गिरधारी लाल गोयल-
आगरा के Dr Pankaj Kaushik व डाक्टर शालीन Amrita Hospital, Faridabad ये इस धरा के राक्षस हैं। मरीजों को फंसा कर जिस प्रकार उनको मरने के लिए छोड़ देते हैं ऐसे इन डाक्टर और अस्पतालों के कर्मों को देख कसाई और जल्लाद भी अपने को महान मान लेंगे।
मेरे निकट परिजन, जिसने शराब या नशीला पदार्थ कभी सपने में भी नहीं लिया था, के लीवर में दो साल पहले सिकुड़ने की समस्या आयी, वो आगरा डाक्टर पंकज कौशिक के पास गया… लगातार उसी डॉक्टर का इलाज कराता रहा… इस बीच हम लोगों ने उसको एलोपेथी के ही किसी दूसरे डॉक्टर साथ ही होम्योपैथी या आयुर्वेदिक डॉक्टर के लिए भी लगातार कहते रहे… लेकिन पता नहीं डाक्टर कौशिक ने उसे कैसा हिप्टोनाइज कर रखा था वो किसी दूसरे डॉक्टर के पास जाता ही नहीं था।
अभी 5 महीने पहले मेरे उस परिजन ने बताया, “अब लिवर ट्रांसप्लांट ही हो सकता है, कल अमृता हॉस्पिटल का डाक्टर आया था तो पंकज कौशिक ने मुझे बुलाया… डाक्टर कह रहा था कि तुम्हारा लिवर अभी तो बीस प्रतिशत शेष है… अभी ट्रांसप्लांट हो जायेगा, महीने भर में ये दस प्रतिशत रह जायेगा तो ट्रांसप्लांट की सफलता की गारंटी नहीं रहेगी… दो महीने बाद तो कुछ भी नहीं हो पायेगा…
मेरे लिए ये बहुत झटका देने वाली सूचना थी… चिंतित हो कर पूछा कि लिवर कहां से लेगा तो उसने अपनी पत्नी का नाम लिया…
मैंने पूछा कि उसका ग्रुप तो अलग है इस पर वो बोला कि अमृता हॉस्पिटल वाला डाक्टर दूसरे ग्रुप के ट्रांसप्लांट का विशेषज्ञ है.. वो पक्की गारंटी ले रहा है।
अब मैं कुछ अशांकित हुआ और उससे पूछा, “डाक्टर शालीन ने कितनी फीस ली..
‘पंकज कौशिक के कारण फीस नहीं नहीं ली…. वो तो यहां मुझे लेने के लिए गाड़ी भी भेज रहे थे।
मैंने पूछा, “डॉक्टर की तू कैसे कह रहा है कि वो विशेषज्ञ है?
‘दो मरीज वहां बैठे हुए थे, बिल्कुल सही हो गए थे, एक लड़का बलकेश्वर का तो अभी एक महीने पहले ऑपरेशन क्रांति के बाद आया है, वो खूब घूम रहा है।
लिवर ट्रांसप्लांट के एक महीने में ही घूमने वाली बात मेरे गले नहीं उतरी….मुझे ये मामला स्पष्ट रूप से फंसाने वाला लग रहा था… लेकिन दिमाग पर ऐसी चिंता सवार हो चुकी थी कि निगेटिव पॉइंट कहीं ओझल हो गए थे।
रुपयों की व्यवस्था की बात चली तो बताया, “16 लाख हॉस्पिटल के हैं…. 4-5 लाख अम्मा (केरल की संत हॉस्पिटल की मालकिन ) छोड़ देती है, और 8-10 लाख हॉस्पिटल वाले मुख्यमंत्री सहायता कोष से करा देते हैं।
