नई दिल्ली। क्या अदालतों के जरिए किसी कंपनी या कारोबारी से जुड़ी पुरानी खबरों को इंटरनेट की खोज से गायब कराया जा सकता है? वित्तीय पत्रकारिता से जुड़े एक गंभीर विश्लेषण में इस सवाल को लेकर चिंता जताई गई है। आरोप है कि कुछ कॉरपोरेट घराने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’, जॉन डो आदेश और एकतरफा अदालती आदेशों का इस्तेमाल कर अपने खिलाफ प्रकाशित खबरों को हटवाने या सर्च इंजन से छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
इसका सबसे बड़ा असर उन खबरों पर पड़ रहा है जो कंपनियों या उनके प्रवर्तकों से जुड़े नियामकीय कार्रवाई, आर्थिक अपराध, धोखाधड़ी के आरोप या अदालतों में चले मामलों की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पर आधारित हैं। मामला सिर्फ मीडिया की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध निवेशकों के उस अधिकार से भी है जिसके तहत वे किसी कंपनी या कारोबारी के पुराने रिकॉर्ड की जानकारी हासिल कर सकें।
दरअसल, भारत ने 1992 में पूंजी बाजार के लिए खुलासा आधारित व्यवस्था को अपनाया था। इसमें नियामक की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि निवेशकों के सामने जरूरी तथ्य उपलब्ध हों, जबकि निवेशक को उन तथ्यों के आधार पर फैसला लेना होता है। ऐसे में अगर किसी कंपनी के पुराने विवाद, नियामकीय कार्रवाई या अदालत से जुड़े मामले इंटरनेट पर खोजने से ही गायब हो जाएं तो निवेशक के पास पूरी जानकारी जुटाने का रास्ता कमजोर हो जाता है।
जॉन डो आदेश बना नया हथियार
लेख के मुताबिक अब कुछ मामलों में कंपनियां सीधे संबंधित खबर प्रकाशित करने वाले मीडिया संस्थानों के बजाय गूगल, मेटा जैसे प्लेटफॉर्म को मुख्य पक्ष बनाकर अदालत पहुंच रही हैं। इसके साथ जॉन डो यानी अज्ञात पक्ष के खिलाफ व्यापक आदेश की मांग की जाती है। ऐसे आदेशों के जरिए केवल एक-दो खबरों को ही नहीं, बल्कि भविष्य में सामने आने वाली समान सामग्री को भी हटाने का रास्ता तैयार हो सकता है।
चिंता इस बात को लेकर भी है कि कुछ आदेश एकतरफा यानी एक्स-पार्टी तरीके से दिए जा रहे हैं। ऐसे मामलों में संबंधित मीडिया संस्थान को अपना पक्ष रखने का मौका मिलने से पहले ही सामग्री हटाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कई मामलों में एक साथ कई समाचार संस्थानों और बड़ी संख्या में इंटरनेट लिंक को हटाने के निर्देश दिए जाने का दावा किया गया है।
सर्च से खबर गायब होना, वेबसाइट पर मौजूद रहने के बावजूद असर खत्म
डिइंडेक्सिंग यानी सर्च इंजन से किसी खबर को हटाने का प्रभाव खासा गंभीर है। खबर मूल वेबसाइट पर मौजूद रहने के बावजूद सामान्य पाठक या निवेशक उसे गूगल जैसे सर्च इंजन के जरिए आसानी से नहीं खोज पाता। आज जब पत्रकार, शोधकर्ता ही नहीं बल्कि एआई आधारित सिस्टम भी इंटरनेट सर्च पर काफी निर्भर हैं, ऐसे में किसी खबर का सर्च से गायब होना व्यावहारिक तौर पर उसके सार्वजनिक पहुंच से बाहर होने जैसा है।
लेख में कहा गया है कि इस तरीके का इस्तेमाल पहले ही एक प्रमुख कारोबारी से जुड़े यौन उत्पीड़न के आरोपों की खबरों को सर्च से हटाने के लिए किया जा चुका है। यदि इस चलन को चुनौती नहीं दी गई तो भविष्य में आर्थिक रूप से मजबूत कारोबारी और कंपनियां भी इसी रास्ते का इस्तेमाल कर सकती हैं।
कंपनी का नाम बदलना भी पुराना तरीका
कंपनियों के नाम बदलना अपने आप में कोई गलत काम नहीं है। विलय, अधिग्रहण और कारोबार के पुनर्गठन जैसे कई वैध कारणों से कंपनियां नाम बदलती हैं। लेकिन लेख में दावा किया गया है कि कुछ संदिग्ध कारोबारी अतीत से जुड़ी पहचान को धुंधला करने के लिए भी नाम बदलने का सहारा लेते रहे हैं।
समस्या तब और बढ़ जाती है जब पुरानी कंपनी के नाम से जुड़ी नकारात्मक खबरें सर्च इंजन से भी हटा दी जाएं। ऐसे में किसी नए नाम वाली कंपनी के बारे में सामान्य इंटरनेट सर्च करने वाले निवेशक को उसके पुराने विवादों का पता लगाना बेहद मुश्किल हो सकता है।
समझौता हुआ तो क्या पुरानी खबर भी मिटा दी जाए?
लेख में सबसे गंभीर सवाल उन मामलों को लेकर उठाया गया है जिनमें कंपनियां नियामकीय या कानूनी मामलों का समझौते के जरिए निपटारा करती हैं। समझौता होने का अर्थ यह नहीं होता कि आरोप गलत साबित हो गए या संबंधित पक्ष को अदालत ने पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दिया।
ऐसे मामलों में अगर प्रवर्तन एजेंसी की प्रेस विज्ञप्ति, अदालत के आदेश या नियामकीय कार्रवाई पर आधारित खबर को भी हटाने की मांग की जाती है तो इससे निवेशकों को उस मामले के अस्तित्व तक का पता नहीं चलेगा। किसी कारोबारी के पिछले रिकॉर्ड का आकलन करने वाले निवेशक के लिए यह महत्वपूर्ण जानकारी हो सकती है कि कंपनी या उसके प्रमोटर के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई हुई थी और मामला किस तरह खत्म हुआ।
सेबी से भी सवाल
लेख में कहा गया है कि इस पूरे मुद्दे को सेबी के शीर्ष स्तर तक पहुंचाया जा चुका है, लेकिन अभी तक इस पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सवाल यह है कि जिस पूंजी बाजार व्यवस्था की बुनियाद ही पर्याप्त जानकारी और खुलासे पर टिकी है, वहां पुराने नियामकीय रिकॉर्ड और वित्तीय पत्रकारिता को सर्च से गायब किए जाने पर नियामक कब स्पष्ट रुख अपनाएगा।
लेख का तर्क है कि किसी व्यक्ति को ऐसी शिकायत से हमेशा के लिए जोड़कर रखना उचित नहीं है जिसे वह कानूनी रूप से खत्म कर चुका हो। लेकिन ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ का इस्तेमाल वित्तीय गड़बड़ियों का इतिहास मिटाने के लिए नहीं होना चाहिए।
मीडिया संस्थानों के लिए भी यह मामला गंभीर चेतावनी है। यदि निचली अदालतों में एकतरफा आदेशों के जरिए तथ्यात्मक और सार्वजनिक रिकॉर्ड पर आधारित खबरों को हटाने का सिलसिला बढ़ता गया तो इसका असर सिर्फ कुछ वेबसाइटों या पत्रकारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेशकों के सूचना के अधिकार और स्वतंत्र वित्तीय पत्रकारिता दोनों पर पड़ेगा।


