नई दिल्ली। टीवी दर्शक मापने वाली कंपनी TAM India ने TV Ratings Policy 2026 के तहत ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसी के लाइसेंस के लिए औपचारिक आवेदन किया है। इसके बाद टीवी इंडस्ट्री में एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि क्या TAM पर दोबारा भरोसा किया जा सकता है और क्या भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील बाजार में एक साथ दो रेटिंग करेंसी टिक सकती हैं।
TAM के आवेदन को लेकर इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया मिली-जुली है। कुछ लोगों को लगता है कि इससे BARC India के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है, जबकि कुछ लोग TAM के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए उसकी वापसी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर दोनों कंपनियों को लाइसेंस मिलता है तो विज्ञापनदाता, एजेंसियां और ब्रॉडकास्टर किसके आंकड़ों को आधिकारिक रेटिंग करेंसी मानेंगे।
दरअसल, भारत में एक से ज्यादा ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसियों की अनुमति देने का विचार नया नहीं है। TRAI ने 2018 में इसकी सिफारिश की थी। 2021 में शशि शेखर वेमपति की अध्यक्षता वाली TRP समिति ने भी इसे आगे बढ़ाया था। इसके पीछे 2020 के कथित TRP घोटाले के बाद रेटिंग व्यवस्था में सुधार और ज्यादा विकल्प उपलब्ध कराने की जरूरत को प्रमुख वजह माना गया था।
जुलाई 2025 में सरकार ने ऑडियंस मेजरमेंट के कारोबार में नए खिलाड़ियों के प्रवेश को आसान बनाने के लिए एक कंसल्टेशन पेपर भी जारी किया था। हालांकि इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) ने इसका विरोध किया। इसके बाद मार्च 2026 में जारी अंतिम TV Ratings Policy में प्रस्तावित ज्यादातर छूट वापस ले ली गईं। सिर्फ न्यूनतम नेटवर्थ की सीमा 20 करोड़ से घटाकर 5 करोड़ रुपये की गई।
TAM के लिए बदली हुई परिस्थितियां
TAM की वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले एक दशक में कंपनी के कारोबार का ढांचा काफी बदल चुका है। अगस्त 2025 में TAM India की स्वामित्व संरचना में बदलाव हुआ। उसके मालिकों में शामिल Kantar Media, Kantar Group से अलग हुआ और उसे H.I.G. Capital ने अधिग्रहित कर लिया। बाद में इसका नाम Fifty5Blue कर दिया गया।
TAM पहले Nielsen और Kantar का संयुक्त उपक्रम था। 2014 में मौजूदा TRP नीति व्यवस्था लागू होने के बाद Kantar Group के WPP से संबंधों के कारण TAM की दोबारा रेटिंग कारोबार में वापसी संभव नहीं हो पाई थी।
उस दौर में TAM अपने खर्च पर लगाए गए पीपल मीटर के जरिए दर्शकों की संख्या मापता था। एक मीटर की कीमत 25 हजार रुपये से ज्यादा बताई जाती थी और कंपनी का दावा था कि उसके पास 8 हजार से ज्यादा मीटर थे। इस पूरी व्यवस्था में भारी निवेश की जरूरत थी। मीटरों की संख्या बढ़ाने का लगातार दबाव, निवेश की जरूरत और अदालती मामलों के चलते कारोबार आर्थिक रूप से मुश्किल होता गया और आखिरकार TAM ने 2014 में यह कारोबार बंद कर दिया।
लेकिन अब तस्वीर अलग है। TAM इस बार रिटर्न पाथ डेटा (RPD) के जरिए दर्शकों के आंकड़े उपलब्ध कराने की तैयारी में है। कंपनी पहले से ही कई मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों (MSO) और DTH कंपनियों के लिए RPD डेटा प्रोसेस कर रही है।
RPD मॉडल में घर-घर पीपल मीटर लगाने और पूरा मापन ढांचा खड़ा करने की जरूरत नहीं होती। इससे ऑडियंस मापन कारोबार की लागत और अर्थशास्त्र दोनों बदल जाते हैं। इसके अलावा मौजूदा व्यवस्था में नियामकीय निगरानी भी पहले के मुकाबले काफी मजबूत है और नियमों के उल्लंघन पर दंड का प्रावधान भी है। ऐसे में TAM के आंकड़ों से मनमानी किए जाने की आशंका को पुराने दौर के आधार पर देखना पूरी तरह सही नहीं होगा।
क्या दो रेटिंग करेंसी टिक पाएंगी?
दूसरा और ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत का बाजार एक साथ दो रेटिंग करेंसी को स्वीकार करेगा। भारत में पहले भी दूसरी रेटिंग व्यवस्था के तौर पर aMap सामने आया था, लेकिन वह लंबे समय तक नहीं चल सका। हालांकि उस दौर की परिस्थितियां आज से काफी अलग थीं। तब अगले दिन लाइव डेटा उपलब्ध कराने पर ज्यादा जोर था और आज जैसी नियामकीय व्यवस्था भी नहीं थी।
TAM की वापसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सब्सक्रिप्शन लागत हो सकती है। ब्रॉडकास्टर्स पहले से ही रेटिंग डेटा की लागत को लेकर संवेदनशील हैं। RPD आधारित मॉडल में इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च कम होने के कारण TAM के पास अपेक्षाकृत कम कीमत पर डेटा उपलब्ध कराने की गुंजाइश हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो उसके लिए BARC के साथ बाजार में जगह बनाना आसान हो सकता है।
हालांकि यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि TAM के आने से BARC अप्रासंगिक हो जाएगा। आज टीवी उद्योग सिर्फ BARC के आंकड़ों पर निर्भर नहीं है। अलग-अलग रिसर्च डेटासेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म से मिलने वाले आंकड़े भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
असल सवाल यह है कि रेटिंग डेटा को ‘करेंसी’ कौन बनाएगा। कोई भी डेटा अपने आप करेंसी नहीं बन जाता। उसे करेंसी तभी माना जाता है जब विज्ञापनदाता, विज्ञापन एजेंसियां और ब्रॉडकास्टर्स उस आंकड़े को लेन-देन और विज्ञापन दर तय करने के लिए स्वीकार करें।
BARC फिलहाल इंडस्ट्री संस्थाओं के संयुक्त उपक्रम के तौर पर भारत की ऑडियंस मेजरमेंट व्यवस्था का मजबूत आधार बना हुआ है। उसके नियंत्रण और संरचना से जुड़े मुद्दे सुलझने के बाद भी उसके मजबूत बने रहने की संभावना है।
भविष्य में यह भी संभव है कि BARC एक ऐसी केंद्रीय व्यवस्था के रूप में विकसित हो, जिसमें लाइसेंस प्राप्त अलग-अलग एजेंसियों से मिलने वाले मापन आंकड़ों को शामिल किया जाए। हालांकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और टीवी उद्योग आगे इस व्यवस्था को किस दिशा में ले जाते हैं।
फिलहाल TAM की संभावित वापसी ने भारतीय टीवी रेटिंग बाजार के सामने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या देश दो रेटिंग एजेंसियों के आंकड़ों को समानांतर स्वीकार करेगा या आखिरकार बाजार एक ही रेटिंग करेंसी को चुनेगा?