इधर हम लोगों ने पता किया तो लिवर ट्रांसप्लांट इतना सहज कहीं भी नहीं लग रहा था जितना सहज वो परिजन बता रहा था… बहुत खतरे और बड़ी रकम का मामला लग रहा था…
मुख्यमंत्री सहायता कोष के लिए एपलीकेशन दी तो मालूम पड़ा कि हॉस्पिटल का नाम ही सूची में नहीं है।
तब डॉक्टर शालीन ने कहा कि एपलीकेशन ऑफ़ लाइन भिजवाओ लखनऊ में नाम मिल जायेगा… DM ऑफिस और SDM ऑफिस की कार्यकुशलता से ऑफलाइन एपलीकेशन एक महीने में पहुंच पायी।
वहाँ भी लिस्ट में नाम नहीं होने के कारण वो एपलीकेशन रद्द हो गयी। अब डॉक्टर शालीन ने कहा कि लिस्ट में नाम शामिल हो जायेगा आप अपनी तईयारी करो।
दूसरे ग्रुप के लिवर के लिए कोई इंजेक्शन लगाया जाता है, उसके लिए बोला कि इस इंजेक्शन का असर एक महीने ही रहता है, एक लाख से ऊपर का वो इंजेक्शन था… हम लोग किसी दूसरे डॉक्टर की कोशिस में थे लेकिन मरीज का जाने कैसा ब्रेन वाश कर दिया गया था कि वो अमृता हॉस्पिटल और डाक्टर शालीन के सम्मोहन से निकलने को तययार ही नहीं था…. बीमारी से लड़ने को सबसे पहले मरीज का दिमाग इलाज के प्रति विश्वास करने वाला होना चाहिए सो हम लोग उसकी इच्छा के विपरीत नहीं जा सकते थे
मुख्यमंत्री सहायता कोष की लिस्ट में नाम नहीं आया, लेकिन दूसरे ग्रुप वाला इंजेक्शन लगवा लिया
अब इंजेक्शन के लगने के एक महीने तक वो नाम नहीं आया… इधर मरीज की डोनर पत्नी और मरीज के टेस्ट आदि में 3लाख से ऊपर और खर्च हो गए…. हालत ये थी कि जो जाँच आगरा में हजार से भी नीचे हो सकती थीं वे जाँच हॉस्पिटल में 25 हजार में होती थीं… बाहर की जाँच की डॉक्टर साफ मना कर देता
लिस्ट में नाम नहीं आया उधर डॉक्टर ने ऑपरेशन से ठीक पहले पूरे रुपये जमा करते समय कह दिया 21 लाख का पैकेज है 16 लाख का हमने नहीं बताया…
तब मजबूरी में हामी भरनी पड़ी… फिर भी डॉक्टर से पूछ लिया कि ऑपरेशन होने से मुख्यमंत्री कोष की सहायता राशि पर कोई फर्क तो नहीं पड़ेगा? इस पर डॉक्टर ने कमिटमेंट किया कि हमारे यहाँ से रिपोर्ट ऐसी जायगी कि आपको मिलने वाली राशि पर कोइ अंतर नहीं पड़ेगा
खैर ऑपरेशन हो गया.
यहाँ तक हॉस्पिटल का और डाक्टर का जो जाल और झूठ था वो तो था ही… आगे का हाल लिखने में आक्रोश से खून खौल रहा है।
धरा के राक्षस 2…… Amrita Hospital, Faridabad में हमारे परिजन लिवर ट्रांसप्लांट वाला ऑपरेशन हो चुका था.
