डॉ ओम शंकर-
मंगलवार की शाम पद्मश्री डॉ. टी. के. लाहिड़ी सर से मेरी मुलाकात हुई… सच्चाई जानकर मेरी आँखों से आँसू निकल आए। कभी-कभी किसी घटना की सच्चाई शब्दों से नहीं, बल्कि किसी बुज़ुर्ग की आँखों में छिपे दर्द से सामने आती है। और मंगलवार की शाम मैंने वही दर्द पद्मश्री डॉ. टी. के. लाहिड़ी सर की आँखों में देखा।
मैं पाँचवें तल्ले स्थित कार्डियोलॉजी CCU में भर्ती मरीजों को देखने वाला था और उसके बाद वहीं स्थित कार्डियोथोरेसिक ICU में जाकर लाहिड़ी साहब से मिलता, जहाँ वे पिछले 8 महीनों से भर्ती थे। लेकिन जैसे ही मैं पाँचवें तल्ले स्थित अपने कार्डियोलॉजी CCU के गेट पर पहुँचा, मेरी नज़र अचानक उस दृश्य पर पड़ी, जिसने मुझे भीतर तक छू लिया।
सामने पद्मश्री डॉ. टी. के. लाहिड़ी साहब थे। गले में आला (स्टेथोस्कोप) लटका हुआ था। और वे अकेले टहलते हुए कार्डियोथोरेसिक ICU के गेट से बाहर आ रहे थे।
मैंने सीधे उनके पास गया। झुककर उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने हमेशा की तरह मुस्कुराकर मेरा अभिवादन स्वीकार किया। मैंने बातचीत शुरू करने के लिए सहजता से पूछा— “सर, आप आला लगाकर कहाँ घूम रहे हैं?”
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा— “अभी मरीजों का शाम वाला राउंड ले रहा था।”
मैंने पूछा— “सभी मरीज ठीक हैं?”
उन्होंने हाँ में जवाब दिया।
सोचिए… आठ महीने से ICU में भर्ती एक वृद्ध चिकित्सक, जो स्वयं मरीज है, वह भी शाम के समय अपने गले में स्टेथोस्कोप डालकर दूसरे मरीजों का हाल पूछ रहा है।
जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जिंदगी मरीजों की सेवा में लगा दी, वह खुद अस्पताल के बिस्तर पर होते हुए भी मरीजों की चिंता कर रहा था। यही लाहिड़ी सर हैं।
बात करते-करते मैं उनके साथ उनके ICU बेड तक पहुँच गया। वहीं उनका शाम का खाना रखा हुआ था।
मैंने कहा— “सर, खाना खा लीजिए।”
उन्होंने पूछा— “कितना समय हुआ है?”
मैंने कहा— “सात बज रहे हैं।”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा— “अभी खाना नहीं खाऊँगा, अभी जल्दी है।”
मैं उनके व्यवहार को समझने की कोशिश कर रहा था। मैं जानना चाहता था कि इतने लंबे समय से अस्पताल में रहने के बावजूद उनकी याददाश्त और मानसिक स्थिति कैसी है।
मैंने पूछा— “सर, आपको मछली पसंद है?”
उन्होंने तुरंत कहा— “हाँ, बहुत पसंद है मुझे।”
मैंने पूछा— “मुर्गा पसंद है?”
उन्होंने कहा— “नहीं।” और फिर अचानक खुद ही मुस्कुराकर मेरे ऊपर कटाक्ष करते हुए बोले— “अब तुम पूछोगे कि सर, गोट, लैम्ब और बीफ खाते हैं? तो जवाब है नहीं।”
फिर वे स्वयं विदेश की अपनी पुरानी स्मृतियों की बात करने लगे। बोले कि जब वे FRCS करने के दौरान 5 वर्षों तक विदेश में थे, तब वहाँ भारतीय लोगों को भी बीफ खाते देखा था।
फिर पढ़ाई के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि वो कोलकाता से MBBS और एम्स दिल्ली से McH, 1972 में किए थे।
जब मैंने उनके घर के बारे में पूछा, तो उन्होंने अपना घर कोलकाता शहर में बताया। उनकी बातें सुनते हुए मैं सिर्फ एक चिकित्सक की याददाश्त नहीं परख रहा था।
मैं एक ऐसे इंसान को देख रहा था, जिसने जीवन के इतने वर्ष दूसरों की सेवा में बिताए हैं।
फिर मैंने उनके साथ कार्डियोथोरेसिक-कार्डियोलॉजी फ्लोर पर टहलना शुरू किया। लगभग 100 मीटर के इस रास्ते पर चलते हुए मैंने पूछा— “क्या आप रोज टहलते हैं?”
उन्होंने हाँ कहा।
फिर मैंने पूछा— “सर, आप BHU में कब से हैं?”
वे मुस्कुराए और बोले— “तुम्हारे जन्म के पहले से।”
फिर बोले— “50 सालों से।”
मैंने उनकी याददाश्त को और समझने के लिए पूछा— “जब आप यहाँ ज्वॉइन किए थे, तब आप अकेले कार्डियोथोरेसिक सर्जन होंगे?”
