देवप्रिय अवस्थी-
भास्कर रायपुर में सवा साल…
मैं रायपुर पहुंचा तब नए राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के महज 50 दिन हुए थे. मुझ से पहले भास्कर, रायपुर के प्रभारी संपादक बैंक अधिकारी सह पत्रकार विजय शंकर मेहता थे. वे उन दिनों बैंक से निलंबित चल रहे थे और अक्सर अपने गृह नगर उज्जैन जाते रहते थे. मेहता जी की अनुपस्थिति में अनुभवी पत्रकार रमेश नैयर सलाहकार संपादक के रूप में अखबार का कामकाज देखते थे. पीढ़ियों के अंतर वाली भोपाल जैसी समस्या रमेश नैयर और सुधीर अग्रवाल के बीच यहां भी रही थी. भास्कर समूह का यह अकेला संस्करण था जिसकी प्रिंट लाइन में संपादक की जगह समूह के चेयरमैन रमेशचंद्र अग्रवाल का नाम छपता था. यहां महाप्रबंधक अवनींद्र जोशी थे जो चौथा संसार, इंदौर में भी इसी भूमिका में काम कर चुके थे.
मेरे काम संभालने के दिन से ही चीफ रिपोर्टर अनिल पुष्कर (पुसदकर) ने दफ्तर आना बंद कर दिया इसलिए एक अनजाने शहर को समझना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल रहा. राज्य ब्यूरो की जिम्मेदारी रवि भोई के पास थी जो भोपाल से स्थानांतरित होकर अपने गृहनगर आए थे.
धनंजय सिंह उनके सहयोगी थे. शहर की रिपोर्टिंग नवाब फाजिल, शिव दुबे, नवीन शर्मा और मोहम्मद निजाम करते थे. अकादमी के पांच साथी-ब्रह्मवीर सिंह, चक्रेश महोबिया, प्रमोद चौबे, दिव्या शर्मा और होरीलाल पटेल मुझ से कुछ दिन पहले ही रायपुर आ चुके थे. ऊर्जा से भरे ये साथी हर तरह की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार रहते थे.
कुछ दिन बाद दिवाकर मुक्तिबोध समाचार संपादक के रूप में इस टीम से जुड़ गए जिससे रिपोर्टिंग पक्ष और भी मजबूत हो गया. दिवाकर जी पहले नवभारत के बिलासपुर संस्करण के प्रभारी संपादक थे. उनकी पहल पर “भास्कर संवाद’ नाम से एक मासिक कार्यक्रम शुरू किया गया जिसमें शहर की समस्याओं पर प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि और शहर के प्रमुख बुद्धिजीवी चर्चा करते थे. यह शहर के लोगों को जोड़ने की सार्थक पहल थी. प्रयोगधर्मी दिवाकर जी इसके पहले भी वार्ड संवाददाता और रूबरू जैसे अनूठे प्रयोग कर चुके थे.
सेंट्रल डेस्क के प्रमुख प्रशांत शर्मा थे. वीरेंद्र शर्मा, आबिद अली, अनुपम राजीव राजवैद्य, कैलाश शर्मा उनके सहयोगी जैसे. प्रादेशिक डेस्क राजेश जोशी, जितेंद्र शर्मा, प्रशांत शर्मा(द्वितीय), नईम शीरो, शशांक खरे देखते थे. आसिफ इकबाल, राजेश दुबे और यामिनी नामपल्लीवार स्थानीय फीचर डेस्क संभालने के साथ कभी-कभी विशेष रिपोर्टिंग भी करते थे. दो अन्य साथी वीरेंद्र शुक्ल और अनिल पुरोहित विज्ञप्तियां देखते थे.
रायपुर संस्करण के अंतर्गत भिलाई सबसे महत्वपूर्ण ब्यूरो था. वहां पूरी तरह अराजकता का माहौल था. मेरे आग्रह पर सुधीर जी ने प्रमोद भारद्वाज को वहां भेजा. भारद्वाज ने सख्ती से काम लेकर वहां का माहौल बदला. वहां से एक साथी ददन सिंह का भोपाल दंडात्मक स्थानांतरण भी करना पड़ा. जगदलपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बालोदा बाजार में ब्यूरो कार्यालय थे.
तड़के 4:15 तक का कवरेज
एक मौका ऐसा भी आया जब हमारी डेस्क ने लोकसभा में तड़के 4:15 बजे हुए शक्ति परीक्षण को कवर करने का कमाल किया. ऐसा करने वाला वह देश का संभवतः अकेला अखबार था. गूगल बाबा के मुताबिक वह 22 अगस्त 2001 की तारीख थी जब सदन में एक संविधान संशोधन बिल पर मतदान हुआ था. मेरी सिफारिश पर प्रबंधन ने डेस्क और प्रिंटिंग विभागों के लिए विशेष पुरस्कार राशि स्वीकृत की थी.