एक बात हर जगह कॉमन है कि ऑपरेशन पर हॉस्पिटल में डॉक्टर नर्स और दूसरा स्टाफ बस ये ही कहते हैं, ” हमारी उम्मीद से भी ज्यादा सफल हुआ है… आप बहुत लकी हैं भगवान ने बहुत कृपा की है” आदि आदि…
फोन पर ये आशाजनक बात सुनने के बाद चैन में थे, लेकिन सफल ऑपरेशन होने के बावजूद 8 दिन में कोइ रेस्पोंस नहीं मिला तो आशंका हुयी, हम लोगों का ध्यान केवल अलग अलग ब्लड ग्रुप वाली आशंका पर ही केंद्रित था लेकिन उधर दूसरा खतरनाक मामला बन चुका था… इधर पैकेज दसवें दिन ही पूरा कर दिया था, दवा इंजेक्शन और दूसरे सामान के खर्चे बिल में जुड़ने लगे।
एक शनिवार को वहाँ से हेमंत बल्लू इस आशा के साथ लौटे कि सोमवार को मरीज ICU से प्राइवेट रूम में ट्रांसफर हो जायेगा लेकिन रविवार को ही फोन आ गया कि पेशेंट को एक्सपलोर के लिए ले जाया जा रहा है, उसकी आर्टरी बंद है… सुबह जल्दी आकर रुपये जमा कराओ… अब दिमाग ये सोचने ले लिए सक्षम नहीं रह गया था कि इन्होंने अल्ट्रासाउंड और CT सन डे में क्यों कराई हैं।
ऑपरेशन को 13 दिन हो गए तब बीच में क्यों नहीं कराई।
खैर सोमवार को जल्दी पहुंचे तो दो लाख रुपये जमा कराने को कहा, डेढ़ लाख तुरंत कैश जमा कराया।
साथ ही एक डॉक्टर से कहलवा दिया कि लिवर को ऑक्सीजन और ब्लड पहुंचाने वाली जो आर्टरी बंद है वो तो हजार में एक के भी नहीं होती…. खुलने का चांस दस प्रतिशत बताया और साथ ही कहा कि खुल गयी तो फिर सफल होने यानी फिर से बंद ना होने के चांस 90% हैं।
समझा जा सकता है कि वहाँ मौजूद अटेंडेंट्स की हालत और घर पर अन्य परिवारिजनों की हालत क्या हो रही होगी… ज्योतिषीयों को फोन लगाना , पूजा प्रसाद बोलना, महामृत्युनजय का पाठ जिसके मन में जो आ रहा था वो अपना लगा हुआ था।
शाम को मालूम पड़ा कि ऑपरेशन सफल रहा है…. दो दिन बाद हेमंत और बल्लू फिर इस उम्मीद के साथ लौटे कि दो दिन बाद मरीज रूम में आ जायेगा।
वे रात को आये कि सुबह फिर फोन आया कि तीसरे एक्सपलोर के लिए ले जा रहे है..
मरीज के पूरे पेट में जगह जगह खून जमा हो गया है…. दौनों फिर भागे रुपये जमा किये…. 16 दिन में तीसरा ऑपरेशन हो चुका था… इस ऑपरेशन में बहुत सारा खून निकला था…
लेकिन अब एक और खतरा पेट में पैदा हो चुका था….. लिवर की वायल लीक हो गयी थी
मरीज रूम में आया, मरीज के खाने पीने का कोई भी रेस्पोंस उसके शरीर पर नहीं आ रहा था… लीक वायल से अंदर फ्लूड लीक हो रहा तहस.. इसके लिए डॉक्टर ने 3-4 दिन बाद एक थैली लगा दी
डॉक्टर के अनुसार उक्त फ्लूड में भोजन के वे इंजाइम्स थे जिनसे कि ब्लड आदि बनता है। उस थैली में 800 ml लिक्विड का 400 ml रह गया तो थोड़ी जान सी आयी कि चलो ये लीकेज बंद हो ही जायगी… लेकिन भोजन अभी भी शरीर को नहीं लग रहा था
एक दिन एक डॉक्टर ने उस थैली का फ्लूड मरीज को पिला दिया कि एन्जइम्स तो कम से कम शरीर को लगें और ये गंदा पानी 6-7 दिन लगातार पिलाते रहे… यही बहुत ज्यादा खतरनाक बन गया
फिर एक दिन तेज बुखार आ गया… मरीज ICU में गया… फिर बुखार फिर ICU में…. फिर छुट्टी कराते कराते बुखार फिर ICU
एक दिन CT में मालूम पड़ा कि लिवर की आर्टिलरी के आसपास पस जमा हो रहा है…. आर्टिलरी सिकुड़ती चली जा रही है….. जिस आर्टिलरी की डॉक्टर कह रहा था की ये खुलने के चांस 10% है वो खुल तो गयी थी, लेकिन 90% बंद नहीं होगी इसके विपरीत उसके बंद होने का खतरा बन चुका था….
