छात्रों को नोटिस भेजना हो या एनएसए लगाना – डराने और परेशान करने का अलग स्तर ही है। इसका असर विरोध प्रदर्शन में भाग लेने से हतोत्साहित करने के रूप में ही दिखना था। सुप्रीम कोर्ट ने रोका है तो कारण यह भी होगा। अधिकारी नहीं समझ रहे हों तो मुझे कुछ नहीं कहना।
संजय कुमार सिंह
आज की बड़ी और महत्वपूर्ण खबरों में एक है, जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारी छात्र को नोटिस भेजने पर सीजेआई सख्त, कहा – ऐसी हिम्मत कैसे हुई। अमर उजाला में तीन कॉलम के इस शीर्षक की खबर के साथ डीसीपी का स्पष्टीकरण भी है, नोटिस से जिलाधिकारी का संबंध नहीं। इसमें कहा गया है, “गौतमबुद्ध नगर में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के चलते कार्यालय मजिस्ट्रेट तृतीय की ओर से छात्र अक्षत को 4 सितंबर को नोटिस जारी हुआ था। …. त्रुटिपूर्ण नोटिस जारी करने का गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी से कोई संबंध नहीं है।”
दैनिक भास्कर और नवोदय टाइम्स में सीजेआई के नाराजगी जताने की खबर भी पहले पन्ने पर नहीं है। देशबन्धु में लीड का शीर्षक है, छात्र को नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार। उपशीर्षक है, सीजेआई सूर्यकांत बोले, मजिस्ट्रेट ने ऐसा करने की हिम्मत कैसे की। देशबन्धु में भी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने की खबर है। अमर उजाला में एक और खबर है, आकृति से रासुका हटाने को चुनौती देगी सरकार। इसमें कहा गया है, (अक्षत) मामले के जिक्र के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि नोएडा श्रमिक आंदोलन में डीयू की छात्रा आकृति चौधरी पर से रासुका हटाने के फैसले को यूपी सरकार शीर्ष कोर्ट में चुनौती देगी। क्यों और ऐसा क्यों जरूरी है यह खबर नहीं है।
खबर के अनुसार, अक्षत को नोटिस ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने जारी किया था, न कि डीएम ने। जब पीठ ने याद दिलाया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अन्य छात्रा (आकृति चौधरी) की हिरासत के संबंध में गौतमबुद्ध नगर की डीएम के आदेश को रद्द कर मुआवजा देने का आदेश दिया था, तो मेहता ने कहा, हम उस आदेश को चुनौती दे रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि मातहत अपने बॉस के दिशानिर्देश पर ही काम करते हैं। जरूरी नहीं है कि यह निर्देश लिखित ही हो और समझने वाला हर बार सही ही समझे। कई उदाहरण हैं। अभी उनकी चर्चा की जरूरत नहीं है।
द हिन्दू की खबर के अनुसार, … ग्रेटर नोएडा के डिप्टी पुलिस कमिश्नर के एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया है कि नोटिस पहले ही वापस ले लिया गया है। इसमें शामिल अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है। बयान में यह भी कहा गया कि गौतम बुद्ध नगर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का इस मामले में कोई रोल नहीं था। छात्र अक्षत त्रिपाठी की तरफ से सीनियर एडवोकेट बिस्वजीत भट्टाचार्य ने कहा कि नोटिस जारी करना टॉप कोर्ट के 1 सितंबर के ऑर्डर का “पहली नज़र में कंटेम्प्ट” है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने बताया कि नोटिस जारी होने के अगले ही दिन वापस ले लिया गया था। लेकिन अधिवक्ता श्री भट्टाचार्य ने कहा कि नोटिस वापस लेने से टॉप कोर्ट का कंटेम्प्ट खत्म नहीं हो सकता।
अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ में यह खबर दो कॉलम की लीड है लेकिन दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है। मुख्य शीर्षक है, आदेश के बावजूद छात्र को नोटिस भेजने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज। इसका इंट्रो है, अधिकारियों ने इसे चूक बताया और कार्रवाई का भरोसा दिया। उत्तर प्रदेश सरकार एनएसए खारिज किए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट जाएगी। अखबार में सबसे महत्वपूर्ण है उसका हाईलाइट किया हुआ हिस्सा। सुप्रीम कोर्ट के हवाले से इसमें कहा गया है, अगर उन्होंने नोटिस वापस न लिया होता, तो हम उस पर तुरंत कार्रवाई करते। लेकिन हमें हैरानी है कि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस जारी किया। हमारा आदेश बिल्कुल साफ़ था—आम आदमी के लिए भी—कि सभी एफआईआर रद्द कर दी गई हैं। कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी और विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक या ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई नहीं की जाएगी।
दि इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर टॉप पर तीन कॉलम में सेकेंड लीड है। मुख्य खबर के साथ संबंधित छात्र अक्षत त्रिपाठी का भी पक्ष है। उसने कहा है कि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है … जानना चाहता है कि नोटिस क्यों जारी किया गया। जाहिर है कि मकसद बच्चों को धमकाना ही है। आंदोलन के समय इस तरह की धमकियां सोशल मीडिया पर और वैसे चर्चा में घूम रही थीं। करियर खराब कर देने और हो जाने की बातें तो होती ही रहती हैं। लेकिन नोटिस जारी किया जाना साधारण नहीं है। सरकारी नीति के अनुकूल है भले ही वापस ले लिया गया हो। इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के एक सितंबर के आदेश की ‘अवमानना’ को रेखांकित किया कहा कि छात्रों पर ‘प्रयोग’ चल रहा है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है। मुख्य खबर के साथ यह सूचना भी है कि उत्तर प्रदेश सरकार हाईकोर्ट के क्षतिपूर्ति के ऑर्डर को चुनौती देगी। कुल मिलाकर, किसी ने यह नहीं लिखा है कि उत्तर प्रदेश की सरकार मेधा रुपम का बचाव करेगी जबकि जो कर रही है वह असल में यही है और मेधा रूपम ने जो किया वह सरकार की नीति के तहत ही लगता है। भले उसके लिए कहा गया हो या नहीं और लिखित हो या नहीं। जाहिर है, काम ऐसे ही होता है। राजनीतिक दल इच्छुक अधिकारियों के जरिए अपना काम करते हैं बदले में शॉर्ट कट के रूप में इनाम पाते हैं। ऐसे तमाम उदाहरण और खबर तो हैं ही, पहले खबर होती थी अब नहीं होती। आज भी नहीं है। (जारी)
इसके आगे का हिस्सा, आज के अखबार (दो) : आकृति चौधरी के खिलाफ एनएसए हटाने के आदेश को चुनौती देने का मतलब नहीं बताते
लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/aakriti-choudhary-ke-khilaaf-nsa-hatane/

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