कमल की 12 पंखुड़ियां टूटीं
21 दिसंबर 2001 को छत्तीसगढ़ के 35 भाजपा विधायकों में से 12 ने टूटकर ‘छत्तीसगढ़ विकास पार्टी’ बनाई. इस आशय का संकेत ब्यूरो के साथी रवि भोई ने एक छोटी खबर में एक दिन पहले दे दिया था. इस खबर की बैनर हेडिंग ‘कमल की 12 पंखुड़ियां टूटीं’ बहुत चर्चित रही. बाद में नई पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया.
छोटा राज्य, छोटा शहर और स्थानीय लोग बहुत भले-भोले होने के कारण रायपुर में काम करना बहुत आनंददायी था. राज्य की दो बड़ी हस्तियां-मुख्यमंत्री अजीत जोगी और भाजपा के प्रदेश
अध्यक्ष लखीराम अग्रवाल मुझ से कुछ-कुछ खफा रहते थे. मेरे लिहाज से यह आदर्श स्थिति थी और इस बात का प्रमाण भी कि अखबार ठीक-ठाक निकल रहा है. जोगी जी ने कम से कम दो बार वरिष्ठ अधिकारी भेजकर खबरों के ट्रीटमेंट/प्लेसमेंट के बारे में कुछ निर्देश/सुझाव देने की कोशिश की. मेरा जवाब था, ‘मैं प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल के अलावा किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हूं. इसलिए किसी और के निर्देश/सुझाव पर अमल नहीं कर सकता.’ लखीराम अग्रवाल भी एक दिन दफ्तर आ धमके. उन्होंने शिकायतों का पिटारा खोला ही था कि मैंने कहा कि न तो आप अपनी पार्टी को संभाल पा रहे हैं और न जनता के मुद्दों को उठा पा रहे हैं. इस पर वे निरुत्तर रह गए.
फरवरी 2002 में भास्कर समूह के संपादकों की एक बैठक कसौली (हिमाचल प्रदेश) में हुई. इस बैठक में मैंने सभी संस्करणों में छपने वाले एजेंसियों और विभिन्न ब्यूरो कार्यालयों के समाचार बनाने के लिए एक केंद्रीय डेस्क के गठन का सुझाव दिया. मेरा मानना था कि ऐसा करने से सभी संस्करणों में छपने वाली खबरों के अनुवाद/संपादन में एकरूपता आएगी और एक ही खबर का अनुवाद/संपादन कई जगह किए जाने की जरूरत नहीं रह जाएगी. बैठक में इस बाबत कोई फैसला नहीं हुआ, लेकिन रायपुर लौटने के दो-तीन दिन बाद श्रवण जी ने टेलीफोन पर बताया कि सुधीर जी ने समूह की केंद्रीय डेस्क बनाने का आपका सुझाव मान लिया है. यह डेस्क 1 अप्रैल से जयपुर में काम शुरू करेगी. सुझाव आपका था, इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी आपकी रहेगी. आप रायपुर में अपना काम समेटकर मार्च के आखिरी सप्ताह में जयपुर पहुंच जाइए. रायपुर से जयपुर आते समय एक दिन भोपाल रुककर सुधीर जी से डेस्क के स्टाफ और दूसरे संसाधनों के बारे में विस्तार से बात कर लीजिए.
वर्तनी नियमावली बनाने, अकादमी की अवधारणा को साकार करने और भोपाल तथा रायपुर संस्करणों को प्रसार संख्या व गुणवत्ता के लिहाज से नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने के बाद केंद्रीय डेस्क की जिम्मेदारी मिलने से मुझे इस बात का संतोष था कि सीमित क्षमताओं के बावजूद मैं भास्कर समूह के लिए थे. अपनी उपयोगिता साबित कर सका हूं. रायपुर का मेरा यादगार और संतोषप्रद पड़ाव लगभग सवा साल का रहा. मार्च के आखिरी हफ्ते में मैं नई जिम्मेदारी संभालने जयपुर पहुंच गया.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (14): भास्कर अकादमी में प्रशिक्षण लेने वाले 16 में से 13 साथी आज भी पत्रकारिता और लेखन में सक्रिय हैं, सिर्फ तीन ने अलग कारणों से पत्रकारिता छोड़ दी!