डॉक्टरों ने पस निकाला तो मरीज को राहत हुयी… दो दिन सही रह कर फिर बुखार आ गया
अब फ्लूड की थैली निकाल दी थी क्योंकि फ्लूड अंदर लीक हो रहा था थैली में कम आ रहा था
जब कल्चर टेस्ट कराया तो रक्त में वो ही वेकटेरिया था जो कि पेट से निकले फ्लूड में था… और वो फ्लूड रोजाना मरीज को पिलाया जा रहा था…
मालूम पड़ा कि ये वेकटेरिया केवल हॉस्पिटल के अंदर ही मिलता है…. अब मरीज तो लगातार टूट ही रहा था…. उसके अटेंडेंट्स थकते चले जा रहे थे ऊपर से लगातार “लाओ पैसा… FIC कराओ….
धरा के राक्षस 3……. Amrita Hospital में मेरे परिजन के लिवर ट्रांसप्लांट की सर्जरी के दौरान 16 दिन में तीन ऑपरेशन मतलब अभी तक डॉक्टर तीन गलती कर चुके थे जिनसे कि कहा जा सकता था कि उनसे बहुत घोर अज्ञानता व लापरवाही दिखायी है
आर्टरी बंद होना – इसके बारे में मालूम पड़ा कि ऐसे केस हजार में भी एक नहीं होते, ऑपरेशन के बाद पेट खुला छोड़ कर शरीर की प्रतिक्रिया देखी जाती है और सिलने से पहले ही रेडियोलोजिस्ट से पूछ लिया जाता है कि खून ऑक्सीजन वाली नलियां सही हैं कि नहीं उसके ok कहने के बाद ही पेट सिला जाता है
इसके अलावा जब सब कुछ ok होने पर भी खाया हुआ शरीर को नहीं लग रहा था तो अल्ट्रासाउंड पैकेज खत्म करने के बाद क्यों किया गया… जब आर्टरी बंद होने की मालूम पड़ी स्थिति तो उसी समय तक खराब हो गयी थी
आर्टरी वाला ऑपरेशन होने के बाद ICU में ऐसी क्या लापरवाही रही कि अंदर कोइ ऐसी नस फटी कि पूरे पेट में खून के छिचड़े जमा हो गए?
खून साफ करने के लिए किये ऑपरेशन में किसकी गलती से लिवर की वायल फटी, ये वायल ही अंतिम रूप से घातक हो गयी
लीक वायल से निकलने वाला फ्लूड मरीज को पिलाना कोइ प्रयोग था या कि ऐसे कैसेज में ऐसा किया जाता है…. ये फेक्ट तो कोइ डॉक्टरी लाइन के लोग ही बता सकते हैं, मरीज के अटेंडेंट्स तो इस मामले में बिल्कुल निल होते हैं
ये फ्लूड पिलाना ही रक्त के बड़े इन्फेक्शन का कारण बना, इससे जो पस आदि बना उसने आर्टरी को पुनः बंद कर दिया, लिवर पर जगह जगह पस की गांठ बन गयीं
आज जिस पेशेंट के सारे ऑर्गन्स एकदम दुरुस्त हैं, वो केवल बंद आर्टरी और पस की गांठों के कारण जीवन- मृत्यु के बीच झूल रहा है
ये तो रही चिकत्सकीय लापरवाहियां…. अब Amrita Hospital, द्वारा मरीज के घरवालों को निचोड़ने की कहानी शार्ट में बता रहा हूं
दसवें दिन पैकेज बंद कर दिया ये तो बता ही चुका हूं, इसके अलावा DR शालीन ने जो भी कमिटमेंट्स किये सारे कमिटमेंट्स जैसे पैकेज में 15 % की छूट, अपनी विजिट्स के चार्जेस की छूट, फार्मेसी में छूट और बाद के दो ऑपरेशन की 50-50 हजार आदि की छूट आदि हर कमिटमेंट से पल्ला झाड़ा जाता रहा….