उन्होंने तुरंत जवाब दिया— “नहीं, मेरे अलावा भी और सर्जन मुझसे पहले से यहाँ थे।”
मैंने पूछा— “मैडम भी क्या आपके पहले से यहाँ थीं?”
उन्होंने कहा— “नहीं, वो मेरे ज्वॉइन करने के बाद यहाँ ज्वॉइन की थीं।”
फिर मैंने पूछा— “तब BHU के वाइस चांसलर कौन थे?”
उन्होंने बिना किसी झिझक के जवाब दिया— “श्री कालू लाल श्रीमाली।”
और फिर खुद ही बताया कि वे पहले केंद्र में शिक्षा मंत्री थे और उसके बाद यहाँ के VC नियुक्त किए गए थे। उस समय तक मैं उनसे सामान्य बातचीत कर रहा था। लेकिन फिर मैंने वह सवाल पूछा, जिसे पूछने के लिए शायद मैं वहाँ सबसे अधिक बेचैन था।
मैंने उनका विश्वास लेकर धीरे से पूछा— “सर, क्या आपके साथ डॉ. अरविंद पांडे द्वारा मारपीट की गई थी?”
यह सवाल सुनते ही उनके चेहरे का भाव बदल गया। वे भावुक हो गए। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था, जिसे शब्दों में बयान करना मेरे लिए मुश्किल है। उन्होंने फिर बाईं आँख की तरफ इशारा किया और हाँ में जवाब दिया। उस क्षण मेरी अपनी आँखें भी नम हो गईं।
मैं सोचने लगा— जिस हाथ में जीवन बचाने का हुनर था, क्या उसी शरीर पर किसी ने हाथ उठाया होगा? जिस व्यक्ति ने दशकों तक दूसरों के दिलों की धड़कनें संभालीं, क्या आज हमें उसके अपने दिल में छिपा दर्द सुनने के लिए भी इतनी मशक्कत करनी पड़ेगी?
इसके बाद मैंने वहाँ मौजूद अन्य कर्मचारियों से भी घटना की वास्तविकता जानने का प्रयास किया। उनसे मिली जानकारी के अनुसार, 29 अगस्त को डॉ. अरविंद पांडे द्वारा लाहिड़ी साहब पर थप्पड़ और घूँसों से प्रहार किए जाने की बात सामने आई, जिसे फोर्सफुल रेस्ट्रेंट बताया गया है।
बताया गया कि यह सब देखकर वहाँ ड्यूटी पर मौजूद एक कर्मचारी ने दौड़कर उन्हें पकड़ा और कहा— “ये क्या कर रहे हो, सर आप?”
तब जाकर डॉ. अरविंद पांडे रुके। पड़ताल के दौरान मुझे यह भी बताया गया कि लाहिड़ी साहब उस समय बिल्कुल स्वस्थ थे और पॉटी में लेटे होने, साफ-सफाई में सहयोग न करने तथा थूकने वाली पूरी कहानी सही नहीं है।
बताया गया कि उस दिन लाहिड़ी साहब सिर्फ अपने आवंटित फ्लैट में जाने की जिद कर रहे थे। इसी बात को लेकर उनकी डॉ. अरविंद पांडे से बहस हुई और उसके बाद कथित रूप से उनके साथ मारपीट की गई।
29 अगस्त को लिए गए फोटोग्राफ में चोटों के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं, लेकिन जांच कमिटी के सदस्यों को ये बिल्कुल नहीं दिखता है। उनके दाहिने ललाट के ऊपर तस्वीर को ज़ूम करके देखने पर उँगलियों के निशान जैसे दिखाई देते हैं। उसी तरह बाईं आँख में हैमरेज और आँख के चारों तरफ मुक्के के निशान जैसे दिखाई देते हैं।
इन तस्वीरों को देखकर मन में एक ही सवाल उठता है— आखिर एक वृद्ध चिकित्सक के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उनके चेहरे पर ये निशान दिखाई दिए?
यह वास्तव में फोर्सफुल रेस्ट्रेंट था अथवा बेरहमी से उनकी पिटाई? इसके साथ ही एक गैर चिकित्सक माननीय मंत्री महोदय श्री रविन्द्र जायसवाल जी द्वारा भी आँख में लालिमा देखे जाने की बात उनके द्वारा लिखे पोस्ट से सामने आई है।
उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा है कि वहाँ जाने पर इलाज के दौरान हुई कथित अभद्रता का पता चलना और आँख की लालिमा के बारे में लाहिड़ी साहब द्वारा दिया गया जवाब भी कई सवाल खड़े करता था।
कल BHU अड्डा पर माननीय कार्यकारिणी परिषद के सदस्यों की डॉ. लाहिड़ी साहब से मुलाकात की जो तस्वीर साझा की गई है, उस तस्वीर को भी zoom करके देखने पर घटना के 12 दिन बीत जाने के बाद भी बाएँ ललाट और बाईं तरफ की भौंह पर (लाल घेरे में) काले निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, जो घटना के दिन लिए तस्वीरों तथा 12 दिनों की नेचुरल हीलिंग प्रक्रिया को दर्शाने के लिए प्रयाप्त हैं।
एक बार उस तस्वीर को ध्यान से देखिए। चेहरा पढ़िए। उन निशानों को देखिए। और फिर अपने आप से पूछिए— क्या हम सचमुच इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि एक वृद्ध, पद्मश्री से सम्मानित चिकित्सक के चेहरे पर दिखाई दे रहे चोट के निशानों को भी अनदेखा कर दें?
