनिक जागरण वालों के बैनर में रजनीगंधा का प्रचार देख के लड़के ने सवाल पूछ लिया विश्विद्यालय में इस ब्रांड प्रचार की क्या प्रासंगिकता है? आयोजक सफाई देने में जुट गए….
हर गलत कदम को जस्टिफाई करना है और जो सामने से सवाल करे उसको गोलमोल कर देना।
वैसे छात्र को मंच पर सवाल नहीं पूछना चाहिए था, छात्र को दैनिक जागरण के पान मसाला अभियान को ‘घर घर मोदी’ की तर्ज पर बढ़ाना था।
विश्विद्यालय और कालेज में भी प्रायोजक कार्यक्रम कराना है जिससे जन जागरूकता और आमदनी दोनों होती चले। मीडिया जनपक्षधर खबरों से अधिक कार्पोरेट कारोबार है। बिना सीएसआर फंडिंग के पूंजीवाद परोकार क्यों करेगा? छात्र और युवा नशाखोरी भी समाज का परिवेश देखकर अपनाते है। जब बड़े फिल्म स्टार और सेलिब्रिटी गुटखा, अन्य उत्पाद का प्रचार करते है तो एक बड़ा तबका प्रभावित होता है।
यह अलग बात है भले ही वो उस ब्रांड को हाथ न लगाते होंगे। फिर आप तो बड़े मीडिया संस्थान हैं। आप चाहते तो फंड लेकर बैनर पर जगह न देते तो भी काम चल सकता था। अब इतना दम तो जागरण रखता ही है सरकार की कृपा से….!
संबंधित खबर…
जागरण फिल्म फेस्टिवल के आयोजन में रजनीगंधा का प्रचार देख छात्र ने जो सवाल दागा, वह आपको भी पढ़ना और सुनना चाहिए!