हालत ये रही है कि यदि रूपया जमा नहीं हुआ तो सुबह या दोपहर तक लगने वाला महत्वपूर्ण इंजेक्शन भी शाम तक नहीं लगता था
बिलिंग की हालत ये कि घंटे घंटे भर पर रिवाइज होता है, कभी घट भी जाता है ज्यादातर बढ़ता ही है…
पैकेज में बताये कामों के चार्जस भी जोड़ दिए जाते हैं… और दवा और दूसरे सामानों की लूट की हालत ये कि एक ऑपरेशन में लगने वाले सामान के 1,25,000रुपये जोड़े जाते हैं, ICU के दौरान 70 हजार रुपये रोज की मेडीशन और कंजयुमेबल सामान लगता है
दवा और कंज्यूमेबल कुछ सामान जो निगाह में आये, उनको देखिये। Elbumin 4300 बाजार में, लेकिन 8500 अमृता की बिलिंग Meropenem 250 अमृता में 900 की बिलिंग (6 रोजाना ) Peracetamol बाजार में 100 अमृता में 500 की बिलिंग Paxyb बाजार में 350 अमृता में 3100 की बिलिंग (3 रोजाना ) Xavitaj बजार में 900 अमृता में 7700 की बिलिंग (3 रोजाना ) Amfogard 4 इंज की शीशी बाजार में 5200 अमृता में 28000 की बिलिंग अंडर शीट बाजार में 200 अमृता में 1000 की बिलिंग Wipers बाजार में 80 अमृता में 450 की बिलिंग (दिन में अनगिनत बार )
ये बाजार रेट तो दिल्ली की हैं आगरा जैसे शहरों में तो और भी कम होगी… इसके अलावा CT 17500 का जो कि सप्ताह में कम सर कम दो बार होता रहा
अल्ट्रासाउंड 3000 का ये भी सप्ताह में 4 बार होता रहा… एक जाँच 5100 रुपये रोज की केवल इस बात की होती रही है कि मरीज को कितनी दवा दी जानी है
लिखने को तो बहुत है लेकिन एक बात जरूर लिखूंगा… अमृता हॉस्पिटल केरल की संत अम्मा का हॉस्पिटल है।
इस संत पर Sangh का या संघ पर इस संत का पूरा पूरा हाथ है…. अभी राममंदिर पर चढ़ावा चोरी कांड पर भी अम्मा ने मंदिर का विजिट कर वहां नकारात्मक शक्तियों को दूर करने का अनुष्ठान भी 7 अगस्त के आसपास किया है
Narendra Modi जी ने इस हॉस्पिटल का रिबिन काटा था…. जहाँ किसी संत, संघ और मोदीजी का नाम जुड़ा हो वहां भी इस प्रकार इलाज में लापरवाही और डकैतों की तरह मरीजों की लूट होगी वहाँ दूसरे हॉस्पिटल्स की तो पता नहीं क्या हालत होती होगी
सबसे बड़ी बात यह हॉस्पिटल आयुष्मान कार्ड नहीं मानता… इसके साथ ही ये अनुरोध भी है कि छोटे व मध्यम वर्गीय लोगों को भगवान के दिए किसी लिवर या किडनी जैसी श्राप झेलने पड़ जायँ तो एलोपेथी इलाज तब तक ही कराएं जब तक कि सर्जरी की नौबत नहीं आ रही हो।
सर्जरी ही अंतिम उपाय रह जाय तब यथा सम्भव होम्योपैथ या आयुर्वेदिक चिकित्सकों की सलाह जरूर ले लें… सर्जरी से पूर्व सरकारी हॉस्पिटल्स में सलाह ले लें, कम से कम वहाँ बिना लग लपेट के बिल्कुल सही ऑप्शन तो बता ही दिया जायेगा…
इसके बाद यदि डॉक्टर या हॉस्पिटल खर्चा जितना भी बताये उसकी चौगुनी रकम की व्यवस्था करके ही सर्जरी में भाग्य आजमायें