लाहिड़ी सर कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं।
- उन्होंने अपने जीवन के लगभग 50 वर्ष BHU को दिए हैं।
- उन्होंने असंख्य मरीजों की सेवा की है।
- देश ने उनकी सेवा को पद्मश्री जैसे सम्मान से सम्मानित किया है।
- और आज वही वृद्ध चिकित्सक पिछले 8 महीनों से ICU में भर्ती हैं।
ऐसे व्यक्ति के साथ यदि कोई मारपीट हुई है, तो यह केवल एक व्यक्ति के साथ हुई घटना नहीं है। यह चिकित्सा profession की गरिमा पर सवाल है। यह बुज़ुर्गों के सम्मान पर सवाल है। यह उस संस्थान की संवेदनशीलता पर सवाल है, जिसे उन्होंने अपने जीवन का इतना बड़ा हिस्सा दिया।
इस सबके बावजूद यदि BHU द्वारा गठित जाँच कमिटी के सदस्यों और चिकित्सा अधीक्षक को कुछ दिखाई नहीं दे रहा है, तो उनकी निष्पक्षता और चिकित्सीय ज्ञान दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। जांच सदस्यों के डॉ अरविंद पांडे के कॉन्फलिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट की भी जांच की जानी चाहिए।
लेकिन मैं किसी से पूर्वाग्रहपूर्ण निर्णय की माँग नहीं कर रहा। मैं सिर्फ सच्चाई चाहता हूँ।
यदि BHU प्रशासन के दावे सही हैं, तो उन्हें सबसे पहले घटना का FIR लंका थाने में दर्ज करवाना चाहिए ताकि पुलिस अपना जांच कर पाए। और यदि मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से जाँच में पाए गए तथ्य सही हैं, तो उनका भी निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए। इसलिए मेरी माँग है कि आज या कल विश्वविद्यालय प्रशासन एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस करे।
मीडिया के सामने पूरी घटना से संबंधित साक्ष्य रखी जाए। सभी संबंधित रिकॉर्ड सामने रखे जाएँ। घटना के समय की परिस्थितियाँ बताई जाएँ। फोर्सफुल रेस्ट्रेंट का चिकित्सकीय औचित्य बताया जाए।
29 अगस्त के चोटों और आज उसके बचे हुए निशानों का मीडियाकर्मियों द्वारा सार्वजनिक अवलोकन करवाई जाए। और सबसे महत्वपूर्ण— लाहिड़ी साहब को स्वयं मीडिया के सामने आने दिया जाए, ताकि देश उनकी अपनी जुबान से उनकी बात सुन सके।
क्योंकि सच्चाई को किसी बंद कमरे में कैद करके नहीं रखा जा सकता। अगर प्रशासन प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से या लाहिड़ी साहब को स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने देने से इनकार करता है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि आखिर ऐसा क्यों? क्या किसी को बचाने की कोशिश हो रही है? या फिर प्रशासन को अपनी ही जाँच पर भरोसा नहीं है?
आज जरूरत किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। आज जरूरत सत्य के पक्ष में खड़े होने की है।
मैं आप सभी से सिर्फ इतना कहूँगा— एक बार लाहिड़ी सर की तस्वीर देखिए।
उनका चेहरा देखिए। उनकी आँखों में झाँकिए। और फिर कल्पना कीजिए कि जिस वृद्ध डॉक्टर ने अपनी पूरी जिंदगी मरीजों की सेवा में लगा दी, आज वही डॉक्टर अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा हुआ अपने साथ हुई घटना के बारे में भावुक होकर अपनी आँख की तरफ इशारा कर रहा है।
अगर उस क्षण आपका दिल नहीं भर आता… अगर आपकी आँखें नम नहीं होतीं… तो शायद हमें अपने भीतर के इंसान से एक बार फिर सवाल पूछने की जरूरत है।
लाहिड़ी सर को दया नहीं चाहिए। उन्हें न्याय चाहिए। उन्हें किसी की कृपा नहीं चाहिए।
उन्हें सच चाहिए। और अगर उनके साथ वास्तव में अन्याय हुआ है, तो उन्हें अकेला छोड़ देना हम सबके लिए शर्म की बात होगी।
आज आवाज़ लाहिड़ी सर की नहीं, हमारी होनी चाहिए। न्याय के लिए। सच्चाई के लिए। एक वृद्ध चिकित्सक के सम्मान के लिए।
Related News…


